26 नवंबर 2008 की रात करीब 9:30 बजे से लेकर 29 नवंबर 2008 की सुबह तक चले मुंबई आतंकी हमले ने पूरे भारत को स्तब्ध कर देने वाली घटना थी।
पाकिस्तान के कराची से नाव के जरिए आए लश्कर-ए-तैयबा के दस आतंकवादियों ने शहर के पांच प्रमुख स्थानों पर एक साथ हमला बोला। छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस, ताज महल पैलेस एंड टावर होटल, ओबेरॉय-ट्राइडेंट होटल, नरीमन हाउस (चाबाड हाउस) और लियोपोल्ड कैफे तथा कामा अस्पताल के आसपास ये हमले हुए।
आतंकवादी 22 नवंबर को ही कराची से निकले थे। उन्होंने भारतीय मछली पकड़ने वाली नाव ‘कुबेर’ को हाईजैक किया, उसके चार क्रू मेंबर्स को मार डाला और कप्तान अमर सिंह सोलंकी का गला रेत दिया। 26 नवंबर की शाम कोलाबा तट के पास पहुंचकर वे रबर डिंगी से उतरे और चार-चार के दो ग्रुप में बंट गए। हर आतंकी के पास AK-47, हैंड ग्रेनेड, RDX और भरपूर गोलियां थीं। सैटेलाइट फोन के जरिए पाकिस्तान में बैठे उनके हैंडलर उन्हें हर पल निर्देश दे रहे थे।
सबसे पहले CST रेलवे स्टेशन पर अजमल कसाब और इस्माइल खान ने अंधाधुंध गोलीबारी शुरू की। कुछ ही मिनटों में 58 लोग मारे गए और सैकड़ों घायल हुए। वहां का CCTV फुटेज आज भी देखकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं। इसके बाद दो-दो आतंकी ताज और ओबेरॉय होटल में घुसे, बंधक बनाए, कमरों में आग लगाई और ग्रेनेड फेंके। ताज होटल लगातार जलता रहा। नरीमन हाउस में छह यहूदियों समेत सभी बंधकों को बेरहमी से मार डाला गया, जिनमें रब्बी गैब्रिएल होल्ट्जबर्ग और उनकी गर्भवती पत्नी रिव्का भी शामिल थीं।
कुल 166 लोग मारे गए, जिनमें 18 विदेशी नागरिक थे। 308 से ज्यादा घायल हुए। जवाबी कार्रवाई में मुंबई पुलिस और ATS ने तुरंत मोर्चा संभाला। असिस्टेंट सब-इंस्पेक्टर तुकाराम ओंबले ने अकेले दम पर कसाब को जिंदा पकड़ लिया और खुद बलिदान दे दिया। दिल्ली से NSG कमांडो पहुंचे। ऑपरेशन टॉरनेडो और ब्लैक टॉरनेडो चलाकर 29 नवंबर की सुबह तक तीनों जगहों को आतंकियों से मुक्त कराया गया। इस दौरान NSG के मेजर संदीप उन्नीकृष्णन, हवलदार गजेंद्र सिंह सहित कुल 18 जांबाजों ने देश के लिए बलिदान दे दिया।
जांच में अमेरिकी नागरिक डेविड कोलमैन हेडली की गवाही से पूरी साजिश सामने आई। उसने बताया कि लश्कर ने कई महीनों तक मुंबई की रेकी कराई थी। अजमल कसाब को 3 मई 2010 को मौत की सजा सुनाई गई और 21 नवंबर 2012 को पुणे की येरवदा जेल में फांसी दे दी गई। लश्कर सरगना हाफिज सईद को भारत लगातार ग्लोबल टेररिस्ट घोषित कराने की कोशिश करता रहा और आखिरकार 2019 में संयुक्त राष्ट्र ने उसे वैश्विक आतंकी घोषित किया।
26/11 भारत का वह घाव है जो आज भी ताजा है। हर साल इस दिन को आतंकवाद विरोधी दिवस के रूप में मनाया जाता है और उन सभी वीरों को याद किया जाता है जिन्होंने मुंबई और हिंदुस्तान को बचाने के लिए अपना बलिदान दे दिया।
गहराई से सोचो अगर सब इंस्पेक्टर तुकाराम ओम्बले ने लाठी के सहारे अजमल कसाब को नहीं पड़ा होता तो मरने वालों की संख्या लाखों में होती और मुंबई के पुलिस एनएसजी के कमांडो भी इनको नहीं पकड़ पाए।
क्योंकि इन आठ आतंकवादियों को करने में सर्व सुविधा संपन्न और सबसे उच्च श्रेणी के भारत के 18 एनएसजी के कमांडो मारे गए थे और एक भी आतंकी को वू पकड़ नहीं पाए थे
कहा तो यहां तक जाता है कि इस आतंकवादी हमले में बड़े-बड़े लोगों का समर्थन प्राप्त था और 19 कृष्णा जो मारे गए वह गलतफहमी का शिकार हो गए थे बहुत सारी बातें सामने आई लेकिन सब की सब दफन हो गए थे असली सच कभी सामने नहीं आएगा
जैसे की समुद्र का सारा सुरक्षा तंत्र कहां था जब पाकिस्तान से भारत तक चले आए तो देश का सारा उपग्रह सिस्टम कहां काम कर रहा था नेवी सिस्टम कहां था जल पुलिस कहां थी और साथ तंत्र का भारतीय गुप्तचर तंत्र कहां सोया था रिसर्च एंड एनालिसिस विंग से लेकर सीबीआई सब कहां थे और जब यह लोग खूनी खेल खेल रहे थे तो भारत के हेलीकॉप्टर और हवाई जहाज कहां थे क्या होटल ताज होटल छत्रपति शिवाजी टर्मिनल पूरी तरह सुरक्षा विहीन था जितना सोचते जाओगे उतना ही पागलपन की हद तक पहुंच जाओगे
सबसे दुख की बात परमवीर तुकाराम अंबाला को ना तो अशोक चक्र दिया गया ना भारत रत्न दिया गया जबकि दुनिया भर का घपला घोटाला करके देश बांटने वाले और काला धन कमाने वाले राजनेताओं को यहां तक की मुलायम जैसों को पद्म पुरस्कार मिल जाता है
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