परीक्षाओं की तानाशाही और निरंकुश्ता परीक्षा देने वाले छात्र-छात्राओं के लिए अभिशाप बनी -डॉ दिलीप कुमार सिंह
अद्भुत सरकार है और अद्भुत है उसका परीक्षा तंत्र हर बार हर परीक्षा में या तो प्रश्न पत्र आउट हो जाते हैं या लीक हो जाते हैं या कुछ न कुछ तकनीकी कमी के कारण लाखों लाख छात्रों की परीक्षा एक झटके में रद्द हो जाती है और हर एक छात्रा का हजारों रुपए पानी में डूब जाता है ।
इसके अलावा भारत की परीक्षाएं भी धन्य है जो सीधे-सीधे सनातन धर्म पर प्रहार हैं यह देखकर बहुत ही अपमानित महसूस किया जाता है कि इस परीक्षा में सनातनी महिलाओं के हार मंगलसूत्र नाक और कान में पहनने वाले आभूषण यहां तक की पैरों में पहनने वाली पायल और मीना तक निकाल लिया जाता है क्या सचमुच पागल हो गया है हमारा परीक्षा तंत्र इन चीजों से परीक्षा में भला क्या खतरा हो सकता है समझ के बाहर है । तुम्हें जब नाका भेजो बुर्का की बात आती है तो सारा तंत्र प्रशासन और न्यायपालिका भी चुप हो जाती है।
जहां तक घड़ी और किसी डिजिटल उपकरण को ले जाना है वहां तक तो कुछ बात समझ में भी आती है लेकिन ऐसा सिस्टम क्यों नहीं विकसित करते हैं की छात्राओं के प्रवेश करते समय ही ऐसी मशीन लगा दीजिए जिससे दूध का दूध और पानी का पानी हो जाए लेकिन ऐसा कुछ नहीं होने वाला है हम लोग तो इतनी परीक्षा दे डाले नल का नामोनिशान नहीं कभी कुछ भी ऐसा नहीं देखने को मिला जैसा आजकल नंगा नाच हो रहा है कहावत है कि चोर को सब चोर और बेईमान को सब बेईमान दुराचारी को सब दुराचारी ही दिखते हैं।
एक खेल और खेलते हैं हमारे परीक्षा से जुड़े हुए तथाकथित युग पुरुष लोग परीक्षाओं को इतना दूर-दूर कर देते हैं की बस ट्रेन सड़क सब कुछ जाम हो जाता है और अधिकांश परीक्षार्थियों के लिए अपने परीक्षा केंद्र पर पहुंचना बहुत टेढ़ी खीर हो जाती है जिस देश में छल कपट विश्वासघात बेईमानी चोरी घूसखोरी भ्रष्टाचार रग रग में भरा हो वहां पर कुछ भी सफल होने वाला नहीं है हर साल लगभग सभी परीक्षाओं में परीक्षा रद्द होती है बेईमानी होती है भ्रष्टाचार होता है सब कुछ जानकार भी लोग चुपचाप रहते हैं और सफल हो जाने वाले तीस मार खान तुर्रम खान बन जाते हैं ।
यदि सचमुच लोगों में नैतिकता और सदाचार होती तो हर एक विद्यालय में एक परीक्षा आयोजित होती जिसमें प्रारंभिक परीक्षा ले ली जाती यदि विद्यालय का तंत्र ईमानदार है तो एक निश्चित अंक पाने वाले छात्रों को ही मुख्य परीक्षा में स्थानिक स्कूल कॉलेज से परीक्षा लेकर भेजा जा सकता है इससे 90% भीड़ अपने आप समाप्त हो जाएगी और सही और योग्य छात्र छात्राएं आराम से मुख्य परीक्षा देने जाएंगे लेकिन ऐसी कुछ भी चीज करना इन लोगों के बस की बाहर की बात है क्योंकि इसमें भी 95% लोग वही होते हैं जो स्वयं ही छल कपट चोरी बेईमानी पैसों के बल पर नियुक्त हो जाते हैं ।
सुना तो यहां तक गया है कि जब राजनेताओं बड़े-बड़े अधिकारियों माफिया धन कुबेर और दलालों के बच्चे नियत अनुपात में चुने नहीं जाते तो जानबूझकर परीक्षा में प्रश्न पत्र आउट कर दिया जाता है या लीक हो जाता है या परीक्षा होने के बाद भी इन्हीं लोगों में से कोई न्यायालय में चला जाता है और सब कुछ तभी ठीक होता है जब उनके छात्रों का बच्चों का समायोजन हो जाता है
परीक्षा दे रहे छात्र-छात्राओं को कितना परेशानी कष्ट होता है यह वही जानते हैं या उनके साथ जाने वाले अभिभावक लोग जानते हैं मोटी रकम लेने के बाद भी अधिकांश विद्यालय में परीक्षा सेंटरों पर पानी तक की व्यवस्था नहीं रहती है अनेक स्थानों में तो बिना पंखे की ही परीक्षा आयोजित होती है इसके अलावा परीक्षा के दिन परीक्षा टेंपो वाहन चालक यहां तक की पानी बेचने वाले और जलपान नाश्ता वाले भी खुले आम लूट करते हैं₹10 की चीज ₹20 से ₹50 तक और ₹10 के भाड़े की जगह ₹100 वसूले जाते हैं और उनके साथ गए अभिभावक लोगों को बैठने की भी कोई जगह नहीं दी जाती है बरसात धूप या फिर ठंड में कांपते हुए समय बिताना उनकी मजबूरी है परीक्षा समाप्त होने के बाद इतना जाम और हाहाकार मचता है कि लोगों को वापस घर पहुंचना कठिन हो जाता है इसमें सबसे ज्यादा परेशानी स्त्रियों और लड़कियों को होती है और उनके घर सुरक्षित पहुंचना भी एक चमत्कार होता है।
ईश्वर ही जाने क्या-क्या खेल हो रहा है इस देश में और इस देश को बना पाना बचा पाना संभव नहीं रह गया है पैसा पे हुए चल दलाल और चमचे गुणगान करते हैं असली सच पुलिस छिपा देती है सब कुछ लिप पोर्ट कर साफ कर दिया जाता है और पता चलता है कि कल पान बीड़ी सुरती खाने वाले मदिरा पीने वाले लोग बड़े-बड़े पदों पर चुन लिए जाते हैं और उनके साथी सहयोगी यहां तक की शिक्षक भी मुंह फाड़ कर देखते रह जाते हैं विश्वास ना हो तो देख लीजिए देश के 90% से अधिक लोग ऊंचे पदों पर द्वितीय या तृतीय श्रेणी में उत्तीर्ण है और इसी कारण से तुलसीदास जी ने मंत्र के मुंह से कहां डाला की कोई भी राजा बने हमको कोई हानि नहीं है इसीलिए भारत की जनता एन देशभक्त हो पाती है और नाराज भक्त हो पाती है और यह लंबा खेल नीचे से ऊपर तक चलता रहता है आठवां वेतन प्राप्त लोगों को 95% लोगों की दुख पीड़ा कष्ट महंगाई बेरोजगारी भ्रष्टाचार से क्या लेना देना है वह भी राजनेताओं की तरह सरपट को गाना और घास को गेहूं बोलते रहेंगे