यह उस संधिकाल की गाथा है जब द्वापर युग अपनी अंतिम सांसें गिन रहा था और काल के गर्त से एक नया, अंधकारमय युग जन्म लेने को तड़प रहा था। महाभारत का भीषण महायुद्ध समाप्त हो चुका था। अधर्मियों के लहू से सिंचित भूमि पर धर्मराज युधिष्ठिर ने न्याय और सत्य के शासन की नींव रखी थी। परंतु, नियति का चक्र कभी थमता नहीं।
एक दिन द्वारका से आए महाविनाशकारी संदेश ने पांडवों की चेतना को सुन्न कर दिया। लीला पुरुषोत्तम भगवान श्री कृष्ण ने अपनी देह लीला समेटकर वैकुंठ प्रस्थान कर लिया था। श्री कृष्ण के जाते ही, इस धरती से सत्य, करुणा, तेज और पवित्रता का अंतिम महान स्तंभ भी ढह गया। पांडव जान गए कि जिस नारायण के साए में उन्होंने धर्म की रक्षा की थी, उनके जाते ही अब अधर्म का साया यानी 'कलयुग' इस पृथ्वी को निगलने आ रहा है।
संसार से विरक्त होकर, शोक में डूबे पांडवों ने राज-पाठ अपने एकमात्र जीवित वंशज, अर्जुन के पौत्र और अभिमन्यु के तेजस्वी पुत्र, राजा परीक्षित को सौंप दिया और स्वयं महाप्रस्थान के लिए हिमालय की ओर चल दिए।
राजा परीक्षित कोई साधारण शासक नहीं थे। वे गर्भाधान के समय ही अश्वत्थामा के ब्रह्मास्त्र से जल रहे थे, तब भगवान श्री कृष्ण ने सूक्ष्म रूप में उनके गर्भ में प्रवेश कर उनके प्राणों की रक्षा की थी। गर्भ में ही भगवान के दर्शन करने के कारण उनका नाम 'परीक्षित' पड़ा। उनका शासन न्याय, ऐश्वर्य और प्रजा-रक्षण का प्रतीक था। उनके राज्य में चोर-उचक्कों, पाखंडियों और पापियों के लिए कोई स्थान नहीं था। राजा भली-भांति जानते थे कि कलयुग सीमाओं पर घात लगाए बैठा है, इसलिए वे लगातार अपने साम्राज्य का भ्रमण करते थे ताकि प्रजा को किसी भी अधार्मिक शक्ति के प्रभाव से बचा सकें।
एक दिन, राजा परीक्षित अपने दिव्य रथ पर सवार होकर साम्राज्य की सीमाओं का निरीक्षण कर रहे थे। घूमते-घूमते वे सरस्वती नदी के पवित्र तट (कुरुक्षेत्र के समीप) पहुंचे। वहां उन्होंने एक ऐसा दृश्य देखा जिसने चक्रवर्ती सम्राट के हृदय को कंपा दिया।
सामने एक बैल खड़ा था, जो अत्यंत दुर्बल, कांतिहीन और भयभीत था। सबसे वीभत्स बात यह थी कि उस बैल की चार टांगों में से तीन टांगें कटी हुई थीं; वह केवल एक टांग पर बड़ी मुश्किल से अपना संतुलन बनाए खड़ा था और दर्द से कराह रहा था।
उसके ठीक पास एक गाय खड़ी थी। उसकी आंखों से अश्रुओं की अविरल धारा बह रही थी। वह इतनी कमजोर थी कि लग रहा था मानो अभी प्राण त्याग देगी। वह अपनी वात्सल्यमयी दृष्टि से उस बैल को देख रही थी और गहरे विलाप में डूबी हुई थी।
तभी राजा की नजर एक तीसरे पात्र पर पड़ी। वहां एक काले रंग का, भयानक और क्रूर दिखने वाला शूद्र खड़ा था। उसने राजाओं के वैभवशाली वस्त्र और मुकुट पहन रखा था, लेकिन उसके हाथ में एक भारी डंडा था। वह नीच पुरुष उस असहाय बैल और रोती हुई गाय को बेरहमी से पीट रहा था।
राजा परीक्षित का क्षत्रिय लहू खौल उठा। उन्होंने तुरंत अपनी म्यान से चमचमाती तलवार निकाली और मेघ के समान गरजते हुए उस क्रूर पुरुष की ओर बढ़े।
राजा ने दहाड़ते हुए कहा, "अरे पापी! मेरे रहते इस पवित्र भूमि पर असहाय जीवों पर ऐसा अत्याचार करने का दुस्साहस तूने कैसे किया? राजा का भेष धरकर इस धर्मभूमि को कलंकित करने वाले दुष्ट, तू वध के योग्य है! बता, तू कौन है?"
तलवार उठाने से पहले, राजा परीक्षित ने उस पीड़ित बैल और गाय की ओर देखा। अपनी दिव्य बुद्धि से वे समझ गए कि ये कोई साधारण पशु नहीं हैं।
राजा ने बैल से पूछा, "हे दिव्य जीव! तुम कौन हो? किसने तुम्हारी यह दुर्दशा की है? सम्राट शांतनु और अर्जुन के इस वंशज के जीवित रहते तुम्हारे नयनों में आंसू किसने दिए?"
बैल ने उत्तर दिया, "हे राजन! आप जैसे न्यायप्रिय राजा के लिए यह प्रश्न शोभा देता है। परंतु इस संसार में दुखों का कारण कौन है, यह कहना कठिन है। कुछ लोग इसे भाग्य कहते हैं, कुछ कर्म, और कुछ प्रकृति। मैं स्वयं 'धर्म' हूँ।"
राजा परीक्षित चकित रह गए। तब उन्हें ज्ञात हुआ कि सतयुग में धर्म के चार पैर थे—सत्य, तप, पवित्रता और दान। त्रेतायुग में मनुष्य की वासना के कारण 'तप' नष्ट हो गया। द्वापर युग में 'पवित्रता' भी समाप्त हो गई। अब, द्वापर के अंत में 'दान' भी लुप्त हो चुका था। धर्म रूपी यह बैल अब केवल अपने आखिरी पैर—'सत्य'—पर टिका हुआ था, और यह दुष्ट उस आखिरी पैर को भी तोड़ना चाहता था।
फिर राजा ने गाय की ओर देखा, जिसने रोते हुए कहा, "हे चक्रवर्ती सम्राट! मैं साक्षात 'पृथ्वी देवी' हूँ। जब तक जगदीश्वर श्री कृष्ण के चरण मुझ पर पड़ते थे, मैं सर्वगुण संपन्न और सुखी थी। उनके जाने के बाद मैं अनाथ हो गई हूँ। अब यह दुष्ट मुझ पर हावी होना चाहता है और मुझे अपवित्र करना चाहता है।"
राजा परीक्षित ने जैसे ही यह सुना, उनका क्रोध चरम पर पहुंच गया। उन्होंने तलवार उठाई और उस राजा का स्वांग रचे शूद्र की गर्दन पर रख दी।
जैसे ही काल रूपी तलवार उसकी गर्दन से छुई, वह क्रूर पुरुष थर-थर कांपने लगा। उसने तुरंत अपना डंडा फेंक दिया, अपने राजा के वस्त्रों को त्याग दिया और साष्टांग दंडवत होकर राजा परीक्षित के चरणों में गिर गया। वह साक्षात 'कलयुग' था।
कलयुग ने रोते हुए गुहार लगाई, "हे शरणागतवत्सल सम्राट! त्राहि-त्राहि! मुझे क्षमा करें। आप पूरे ब्रह्मांड के स्वामी हैं। पांडवों के वंशज कभी शरणागत पर वार नहीं करते। मैं आपकी शरण में हूँ, मेरे प्राणों की रक्षा करें!"
राजा परीक्षित धर्मसंकट में पड़ गए। शास्त्र कहते हैं कि शरण में आए शत्रु का वध नहीं करना चाहिए। राजा ने तलवार थोड़ी पीछे खींची और कड़ककर कहा, "अरे कलयुग! तू अधर्म, झूठ, चोरी, पाखंड और विनाश का मूल कारण है। तूने मेरे राज्य में कदम रखने की जुर्रत कैसे की? तू तुरंत मेरी सीमाओं से बाहर निकल जा, अन्यथा मेरी यह तलवार तेरे टुकड़े-टुकड़े कर देगी।"
कलयुग ने हाथ जोड़कर अत्यंत चतुरता से संवाद शुरू किया:
कलयुग: "हे महाराज! आप सत्य कह रहे हैं। मैं बुराइयों का प्रतीक हूँ। परंतु कृपा कर ठंडे दिमाग से सोचें। इस ब्रह्मांड की रचना ब्रह्मा जी ने की है। उन्होंने ही कालचक्र बनाया है, जिसके अनुसार सतयुग, त्रेता और द्वापर के बाद मेरा आना अनिवार्य है। यह नियति का नियम है। यदि आप मुझे मार भी देंगे, तो भी काल का यह चक्र नहीं रुकेगा। मैं अपने समय पर आया हूँ। जब आपका राज्य चारों ओर फैला है, तो मैं इस संसार को छोड़कर कहाँ जाऊँ? ईश्वर के विधान के अनुसार मुझे भी जीने का हक है। कृपा कर मुझे इस पृथ्वी पर रहने के लिए कोई निश्चित स्थान दे दें।"
राजा परीक्षित: "ठीक है कलयुग, तू मेरी शरण में है इसलिए मैं तुझे स्थान देता हूँ। सुन! तू आज से इन चार स्थानों पर वास करेगा—
द्यूत (जुआ): जहाँ छल, कपट, सट्टा और चोरी होती है।
मद्यपान (मदिरा/शराब): जहाँ मनुष्य विवेक खो देता है और होश गंवा बैठता है।
स्त्री-संसर्ग (व्यभिचार/अनैतिक संबंध): जहाँ वासना, लज्जाहीनता और अपवित्रता होती है।
सून (हिंसा/पशु वध): जहाँ निर्दोष और मूक जीवों की हत्या कर उनका मांस खाया जाता है।"*
कलयुग मन ही मन मुस्कुराया, लेकिन वह अत्यंत महत्वाकांक्षी था। उसने देखा कि ये चारों स्थान तो समाज के सबसे निचले और घृणित हिस्से हैं। इतने कम स्थानों से वह पूरी पृथ्वी पर अपना साम्राज्य कैसे फैला पाता? उसने अत्यंत दीन बनकर राजा से एक और विनती की।
कलयुग: "हे महादानी सम्राट! आपके द्वारा दिए गए ये चारों स्थान अत्यंत संकुचित और पापी लोगों के हैं। मेरा स्वरूप बहुत बड़ा है। इतने छोटे स्थानों में मेरा निर्वाह कैसे होगा? कृपा करके मुझे कोई एक ऐसा श्रेष्ठ और शक्तिशाली स्थान भी प्रदान करें, जो अत्यंत प्रभावशाली हो, जिसे समाज का हर वर्ग स्वीकार करे और जहाँ बैठकर मैं पूरे संसार के मानस पर शासन कर सकूं।"
राजा परीक्षित उस समय दानवीरता के अति-विश्वास में थे। उन्होंने क्षण भर के लिए सोचा और कलयुग को पांचवां स्थान दे दिया—'सुवर्ण' (सोना, अर्थात अनैतिक और गलत तरीके से कमाया गया धन)।
राजा परीक्षित: "तथास्तु! कलयुग, तू सुवर्ण (सोने) में भी वास करेगा।"
यह सुनते ही कलयुग की आँखें चमक उठीं। उसने देखा कि राजा परीक्षित उसे केवल दोषों की खान समझकर घृणा कर रहे हैं। कलयुग ने तब मुस्कुराते हुए मनुष्य जाति के कल्याण का सबसे बड़ा रहस्य प्रकट किया, जो कलयुग का एकमात्र लेकिन सबसे बड़ा फायदा था।
कलयुग का संवाद:
"हे राजन! आप मुझे केवल बुरा समझ रहे हैं, लेकिन मुझमें एक ऐसा महान गुण (फायदा) भी है, जो सतयुग, त्रेता और द्वापर, तीनों युगों में से किसी के पास नहीं है! मेरे इसी एक गुण के कारण भविष्य में ऋषि-मुनि और देवता भी कलयुग में मनुष्य रूप में जन्म लेने तरसेंगे।
हे राजन! सतयुग में मनुष्यों को भगवान को पाने, मोक्ष प्राप्त करने या अपनी आत्मा को शुद्ध करने के लिए हजारों वर्ष तक कठोर तपस्या, व्रत और कठिन समाधि लगानी पड़ती थी। त्रेतायुग में बड़े-बड़े कठिन यज्ञ, अनुष्ठान और तप करने के बाद भगवान प्रसन्न होते थे। द्वापरयुग में मंदिरों में अत्यधिक विधि-विधान से की जाने वाली पूजा और असीम सेवा-अर्चना से प्रभु मिलते थे।
परंतु, मेरे युग (कलयुग) में मनुष्यों के पास न तो लंबी आयु होगी, न उतनी शारीरिक शक्ति होगी और न ही वैसा शुद्ध वातावरण होगा। इसलिए भगवान ने मेरे लिए नियम बहुत सरल कर दिए हैं—कलयुग में भगवान को पाने के लिए न कठिन तप की आवश्यकता है, न महंगे यज्ञों की और न ही जटिल विधियों की। मेरे युग में केवल 'हरि नाम संकीर्तन' (भगवान के नाम का सच्चे मन से स्मरण और कीर्तन) करने मात्र से ही मनुष्य को वही मोक्ष और परम पद मिल जाएगा, जो सतयुग में दस हजार वर्ष की तपस्या से मिलता था! (कलयुग केवल नाम अधारा। सुमिरि सुमिरि नर उतरहिं पारा॥)
इसके अलावा, मुझमें एक और बड़ा फायदा यह है कि सतयुग या त्रेता में यदि मनुष्य मन में भी कोई पाप का विचार लाता था, तो उसे उसका पाप-फल भोगना पड़ता था। परंतु कलयुग में मन में सोचे गए पाप का कोई दंड नहीं मिलेगा, दंड तभी मिलेगा जब मनुष्य उसे असल में करेगा। वहीं दूसरी ओर, यदि कोई मनुष्य मन में भी किसी के कल्याण या भगवान के नाम का विचार लाएगा, तो उसे उसका पूरा पुण्य-फल तुरंत मिल जाएगा!"
यह सुनकर राजा परीक्षित चकित रह गए और उन्होंने समझा कि प्रकृति का संतुलन कितना अद्भुत है। कलयुग राजा को प्रणाम कर वहाँ से अंतर्ध्यान हो गया।
कलयुग गायब तो हो गया, लेकिन वह बहुत प्रतिशोधी था। वह जानता था कि जब तक राजा परीक्षित जीवित हैं, तब तक कलयुग इन पांच स्थानों से बाहर नहीं निकल पाएगा। उसने राजा परीक्षित को ही अपना पहला शिकार बनाने की कुटिल योजना बुनी।
एक दिन, राजा परीक्षित वन में शिकार खेलने गए। दोपहर के समय सूर्य की किरणें अत्यंत तेज थीं और राजा बहुत थक चुके थे। उन्हें तीव्र प्यास लगी थी। वन में भटकते हुए वे शमीक ऋषि के पवित्र आश्रम में पहुंचे। शमीक ऋषि उस समय भगवान के ध्यान में लीन थे। वे गहरे ध्यान (समाधि) में थे और उन्होंने मौन व्रत धारण कर रखा था। राजा परीक्षित ने आश्रम में प्रवेश किया और अत्यंत विनम्रता से जल माँगा। परंतु समाधिस्थ होने के कारण ऋषि को राजा की आवाज सुनाई नहीं दी और वे शांत बैठे रहे।
प्यास से व्याकुल राजा को लगा कि ऋषि जानबूझकर उनका अपमान कर रहे हैं। वास्तव में, राजा परीक्षित कभी ऐसा सोच ही नहीं सकते थे। लेकिन नियति का खेल देखिए—उस दिन राजा परीक्षित ने अपने सिर पर एक विशेष सोने का मुकुट पहन रखा था। यह मुकुट महापापी राजा जरासंध का था, जिसे भीमसेन ने युद्ध में जीता था। चूंकि वह मुकुट अधर्म के धन से बना था, इसलिए कलयुग उस सोने के मुकुट के भीतर जाकर बैठ गया था।
मुकुट में बैठे कलयुग ने राजा की बुद्धि को पूरी तरह भ्रष्ट कर दिया। कलयुग के प्रभाव में आकर राजा का विवेक शून्य हो गया। उन्होंने क्रोध और मतिभ्रम के वश में होकर, पास ही पड़ा एक मृत सर्प अपने धनुष की नोक से उठाया और ध्यानमग्न शमीक ऋषि के गले में डाल दिया। इसके बाद वे हस्तिनापुर लौट आए।
जब शमीक ऋषि के परम प्रतापी और क्रोधी पुत्र श्रृंगी ऋषि नदी से स्नान करके आश्रम लौटे, तो उन्होंने अपने परम पूज्य पिता के गले में मरा हुआ सांप देखा। ध्यान लगाने पर उन्हें ज्ञात हुआ कि यह कृत्य राजा परीक्षित का है। क्रोध से कांपते हुए श्रृंगी ऋषि ने कौशिकी नदी का पवित्र जल अपने हाथ में लिया और राजा परीक्षित को घोर शाप दे दिया: "जिस राजा ने मद में अंधा होकर मेरे मौन और समाधिस्थ पिता का ऐसा घोर अपमान किया है, आज से ठीक सातवें दिन तक्षक नाग उसे डसेगा और उसकी मृत्यु हो जाएगी।"
इधर, हस्तिनापुर के महल में कदम रखते ही जब राजा परीक्षित ने अपने सिर से वह सोने का मुकुट उतारा, तो कलयुग का प्रभाव उनके मस्तिष्क से हट गया। मुकुट उतरते ही उनका विवेक वापस आ गया। उन्हें तुरंत अहसास हुआ कि उन्होंने वन में कितना बड़ा पाप किया है। वे पश्चाताप की अग्नि में जलने लगे।
जब उन्हें ऋषि पुत्र के शाप का समाचार मिला, तो उन्होंने इसे अपनी भूल का न्यायसंगत दंड माना। राजा परीक्षित ने अपने जीवन के अंतिम सात दिनों को सार्थक करने के लिए तुरंत राज-पाठ अपने पुत्र जनमेजय को सौंप दिया। वे गंगा के तट पर आसन बिछाकर बैठ गए। वहाँ महान शुकदेव जी महाराज का आगमन हुआ, जिन्होंने राजा परीक्षित को अंतिम सात दिनों में श्रीमद्भागवत पुराण की परम पावन कथा सुनाई, जिससे राजा को मृत्यु का भय छूट गया और उन्हें मोक्ष की प्राप्ति हुई। ठीक सातवें दिन, तक्षक नाग ने आकर राजा परीक्षित को डस लिया और उनके स्थूल शरीर के प्राण पखेरू उड़ गए।
जैसे ही पृथ्वी के रक्षक और न्यायप्रिय चक्रवर्ती सम्राट राजा परीक्षित का अंत हुआ, वैसे ही कलयुग के मार्ग का आखिरी और सबसे बड़ा कांटा हट गया। कलयुग ने पूरी स्वतंत्रता के साथ पूरी पृथ्वी को अपने आगोश में ले लिया। मनुष्यों के दिलों से संतोष, सत्य और त्याग धीरे-धीरे लुप्त होने लगा और इस तरह इस धरती पर 'कलयुग' का पूर्ण और आधिकारिक साम्राज्य स्थापित हो गया।
पुराणों में वर्णित 'कलयुग के प्रत्यक्ष लक्षण'
कलयुग के अंतर्ध्यान होने के बाद, श्रीमद्भागवत पुराण के बारहवें स्कंध में शुकदेव जी ने राजा परीक्षित को कलयुग के उन भयावह लक्षणों (भविष्यवाणियों) के बारे में बताया, जो आज के समाज में सच होती दिख रही हैं:
धन ही श्रेष्ठता का आधार: कलयुग में मनुष्य के गुण, सदाचार या कुल की कोई महत्ता नहीं रह जाएगी। जिस व्यक्ति के पास जितना अधिक धन होगा, समाज में उसे उतना ही कुलीन, सदाचारी और बुद्धिमान माना जाएगा। न्याय और कानून भी केवल उसी के पक्ष में काम करेंगे जिसके पास पैसा और शक्ति होगी।
रिश्तों और विवाह का पतन: विवाह पवित्र धार्मिक बंधन नहीं, बल्कि स्त्री-पुरुष की केवल क्षणिक शारीरिक रुचि और आपसी समझौते का साधन रह जाएगा। पारिवारिक मूल्य पूरी तरह गिर जाएंगे; संतान अपने माता-पिता का सम्मान करना छोड़ देगी, बूढ़े माता-पिता को बोझ समझा जाएगा और लोग केवल अपने स्वार्थ तक सीमित रहेंगे।
पाखंड ही धर्म बनेगा: कलयुग में जो व्यक्ति जितना बड़ा ढोंगी और कपटी होगा, उसे उतना ही बड़ा संत और व्यवहार-कुशल माना जाएगा। लोग केवल बाहरी वेशभूषा, तिलक या जटा बढ़ाकर खुद को धार्मिक घोषित करेंगे, जबकि उनके भीतर वासना और लालच भरा होगा।
प्रकृति का विकराल रूप और अकाल: मौसम अपना संतुलन खो देगा। कभी भयंकर सूखा पड़ेगा तो कभी बाढ़ आएगी। नदियां सूखने लगेंगी, धरती बंजर हो जाएगी और पेड़ फल देना बंद कर देंगे। जनता भुखमरी, भारी टैक्स (करों) और महामारियों से इतनी त्रस्त हो जाएगी कि लोग आत्महत्या करने को मजबूर होंगे।
शारीरिक और मानसिक पतन: मनुष्यों की आयु, स्मरण शक्ति और शारीरिक बल दिन-प्रतिदिन घटते जाएंगे। कलयुग के अंत तक आते-आते मनुष्य की अधिकतम आयु केवल 20 से 30 वर्ष रह जाएगी और उनका कद घटकर कुछ फीट का हो जाएगा।
स्त्रियों और पुरुषों का स्वभाव: स्त्रियाँ अत्यंत क्रोधी, लोभी और विलासी स्वभाव की हो जाएंगी। लोग बिना स्नान किए भोजन करेंगे, मेहमानों और पितरों का सत्कार बंद हो जाएगा। एक हाथ दूसरे हाथ की जेब से चोरी करेगा और भाई ही भाई के खून का प्यासा बन जाएगा...❤️🌻
सोच लीजिए सारी धरती के एक छात्र सम्राट परीक्षित इतने शक्तिशाली थे जो कलयुग का भी गला काट सकते थे यदि आज भारत के प्रधानमंत्री के सामने कलयुग खड़ा हो जाए तो उनका क्या हाल होगा एक बात और कलयुग सोने में रहता है और कलयुग के लोगों का सबसे बड़ा आकर्षण अर्थात लालच सोने में ही होता है इसलिए जितने लोग सोना पहनते हैं सबके अंदर कलयुग का वास हो जाता है इसलिए मैंने सोना पहनना बहुत लंबे समय से त्याग दिया है और केवल वही कलयुग के प्रभाव से बचकर सच्ची भक्ति ईश्वर का दर्शन देवी देवताओं को देख सकते हैं जो किसी भी रूप में सोने का प्रयोग ना करें लेकिन पापी कलयुग के प्रभाव से कोई बिना सोने के रहने की कल्पना ही नहीं कर सकता विशेष कर स्त्रियां क्योंकि धरती पर सत्य धर्म न्याय सदाचार उनके ही कारण रहता है इसलिए अब ऐसा होना संभव नहीं है