Sunday, 4 October 2026

आंदोलन, जवाबदेही

👉 *सम्पादकीय*

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*आंदोलन, जवाबदेही और सत्ता : इतिहास के आईने में 1966 से 2026 तक*

लोकतंत्र में आंदोलन केवल सड़कों पर उमड़ती भीड़ का नाम नहीं है। आंदोलन उस असहमति की आवाज है, जो तब पैदा होती है जब नागरिकों को लगता है कि उनकी बात सत्ता के गलियारों तक पर्याप्त रूप से नहीं पहुंच रही। भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में छात्र आंदोलनों से लेकर सामाजिक और धार्मिक आंदोलनों तक अनेक ऐसे प्रसंग हैं, जिन्होंने सरकारों को अपने फैसलों पर पुनर्विचार करने और जवाबदेही तय करने के लिए मजबूर किया है।
वर्ष 2026 में शिक्षा व्यवस्था से जुड़े विवादों के बीच लंबे समय तक चले छात्र आंदोलन के बाद केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने 25 जुलाई को इस्तीफा दिया। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार आंदोलन में परीक्षा व्यवस्था और NEET-UG से जुड़े कथित अनियमितताओं तथा पेपर लीक को लेकर जवाबदेही की मांग प्रमुख थी। सरकार ने उनका इस्तीफा स्वीकार किया और शिक्षा मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार प्रह्लाद जोशी को दिया गया।
यह घटनाक्रम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे लोकतंत्र में जवाबदेही की अवधारणा पर बहस फिर सामने आई है। किसी मंत्री का इस्तीफा अपने आप में किसी आंदोलन की सभी समस्याओं का समाधान नहीं होता, लेकिन यह राजनीतिक व्यवस्था में जिम्मेदारी तय करने की एक स्थापित प्रक्रिया का हिस्सा है। दूसरी ओर, सरकार का पक्ष भी यह रहा कि व्यापक परिस्थितियों, छात्रों के भविष्य और कानून-व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए निर्णय लिया गया।
भारत के इतिहास में लगभग छह दशक पहले का एक और आंदोलन इस संदर्भ में याद आता है। 7 नवंबर 1966 को गोहत्या पर राष्ट्रव्यापी प्रतिबंध की मांग को लेकर साधु-संतों और अन्य प्रदर्शनकारियों ने दिल्ली में संसद की ओर मार्च किया था। प्रदर्शन के दौरान हिंसा भड़की और पुलिस ने आंसू गैस, लाठीचार्ज तथा गोलीबारी की। ऐतिहासिक रिकॉर्ड और उपलब्ध फैक्ट-चेक के अनुसार इस घटना में सात प्रदर्शनकारियों और एक पुलिसकर्मी समेत आठ लोगों की मौत हुई थी।
इस घटना के बाद तत्कालीन केंद्रीय गृहमंत्री गुलजारी लाल नंदा ने अपने पद से इस्तीफा दिया था। इसलिए 1966 के प्रसंग को शिक्षा मंत्री के इस्तीफे से जोड़ना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा।
1966 और 2026 के दोनों प्रसंगों के बीच परिस्थितियां, मुद्दे और राजनीतिक संदर्भ बिल्कुल अलग हैं। एक तरफ धार्मिक-सामाजिक मांग को लेकर संसद के बाहर बड़ा आंदोलन था, दूसरी तरफ शिक्षा और परीक्षा व्यवस्था से जुड़े सवालों को लेकर छात्रों का आंदोलन। इसलिए दोनों घटनाओं को समान घटना के रूप में देखना इतिहास को सरल बनाना होगा। लेकिन दोनों से एक व्यापक लोकतांत्रिक प्रश्न जरूर उठता है—जब जनता, छात्र या कोई बड़ा सामाजिक समूह अपनी मांग लेकर सड़क पर उतरता है, तब सत्ता की जवाबदेही किस तरह तय होनी चाहिए?
लोकतंत्र की ताकत इसी में है कि असहमति को सुना जाए। आंदोलन शांतिपूर्ण हो तो संवाद उसका पहला रास्ता होना चाहिए। वहीं यदि आंदोलन हिंसक हो जाए या सार्वजनिक संपत्ति और कानून-व्यवस्था प्रभावित होने लगे तो राज्य के सामने कानून लागू करने की जिम्मेदारी भी होती है। इन दोनों दायित्वों के बीच संतुलन ही लोकतांत्रिक शासन की वास्तविक परीक्षा है।
1966 की घटना यह भी याद दिलाती है कि पुलिस कार्रवाई के बाद केवल तत्कालीन स्थिति को नियंत्रित करना पर्याप्त नहीं होता। ऐसी घटनाओं के बाद जवाबदेही, जांच और राजनीतिक जिम्मेदारी जैसे प्रश्न लंबे समय तक सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बने रहते हैं। संसद के रिकॉर्ड में भी 7 नवंबर 1966 की घटनाओं और गोहत्या प्रतिबंध की मांग पर औपचारिक चर्चा दर्ज है।
2026 का छात्र आंदोलन एक अलग संदेश देता है। आज का युवा केवल परीक्षा पास करने की चिंता नहीं करता; वह परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता, पारदर्शिता और अपने भविष्य की सुरक्षा को भी शासन की जिम्मेदारी मानता है। जब लाखों युवाओं का भविष्य प्रतियोगी परीक्षाओं से जुड़ा हो, तब परीक्षा में किसी भी प्रकार की गड़बड़ी का असर केवल एक परीक्षा तक सीमित नहीं रहता।
इसलिए असली सवाल यह नहीं होना चाहिए कि किस सरकार के समय किस मंत्री ने इस्तीफा दिया। असली सवाल यह होना चाहिए कि क्या लोकतांत्रिक व्यवस्था नागरिकों की आवाज को समय रहते सुनती है? क्या शिकायतों की स्वतंत्र और पारदर्शी जांच होती है? क्या दोष तय होने पर जिम्मेदारी निर्धारित होती है? और क्या आंदोलनकारियों तथा राज्य—दोनों के लिए कानून की समान कसौटी लागू होती है?
इतिहास सत्ता बदलने के लिए नहीं, सत्ता को आईना दिखाने के लिए भी पढ़ा जाता है। 1966 की गोलीबारी हो या 2026 का छात्र आंदोलन—दोनों घटनाएं अपने-अपने समय की परिस्थितियों से पैदा हुईं। लेकिन लोकतंत्र के लिए उनका साझा सबक यही है कि सत्ता चाहे किसी भी दल की हो, जनता की आवाज को सुनना, गलतियों की जिम्मेदारी तय करना और संस्थाओं में विश्वास बनाए रखना शासन की मूल कसौटी है।
लोकतंत्र में सरकारें आती-जाती रहती हैं, मंत्री बदलते रहते हैं और आंदोलन भी समय के साथ समाप्त हो जाते हैं। लेकिन नागरिकों का यह अधिकार स्थायी है कि वे सवाल पूछें, जवाब मांगें और शांतिपूर्ण तरीके से अपनी असहमति दर्ज कराएं। यही अधिकार लोकतंत्र को केवल चुनावी व्यवस्था नहीं, बल्कि जवाबदेह शासन व्यवस्था बनाता है।

Saturday, 3 October 2026

स्मित मच्छर के बाद सभी सनातनी लोगों को सभी गैर मुसलमान लोगों को यह जानने का अधिकार होना चाहिए की बस ट्रक हवाई जहाज पानी का जहाज ऑटो रिक्शा टेंपो या कोई भी वाहन चलाने वाला व्यक्ति कौन है और वह किस धर्म का है कहीं वह शैतान जिहादी तो नहीं है हर दुकान पर भी आधार कार्ड के साथ उसका नाम पता मोबाइल नंबर होना चाहिए

स्मित मच्छर के बाद सभी सनातनी लोगों को सभी गैर मुसलमान लोगों को यह जानने का अधिकार होना चाहिए की बस ट्रक हवाई जहाज पानी का जहाज ऑटो रिक्शा टेंपो या कोई भी वाहन चलाने वाला व्यक्ति कौन है और वह किस धर्म का है कहीं वह शैतान जिहादी तो नहीं है हर दुकान पर भी आधार कार्ड के साथ उसका नाम पता मोबाइल नंबर होना चाहिए 

हर वाहन पर चलने वाले का नाम उसका धर्म और आधार कार्ड चिपकाना अनिवार्य कर दिया जाए और हवाई जहाज उड़ाने के पहले यात्रियों को तीन बार बताया जाए कि इसमें विमान का चालक कौन है सहचालक कौन है एयर होस्टेस किस जाति धर्म की है ताकि लोगों को अपनी सुरक्षा करने का अधिकार प्राप्त हो सके। 


स्मित मच्छर को तो हनुमान जी ने बचा लिया लेकिन सबको बचाने तो हनुमान जी नहीं आ सकते हैं ना 

और याद आ गया जौनपुर में अभी प्रिया सरोज किसी परवीन नाम की महिला के विमान चालक होने पर बधाई शुभकामनाएं देने गई थी देखना है आगे वह क्या-क्या गुल खिलाती हैं और प्रिया सरोज का नाम कितना रोशन करती हैं। 


क्योंकि सांप है तो वह कटेगा अवश्य और काटेगा तो उससे जहर ही निकलेगा अमृत नहीं यह तो अटल और ध्रुव सत्य है। 

और सभी जानते हैं कि मुस्लिम महिलाएं मुस्लिम पुरुषों से अधिक कट्टर जिहादी और अपने धर्म का प्रचार प्रसार करने वाली होती हैं जिनका काम ही होता है कि एक से लेकर 100 गैर मुसलमान को किसी भी प्रकार से मुसलमान बनाना इसके लिए यह लोग नकाब हिजाब बुर्का भयंकर गर्मी में भी पसीने से डूबे होने पर भी धारण करके चलती हैं


 और उसकी आड़ में अनेक पवित्र इस्लामी कार्य कर दिखाती हैं जबकि गैर धर्म की स्त्रियां मुफ्त में अपने शरीर का प्रदर्शन सबको करते हुए सीधे स्वर्ग जाने का रास्ता साफ करती हैं।

लेकिन एक बात के लिए सभी गैर मुसलमान और सनातनी मच्छर के आभारी रहेंगे जो उन्होंने खुले आम कहा कि उनकी रक्षा स्वयं श्री हनुमान जी ने किया जबकि सनातनी लोग कोई पद पाए जाते हैं तो सबसे पहले अपना धर्म और फिर भगवान का नाम छोड़ देते हैं जिसका फल या होता है कि धर्म और भगवान भी उनको छोड़ देते हैं और उनका अंत बहुत भयानक होता है जय श्री राम जय हनुमान

“मैं तुम्हारे बिना नहीं जी सकता…”लेकिन तुम्हें मेरे बिना भी अपने पैरों पर खड़ा होना सीखना होगा!🌿 इस रविवार हर पति-पत्नी को यह एक बार जरूर पढ़ना चाहिए…

❤️ “मैं तुम्हारे बिना नहीं जी सकता…”

लेकिन तुम्हें मेरे बिना भी अपने पैरों पर खड़ा होना सीखना होगा!

🌿 इस रविवार हर पति-पत्नी को यह एक बार जरूर पढ़ना चाहिए…
एक शाम पत्नी ने अपने पति से कहा—

“सुनिए… आपसे एक बात पूछूँ? नाराज़ मत होना। मुझे सच-सच जवाब चाहिए।”

पति मुस्कुराकर बोले—

“फिर कोई मुश्किल सवाल पूछने वाली हो क्या? पूछो…”

पत्नी थोड़ी गंभीर हो गई।

“हमारे बच्चे अब विदेश में बस गए हैं। हम दोनों यहाँ अकेले रहते हैं। भगवान की कृपा से हमें खाने-पीने, रहने या किसी जरूरी चीज़ की कोई कमी नहीं है। हम दोनों एक-दूसरे के साथ हैं और शांति से अपना जीवन जी रहे हैं।

लेकिन अब उम्र बढ़ रही है… शरीर पहले जैसा साथ नहीं देता। हम हमेशा की तरह बच्चों के पास जाकर नहीं रह सकते। उनकी भी नौकरी है, बच्चों की पढ़ाई है और अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियाँ हैं। वे हमेशा हमारे साथ रह भी नहीं सकते।

इसीलिए मुझे एक डर सताता है… अगर मुझे कुछ हो गया तो आप अकेले कैसे रहेंगे?

कभी-कभी इसी सोच के कारण रात को नींद भी नहीं आती।”

पति कुछ क्षण चुप रहे।

फिर उन्होंने पत्नी का हाथ अपने हाथ में लिया और धीरे से कहा—

“मुझे भी यही डर लगता है… लेकिन मेरे मन में सवाल थोड़ा अलग है।

तुम सोचती हो—‘अगर तुम नहीं रहे तो मैं कैसे जीऊँगी?’

और मैं सोचता हूँ—‘अगर मैं नहीं रहा तो तुम कैसे जीओगी?’”

उन्होंने आगे कहा—

“मैं तुमसे पाँच साल बड़ा हूँ। कौन पहले जाएगा, यह किसी को पता नहीं। इसलिए आज हमें एक बहुत जरूरी बात करनी चाहिए।”

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❤️ प्यार सिर्फ एक-दूसरे पर निर्भर रहना नहीं है…

“हमने पूरी जिंदगी एक-दूसरे का सहारा बनकर बिताई है। लेकिन सच्चा प्यार सिर्फ यह नहीं कि ‘तुम मेरे लिए हो।’

सच्चा प्यार यह भी है कि अगर एक दिन हममें से कोई साथ न हो, तो दूसरा टूटे नहीं… बल्कि हिम्मत से अपना जीवन संभाल सके।

इसलिए मैं तुमसे कुछ पूछना चाहता हूँ—

अगर मैं नहीं रहूँ तो क्या तुम…

- ATM से खुद पैसे निकाल सकती हो?
- UPI से पैसे भेज सकती हो?
- OTP क्या होता है और उसका उपयोग कैसे करना है, यह जानती हो?
- Google Pay, PhonePe या Net Banking चला सकती हो?
- जरूरत पड़ने पर Cab बुक कर सकती हो?
- 112 या 108 जैसी Emergency Services की मदद ले सकती हो?
- मेरे फोन में Emergency Contacts कहाँ सेव हैं, यह पता है?
- बच्चों को Video Call कर सकती हो?
- WhatsApp पर अपनी Location Share कर सकती हो?
- Google Maps से घर की Location भेज सकती हो?
- हमारे डॉक्टर, हॉस्पिटल और Health Insurance की जानकारी कहाँ रखी है, यह जानती हो?
- Insurance Card का उपयोग कैसे करना है, यह पता है?
- गैस सिलेंडर बुक कर सकती हो?
- बिजली का बिल भर सकती हो?
- मोबाइल Recharge कर सकती हो?
- हमारे Bank Accounts की जानकारी कहाँ है, यह पता है?
- FD और दूसरी Investments की जानकारी कहाँ रखी है, यह जानती हो?
- Aadhaar, PAN, Insurance, घर के कागज और बैंक से जुड़े जरूरी Documents कहाँ सुरक्षित रखे हैं, यह पता है?”**

पत्नी चुपचाप सब सुनती रही।

फिर धीरे से बोली—

“आपने मुझे यह सब कई बार बताया है… लेकिन मैंने कभी सोचा ही नहीं कि मुझे सच में यह सब सीखना चाहिए।

मैं तो हमेशा यही सोचती रही कि आप हैं ना… आप सब संभाल लेंगे।”

पति मुस्कुराए और बोले—

“बस, यही हमारी सबसे बड़ी भूल है।”

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🌱 “वह है ना…” और “वह है ना…”

“पूरी जिंदगी हम ‘वह है ना’ कहकर एक-दूसरे पर निर्भर रहे।

लेकिन जिंदगी की कोई गारंटी नहीं है।

इसलिए आज से एक नई शुरुआत करते हैं।

तुम मुझे सिखाओ… मैं तुम्हें सिखाता हूँ।

तुम UPI और Online Banking सीखो,
मैं घर के कुछ काम सीखता हूँ।

तुम बैंक के काम समझो,
मैं Insurance और जरूरी Documents की जानकारी रखता हूँ।

तुम Emergency Contacts और Technology सीखो,
मैं दवाइयाँ, Medical Reports और जरूरी कागज कहाँ रखे हैं, यह व्यवस्थित करता हूँ।

हम साथ-साथ ही रहेंगे… लेकिन अगर कभी एक को अकेले रहना पड़े, तो दूसरा असहाय न हो—इतना सक्षम जरूर बने।”

पत्नी की आँखों में आँसू आ गए।

वह बोली—

“यह सब सुनकर मुझे डर लग रहा है…”

पति ने उसका हाथ थामते हुए कहा—

“डरने की जरूरत नहीं है।

जो हमारे हाथ में नहीं है, उसकी चिंता करने से अच्छा है कि जो हमारे हाथ में है, उसकी तैयारी करें।

भगवान ने हमें कितने दिन दिए हैं, यह हमें नहीं पता।

लेकिन हर दिन प्यार से, आत्मविश्वास से और एक-दूसरे का हाथ थामकर जीना—यह हमारे हाथ में है।”

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🕊️ तैयारी करना डर नहीं, समझदारी है

हम अपने बच्चों को बचपन से सब कुछ सिखाते हैं—

पढ़ाई, नौकरी, गाड़ी चलाना, खाना बनाना, तैरना, Technology, पैसे संभालना…

लेकिन जब हमारी उम्र बढ़ती है तो हम अक्सर कहते हैं—

“मुझे यह सब सीखने की क्या जरूरत है?”

इसके बजाय हमें खुद से एक सवाल पूछना चाहिए—

“अगर कल अचानक इसकी जरूरत पड़ गई, तो क्या मैं यह काम खुद कर पाऊँगा?”

यही सवाल हमें आत्मनिर्भर बनाता है।

जीवन की तैयारी करना मृत्यु के बारे में सोचना नहीं है।
बल्कि जीवन को आत्मविश्वास के साथ जीना है।

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🙏 एक-दूसरे का सहारा बनिए… और एक-दूसरे को सक्षम भी बनाइए

पति पत्नी की जगह नहीं ले सकता।

पत्नी पति की जगह नहीं ले सकती।

लेकिन दोनों एक-दूसरे को इतना सक्षम जरूर बना सकते हैं कि जीवन की किसी भी परिस्थिति में दूसरा व्यक्ति पूरी तरह असहाय न हो।

इसलिए—

Technology सीखिए।
Digital Payment सीखिए।
Banking समझिए।
Emergency Services के नंबर याद रखिए।
जरूरी Documents व्यवस्थित रखिए।
महत्वपूर्ण जानकारी सुरक्षित रखिए।
बच्चों से नियमित संपर्क में रहिए।
और सबसे जरूरी—एक-दूसरे से प्रेम और सम्मान बनाए रखिए।

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❤️ अंत में सिर्फ तीन बातें…

“मैं तुम्हारे बिना नहीं जी सकता…”
— यह प्रेम है।

“तुम नहीं रहोगी, तब भी मैं हिम्मत से खड़ा रहूँगा…”
— यह जीवन को समझना है।

और—

“जब तक तुम मेरे साथ हो, मैं हमेशा तुम्हारे साथ खड़ा रहूँगा।”

— यही सच्ची जीवनसंगिनी और जीवनसाथी की पहचान है।

हमारा कर्तव्य करना हमारे हाथ में है।

हमारी रक्षा करना उसके हाथ में है। 🙏

इसलिए जब तक हम एक-दूसरे के साथ हैं—

सिर्फ एक-दूसरे से प्यार मत कीजिए…
एक-दूसरे को जीवन जीना भी सिखाइए।

क्योंकि प्रेम की सबसे सुंदर अभिव्यक्ति यह नहीं कि—

“तुम्हारे बिना मैं नहीं जी सकता…”

बल्कि यह है कि—

“अगर कभी मैं तुम्हारे साथ न रहूँ, तो भी तुम हिम्मत से अपना जीवन जी सको—इसके लिए मैं तुम्हें आज से तैयार करूँगा।” ❤️

और शायद…

यही सच्चे जीवनसाथी की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है। 🙏🌿

घर की स्त्रियों को पढ़ाई शिक्षा नौकरी काम के बाहरी बहाने बाहर निकालो बेटी बढ़ाओ बेटी बेटी पढ़ाओ नारी का सशक्तिकरण करो इस तरह अंकित नारे देकर नारियों का भरपूर शारीरिक और यौन शोषण करो और घर को बर्बाद कर दो

घर की स्त्रियों को पढ़ाई शिक्षा नौकरी काम के बाहरी बहाने बाहर निकालो बेटी बढ़ाओ बेटी बेटी पढ़ाओ नारी का सशक्तिकरण करो इस तरह अंकित नारे देकर नारियों का भरपूर शारीरिक और यौन शोषण करो और घर को बर्बाद कर दो कुछ दिन बाद नारा देना स्त्रियों को बाहर निकालो पुरुषों को घर का चौका बर्तन करने को लगाओ उसे दिन के बाद स्त्रियों को इतना स्वतंत्र और सत्संग कर देना विवेक कहने लगे कि हम बच्चे पैदा क्यों करें क्योंकि हमारा भी बराबर का अधिकार है पुरुष लोग बच्चे पैदा करें इसके बाद मन इतना बढ़ा दो कि वह कहीं हम तो पेंट शर्ट टाई लगाकर घूमेंगे और पुरुष साड़ी साया ब्लाउज समीज सलवार पहने और आराम से सारी दुनिया मिट जाए केवल मुसलमान बैठे हैं क्योंकि मुसलमान तो कभी नहीं मानेंगे कि स्त्रियां घर के बाहर निकले बच्चे पैदा ना करें किस प्रकार एक प्रकार से सारी दुनिया के राजनेता मुसलमान के द्वारा ब्लैकमेल होकर मोदी की तरह मुस्लिम दुनिया बनाने में जुटे हुए हैं क्योंकि ऊपर लिखी बातें जब होने लगेगी तो बच्चे कोच्चि दुनिया पर मुसलमान अपने आप ही अधिकार कर लेंगे वैसे भी हर परिवार विनाश के कगार पर खड़ा हो चुका है केवल 5 से 10 प्रतिशत घर समाज देश और धर्म को समझदार महिलाओं ने बचा कर रखा है जो राजनेताओं और कल बुद्धिजीवियों की हर चाल को समझ चुके हैं प्रकृति के नियम को बदलने चले हैं आज के भ्रष्टाचारी नेता और शासन जो एक दिन में करोड़ों रुपए का नाश्ता भोजन शिलाजीत वियाग्रा खाकर दुनिया के तमाम देशों में जाकर मौज मस्ती करते हैं और समझते हैं जनता इतनी मूर्ख है कि जो भी नारा देंगे जनता मान लेगी विदेश नहीं जाएगी सोना नहीं खरीदेगा घर में एक पैसे नहीं रखेगी आज क्या स्थिति बनी है 1000 2000 के नोट समाप्त करके नौटंकी कर दिया 10 20000 घर में आपत्ति के समय पड़े रहते थे वह भी नहीं है पूरा समाज और घर पूरी तरह बर्बाद कर दिया है इंद्राज नेताओं ने नियम कानून इनके ऊपर नहीं लागू होता केवल जनता को दिखाते हैं बिजली बचाओ पानी बचाओ इतनी हद हो गई है कि खुद तो एक गांव और कॉलोनी के बराबर एक सांसद विधायक मंत्री बिजली खर्च करते हैं पानी खर्च करते हैं जितने में एक परिवार नहाता है उतने में उनके कुत्ते स्नान करते हैं और देश को मूर्ख बनाकर घर परिवार पति पत्नी बाप बेटा बेटी लड़ा कर मजा ले रहे हैं महिलाओं के हरियाणवी क्षण में यही वर्ग सबसे आगे रहता है लोकराज के कारण भले न बताएं लेकिन पढ़ाई लिखाई नौकरी करने वाली एक भी लड़की औरत ऐसी नहीं है जो घर के बाहर यौन हिंसा का शिकार ना हुई हो लेकिन अपना घर परिवार बढ़ाने के कारण कोई मुंह नहीं खोलता है यही हमारे देश की सुरक्षा व्यवस्था और रामराज हैं पहले समस्त उतना अच्छा बना चारों ओर जंगली कुत्ते भेजिए घूम रहे हैं

मौसम की भविष्यवाणी आज का अधिकतम तापमान 34 डिग्री सेल्सियस न्यूनतम तापमान 25 डिग्री सेल्सियस रहेगा वर्षा की कोई संभावना नहीं है हल्के बादलों के बीच खुली धूप होगी

मौसम की भविष्यवाणी आज का अधिकतम तापमान 34 डिग्री सेल्सियस न्यूनतम तापमान 25 डिग्री सेल्सियस रहेगा वर्षा की कोई संभावना नहीं है हल्के बादलों के बीच खुली धूप होगी

कल के बारे में अनुमान है कि अधिकतम तापमान 33 डिग्री सेल्सियस न्यूनतम तापमान 24 डिग्री सेल्सियस रहेगा कल भी वर्षा की कोई संभावना नहीं है। 

इसी बीच वायु गुणवत्ता सूचकांक 75 से 150 के बीच हवा की दिशा पश्चिम और गति 10 से 20 के बीच रहेगी जो धीरे-धीरे बदलकर दक्षिण पश्चिम और फिर उत्तरी पूर्वी हो जाएगी।

और 15 अक्टूबर तक एक हल्की मध्यम वर्षा की  संभावना होने की भविष्यवाणी धीरे-धीरे सही हो रही है जो 6-7 अक्टूबर को होगी। इसके अध्यक्ष के हिमालय क्षेत्र महाराष्ट्र और अन्य जगहों पर हल्के मध्य भूकंप आने और अनेक भीषण प्राकृतिक आपदाओं के संभावना अक्टूबर के प्रथम सप्ताह में घटेगी सावधान रहें

पराबैंगनी किरणों की तीव्रता इस बीच 4 से 7 रहेगी  6  अक्टूबर से ठंड और भी बढ जाएगी- डॉ दिलीप कुमार सिंह मौसम विज्ञानी ज्योतिष शिरोमणि एवं निदेशक अलका शिप्रा वैष्णवी ज्योतिष मौसम पूर्वानुमान और विज्ञान अनुसंधान केंद्र जौनपुर 7017713978
[10/4, 6:11 AM] : हिमालय क्षेत्र और गुजरात महाराष्ट्र के कुछ भागों में अक्टूबर के प्रथम सप्ताह में भूकंप आने की हमारे केंद्र की भविष्यवाणी सही हुई
[10/4, 7:47 AM] Dileep Singh Rajput Jounpur: देश-विदेश के मौसम की भविष्यवाणी  - डॉ दिलीप कुमार सिंह मौसम विज्ञानी ज्योतिष शिरोमणि एवं निदेशक अलका शिप्रा वैष्णवी ज्योतिष मौसम पूर्वानुमान और विज्ञान अनुसंधान केंद्र जौनपुर 7017713978

 जौनपुर और आसपास 5 से 7 अक्टूबर तक होने वाली है वर्षा विश्व में आने वाले हैं तीन महा चक्रवात और कई अन्य भीषण प्राकृतिक आपदाएं


 जौनपुर और आसपास आज का अधिकतम तापमान 34 डिग्री सेल्सियस और न्यूनतम तापमान 25 डिग्री सेल्सियस रहेगा आज मौसम मुख्य रूप से सूखा रहेगा हवा दक्षिण पूर्वी हो जाएगी। और कल से बदलकर पूर्वी हो जाएगी शाम और रात में बादल छा जाएंगे 


कल के मौसम के बारे में अनुमान है कि अधिकतम तापमान 32 डिग्री सेल्सियस और न्यूनतम 23 डिग्री सेल्सियस रहेगा और कल परसों और उसके अगले दिन अनेक स्थानों पर हल्की मध्यम वर्षा होगी 100 से 140 के बीच हवा की गति 5 से 15 किलोमीटर प्रति घंटा हवा की दिशा पूर्वी रहेगी और पराबैंगनी किरणों की तीव्रता 4 से 7 रहेगी इसके अतिरिक्त हिमालय क्षेत्र पूर्वी उत्तरी पूर्वी भारत और दक्षिण के तटीय समुद्री भागों और किनारे पर वर्षा होगी जबकि दक्षिण का पठार महाराष्ट्र मुंबई नालासोपारा वसई विरार पालघर वापी वलसाड गुजरात और मध्य भारत में तेज धूप के साथ गर्मी उमस और पसीना होगा। 


दो महा चक्रवात प्रशांत महासागर में और एक अटलांटिक महासागर में उत्पन्न होंगे जिसमें प्रशांत महासागर में उत्पन्न होने वाला तूफान और हरिकेन और टाइफून बहुत अधिक प्रभावी होगा इन महा चक्रवातों की गति 200 से 300 किलोमीटर प्रति घंटा रहेगी लेकिन इनका 95% भाग समुद्र में पड़ जाने से बहुत अधिक धन-धन हानि की संभावना नहीं है फिर भी इसके प्रभाव से जापान के अनेक भागों में हवाई और क्यूबा द्वीप समूह में तथा दक्षिणी पूर्वी एशिया में बहुत तेज हवाओं के साथ भारी वर्षा हो सकती है और एशियाई समापन खेलों में बाधा पड़ सकती है। 


 एक बार फिर से बताना चाहते हैं कि अक्टूबर महीने में भारत में दो मध्यम और कई हल्के भूकंप आएंगे जबकि ईरान अरब क्षेत्र दक्षिणी पूर्वी एशिया जापान और दक्षिणी अमेरिका के कुछ भागों में एक या दो प्रचंड भयानक चक्रवात तूफान और भूकंप आने से भयानक हानि की संभावना है इस बार भारत के महाराष्ट्र और गुजरात में कई बार हल्के मध्य भूकंप आएंगे उत्तर भारत के अधिकांश भागों का तापमान अधिकतम 32 से 35 डिग्री सेल्सियस और न्यूनतम 22 से 25 डिग्री सेल्सियस रहेगा 


जबकि हिमालय के पर्वतीय क्षेत्र और पूर्वोत्तर भारत-30 डिग्री सेल्सियस में यह तापमान 25अधिकतम  और न्यूनतम 10 से 15 डिग्री सेल्सियस होता इस बीच दोपहर को छोड़कर मौसम सुखद शीतल सुहाना ठंडा और ताजा बना रहेगा हिमालय के तराई क्षेत्र नूरपुर और मुरादाबाद में गर्मी उमस के साथ हल्की वर्षा भी हो सकती है

: एक और बात बहुत ही गहन विचार करने की है कि भारत ने जितने भी रजत पदक जीते हुए सभी स्वर्ण पदक में बदल सकते थे

: एक और बात बहुत ही गहन विचार करने की है कि भारत ने जितने भी रजत पदक जीते हुए सभी स्वर्ण पदक में बदल सकते थे

 यदि इस पर गहन प्रशिक्षण दिया गया होता और खिलाड़ियों को उचित खान-पान और सुविधा दी गई होती कुछ खेलों में तो यह अंतर इतना कम था जिसे आज भी बहुत अफसोस होता है जैसे निशानेबाजी में इलावेनेल केवल 0.6 अंक से स्वर्ण पदक गंवा दिया वहीं ईशा सिंह चीन के खिलाड़ी के बराबर 38-38 अंक पर थी लेकिन उन्हें रजत पदक मिला एंसी सोजन केवल 2 सेंटीमीटर से चीन से स्वर्ण पदक चूक गई गोला फेंक में तेजेंद्र पाल तूर केवल 17 सेमी से स्वर्ण पदक गंवा बैठे तो मैराथन में सावन बरणबाल 2 घंटे 11 मिनट 37 सेकंड का सर्वश्रेष्ठ समय निकालने के बाद भी समापन रेखा पर जापान से केवल कुछ सेकंड से पीछे रह गए वहीं पर ऊंची कूद में कुशारे 2.25 मी के साथ चैंपियन खिलाड़ी के बराबर थे लेकिन उनका भी स्वर्ण पदक नहीं मिला लगभग सभी 21 रजत पदक स्वर्ण में बदल सकते थे और हाहाकार मच सकता था लेकिन खेल मंत्रालय और खेल अधिकारियों की कमी के चलते ऐसा नहीं हो सका इसी तरह जिसने सारे एशियाई खेल ध्यान से मेरी तरह देखा है वह अच्छी तरह जानता है कि लगभग हर एक तीसरा स्थान दूसरे स्थान में और चौथा स्थान तीसरे स्थान में बदल सकता था क्योंकि बैडमिंटन तलवारबाजी टेनिस टेबल शाहिद अनेक खेलों में भारत बिल्कुल अंत में हार गया इसमें बहुत बड़ा कारण था जापान पहुंचने पर खिलाड़ियों को भोजन पानी और कमरे के लिए ठहरना पड़ा जिन जिनसे उनकी ले बिगड़ गई और यदि आप ध्यान से देखें तो प्रारंभ के 5 और 6 दिनों तक खिलाड़ियों ने सबसे खराब प्रदर्शन किया बाद में जब उनको सारी सुविधाएं मिली तब उन्होंने जी तोड़ प्रदर्शन किया और अनेक कीर्तिमान बनाया

 कब बदलेगी भारतीय खेलों की दिशा और कब बनेगा भारत चीन की तरह खेलों की विश्व शक्ति

यह बहुत ही गहन और विचारणीय प्रश्न है जो 149 करोड़ भारतीयों को हमेशा बहुत ही व्यथित करता रहता है कि आखिर छोटे-छोटे देश एशियाई राष्ट्रमंडल और विश्व तथा ओलंपिक खेलों और अन्य खेलों में हमसे बहुत आगे हैं  इसका कारण है कि हमारे यहां हवा हवाई नारेबाजी बहुत होती है मुंगेरीलाल के हसीन सपने भी खूब दिखाए जाते हैं खिलाड़ियों पर दिखाने के लिए पैसे और धन तो बहुत खर्च किया जाता है लेकिन उसका आधा भाग भी वास्तव में खर्च नहीं हो पता अधिकांश खिलाड़ी और खेल मंत्रालय कभी खेलों के रुचि में रहता ही नहीं ना कभी खिलाड़ियों से उनका बहुत अधिक संबंध रहता है और उसमें अधिकांश तो न खिलाड़ी होते हैं ना खेलों का क ख ग घ जानते हैं  वर्ष भर आराम से सोते हैं और जब एशियाई खेल राष्ट्रमंडल खेल विश्व खेल ओलंपिक खेल और विश्व कप जैसे खेल खेल नजदीक आते हैं तब सोते-सोते जाग जाते हैं और आधी अधूरी तैयारी के साथ खिलाड़ियों को खेलने के लिए भेज दिया जाता है इसका परिणाम सामने आ जाता है वैसे अधिकांश एशियाई खेलों का स्तर ओलंपिक खेलों से बहुत अधिक नीचे हैं इसलिए और ओलंपिक खेलों में भारत को एक स्वर्ण मिलना भी बहुत भारी पड़ता है और भारत हमेशा सर्वश्रेष्ठ 30 देश से भी नीचे रहता है

यही कारण है कि आज से तीन-चार वर्ष पहले हांगझोऊ चीन में जहां से चले थे वहीं पर फिर से आ गए स्थान तो चौथा हमने बरकरार रखा हमने लेकिन कुल स्वर्ण पदकों की संख्या में 7 स्वर्ण पदक की कमी हो गई और संपूर्ण पदक संख्या भी 107 से घटकर 85 पर आ गई जो 32 काम है जो बहुत ही लज्जा जनक दुखद और चिंताजनक है विशेष कर तब जब 4 साल तक खेलो इंडिया का हवा हवाई नारा मुंगेरीलाल के हसीन सपनों की तरह सारे भारत के प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में सब के सिर पर चढ़कर बोल रहा था और सभी लोग कम से कम दूसरा स्थान पाने की खयाली पुलाव मन में पकाए हुए बैठे थे वह तो भला हो की अंतिम समय में उज्बेकिस्तान स्वर्ण पदक का मुकाबला हार गया वरना भारत पांचवें स्थान पर होता क्योंकि उज्बेकिस्तान ने भी भारत के बराबर ही 21 स्वर्ण पदक प्राप्त किए थे और उसका रजत पदक भारत से केवल दो कम था  इस प्रकार भारत का मान सम्मान थोड़ा बहुत बच गया लेकिन 149 करोड़ देश वाले भारत के लिए यह बहुत ही लज्जा जनक और अफसोस जनक है ।

यदि हमें वास्तव में खेलों में आगे बढ़ाना है और एशियाई खेलों में दूसरे या तीसरे स्थान विश्व और ओलंपिक खेलों में दूसरे या तीसरे स्थान विश्व और ओलंपिक खेलों में सर्वश्रेष्ठ 10 स्थान में आना है तो हमें दुनिया भर के हवा हवाई नारे और विज्ञापन से हटकर यथार्थ की दुनिया में आना होगा और चीन जापान अमेरिका की तरह बहुत छोटी आयु से ही खिलाड़ियों को संपूर्ण प्रशिक्षण संपूर्ण सुविधाओं के साथ देना होगा और उनके पैसे और भोजन में लूटपाट बंद करनी होगी जैसे कि देश की आजादी से आज तक होता चला आ रहा है इस बात का प्रमाण है वह खिड़की जो की अपना खेत बेचकर आभूषण बेचकर या गिरवी रखकर उधार लेकर खेलने गए और एशियाई खेलों से पदक लेकर लौटे जबकि भारी भरकम सरकारी सुविधा पाने वाले खिलाड़ी बुरी तरह हार गए इस पर भी गहराई से ध्यान देना होगा नहीं तो इसी तरह हवा हवाई नारे टेलीविजन और समाचार पत्रों में नेताओं के भाषण में जारी रहेगा सबसे बड़ी बात हमें देशभक्ति का विकास करना होगा और अंग्रेजी तथा अंग्रेजी संस्कृति सभ्यता की छाया से निकलकर खेलो इंडिया की जगह खेलो भारत जैसी सभ्यता का विकास करना होगा

अंत में गहराई से निष्पक्ष विवेचना करते हुए यह कहा जा सकता है कि अंतिम दो दिनों में 6 और 5 स्वर्ण पदक प्राप्त करके भारतीय खिलाड़ियों ने किसी तरह भारत को अपमानित होने से बचा लिया और गोल्फ जैसे खेलों में स्वर्ण पदक जीत करतहल्का मचा दिया  एक बात ध्यान रखना होगा कि जिन खेलों में सबसे अधिक स्वर्ण पदक मिलते हैं उसमें हम कहीं नहीं हैं जिसमें एथलेटिक्स जिमनास्टिक तरह की साइकलिंग तलवारबाजी जैसी प्रतियोगिताएं हैं इस पर हमको बहुत गहराई से ध्यान देना होगा यदि सरकार खेल मंत्रालय और भारत के बुद्धिजीवी जरा भी गंभीर हैं तो अब लगाया जापान को आज से भूलकर आने वाली विश्व का ओलंपिक खेल और अगले एशियाई खेलों पर ध्यान देते हुए तत्काल ही इस पर गहराई से काम करना होगा वरना फिर एक के बाद एक हम फेल होते चले जाएंगे और फिर से खेलो इंडिया का नारा हवा हवाई सिद्ध होगा हमें चीन की तरह पूरी तैयारी के साथ उतर कर पूरी दुनिया को आश्चर्यचकित करते हुए विश्व और ओलंपिक खेलों में शीर्ष पांच स्थानों में आना ही होगा
[10/3, 10:31 PM] Dr  Dileep Kumar singh: भारत के खेलों का ढांचा इतना पक्ष पर पूर्ण और गलत आधार पर है कि जिनको इसके बारे में गहराई से नहीं मालूम पर विश्वास नहीं कर सकते हैं सबसे बड़ी बात यहां पर खिलाड़ियों का शोषण और यौन शोषण जमकर होता है और आवाज उठाने वालों का हाल इतना बड़ा होता है कि पुलिस प्रशासन तो दूर न्यायपालिका से भी उनको न्याय नहीं मिल पाता है इसलिए वह सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन नहीं कर पाए चाहे पुरुष हो या महिला हो दूसरी बात पक्षपात और भाई भतीजावाद है जो स्कूल कॉलेज से विश्वविद्यालय तक चलता रहता है और प्रशिक्षक लोगों को काफी पैसा या फिर शरीर की आवश्यकता होती है और काफी सिफारिश भी चाहिए होती है अन्यथा अच्छे से अच्छा खिलाड़ी भी क्लब स्तर तक सीमित रह जाता है इसके अतिरिक्त मुंबई दिल्ली और महानगरों के जो खिलाड़ी होते हैं उनको राष्ट्रीय स्तर पर जाने की संभावना अधिक होती है छोटे स्तर वाले अपने नगर क्षेत्र तक ही गायब हो जाते हैं क्योंकि उनको उठाने वाला कोई नहीं होता है नगर क्षेत्र तक ही गायब हो जाते हैं क्योंकि उनको उठाने वाला कोई नहीं होता है । खेलों में तानाशाही चरम पर होती है चाटुकार और चापलूस लोग आगे बढ़ते जाते हैं और स्वाभिमानी लोग दबा दिए जाते हैं और यह लोग विश्व और एशिया स्तर पर जाकर देश के ऊपर कलंक लगा देते हैं सबसे बड़ी बात देश के अधिकांश प्रतिभाएं गांव और सुदूर क्षेत्रों से निकलते हैं जिन्हें धन का और सुविधाओं का घोर अभाव होता है इस बारे में एशियाई खेलों में गए खिलाड़ियों के बारे में पढ़कर आप जान सकते हैं जौनपुर के रोहित यादव का उदाहरण भी ले सकते हैं किस तरह लोग उधार लेकर खेत बेचकर आभूषण रखकर अनेक कठिनाई सहन करके या अपने शरीर का सौदा करके संबंधित खेल अधिकारी राजनेता के आगे उनकी सही गलत मांगों को मान लिए तब जाकर खेलने जा पाए यहां प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया भी बहुत ही पक्षपाती है और 20 से लेकर 24 पृष्ठ के समाचार पत्र में केवल एक पृष्ठ खेलों से संबंधित होता है और उसमें भी कभी-कभी आधा पेज विज्ञापन दे दिया जाता है इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का हाल तो और भी खराब है खेल पर लेख लिखने वाले तो बहुत गिने चुने दिखाई पड़ते हैं और अच्छा लिखने वाले लोगों का छापा भी नहीं जाता है सामान्य जनता और बुद्धिजीवी लोगों की रुचि भी खेलों में बहुत कम है इन सब चीजों को दूर करके ही भारत खेलों की विश्व शक्ति बन सकता है।

रिएक्शन से ज़िम्मेदारी से जुड़ने तक*

*रिएक्शन से ज़िम्मेदारी से जुड़ने तक*

भारत की ताकत हमेशा से अलग-अलग बातों को समझने की उसकी काबिलियत पर टिकी रही है। अलग-अलग धर्मों, भाषाओं, संस्कृतियों और परंपराओं के लोग सदियों से एक साथ रहते आए हैं, आस-पड़ोस, काम की जगहें, संस्थाएँ और पब्लिक जगहें शेयर करते आए हैं। फिर भी इस अलग-अलग तरह की बातों के सामने चुनौतियाँ भी हैं। अफवाहें, गलत जानकारी, पुरानी सोच और भड़काऊ बातें जल्दी ही शक पैदा कर सकती हैं और समाज में फूट को और गहरा कर सकती हैं। मुस्लिम समुदाय के लिए, हर दूसरे समुदाय की तरह, चुनौती सिर्फ़ भेदभाव या दुश्मनी होने पर जवाब देना ही नहीं है, बल्कि यह पक्का करना भी है कि जवाब से फूट और न बढ़े।
नफ़रत पर आम रिएक्शन अक्सर गुस्सा होता है। जब कोई समुदाय खुद को टारगेटेड महसूस करता है, तो उसी भाषा में जवाब देने का बहुत ज़्यादा लालच हो सकता है, खासकर सोशल मीडिया पर। लेकिन यह आसानी से एक जाल बन सकता है। एक भड़काऊ बयान दूसरे बयान की ओर ले जाता है, एक गुमराह करने वाली पोस्ट गुस्से वाली प्रतिक्रिया को न्योता देती है, और जल्द ही असली मुद्दा आरोप-प्रत्यारोप के चक्कर में दब जाता है। जो लोग फूट डालना चाहते हैं, उन्हें ठीक इसी माहौल से फ़ायदा होता है। इसलिए, मकसद यह नहीं होना चाहिए कि ऑनलाइन हर बहस जीत ली जाए, बल्कि यह होना चाहिए कि उकसावे की वजह से कम्युनिटी कैसे रिएक्ट करें, यह तय न हो। झूठे दावों को फैक्ट्स से चैलेंज किया जा सकता है। हेट स्पीच को डॉक्यूमेंट करके रिपोर्ट किया जा सकता है। गैर-कानूनी कामों को सही लीगल तरीकों से आगे बढ़ाया जा सकता है। सोशल मीडिया पोस्ट, वीडियो और दूसरी चीज़ों को सबूत के तौर पर संभालकर रखा जा सकता है, न कि सिर्फ़ गुस्से वाली बहस का विषय बनने दिया जाए। एक कॉन्स्टिट्यूशनल डेमोक्रेसी शिकायतों को दूर करने के लिए इंस्टीट्यूशन और लीगल सिस्टम देती है। यह पक्का करने का एक तरीका है कि जायज़ चिंताओं को सबूत और सही प्रोसेस से दूर किया जाए, न कि टकराव से।
डिजिटल दुनिया पर खास ध्यान देने की ज़रूरत है। एडिट किए गए वीडियो, मनगढ़ंत कोटेशन, पुरानी तस्वीरें जिन्हें नए और गुमराह करने वाले दावों के तौर पर दिखाया जाता है, तेज़ी से फैल सकती हैं, खासकर जब वे मौजूदा डर या गलत सोच को कन्फर्म करती हैं। जब तक सच्चाई सामने आती है, तब तक नुकसान हो चुका होता है। यह हर सोशल-मीडिया यूज़र को सॉल्यूशन या प्रॉब्लम का हिस्सा बनाता है। भड़काने वाला कंटेंट फॉरवर्ड करने से पहले, एक आसान सा सवाल पूछना सही है: क्या यह वेरिफाइड है? अगर जवाब नहीं है, तो इसे फॉरवर्ड करने से, भले ही इसकी बुराई करने के इरादे से, इसे ज़्यादा लोग देख सकते हैं। इसलिए, गलत जानकारी को बढ़ावा देने से मना करना ज़िम्मेदार नागरिक होने का एक ज़रूरी तरीका है। भारत में सांप्रदायिक तनाव के अनुभव ने बार-बार अफ़वाहों और भड़काऊ बातचीत के खतरों को दिखाया है। उदाहरण के लिए, 2013 में मुज़फ़्फ़रनगर में हुई गड़बड़ी ने दिखाया कि कैसे गुमराह करने वाला डिजिटल मटीरियल पहले से ही तनावपूर्ण माहौल को और बिगाड़ सकता है। यह सबक सिर्फ़ एक घटना या एक समुदाय तक सीमित नहीं है। यह सोशल मीडिया इस्तेमाल करने वाले हर किसी के लिए काम का है। जानकारी तनाव को शांत कर सकती है, लेकिन यह उन्हें और भड़का भी सकती है। इसलिए शेयर करने से पहले वेरिफ़ाई करने की ज़िम्मेदारी सभी नागरिकों की है।
मुस्लिम समुदाय के लिए, इस चुनौती का एक और ज़रूरी पहलू है। पब्लिक एंगेजमेंट हमेशा रिएक्टिव नहीं रहना चाहिए। अगर हर बातचीत नए विवाद से शुरू होती है और जवाब के साथ खत्म होती है, तो समुदाय बचाव की स्थिति में फंस सकता है। एक मज़बूत और ज़्यादा टिकाऊ तरीका यह पक्का करना है कि आम जनता भी समुदाय को उसके योगदान, उपलब्धियों और समाज के साथ रोज़ाना के जुड़ाव के ज़रिए देखे। मुस्लिम प्रोफ़ेशनल, एंटरप्रेन्योर, टीचर, डॉक्टर, रिसर्चर, कलाकार, खिलाड़ी, सोशल वर्कर और सिविल-सोसाइटी संगठन कई तरह से देश में योगदान दे रहे हैं। मुस्लिम संस्थाएं शिक्षा, हेल्थकेयर, चैरिटी, आपदा राहत और कम्युनिटी की भलाई में शामिल हैं। ऐसे योगदान को देश पर एहसान के तौर पर नहीं दिखाना चाहिए। वे बराबर के नागरिक के तौर पर कम्युनिटी की भूमिका का हिस्सा हैं। कंस्ट्रक्टिव हिस्सेदारी की ज़्यादा विज़िबिलिटी, भारतीय मुसलमानों के बारे में लोगों की ज़्यादा पूरी समझ बनाने में मदद कर सकती है, उन विवादों से परे जो अक्सर न्यूज़ और सोशल मीडिया पर छाए रहते हैं।
इसके लिए युवाओं पर भी ज़्यादा ध्यान देने की ज़रूरत है। युवा मुसलमान डिजिटल प्लेटफॉर्म के सबसे ज़्यादा एक्टिव यूज़र में से हैं और इसलिए वे खास तौर पर भड़काऊ कंटेंट, गलत जानकारी और ऑनलाइन पोलराइजेशन के संपर्क में आते हैं। उन्हें जो कुछ भी वे देखते हैं उस पर तुरंत रिएक्ट करने के बजाय उस पर सवाल उठाने का कॉन्फिडेंस चाहिए। डिजिटल लिटरेसी, फैक्ट-चेकिंग, इज्ज़तदार बातचीत और कानूनी उपायों के बारे में जागरूकता कम्युनिटी एजुकेशन का हिस्सा बननी चाहिए। बिना गाली दिए असहमत होने की क्षमता, और किसी दूसरे व्यक्ति को नीचा दिखाए बिना अपनी बात का बचाव करना, एक ज़रूरी सिविक स्किल है। यह समझने में भी समझदारी है कि हर उकसावे का एक जैसा जवाब नहीं मिलना चाहिए। कुछ मुद्दों पर कानूनी कार्रवाई की ज़रूरत होती है। कुछ पर फैक्ट्स की सफाई की ज़रूरत होती है। दूसरों को जानबूझकर भड़काऊ कंटेंट को गैर-ज़रूरी पब्लिसिटी देने से मना करके बेहतर तरीके से संभाला जा सकता है। स्ट्रेटेजिक रोक को सरेंडर समझने की गलती नहीं करनी चाहिए। इसका मतलब है यह तय करना कि कोई रिस्पॉन्स कहाँ है ...जहां सही प्रतिक्रिया से सचमुच बदलाव लाया जा सकता है, वहीं गुस्से वाली प्रतिक्रिया विवाद को और हवा ही देगी।
इस्लामी नैतिक परंपरा में भी संयम, न्याय और ज़िम्मेदार व्यवहार को महत्व दिया जाता है। अपनी गरिमा की रक्षा के लिए नफ़रत फैलाने वालों जैसा व्यवहार अपनाने की ज़रूरत नहीं है। और न ही किसी पूर्वाग्रह का विरोध करने के लिए किसी दूसरे समूह के प्रति पूर्वाग्रह पालने की ज़रूरत है। मकसद यह होना चाहिए कि किसी एक घटना को सामूहिक दुश्मनी में बदले बिना किसी काम, तर्क या झूठे दावे को चुनौती दी जाए। भारत का भविष्य न केवल बंटवारा फैलाने वालों से तय होगा, बल्कि इस बात से भी तय होगा कि आम नागरिक उस पर कैसी प्रतिक्रिया देते हैं। भारतीय मुसलमानों के लिए, इसका मतलब है भेदभाव और गलत जानकारी के खिलाफ मजबूती से खड़े होना, साथ ही बदले में वैसी ही नफ़रत न फैलाना। इसका मतलब है कानूनी तरीकों से न्याय की मांग करना, सोशल मीडिया का ज़िम्मेदारी से इस्तेमाल करना, युवाओं में निवेश करना और समाज में किए जा रहे रचनात्मक योगदान को ज़्यादा लोगों तक पहुँचाना।
फ़रहत अली खान 
एम ए गोल्ड मेडलिस्ट