Saturday, 3 October 2026

रिएक्शन से ज़िम्मेदारी से जुड़ने तक*

*रिएक्शन से ज़िम्मेदारी से जुड़ने तक*

भारत की ताकत हमेशा से अलग-अलग बातों को समझने की उसकी काबिलियत पर टिकी रही है। अलग-अलग धर्मों, भाषाओं, संस्कृतियों और परंपराओं के लोग सदियों से एक साथ रहते आए हैं, आस-पड़ोस, काम की जगहें, संस्थाएँ और पब्लिक जगहें शेयर करते आए हैं। फिर भी इस अलग-अलग तरह की बातों के सामने चुनौतियाँ भी हैं। अफवाहें, गलत जानकारी, पुरानी सोच और भड़काऊ बातें जल्दी ही शक पैदा कर सकती हैं और समाज में फूट को और गहरा कर सकती हैं। मुस्लिम समुदाय के लिए, हर दूसरे समुदाय की तरह, चुनौती सिर्फ़ भेदभाव या दुश्मनी होने पर जवाब देना ही नहीं है, बल्कि यह पक्का करना भी है कि जवाब से फूट और न बढ़े।
नफ़रत पर आम रिएक्शन अक्सर गुस्सा होता है। जब कोई समुदाय खुद को टारगेटेड महसूस करता है, तो उसी भाषा में जवाब देने का बहुत ज़्यादा लालच हो सकता है, खासकर सोशल मीडिया पर। लेकिन यह आसानी से एक जाल बन सकता है। एक भड़काऊ बयान दूसरे बयान की ओर ले जाता है, एक गुमराह करने वाली पोस्ट गुस्से वाली प्रतिक्रिया को न्योता देती है, और जल्द ही असली मुद्दा आरोप-प्रत्यारोप के चक्कर में दब जाता है। जो लोग फूट डालना चाहते हैं, उन्हें ठीक इसी माहौल से फ़ायदा होता है। इसलिए, मकसद यह नहीं होना चाहिए कि ऑनलाइन हर बहस जीत ली जाए, बल्कि यह होना चाहिए कि उकसावे की वजह से कम्युनिटी कैसे रिएक्ट करें, यह तय न हो। झूठे दावों को फैक्ट्स से चैलेंज किया जा सकता है। हेट स्पीच को डॉक्यूमेंट करके रिपोर्ट किया जा सकता है। गैर-कानूनी कामों को सही लीगल तरीकों से आगे बढ़ाया जा सकता है। सोशल मीडिया पोस्ट, वीडियो और दूसरी चीज़ों को सबूत के तौर पर संभालकर रखा जा सकता है, न कि सिर्फ़ गुस्से वाली बहस का विषय बनने दिया जाए। एक कॉन्स्टिट्यूशनल डेमोक्रेसी शिकायतों को दूर करने के लिए इंस्टीट्यूशन और लीगल सिस्टम देती है। यह पक्का करने का एक तरीका है कि जायज़ चिंताओं को सबूत और सही प्रोसेस से दूर किया जाए, न कि टकराव से।
डिजिटल दुनिया पर खास ध्यान देने की ज़रूरत है। एडिट किए गए वीडियो, मनगढ़ंत कोटेशन, पुरानी तस्वीरें जिन्हें नए और गुमराह करने वाले दावों के तौर पर दिखाया जाता है, तेज़ी से फैल सकती हैं, खासकर जब वे मौजूदा डर या गलत सोच को कन्फर्म करती हैं। जब तक सच्चाई सामने आती है, तब तक नुकसान हो चुका होता है। यह हर सोशल-मीडिया यूज़र को सॉल्यूशन या प्रॉब्लम का हिस्सा बनाता है। भड़काने वाला कंटेंट फॉरवर्ड करने से पहले, एक आसान सा सवाल पूछना सही है: क्या यह वेरिफाइड है? अगर जवाब नहीं है, तो इसे फॉरवर्ड करने से, भले ही इसकी बुराई करने के इरादे से, इसे ज़्यादा लोग देख सकते हैं। इसलिए, गलत जानकारी को बढ़ावा देने से मना करना ज़िम्मेदार नागरिक होने का एक ज़रूरी तरीका है। भारत में सांप्रदायिक तनाव के अनुभव ने बार-बार अफ़वाहों और भड़काऊ बातचीत के खतरों को दिखाया है। उदाहरण के लिए, 2013 में मुज़फ़्फ़रनगर में हुई गड़बड़ी ने दिखाया कि कैसे गुमराह करने वाला डिजिटल मटीरियल पहले से ही तनावपूर्ण माहौल को और बिगाड़ सकता है। यह सबक सिर्फ़ एक घटना या एक समुदाय तक सीमित नहीं है। यह सोशल मीडिया इस्तेमाल करने वाले हर किसी के लिए काम का है। जानकारी तनाव को शांत कर सकती है, लेकिन यह उन्हें और भड़का भी सकती है। इसलिए शेयर करने से पहले वेरिफ़ाई करने की ज़िम्मेदारी सभी नागरिकों की है।
मुस्लिम समुदाय के लिए, इस चुनौती का एक और ज़रूरी पहलू है। पब्लिक एंगेजमेंट हमेशा रिएक्टिव नहीं रहना चाहिए। अगर हर बातचीत नए विवाद से शुरू होती है और जवाब के साथ खत्म होती है, तो समुदाय बचाव की स्थिति में फंस सकता है। एक मज़बूत और ज़्यादा टिकाऊ तरीका यह पक्का करना है कि आम जनता भी समुदाय को उसके योगदान, उपलब्धियों और समाज के साथ रोज़ाना के जुड़ाव के ज़रिए देखे। मुस्लिम प्रोफ़ेशनल, एंटरप्रेन्योर, टीचर, डॉक्टर, रिसर्चर, कलाकार, खिलाड़ी, सोशल वर्कर और सिविल-सोसाइटी संगठन कई तरह से देश में योगदान दे रहे हैं। मुस्लिम संस्थाएं शिक्षा, हेल्थकेयर, चैरिटी, आपदा राहत और कम्युनिटी की भलाई में शामिल हैं। ऐसे योगदान को देश पर एहसान के तौर पर नहीं दिखाना चाहिए। वे बराबर के नागरिक के तौर पर कम्युनिटी की भूमिका का हिस्सा हैं। कंस्ट्रक्टिव हिस्सेदारी की ज़्यादा विज़िबिलिटी, भारतीय मुसलमानों के बारे में लोगों की ज़्यादा पूरी समझ बनाने में मदद कर सकती है, उन विवादों से परे जो अक्सर न्यूज़ और सोशल मीडिया पर छाए रहते हैं।
इसके लिए युवाओं पर भी ज़्यादा ध्यान देने की ज़रूरत है। युवा मुसलमान डिजिटल प्लेटफॉर्म के सबसे ज़्यादा एक्टिव यूज़र में से हैं और इसलिए वे खास तौर पर भड़काऊ कंटेंट, गलत जानकारी और ऑनलाइन पोलराइजेशन के संपर्क में आते हैं। उन्हें जो कुछ भी वे देखते हैं उस पर तुरंत रिएक्ट करने के बजाय उस पर सवाल उठाने का कॉन्फिडेंस चाहिए। डिजिटल लिटरेसी, फैक्ट-चेकिंग, इज्ज़तदार बातचीत और कानूनी उपायों के बारे में जागरूकता कम्युनिटी एजुकेशन का हिस्सा बननी चाहिए। बिना गाली दिए असहमत होने की क्षमता, और किसी दूसरे व्यक्ति को नीचा दिखाए बिना अपनी बात का बचाव करना, एक ज़रूरी सिविक स्किल है। यह समझने में भी समझदारी है कि हर उकसावे का एक जैसा जवाब नहीं मिलना चाहिए। कुछ मुद्दों पर कानूनी कार्रवाई की ज़रूरत होती है। कुछ पर फैक्ट्स की सफाई की ज़रूरत होती है। दूसरों को जानबूझकर भड़काऊ कंटेंट को गैर-ज़रूरी पब्लिसिटी देने से मना करके बेहतर तरीके से संभाला जा सकता है। स्ट्रेटेजिक रोक को सरेंडर समझने की गलती नहीं करनी चाहिए। इसका मतलब है यह तय करना कि कोई रिस्पॉन्स कहाँ है ...जहां सही प्रतिक्रिया से सचमुच बदलाव लाया जा सकता है, वहीं गुस्से वाली प्रतिक्रिया विवाद को और हवा ही देगी।
इस्लामी नैतिक परंपरा में भी संयम, न्याय और ज़िम्मेदार व्यवहार को महत्व दिया जाता है। अपनी गरिमा की रक्षा के लिए नफ़रत फैलाने वालों जैसा व्यवहार अपनाने की ज़रूरत नहीं है। और न ही किसी पूर्वाग्रह का विरोध करने के लिए किसी दूसरे समूह के प्रति पूर्वाग्रह पालने की ज़रूरत है। मकसद यह होना चाहिए कि किसी एक घटना को सामूहिक दुश्मनी में बदले बिना किसी काम, तर्क या झूठे दावे को चुनौती दी जाए। भारत का भविष्य न केवल बंटवारा फैलाने वालों से तय होगा, बल्कि इस बात से भी तय होगा कि आम नागरिक उस पर कैसी प्रतिक्रिया देते हैं। भारतीय मुसलमानों के लिए, इसका मतलब है भेदभाव और गलत जानकारी के खिलाफ मजबूती से खड़े होना, साथ ही बदले में वैसी ही नफ़रत न फैलाना। इसका मतलब है कानूनी तरीकों से न्याय की मांग करना, सोशल मीडिया का ज़िम्मेदारी से इस्तेमाल करना, युवाओं में निवेश करना और समाज में किए जा रहे रचनात्मक योगदान को ज़्यादा लोगों तक पहुँचाना।
फ़रहत अली खान 
एम ए गोल्ड मेडलिस्ट

पूज्य प्रेमानंद जी महाराज के शिष्य थे, रसिक दुलारी दास, पुलिस जांच के अनुसार इन्होंने कामवासना से पीड़ित होकर अपने जननांग ग्राइंडर मशीन से काट लिए

पूज्य प्रेमानंद जी महाराज के शिष्य थे, रसिक दुलारी दास, पुलिस जांच के अनुसार इन्होंने कामवासना से पीड़ित होकर अपने जननांग ग्राइंडर मशीन से काट लिए, पहले दर्द और पीड़ा से वह इधर-उधर दौड़ते दिखाई दिए हैं, जब दर्द और ब्लड नहीं रुका दुलारी जी ने बिल्डिंग से कूदकर आत्महत्या कर ली l 
वह 25 साल के थे,25 साल की आयु में कामवासना एक प्राकृतिक चीज है l सभी युवकों में एक आयु पर कामवासना आती है, अब आपके पास तीन उपाय है, पहला प्राकृतिक उपाय यही है कि आप एक जीवन साथी खोजें और अगर आध्यात्मिक प्रवृत्ति के हैं तो परिवार में रहते हुए साधना करें l साधू संतों की उन बातों को कचरे में डाल दें, जो कहते हैं कि भोग पाप है और पतन है l भोग न पाप है और न पुण्य है, वह बस शरीर की बायोलॉजिकल आवश्यकता है l यह सारी व्यवस्था भी परमात्मा की ही बनाई हुई है, इसे स्वीकार करें l अधिकांश धार्मिक लोग जीवन विरोधी हैं, जीवन की सहजता को स्वीकार नहीं कर पाते हैं l 

फिर भी अगर आपने संकल्प ले ही लिया है तो आपको यह समझना होगा कि कामवासना को दबा लेना कोई ब्रह्मचर्य नहीं है l इस तरह के दमन से आपके भीतर तो कामवासना उबलती रहती है और आप ऊपर ऊपर राम राम भी जपते रहते हैं l एक और ब्रह्मचर्य भी है, जहां कामवासना तिरोहित होने लगती है, जैसे एक पांच साल का बच्चा है तो वह कामवासना को दबाये हुए नहीं है, वह अभी मुक्त है, जो भी व्यक्ति कामवासना से मुक्त हो जाता है, वह बच्चे की तरह ही सरल हो जाता है l ऐसा नहीं है कि वह कामवासना को दबाये बैठा होता है, बल्कि उसकी स्त्री या पुरुष में उत्सुकता ही समाप्त हो जाती है l 

लेकिन यह राधे-राधे जपने से नहीं होगा, न राम- राम जपने से होगा l यह तो बहुत प्राईमरी स्तर की साधना है, कुछ शब्दों को बार बार दोहराने से कोई ऊंची आध्यात्मिक अवस्था उपलब्ध नहीं की जा सकती है लेकिन सारी दुनिया इसी मूढ़ता में है, लोग समझते हैं कि किसी शब्द को बार बार दोहराने से कुछ उपलब्ध हो जाएगा l मैं जगतगुरु श्री कृपालु महाराज के पास भी रह चुका हूं, तो मैं अपने अनुभव से ही कह रहा हूँ l आज भी कृपालु महाराज के प्रति श्रद्धा रखता हूँ और फिर भी कहता हूं कि यह बहुत ही प्राईमरी स्कूल की शिक्षा है l मेरे एक मित्र खुद ही पूरे दिन राम नाम की माला घुमाते हैं और एक दिन सत्य जुबान पर आ ही गया, पूछने लगे कि दिन भर भजन करने के बाद भी काम क्रोध कम क्यों नहीं होते हैं? 

जब तक आपको नहीं पता कि सुषुम्ना से कैसे साँस ली जाती है ? साँस कब कौन से स्वर पर चल रही है? जब तक आपको समाधि की अनुभूति नहीं है, समाधि का ज्ञान नहीं है, तब तक आप अपनी ऊर्जा को रूपांतरित न कर पाएंगे l अगर चित्त तनाव ग्रस्त रहता है तो तनाव ग्रस्त चित्त हल्के होने के लिए काम वासना की मांग करेगा l इसलिए सांसरिक कार्यो में बोध और होश के साथ जिएं ताकि चित्त प्रफुल्लित रहे l 

मन का एक नियम है, इसे जहां सुख मिलता है, यह वहीं भागता है l अभी तक मनुष्य जाति ने स्वाद और सेक्स से ऊपर कोई सुख जाना भी नहीं है, इसीलिए दोनों की बड़ी मांग है l जब आप भीतर कोई और रस,कोई और आनंद से परिचित हो जाते हैं तो बाकी के रस मन सहज छोड़ देता है, कबीर कहते हैं- राम रस पिया रे, जा रस बिसर गए रस और...

बाकी सूरदास जी के बारे में भी कहा जाता है कि स्त्रियाँ उनको आकर्षित करती थी, इसलिए उन्होंने अपनी आँख फोड़ ली थी, अरे आँख तो यही बुद्ध के पास भी है, यही कबीर के पास भी है l आँख थोड़े ही वासना के लिए जिम्मेदार है, मन का सारा खेल है, जननांग को काटने से भी वासना नहीं जाती है, मन वासना से घिरा है l कान का काम बाहर की ध्वनि को भीतर पहुंचाना है, यह तो मन का रस है कि वह क्या सुनना चाहता है l विवेक भी तो विकसित कीजिए l 

धार्मिक लोगों की समझ ऐसी है कि अगर आप कामवासना पर बात करते हैं तो आप कैसे धार्मिक व्यक्ति हैं l धार्मिक लोगों की सबसे बड़ी समस्या भी यही है क्योंकि वे कामवासना का दमन करते हैं और दमन के कारण कामवासना से ही ग्रस्त भी रहते हैं, रूपांतरण का कोई ज्ञान नहीं है l बाकी पूजनीय संत प्रेमानंद जी आज बहुत प्रसिद्ध हैं,लेकिन प्रसिद्धि सत्य की कसौटी नहीं है l मैं भी उनके प्रति श्रद्धा रखता हूँ लेकिन यह भी जानता हूं कि वे सत्य को उपलब्ध नहीं है, लेकिन संत बहुत प्यारे हैं l हृदय में किसी तरह का छल, कपट इत्यादि कुछ भी नहीं है लेकिन पूर्णत्व भी नहीं है l 

किसी भी दुर्भावना से पोस्ट प्रभावित नहीं है, बस एक साधक की दुखद यात्रा के लिए खेद है और जो युवक इस मार्ग पर हैं, उनके लिए करुणा है l 

आपको क्या लगता है अपने विचार कमेंट कर सकते हैं

#foryouシ  #nonfollowers #socialmediapost

Friday, 2 October 2026

सास के बाद बहू की बारी’: जमीन के भूखे दामाद का खूनी ‘लव रिटर्न’, 5 घंटे में पुलिस ने निकाला सारा भूत

‘सास के बाद बहू की बारी’: जमीन के भूखे दामाद का खूनी ‘लव रिटर्न’, 5 घंटे में पुलिस ने निकाला सारा भूत

#छतरपुर की अमलताश कॉलोनी से इश्क़, जमीन और खून-खराबे का ऐसा ‘पारिवारिक पैकेज’ सामने आया है, जिसे देखकर सनसनी भी अपना सिर पीट ले। मिलिए लखन जोशी से—जो पहले अपनी सास को ‘सदाबहार छुट्टी’ पर भेजकर जेल की हवा खा चुका था। जेल से छूटते ही लगा कि साहब सुधर गए होंगे, मगर जनाब के दिमाग में जमीन का कीड़ा ऐसा कुलबुलाया कि जिस पत्नी से कभी ‘लव मैरिज’ की कसमें खाई थीं, उसी को मौत के घाट उतार दिया।
शायद पतिदेव का मानना था कि जब सास को रास्ते से हटा ही दिया है, तो पत्नी को बीच में छोड़कर ‘काम अधूरा’ क्यों रखा जाए! बेशकीमती जमीन नाम कराने का सुरूर ऐसा चढ़ा कि उसने अपने एक साथी के साथ मिलकर पत्नी ज्योति की जान ले ली और यूपी भागकर 'फरार दामाद' बनने की फिराक में लग गया।
मगर अफसोस, विलेन की किस्मत में लंबी दौड़ नहीं लिखी थी। सिविल लाइन पुलिस ने ऐसा जाल बिछाया कि महज 5 घंटे के भीतर साहब का सारा 'जमीनी बुखार' उतर गया और वे सीधे सलाखों के पीछे जा पहुंचे।
हैरत और लालच के इस खूनी ड्रामे का सबसे स्याह पहलू वो दो मासूम बच्चे हैं, जिनकी दुनिया एक झटके में उजड़ गई—मां कब्र में और ‘कातिल बाप’ अब जिंदगी भर जेल की रोटियां तोड़कर अपनी 'जमींदारी' का हिसाब लगाएगा।
#ChhatarpurCrime
#CrimeNewsHindi
#GreedAndBetrayal
#PoliceAction
#KhaufnakHatyakand

बीमार पत्नी’ का ढोंग और गंदी नीयत: कुशीनगर के स्कूल प्रबंधक को भारी पड़ी अश्लील हरकत, शिक्षिका ने सिखाया सबक, पहुंचा जेल

‘बीमार पत्नी’ का ढोंग और गंदी नीयत: कुशीनगर के स्कूल प्रबंधक को भारी पड़ी अश्लील हरकत, शिक्षिका ने सिखाया सबक, पहुंचा जेल
#कुशीनगर; के रवींद्र नगर स्थित ‘द रैनबो लोरेटो एकेडमी’ नाम के तथाकथित शिक्षा के मंदिर में प्रबंधक दिनेश राय की शर्मनाक करतूत सामने आई है। खुद को संस्कार और मर्यादा का ठेकेदार समझने वाले इस प्रबंधक ने ट्रांसफर सर्टिफिकेट (TC) बनवाने के बहाने एक युवा शिक्षिका को अपने दफ्तर बुलाया। आरोप है कि वहां उसने अपनी ‘बीमार पत्नी’ का सबसे पुराना और घिसा-पिटा रोना रोते हुए शिक्षिका पर आपत्तिजनक दबाव बनाने और अश्लील हरकतें करने की कोशिश की।
मगर ‘डायरेक्टर साहब’ का यह घटिया दांव उल्टा पड़ गया। शिक्षिका डरकर खामोश बैठने के बजाय चट्टान बनकर खड़ी हो गई और उसने प्रबंधक को सीधे मुंह पर लताड़ लगाते हुए आईना दिखा दिया: “सर, मैं आपकी बेटी की उम्र की हूं। अगर आपकी बेटी से कोई ऐसा बोले तो कैसा लगेगा? इतनी ही मजबूरी है तो दूसरी शादी कर लो या कहीं और जाओ, स्कूल को अपनी अय्याशी का अड्डा मत बनाओ।” शिक्षिका ने यह भी साफ कर दिया कि स्कूल में यह कोई नई बात नहीं है, बल्कि हर महिला टीचर उसके अकेले में बुलाने की नीयत से खौफ खाती है।
प्रबंधक ने विरोध करने पर धमकी देकर बात दबाने की कोशिश की, लेकिन पूरी घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर #वायरल हो गया। वीडियो सामने आते ही कुशीनगर पुलिस तुरंत हरकत में आई और आरोपी प्रबंधक को गिरफ्तार कर अदालत में पेश किया, जहां से उसे सीधे जेल की सलाखों के पीछे भेज दिया गया।
संस्कारों का ढोंग रचकर गंदा खेल खेलने वाले स्कूल प्रबंधक की सारी हेकड़ी धरी की धरी रह गई—शिक्षिका की हिम्मत ने साफ कर दिया कि स्कूल बच्चों का भविष्य संवारने के लिए होते हैं, किसी प्रबंधक की ओछी हरकतों का अड्डा बनने के लिए नहीं।
#KushinagarNews
#SchoolManagerExposed
#UPPoliceAction
#CrimeAgainstWomen
#WomenSafetyAtWork

शिक्षामित्र ऊषा ओझा की साठ वर्ष में सेवा समाप्ति पर रोक**________________________*

#शिक्षामित्र ऊषा ओझा की साठ वर्ष में सेवा समाप्ति पर रोक*
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❇️👉मामला रिट याचिका के अंतिम निर्णय के अधीन : विजय पांडे 


जनपद सुलतानपुर की शिक्षामित्र उषा ओझा द्वारा साठ वर्ष की आयु पूर्ण होने पर सेवा समाप्त किए जाने के विरुद्ध अधिवक्ता विजय कुमार पाण्डेय के माध्यम से दायर याचिका पर माननीय उच्च न्यायालय, इलाहाबाद, लखनऊ पीठ ने महत्वपूर्ण आदेश पारित किया है। न्यायमूर्ति प्रकाश सिंह ने निर्देश दिया है कि याचिनी के विरुद्ध किसी भी प्रकार की कार्रवाई रिट याचिका के अंतिम निर्णय के अधीन रहेगी।
श्रीमती उषा ओझा वर्ष 2006 से प्राथमिक विद्यालय विभारपुर, विकास खंड–जयसिंहपुर में शिक्षामित्र के रूप में कार्यरत हैं। 

उनकी सेवानिवृत्ति 23 नवंबर 2025 को प्रस्तावित थी, क्योंकि उसी दिन वे 60 वर्ष की आयु पूर्ण कर रही थीं। उन्होंने 17 फरवरी 2023 के उस शासनादेश को चुनौती दी है, जिसमें शिक्षामित्रों की सेवा समाप्ति आयु 60 वर्ष निर्धारित की गई है। उनका कहना है कि जब नियमित सहायक अध्यापकों की सेवानिवृत्ति आयु 62 वर्ष है और शिक्षामित्र भी समान कार्य व दायित्व निभाते हैं, तो 60 वर्ष की आयु में सेवा समाप्ति समानता के सिद्धांतों के विपरीत है। याचिका में इस संबंध में पूर्व के उच्च न्यायालयीन निर्णयों का भी उल्लेख किया गया है।

माननीय न्यायालय के आदेश का पालन करते हुए विद्यालय ने श्रीमती उषा ओझा को पुनः सेवा ग्रहण करा दी है और वे पूर्ववत शिक्षण कार्य में सक्रिय रूप से संलग्न हो गई हैं। कोर्ट के इस संरक्षण ने न केवल याचिनी को राहत दी है, बल्कि प्रदेश के हजारों #शिक्षामित्रों में भी न्याय की नई आशा उत्पन्न की है।

जहां-जहां विवाद है, वहां समझना कि जीवन को देखने के ढंग भिन्न हैं।

मुल्ला नसरुद्दीन से कोई पूछ रहा था--एक ट्रेन में वह बैठा यात्रा कर रहा था। एक आदमी उससे कुछ, पड़ोसी उससे कुछ पूछ रहा है, ‘कहां रहते हो? क्या करते हो?’ आखिर उस आदमी ने पूछा कि क्या शादी-शुदा हो? नसरुद्दीन ने उसकीतरफ देखा और कहा, ‘मैं वैसे ही दुखी हूं। तुम यह मत सोचो कि मैं कोई शादी-शुदा हूं। मैं वैसे ही दुखी हूं’।

पति दुखी हो जाता है। तुम पहचान सकते हो कि पति अपनी पत्नी के साथ रास्ते पर चल रहा है कि किसी और की पत्नी के साथ--दूर से देखकर भी! अपनी पत्नी के साथ वह उदास चलता है क्योंकि पत्नी पूरे वक्त निरीक्षण कर रही है कि वह कोई नया आक्रमण तो नहीं कर रहा है! तो अपनी पत्नी के साथ वह डरा-डरा चलता है, भयभीत चलता है। पत्नी पति के साथ बड़ी प्रफुल्लित चलती है क्योंकि सुरक्षा साथ है। कोई भय नहीं है। पति डरा-डरा चलता है क्योंकि पत्नी चौबीस घंटे का नियंत्रण है और आक्रमण की, नये अभियान की, एडवेन्चर की कोई सुविधा नहीं। वह देख भी नहीं सकता दूसरी स्त्री की तरफ, क्योंकि उससे उपद्रव ही खड़ा होगा।

दोनों की आकांक्षाएं भिन्न हैं इसलिये विवाद है। दोनों के देखने का ढंग भिन्न है, इसलिये विवाद है। पत्नी स्थायित्व चाहती है, पति परिवर्तन चाहता है। यह बड़ा मजा है कि इसीलिये ही आकर्षण है; क्योंकि दोनों विपरीत हैं। समान में आकर्षण नहीं होता। ऋण विद्युत धन विद्युत को खींचती है। धन विद्युत धन विद्युत को नहीं खींचती। इसलिये दो स्त्रियों में परिचय हो सकता है, मैत्री नहीं होती। दो पुरुषों में परिचय हो सकता है, लेकिन प्रेम नहीं होता। विपरीत चाहिए। विपरीत खींचता है। लेकिन दूसरा खतरा छिपा है कि वह विपरीत है, इसलिये उसकी सारी आकांक्षाएं विपरीत हैं, उसके देखने का ढंग विपरीत है। और तब विवाद है।

जहां-जहां विवाद है, वहां समझना कि जीवन को देखने के ढंग भिन्न हैं।

अमरोहा में 23 साल की लड़की के साथ सब इंस्पेक्टर, हेड कॉन्स्टेबल और CRPF के 2 जवानों ने गैंगरे*प किया। लड़की हरियाणा की रहने वाली है। आरोप है कि उसे CRPF का इंस्पेक्टर लालाराम अमरोहा लाया था। उसके साथ हेड कॉन्स्टेबल मोहित भी था।

अमरोहा में 23 साल की लड़की के साथ सब इंस्पेक्टर, हेड कॉन्स्टेबल और CRPF के 2 जवानों ने गैंगरे*प किया। लड़की हरियाणा की रहने वाली है। आरोप है कि उसे CRPF का इंस्पेक्टर लालाराम अमरोहा लाया था। उसके साथ हेड कॉन्स्टेबल मोहित भी था।
दोनों ने लड़की को झुलपुरी गांव के पास फार्म हाउस में ठहराया। यह फार्म हाउस उत्तराखंड में खानपुर सीट से निर्दलीय विधायक उमेश शर्मा का बताया जा रहा है।
मंगलवार रात दरोगा संजय तोमर और हेड कॉन्स्टेबल प्रमोद मालिक भी फार्म हाउस पहुंचे। चारों ने शराब पार्टी की और कमरे में घुसकर लड़की के साथ वारदात की। संजय तोमर और प्रमोद मलिक की तैनाती हसनपुर कोतवाली में है।
रात में ही लड़की ने पुलिस अधिकारियों को कॉल कर घटना की सूचना दी। लेकिन, पुलिस दिनभर मामला दबाए बैठी रही। दबाव बढ़ा तो कार्रवाई करनी पड़ी।
शाम 4:20 बजे चारों आरोपियों के खिलाफ केस दर्ज किया गया। इसके बाद एसपी लाखन सिंह यादव मीडिया के सामने आए। उन्होंने आरोपियों की गिरफ्तारी और घटना की की जानकारी दी। हालांकि आरोपियों को मीडिया के सामने पेश नहीं किया।
एसपी लाखन सिंह यादव ने बताया कि लड़की का मेडिकल कराया गया है। आरोपियों से पूछताछ की जा रही है। देर शाम मुरादाबाद के DIG मुनिराज जी. अमरोहा पहुंचे। उन्होंने एसपी से इस मामले को लेकर बात की।
लड़की ने बताया, मोहित और लालराम उसे लेकर मंगलवार को हसनपुर (अमरोहा) पहुंचे। हसनपुर थाने के गेट पर उनकी मुलाकात दरोगा संजय तोमर से हुई। वे सभी झुलपुरी फार्म हाउस (हसनपुर) पहुंचे। वहां दो कमरे बुक किए। एक कमरे में मोहित और दरोगा संजय तोमर व लालाराम लेट गए।
कुछ देर बाद हसनपुर थाने का सिपाही प्रमोद खाना और शराब लेकर आया। वह मुजफ्फरनगर में थाना फुगाना के खेडा मस्तान गांव का रहने वाला है। चारों ने एक कमरे में बैठ कर खाना खाया। शराब पी। मैंने अपने कमरे मे बैठकर खाना खाया। कुछ देर बाद मोहित और लालाराम यादव, संजय तोमर मेरे कमरे में घुस आए। तीनों ने मेरे साथ रेप किया।
लड़की ने बताया, तीनों आरोपी रेप करने बाद कमरे से बाहर निकल गए। इसके बाद जब चौथा आरोपी प्रमोद कमरे में आया, तो उसे धक्का देकर बाहर किया और अंदर से कुंडी बंद कर ली। इसके बाद मैंने गूगल सर्च करके अमरोहा पुलिस का नंबर खोजा और सूचना दी।
बुधवार सुबह परेशान युवती ने पुलिस अधिकारियों को काल कर घटना की सूचना दी। दिनभर मामला दबाए बैठी रही पुलिस को दोपहर बाद इस मामले में कार्रवाई करनी पड़ी।