Thursday, 30 July 2026

पवित्र सावन महीना और आदिदेव भगवान शिव माता पार्वती - डॉ दिलीप कुमार सिंह मौसम विज्ञानी ज्योतिष शिरोमणि (एक पूर्ण प्रमाणिक वैज्ञानिक लेख)

पवित्र सावन महीना और आदिदेव भगवान शिव  माता पार्वती - डॉ दिलीप कुमार सिंह मौसम विज्ञानी ज्योतिष शिरोमणि (एक पूर्ण प्रमाणिक वैज्ञानिक लेख)

 भारतीय ग्रंथों के अनुसार मानव सभ्यता का उदय अब से लगभग 2 अरब वर्ष पहले हुआ था और भारतीय ऋषि मुनियों ने देश काल समय परिस्थिति ऋतु सौरमंडल और ब्रह्मांड सहित 2000 खरब ब्रह्मांडो के हिसाब से एक अद्भुत जीवन शैली का विकास किया। 
इसीलिए दुनिया की सारी सभ्यताएं पर्व त्यौहार उत्सव मिट गए लेकिन भारत की संस्कृति सभ्यता ज्यों की त्यों है। दुनिया की कोई भी अन्य सभ्यता 2000 वर्ष से ज्यादा नहीं चली है ।यहां तक की नई इस्लामी सभ्यता भी विनाश होने के कगार पर है।

सावन महीना हरा-भरा वनस्पतियों हरियाली जल और वर्षा का मौसम होता है स्वाभाविक रूप से इस मौसम में जीवाणु कीटाणु विषाणु रोगाणु  सांप बिच्छू विषैले जीव जंतु बहुत संख्या में होते हैं और आसानी से हर जगह छिप जाते हैं इसीलिए सावन में पत्तेदार हरी सब्जियां और साग  गुड़ खाने का निषेध है और मांस मछली खाना पूरी तरह से वर्जित है क्योंकि इसी महीने मछलियों के बीज विकसित होते हैं और यह मछलियों के प्रजनन का सर्वश्रेष्ठ समय होता है इसलिए सावन भर मछली खाने और मारने का भी निषेध है ।

इसीलिए पूरे सावन महीने भर भगवान शिव माता पार्वती का महीना माना जाता है और धर्म-कर्म कांवड़ यात्रा शिवजी का जलाभिषेक महारुद्राभिषेक चलता रहता है इस बार सावन महीना बृहस्पतिवार  को शुरू हो रहा है और 29 अगस्त को सोमवार के दिन ही समाप्त हो रहा है जो विस्मयकारी है सोमवार शुक्रवार वैसे भी भगवान शिव का दिन है और  इस बार केवल 4 सोमवार सावन में पड़ रहे हैं इसमें तमाम योग ग्रह नक्षत्रमिलकर इस सावन महीने को बहुत ही उत्तम बना दे रहे हैं इस बार  सावन महीने भर कम बारिश होगी और फसलें भी कम अच्छा होगी ।

भगवान शिव की पूजा-अर्चना केवल मन मात्र से करने से ही वह संतुष्ट हो जाते हैं इस बार पहले सोमवार को माया स्वरूप भगवान शिव दूसरे को महाकालेश्वर भगवान शिव तीसरे को अर्धनारीश्वर चौथे को तंत्र के ईश्वर और पशुओं को भोलेनाथ की पूजा की जाएगी जहां तक हो सके शुद्ध चित्त होकर मन मस्तिष्क का पूर्ण विकास करते हुए भौतिक व मानसिक अथवा आध्यात्मिक रुप से ही भगवान शिव भगवती पार्वती का जप तप करने से वह पूर्ण प्रसन्न हो जाते हैं लेकिन शर्त इतनी ही है कि सावन माह व्रत करने के बाद मनुष्य अपने जीवन के पापकर्म अश्लील काम व्यभिचार गंदी आदतें और चोरी बेईमानी वास्तव में छोड़ दें नहीं तो उसे घोर कष्ट मिलता है शिवजी का व्रत करने और रुद्राक्ष धारण करने के बाद भी गलत काम करने वाले बहुत ही कष्ट पाते हैं ‌। 

ॐ नमः शिवाय अथवा भगवान शिव भगवती पार्वत्यै नमो नमः  या ऊं त्र्यंबक यजामहे सुगंधि पुष्टि वर्धनम उर्वारुकमिव बंधानात्   मृत्योर्मुक्षीय मामृताम  परम सिद्ध मंत्र का जाप करने से तमाम रोग शोक कष्टों से छुटकारा तो मिलता ही है अपनी पूजा तपस्या के अनुसार स्वप्न में अथवा साक्षात सामने ही भगवान शिव भगवती पार्वती का दर्शन होता है इसमें कोई संदेह नहीं है ।
जितना ही ज्यादा जटिलता और कर्मकांड बढ़ाया जाता है उतना ही पूजा पाठ का फल उतना ही कम होता जाता है इसलिए भगवान शिव की जय माता पार्वती की जय बोलते हुए सरल सात्विक रूप से करना चाहिए। 

भगवान शिव के चरित्र और उनके स्वरूप को ध्यान से देखें तो सारा ब्रह्मांड उत्पन्न और नष्ट होने का परम रहस्य उनके शरीर में समाया हुआ है सिर पर जटाएं जटाओं पर चंद्रमा गंगा की धवल धार और गले में काल कराल वासुकि नाग देवता वक्षस्थल पर गंगा गले में हलाहल विष हृदय में अमृत बाघंबर का वस्त्र चट्टान पर सीधे खड़े होने की मुद्रा ब्रह्मांड पैदा करनेवाले डमरू का निनाद और अल्फा बीटा गामा किरणों और लेसर तथा क्वासर और लेजर की शक्तियों से युक्त है उनका परम भयानक त्रिशूल और पाशुपतास्त्र सब कुछ परम रहस्य के केंद्र हैं

उनके तीनों नेत्र इलेक्ट्रॉन प्रोटान न्यूट्रान और अल्फा बीटा गामा किरणों के संयुक्त रूप हैं । उनका पाशुपतास्त्र परम ब्रम्हांडीय महा लिराटबम है जो कुछ पलों में 2000 खरब ब्रह्मांडो और 2000 खरब प्रति महाब्रह्मांड  एक खरब ब्लैक होल्स नष्ट करने में समर्थ हैं तो उनका डमरू पल मात्र में ही माता भगवती की कृपा से इतने ही ब्रह्मांड करण और प्रति ब्रह्मांड ऊर्जा और प्रति उर्जा सबकुछ पैदा करने में सक्षम हैं भगवती माता पार्वती और माता काली ब्लैक होल्स और व्हाइट हाउस की प्रतीक हैं जो शिवजी की स्त्री अथवा परिणयात्मक परम शक्तियां हैं इन सब का विस्तृत वर्णन कभी फिर विस्तार से किया जाएगा ।  भगवान श्री हरि विष्णु के योग निद्रा में सो जाने के कारण 4 महीना तक सारा भार भगवान शिव और भगवती माता पार्वती पर ही रहता है इस कालखंड में रुद्राभिषेक करने से वर्षा के जाल में और वातावरण में तथा वायुमंडल में व्याप्त विषैला तत्व और प्रदूषण चीज समाप्त हो जाते हैं और इससे जहरीले प्रजातियों में क्रोध और उत्तेजना की मात्रा तेजी से घटती है और महा रुद्राभिषेक तथा सोमवार के व्रत करने से जीव जंतु घरों से दूर चले जाते हैं इसीलिए हरा भरा सावन और सावन में भगवान शिव माता पार्वती की पूजा पाठ का वैज्ञानिक दार्शनिक आध्यात्मिक और धार्मिक महत्व अद्वितीय है  - डॉक्टर दिलीप कुमार सिंह मौसम विद ज्योतिर्विद न्यायविद

Monday, 27 July 2026

जिसमें उनकी पूजा अर्चना पूरे महीने भर होती है। आषाढ़ मास में भी पूजा पाठ की वही विधि है जो विधि अन्य पर्व

आषाढ़ मास और गुरु पूर्णिमा का महत्व कुमार सिंह मौसम विज्ञानी 

आषाढ़ मास की पूर्णिमा की रात बहुत ही घनघोर अंधेरे वाली होता है क्योंकि इस समय आसमान में घने काले बादल छाए रहते हैं इस पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा भी कहा जाता है इस समय चारों ओर वर्षा का वातावरण रहता है और चारों तरफ पानी भरा होने के कारण आना जाना सम नहीं रह जाता है इसलिए प्राचीन काल में आषाढ़ मास की एकादशी से लेकर कार्तिक मास की एकादशी तक चार महीने सभी शुभ और मंगल कार्य बंद रहते थे और लोग गहन अध्यात्म चिंतन और धर्म कर्म के प्रतिपादन में अपना समय घर में सुरक्षित गुफाओं में या जंगल के अंदर आश्रम में बिताया करते थे प्राचीन भारत में गुरु की महत्ता भगवान से भी बढ़कर बताई गई थी वेदों के संकलन और 18 पुराणों की रचना करने वाले महागुरु वेदव्यास का जन्म भी इसी दिन हुआ था इसी दिन ज्ञान प्राप्त के बाद भगवान गौतम बुद्ध ने सारनाथ में अपने शिष्यों को प्रथम उपदेश दिया था और इसी दिन महावीर स्वामी ने भी अपने शिष्य इंद्रभूति को प्रथम उपदेश दिया था इसलिए इस दिल को अद्भुत अनुपम माना जाता है। 

गुरु का अर्थ केवल शिक्षक ही नहीं होता है जो एक संपूर्ण मानव का विकास करने वाली विद्या अपने शिष्यों में से और जो अपने शिष्यों के अंदर से अज्ञान अंधकार सत्य को दूर करते हुए उन्हें सत्य ज्ञान और प्रकाश से भर दें वही गुरु कहा जाता है और प्राचीन भारत में सचमुच ऐसा ही था गुरु और गुरु माता अपने शिष्यों को इतना योग्य बना देते थे कि वह अकेले ही नए युग का निर्माण कर सकते थे ब्रह्म ऋषि विश्वामित्र और वशिष्ठ महागुरु सांदीपनि गुरु तुकाराम और एकनाथ और राघवेंद्र प्रताप जैसे लोगों ने देश को रामकृष्ण शिवाजी महाराणा प्रताप और कबीर जैसी अनंत काल तक चलने वाली लंबी गुरु और शिष्य परंपरा दिया है जो आज भी चल रही है। 

इस बारे में एक और तथ्य भी बहुत महत्वपूर्ण है कि इन चार महीना में भगवान विष्णु योग माया में ली हो जाते हैं और देवी  लक्ष्मी उनकी सेवा करती हैं इन चार महीना में संपूर्ण ब्रह्मांड की देखभाल भगवान शिव माता पार्वती और गणेश जी करते हैं इसलिए इन चार महीना में इन तीनों की पूजा पाठ करने से व्यक्ति की मनोकामनाएं पूरी होती हैं और वह दीर्घायु स्वस्थ साहसी राष्ट्रभक्त और सनातन भक्त बनता है सावन महीना तो भगवान शिव जी का महीना है ही जिसमें उनकी पूजा अर्चना पूरे महीने भर होती है। 
जिसमें उनकी पूजा अर्चना पूरे महीने भर होती है। 

आषाढ़ मास में भी पूजा पाठ की वही विधि है जो विधि अन्य पर्व त्योहार की है सुबह उठकर नित्य क्रिया करें इसके बाद शुद्ध चित्र से स्नान करें यदि गंगाजल मिल जाए तो थोड़ा सा हल्दी और गंगाजल मिलाकर स्नान करें इसके बाद अपने गुरु और गुरुओं के आदि गुरु भगवान शिव और भगवती माता पार्वती का ध्यान करते हुए मानसिक पूजा करें अथवा पुष्प और माला से भी धूप दीप और गंध के साथ गुरुजनों की पूजा करें ईश्वर की पूजा के साथ गुरुजनों की पूजा करें ईश्वर की पूजा करें गुरुजनों को जाकर अपनी शक्ति के अनुसार उपहार सम्मान देते हुए उनका आशीर्वाद प्राप्त करें वेदव्यास कबीर दास तुलसीदास सहित संपूर्ण साहित्य में गुण की महिमा भरी पड़ी है और गुण का सम्मान आशीर्वाद प्राप्त करके अपने घर शांत चित्त से चिंतन करें देश और धर्म के लिए अपना सब कुछ न्योछावर करने और दीन दुखी की सेवा करें कन्याओं और महिलाओं की सुरक्षा का भर लें ऐसा करने से गुरु पूर्णिमा पर निश्चित रूप से समस्त मनोकामनाएं पूरी होती हैं

देव शयनी एकादशी -डॉक्टर दिलीप कुमार सिंह

देव शयनी एकादशी -डॉक्टर दिलीप कुमार सिंह 

सनातन धर्म दुनिया का सबसे प्राचीन सबसे वैज्ञानिक और सबसे प्रगतिशील धर्म है यहां पर प्रकृति पर्यावरण और जीव जगत का एक दूसरे से अभिन्न संबंध है हर महीने बहुत से व्रत पर्व त्यौहार ग्रह नक्षत्र के अनुसार पड़ते ही रहते हैं जिनका वैज्ञानिक महत्व है इसी क्रम में असर माह की शुक्ल पक्ष एकादशी को पड़ने वाला देवशयनी महापर्व की एक बहुत प्रसिद्ध पर्व है इसको हरि शयनी महापर्व भी कहा जाता है यह महापर्व सृष्टि के पालनकर्ता भगवान श्री हरि विष्णु को समर्पित है जो स्थिति से लेकर 4 महीने तक योग निद्रा में सोते रहते हैं और फिर कार्तिक शुक्ल पक्ष एकादशी के दिन जागते हैं इसलिए उसी दिन को देव उठनी या हरि उठनी एकादशी का व्रत रहते हैं कहीं-कहीं इसको जुठवन भी कहा जाता है‌

ग्रह नक्षत्र पंचांग के अनुसार जब सूर्य मिथुन राशि में आते हैं तब यह महापर्व प्रारंभ हो जाता है और जब सूर्य तुला राशि में कार्तिक माह में आते हैं तब 4 महीने की योग निद्रा भगवान श्री हरि विष्णु की समाप्त हो जाती है इसी दिन महान आतताई असुर शंखासुर मारा गया था और उसका विनाश करके श्री हरि विष्णु चार महीने की लंबी योग निद्रा में लीन हुए थे तभी से यह व्रत चला आ रहा है। इस बारे में एक और कथा है सतयुग में संपूर्ण पृथ्वी जीतने वाले महान सम्राट मांधाता के राज्य में एक बार तीन वर्ष का महान काल और सूखा पड़ गया जब मांधाता ने इसका कारण जानना चाहा तो महर्षि अंगिरा ने कहा कि राज्य में धर्म विरुद्ध ढंग से एक शूद्र तपस्या कर रहा है उसको मार दिया जाए तो यह अकाल और सूखा खत्म हो सकता है लेकिन सम्राट मांधाता ने इसको स्वीकार नहीं किया और दूसरा उपाय पूछा तब ब्रह्म ऋषि अंगिरा ने उन्हें एकादशी व्रत करने को कहा जिसके फलस्वरुप चारों ओर घनघोर वर्षा हुई और जन जीवन सुखी हो गया तब से लेकर आज तक यह व्रत लगातार चल आ रहा है।

सनातन धर्म बहुत ही सरल प्राकृतिक और मानवता का धर्म है जिसको हर कोई अपना सकता है इसमें व्रत पूजा पाठ यज्ञ हवन अनुष्ठान सरल से सरल है और कठिन से कठिन भी है कठिन उनके लिए है जो ऋषि मुनि तपस्वी या धर्म के आचार्य हैं और गृहस्थ जीवन के लिए बहुत सरल है इस दिन सुबह स्नान ध्यान करके भगवान श्री हरि विष्णु की सोने चांदी तांबे किसी एक प्रतिमा को स्नान कर कर सफेद तकिया और चादर बिछाकर फूल माला धूप दीप के साथ सोने के लिए रख दिया जाता है जो 4 महीने तक लगातार सोते हैं इन चार महीना में सृष्टि का देखभाल भगवान शिव और माता पार्वती करती हैं यदि देवउठनी एकादशी को करने वाला व्यक्ति अपनी बुराई पाप छोड़कर सदाचार अपना ले और तामसी भोजन से दूर रहे जन कल्याण और मानवता के कार्य में लगा रहे तो उसकी न केवल मनोकामना पूरी होती है बल्कि भगवान श्री हरि विष्णु और माता महालक्ष्मी के दर्शन भी हो जाते हैं 

लेकिन धर्म और आध्यात्मिक के अलावा इस व्रत का सबसे बड़ा वैज्ञानिक और दार्शनिक पक्ष भी हैं जो प्रकृति और पर्यावरण के अनुकूल है इन चार महीना में किसी भी प्रकार के मांगलिक और शुभ कार्य करने के लिए वर्जित किया गया है ।यद्यपि आजकल खरीदे गए धर्माचार्य और ज्योतिषी इस कालखंड में अनेक कार्यों को करने की अनुमति देते हैं लेकिन यह पूरी तरह से धर्म विज्ञान और दर्शन के विरुद्ध हैं ऐसा नहीं करना चाहिए अन्यथा उसका फल विनाशकारी होता है इस कालखंड में होने वाले विवाह मांगलिक कार्य किसी भी प्रकार की खरीद फरोक्त कभी सफल नहीं होती है जिस तरह से धन्वंतरि की जयंती को बर्तन और सोना चांदी वहां की खरीद से जबरदस्ती जोड़ दिया गया है और अक्षय तृतीया को भी इसी प्रकार से गलत ढंग से जोड़ा गया है जो पूरी तरह गलत है इसलिए किसी भी प्रकार से शुभ मांगलिक कार्य करने से बचें जो करना चाहता है उसे करने दें।

4 महीने श्री हरि विष्णु के योग माया में सोने और सभी शुभ मांगलिक कार्य को वर्जित करने का वैज्ञानिक और लोक हित में सबसे बड़ा कारण है कि इन चार महीनों में घनघोर बरसात होती है चारों तरफ पानी ही पानी रहता है रास्ते डूब जाते हैं चारों ओर खतरनाक और विषैला जीव जंतु सांप बिच्छू फैल जाते हैं जिनके काटने का डर होता है वातावरण में नकारात्मक ऊर्जा फैल जाती है सूर्य का प्रकाश और गर्मी बहुत कमजोर हो जाता है और व्यक्ति की पाचन शक्ति भी बहुत क्षीण हो जाती है सूर्य भी दक्षिणायन हो जाता है और विवाह के मंगल कारक शुक्र और बृहस्पति ग्रह भी अस्त रहते हैं या प्रभाव नहीं देते हैं व्यावहारिक रूप से भी इस समय शुभ विवाह और शुभ मांगलिक कार्य करना प्रकृति और विधि के विरुद्ध है इस समय अग्नि जलाने में बहुत कठिनाई होती है और सूखी लकड़ी सूखे उपले मिलना भी बड़ा मुश्किल होता हैऔर खुले में यज्ञ हवन होता है जो बरसात में संभव नहीं हो सकता इसलिए बड़ी ही कुशलता से धर्म और लोक व्यवहार तथा विज्ञान सम्मत ढंग से इस समय समस्त शुभ और मांगलिक कार्यों को वर्जित किया गया है जो बिल्कुल सही है ।


आज इतनी सुविधा होने के बाद भी इन चार महीना में शुभ कार्य और मांगलिक कार्य करना संभव नहीं है वह प्रकृति के द्वारा बाधित हो जाता है वातावरण में भी चारों ओर जीवाणु कीटाणु विषाणु रोगाणु फैले रहते हैं और भोजन फल फूल बहुत जल्दी खराब होता है इस समय पूजा सामग्री हवन सामग्री विभिन्न प्रकार की जड़ी बूटियां और पुष्प तथा अन्य चीज मिल पाना बहुत कठिन होता है इसलिए इस समय पूरे सावन महीने भर भगवान शिव की पूजा अर्चना होती है जिससे वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा फैलती है जिससे सांप बिच्छू और विषैले जीव जंतु ग्रामीण स्थान और मानव निवास स्थान से दूर हो जाते हैं और इस समय उपलब्ध बेल के पत्र से मुख्य पूजा की जाती है बेल के पत्र दूध शहद  घी  गन्ने के रस घी का मिट्टी से बने शिवलिंग पर अभिषेक करने से उसका पानी जल को शुद्ध करता है और उसकी सुगंध हानिकारक जीवाणु को मार कर खतरनाक विषैली चीजों को बाहर भगा देती है इन सभी वैज्ञानिक कर्म से ही चार महीने जब तक भगवान श्री हरि विष्णु योग निद्रा से जाग नहीं जाते हैं तब तक शुभ और मांगलिक कार्य संपन्न होना निषेध किया गया है 

इस प्रकार हरिशयनी एकादशी या पद्मा एकादशी बहुत ही शुभ फल देने वाला महापर्व है और इस व्रत को विधि विधान से करने वालों की वे सभी इच्छाएं पूरी होती हैं जिनके वह पात्र होते हैं इतना अवश्य है कि उन्हें पवित्र होकर सदाचार पूर्वक पाप और बुराई छोड़ते हुए इस अनुष्ठान को करना चाहिए। बुराई और पाप पूर्ण ढंग से किया गया कोई भी व्रत पूजा पाठ यज्ञ हवन अनुष्ठान कभी भी सफल नहीं हो सकता है।

Sunday, 26 July 2026

इथेनॉल 20 और सरकारी दावे -डॉ दिलीप कुमार सिंह वर्तमान समय में देश का सबसे चर्चित विषय ई20 है जिसके लिए

: इथेनॉल 20 और सरकारी दावे -डॉ दिलीप कुमार सिंह 
वर्तमान समय में देश का सबसे चर्चित विषय ई20 है जिसके लिए रोज दावे पर दावे किए जा रहे हैं। एक तरफ जहां पर वाहन चालकों का कहना है कि इससे इंजन खराब हो रहा है और माइलेज बहुत कम हो रही है वही सरकारी दावे और सरकारी विशेषज्ञ कहते हैं कि यह बिल्कुल ठीक है और इससे इंजन पर या माइलेज पर कोई भी अंतर नहीं पड़ता है तो इस बात पर निष्पक्ष विवेचन करके देखा जाना आवश्यक है की सरकारी तंत्र और जनता के बीच वास्तविकता क्या है 

इस समय भारत में 23 करोड़ से अधिक गाड़ियां पेट्रोल डीजल से चल रही है और बिना जनता की जानकारी के 10% इथेनॉल उसमें 2013-14 से ही मिलाया जा रहा है जो 2020-22 तक 10% हो गया और अब 20% हो गया है और अब इसे बढ़ाकर सरकार 85 प्रतिशत करने जा रही है इसी बात से चारों तरफ हाहाकार मचा हुआ है।

यहां पर यह जान लेना आवश्यक है कि इथेनॉल 20 क्या है और यह किन चीजों से बनता है वास्तव में एथेनॉल 20 एक प्रकार का इंधन है जिसे पेट्रोल में मिलाया जाता है या प्राकृतिक शर्करा और मंड से बनता है ‌ अंग्रेजी भाषा में शुगर और स्टार्च कहा जाता है सीधा चावल मक्का गेहूं चुकंदर ज्वार कृषि के अवशेष अर्थात बायोमास लकड़ी और बुरादा तथा भूसे से बनता है जिसे कई प्रक्रिया से गुजर कर द्रव रूप में बनाकर पेट्रोल में मिलाया जाता है सरकार का दावा है कि इससे प्राकृतिक डीजल गैस पर आयात होने वाले खर्च में भारी बचत होती है और किसानों को लाभ होता है
[7/21, 11:06 AM] Dr  Dileep Kumar singh: इस संदर्भ में हजार लेना आवश्यक है कि भारत में कुल 13 लाख करोड रुपए का पेट्रो पदार्थ आयात किया जाता है जबकि भारत का कुल निर्यात 72 लाख करोड रुपए है‌ इस प्रकार भारत के निर्यात का लगभग 1/5 भाग को केवल पेट्रोल और पेट्रोल पदार्थों पर ही खत्म हो जाता है जो देश के लिए बहुत बड़ा खतरा है पेट्रोल पदार्थ के आयात को घटाने के लिए ही ई20 और एथेनॉल पचासी ईंधन को बेचा जा रहा है।

वैसे पेट्रोल डीजल और पेट्रोल पदार्थ में क्या-क्या मिलाया जा रहा है यह तो भगवान जाने या सरकार जानती है लेकिन इतना सच है कि मिलावट धीरे-धीरे इतनी बढ़ चुकी है कि उसे सारी गाड़ियां 20 वर्ष की जगह  7 8 वर्ष में ही कबाड़ हो जा रही है‌ और जितना पेट्रोल डीजल बच रहा है उससे ज्यादा माइलेज घटना के कारण लग रहा है यहां तक की मिलने वाला मिट्टी का तेल अर्थात केरोसिन तेल पूरा का पूरा पेट्रोल में मिलाया जा रहा है तब भी पूरा नहीं हो रहा है तो सरकार का यह दावा बिल्कुल निरर्थक है ‌ एथेनॉल के प्रयोग से ‌ पेट्रोल और पेट्रोल पदार्थ में बचत होगी और सरकारी घाटा कम होगा या तो ऐसा ही होगा कि शॉर्टकट के चक्कर में अच्छी सड़क छोड़कर उबड़-खाबड़ सड़क पकड़ लिया जाए जिससे माइलेज और भी खराब हो जाएगा।

यदि सरकारी दावे में सच है और सरकार एथेनॉल पचासी का प्रयोग सचमुच करना चाहती है तो उसे देशवासियों को और 25 करोड़ वाहन स्वामियों को अपने विश्वास में लेना होगा‌ इसके लिए जितने सांसद विधायक मंत्री प्रधानमंत्री राष्ट्रपति और शीर्ष अधिकारी हैं धन कुबेर और राजनेता हैं उन सब को केवल और केवल इथेनॉल पचासी मिश्रित पेट्रोल पदार्थ की गाड़ियों से ही जाने दिया जाए यह अनिवार्य नियम बनाया जाए ऐसा करने से बाकी लोग धीरे-धीरे अपने आप इसका प्रयोग करेंगे और सरकार को पेट्रोल समाप्त करके एथेनॉल 100 का प्रयोग करना देश के लिए अनिवार्य कर दिया जाना चाहिए यदि सरकार ऐसा नहीं करती तो उसका उद्देश्य और आशय ‌ दोनों ही गड़बड़ और संदेहास्पद है। यदि इतना ही अच्छा है तो पहले उसका प्रयोग उपयुक्त वर्ग को करना चाहिए जो देश की सबसे अच्छी चीजों पर अपना अधिकार समझते हैं।

सरकार एक और काम कर सकती है एक तरफ शुद्ध 100% पेट्रोल के पंप लगाए जाएं और इस पेट्रोल पंप पर 100% एथेनॉल बचा जाए जिसको जो पसंद आवे वह अपने हिसाब से अपनी गाड़ी में भरा ले ‌ कुछ महीने या साल के बाद अपने आप अच्छी चीज अपना कर लोग बेकार चीजों को छोड़ देंगे और सरकारी दावा भी पोस्ट हो जाएगा‌ जब गाड़ी और पैसा जनता का है तो सरकार धोखा देकर ऐसा काम क्यों कर रही है पहले ही पेट्रोल पदार्थ में और डीजल तथा प्राकृतिक गैस में अनगिनत मिलावट हो रही है और कमतौली की समस्या पूरे देश में है‌ तो फिर सरकार अनावश्यक चल पर पांच करके जनता को भयभीत करके उसे ई20 अथवा एथेनॉल 85 खरीदने को क्यों बाध्य कर रही है ‌ सरकार को दूध का दूध और पानी का पानी उसे जनता के लिए करना चाहिए जो पहले ही महंगाई बेरोजगारी लाल फीता शाही संवेदनहीनता भ्रष्टाचार और घूसखोरी से बहुत बुरी तरह त्रस्त है 

इसलिए सरकार को समय रहते ऐसी चीजों को हाथ से नहीं निकलने देना चाहिए देश पहले ही तमाम ‌ समस्याओं आतंकवाद नक्सलवाद विदेशी षड्यंत्र पर बुरी तरह से घिरा हुआ है और ऐसे में जबरदस्ती जनता को इथेनॉल का विकल्प देकर जनता को परेशान नहीं करना चाहिए‌ क्योंकि एक सीमा से अधिक भर कोई भी बर्दाश्त नहीं कर सकता है

Monday, 20 July 2026

अखिल ब्रह्मांड में सृष्टि के मूल देवों के देव आदि देव महादेव भगवान शिव के बारे में पूर्ण वैज्ञानिक और मौलिक जानकारी

*अखिल ब्रह्मांड में सृष्टि के मूल देवों के देव आदि देव महादेव भगवान शिव के बारे में पूर्ण वैज्ञानिक और मौलिक जानकारी*
 *भगवान शिव और भगवती पार्वती इस सारी सृष्टि के मूल हैं जो 1000000 अरब प्रकाश वर्ष में संपूर्ण लोको में  फैली एक करोड़ अरब आकाश गंगाओं के रूप में फैली है भगवान शिव का प्रत्येक कार्य परम अद्भुत परम विचित्र और सृष्टि की समझ के परे है । भगवान शिव का स्वरूप परम अद्भुत है आशुतोष हैं  अवढरदानी हैंऔर इनकी गति अनंत है इनकी अर्धांगिनी भगवती पार्वती का एक रूप कृष्ण नक्षत्र अर्थात महाकाली है जिसे आधुनिक विज्ञान ब्लैक होल के नाम से जानता है जिसमें सारा लोक और ब्रह्मांड विनष्ट हो कर समाहित हो जाता है उनके वेग को रोकना भगवान शिव के ही बस में है *।

*जब प्रबल क्रोध में भगवती महाकाली ने चंड मुंड रक्तबीज और असंख्य राक्षसों का वध कर पूरे ब्रह्मांड को जलाना चाहा और सारी शक्तियां उन्हें रोकने में असफल रही तब भगवान शिव उनकी राह में लेट गए और उनके वक्षस्थल पर मां काली का पैर पड़ते ही उनकी सारी शक्तियां स्वयं भगवान शिव में समाहित हो गई उनकी लपलपाती निकली जीभ का यही वैज्ञानिक प्रमाण हैं जो भगवान शिव के अनंत वेग और अल्फा बीटा गामा किरणों में समा जाती है*।
*इनके तीन नेत्र जहां अल्फा बीटा और गामा किरणों का प्रतीक है तो वहीं इन का त्रिशूल प्रोटॉन इलेक्ट्रॉन और न्यूट्रॉन की ऊर्जा से  भरा हुआ है जिससे पलक झपकते ही वे संपूर्ण सृष्टि का संहार कर सकते हैं इनके तेज से निकलने वाली किरणे़ संपूर्ण विश्व को जीवन देती है तो जब क्रोध में इनकी तीसरी आंख खुलती है तो उससे लेजर और क्वाजर किरणों के साथ गामा की महाप्रलयंकारी किरणें निकल कर सामने पड़ने वाले सभी प्राणियों ग्रह नक्षत्र आकाशगंगा को भस्मीभूत कर देती हैं ।भगवान शिव अर्धनारीश्वर हैं पशुपतिनाथ हैं त्रिपुरारी हैं नंदीश्वर हैं  महाकाल हैं  रूद्र हैं  बसु हैं  और भैरव तथा  वीरभद्र के अवतार हैं और संपूर्ण सृष्टि में सबसे भयंकर हलाहल कालकूट विष को पान करने के बाद भी जीवित रहने वाले हैं जिस कालकूट विष की कुछ बूंदें गिरने से ही संपूर्ण संसार के विष और विषैले प्राणी उत्पन्न हुए हैं* ।

*उनके मस्तक पर विराजमान अमृत वर्षा करने वाला चंद्रमा उनके कालकूट महा विष को और उस के दुष्प्रभाव को निरंतर पीता रहता है जटाओं में समाहित गंगा प्रत्येक अहंकारी अभिमानी का मान मर्दन कर देती हैं और त्रिशूल में बंधा हुआ डमरु ध्वनि अर्थात नाद शब्द की महत्ता दिखाता है जिससे संपूर्ण सृष्टि उत्पन्न हुई है सारे ब्रहमांड की ध्वनि भगवान शिव के डमरु शेर उत्पन्न हुए हैं इतना ही नहीं बल्कि उसी डमरू से सारे ध्वनि ओंकार और पाणिनि के 14 सूत्र भी निकले हैं जिससे सारे संसार की भाषाओं का व्याकरण और लिपियों का निर्माण हुआ।  और आज का विज्ञान है यह मान चुका है कि ध्वनि और नाद शृष्टि का मूल है जिसकी ऊर्जा अनंत होती है। इस संपूर्ण तीनो लोक के सभी सूर्य और आकाशगंगा निरंतर ओम शब्द से गूंजती रहती हैं*

  *भगवान शिव सभी धर्म सभी सभ्यताओं में पूजे जाते हैं और सम्मानित हैं मक्का मदीना के मक्केश्वर माया और इंका सभ्यताओं के पशुपतिनाथ और मातृ देवी तथा सिंधु घाटी हड़प्पा लोथल की सभ्यता में चीन मिश्र यूनान और रोम की सभ्यता में और ऑस्ट्रेलिया की सभ्यताओं में भी उनके अलग-अलग रूप दिखाई पड़ते हैं थोड़े से ही तपस्या से प्रसन्न होकर अपने ही विरुद्ध वरदान देने वाले संपूर्ण सृष्टि के एकमात्र देव हैं और जब व प्रसन्न होते हैं तो 1000000000 करोड़ ब्रह्मांड खुशी से नाच उठते हैं और क्रोध में आने पर उनके परम भयंकर तांडव नृत्य करते हैं सारे सृष्टि टूट टूट कर बिखरने लगती है अरबों आकाशगंगाएँ  नष्ट हो जाती हैं। अनगिनत ब्लैक होल अर्थात कृष्ण नक्षत्र चकनाचूर हो जाते हैं*

* *उनके क्रोध और भैरवनाद से वीरभद्र काल भैरव जैसे महागण प्रकट होते हैं जो दक्ष जैसे तीनों लोकों के स्वामी का सर काट कर शिवजी को चढ़ा देते हैं शिव जी के द्वारा मान्य बेलपत्र बेर भांग और धतूरे तथा अन्य पुष्प पत्र दुनिया की सबसे चमत्कारी औषधियां हैं जिन पर व्यापक शोध हो रहा है । यह चमत्कारिक पौधे हैं जिन पर आज
और आगे भी अनुसंधान जारी हैं।  उनका रहन-सहन वेशभूषा सब कुछ परम आश्चर्य का विषय है व्याघ्र का  चर्म सांप की माला बैल और व्याघ्र तथा मयूर सिर पर गंगा हृदय स्थल में पार्वती मां श्मशान घाट में निवास सब कुछ परम आश्चर्यजनक और वैज्ञानिक  है।*

 *भगवान शिव दुग्ध और पुष्प पत्रों का अभिषेक सावन मास में स्वीकार करते हैं जो वर्षा की बूंदों से और वर्ष भर की गंदगी से विषैले हो जाते हैं परंतु दुग्ध के साथ शिवलिंग पर चढ़ते ही उनका सारा विष अमृत में बदलकर बहने लगता है जो वर्षा ऋतु में सभी नदियों जलाशयों तालाब याद में एकत्र होकर संपूर्ण विषैले जल को जो तेजाब और अम्ल युक्त होता है उसे औषधि और अमृत में बदल देता है उनके शिवलिंग की महिमा न्यारी है जिसमें संपूर्ण  परमाणु जैव नाभिकीय रासायनिक धार्मिक और  आध्यात्मिक शक्तियां विद्यमान रहती हैं ।  महा रुद्राभिषेक में प्रयुक्त किए गए जड़ी बूटियों औषधियों और पूजा हवन सामग्री को मिला देने पर सबसे जहरीला और प्रदूषित पदार्थ और पानी शुद्ध हो जाता है जिन पेड़ों में तीन पत्ते होते हैं जैसे बेर बेल वे शिवजी को अत्यधिक प्रिय हैं।*

*बाघ का चर्म पहनकर हिम मंडित कैलाश शिखर पर रहना और मानसरोवर झील में भगवती पार्वती के साथ निवास करना और बिहार करना सबके लिए परम आश्चर्य का केंद्र है जहां तापमान ऋणात्मक बिंदु से भी 70 से 80 डिग्री नीचे पहुंच जाता है और हवाएं इतनी भयंकर गति से चलती है कि चारों ओर ओम की ध्वनि बिखरती रहती है इतना ही नहीं कैलाश पर्वत पर भी ऊपर से देखने पर ओम स्पष्ट लिखा हुआ दिखता है और सारे संसार में आज तक कोई भी कैलाश पर्वत पर अपनी पताका फहरा नहीं पाया है । इसे जीतने के पर्वतारोहियों के सारे प्रयास विफल हुए हैं* ।

*वे देव दनुज दानव मानव नाग अवर्ण सवरण आदिवासी वनवासी सबके लिए एक समान है जो परम उदार हैं और अपनी परम प्रिय अर्धांगिनी पार्वती के लिए बड़े मनोयोग से सोने की  निर्मित लंका को दान में रावण को बिना किसी हिचकिचाहट के दे देते हैं शिवजी हर देश काल समय में रचे बसे हैं।और उसके ऊपर हैं। वे स्वयं सभी देवी देवताओं द्वारा पूज्य होकर भी भगवान विष्णु की पूजा करते हैं इस प्रकार अपनी विश्व के सबसे दूसरा स्थान जैसे श्मशान और कैलाश मानसरोवर और अमरनाथ की गुफाएं उनके सबसे प्रिय स्थान हैं*।

 *सतयुग त्रेता द्वापर कलयुग में हर समय विद्यमान रहते हैं सतयुग त्रेता द्वापर में तो शिवजी का प्रामाणिक वर्णन है ही कलयुग में ही सम्राट विक्रमादित्य सम्राट हर्षवर्धन देवराहा बाबा तैलंग स्वामी बाबा कीनाराम अवधूत भगवान राम जैसे तमाम लोगों ने इनका प्रत्यक्ष दर्शन किया है और हम आप भी साधना में भगवान शिव भगवती पार्वती का प्रत्यक्ष अनुभव करते हैं सभी के प्रति समान होते हुए भी घनघोर संकट और आपत्ति काल में भगवान शिव उसी का साथ देते थे जो अधिक सच्चाई और सत्य की ओर रहता था उन्होंने देव दानव मानव सबको ऐसे वरदान दिया जाए उन्हीं के लिए संकट का कारण बने परंतु इससे उन पर कोई अंतर नहीं पड़ा।*

 *भगवनशिव दैत्य राक्षस दानव भूत महाभूत काल महाकाल दानव मानव शैतान प्रेत  यक्ष किन्नर गंधर्व पशु पक्षी मानव  सबके परम प्रिय हैं और उनका सबसे प्रिय स्थान शमशान है और शमशान की राख बड़े प्रेम से अपने शरीर पर भस्म के रूप में लगाकर परम आनंदित होते हैं संसार का कल्याण करने के नाते उनका नाम शंकर और अत्यधिक प्रिय और कल्याणकारी होने के नाते शिव है और भोलेनाथ भूत भावन इसलिए कि आसानी से प्रसन्न हो जाते हैं* ।

*और भूतों के प्रिय महाभूत और  काल के महाकाल हैं क्योंकि सारे भूत और काल उन्हीं में समाहित हो जाते हैं वह संपूर्ण समय द्रव्यमान पदार्थ काल की अंतिम सीमा है एक तरफ भगवान राम को प्रत्यक्ष दर्शन देकर वरदान देते हैं तो दूसरी तरफ रावण को भी वर देते हैं नंदी और महाकाल रावण और बाणासुर जैसे लोग उनके द्वार पाल हैं देवताओं के सभा के में सबसे सम्मानित सदस्य हैं अपने संपूर्ण ज्ञान कला को स्वरूप में पारित करना लोक कल्याण के लिए लगा देना और अंतहीन कल्पना करना शिव जी का स्वभाव है *।

*उनके अस्तित्व को सभी भौतिक जीव और रसायन विज्ञानियों ने भी माना है वे अनंत हैं अक्षय हैं आदिदेव के साथ आदि पुरुष भी हैं भारत में प्रकृति पर्यावरण और शक्तियों को संतुलित स्वच्छ करने के लिए तमाम ज्योतिर्लिंग अर्थात शिवलिंग की स्थापना किया गया जिसमें सोमनाथ मल्लिकार्जुन महाकालेश्वर ओमकारेश्वर बैद्यनाथ भीम शंकर रामेश्वर नागेश्वर विश्वनाथ त्रंबकेश्वर केदारनाथ घृष्णेश्वर पूरे भारत में फैले हुए हैं और इनसे हमेशा तेजस्वी किरणें अर्थात रेडियो एक्टिव तत्व निकलते रहते हैं* ।

*भारत में गिरने वाले तेजस्विता पूर्ण पिंडों से शिव की शक्ति से ही ज्योतिर्लिंगों का निर्माण हुआ महा प्रलय काल में वायु पुराण और शिव पुराण के अनुसार सारी सृष्टि शिवलिंग में लीन हो जाती है और एक ही सृष्टि का बिंदु नाथ स्वरूप है और महा विस्फोट सिद्धांत के अनुसार जिसे  बिग बैंग थ्योरी कहते हैं ध्वनि ऊर्जा धन और ऋण बिंदुओं से फिर से आकाशगंगा ओं का निर्माण और जीवन की सृष्टि होती हैं बिना ऊर्जावान नर नारी के सृष्टि का निर्माण संभव है* ।

*शिव जी की महत्ता की गौरव गाथा वेद पुराण उपनिषद विज्ञान धर्म दर्शन भैरव और शिव ग्रंथों शिव पुराण शिव संगीता मैं ही नहीं संपूर्ण दुनिया की लोक कथाओं में समाई है तंत्र मंत्र यंत्र और सारे अस्त्र-शस्त्र और  पाशुपत पिनाक नारायण अस्त्र चक्र सहित सभी दिव्यास्त्र भगवान शिव ने ही बनाए हैं और देवताओं सहित असुरों और दैत्यों तथा मनुष्यों को उन्होंने ही प्रदान किया है भगवान श्री राम रावण अर्जुन को दिए गए पशुपता अजगव जैसे अस्त्र-शस्त्र इसके प्रमाण हैं।  गीत संगीत शब्द नाद व्याकरण सब कुछ भगवान शिव से उत्पन्न हुए हैं*

 *संसार को मोक्ष प्रदान करने के लिए भगवान शिव ने भगवती पार्वती को अपने अमृत कथा अमरनाथ की पवित्र गुफा में किए जिससे तमाम शाखाए निकली और विज्ञान भैरव तंत्र का भी निर्माण हुआ है संपूर्ण धरती पर एकमात्र अमरनाथ की पवित्र गुफा में ही शिवलिंग का निर्माण होता है शिव जी ने ही हठयोग सहित समस्त ज्ञान विज्ञान की शाखाओं का निर्माण किया है । दुनिया ने सभी पर्वत चोटी ऊपर विजय पाली लेकिनअब रात कैलाश पर कोई भी चढ़ नहीं पायाक्यों कि यह भगवान शिव का स्थान है*

*शिव जी के अनंत नामों में 108 नाम अधिक प्रचलित हैं उसमें भी शिव महादेव महाकाल नीलकंठ शंकर पशुपतिनाथ गंगाधर नटराज त्रिनेत्र भोलेनाथ आदिदेव आदिनाथ त्रियंबक जटाशंकर जगदीश विश्वनाथ शिव शंभू भूतनाथ महारुद्र वीरभद्र और हनुमान अधिक प्रचलित है जय परंपरा में शिव जी की भक्ति और उनकी पूजा करने का किसी को मना ही नहीं है इसीलिए सब वैष्णव शाक्त दशनामी दिगंबर श्वेतांबर लिंगायत तमिल शैेव काल मुख कश्मीरी शैव वीरशैव नाग पाशुपत कापालिक काल दमन महेश्वर चंद्रवंशी सूर्यवंशी अग्रवंशी नागवंशी सभी शिव की परंपरा को मानते हैं*।

 *यक्ष किन्नर गंधर्व राक्षस मानव सबके आदि देव भगवान शिव हैं सभी बनवासी कोल भील किरात आदिवासी उनका ही धर्म मानते हैं कामदेव को जीतने और भस्म करने की क्षमता भगवान शिव में ही है गणेश और दक्ष के कटे सिरों को जोड़कर फिर से जीवित कर के विज्ञान का सबसे बड़ा चमत्कार किया जो आज भी किसी के द्वारा असंभव है ब्रह्मा जी के छल करने पर त्रिशूल से पांचवा सिर काटकर उनके अहंकार को समाप्त किया और उन्हें पवित्र किया।*

 *भगवान शिव के वैसे तो अनंत अनुयाई और शिष्य है लेकिन उसमें भी मनु विशालाक्षी बृहस्पति शुक्र सहसराक्ष महेंद्र प्रचेता भारद्वाज अगस्त गौरी कार्तिकेय भैरव गोरखनाथ वीरभद्र मणिभद्र नंदी श्रृंगी घंटाकर्ण बाणासुर रावण विजय दत्तात्रेय शंकराचार्य मत्स्येंद्रनाथ का नाम प्रमुख है जिन्होंने शिव भक्ति का व्यापक प्रचार प्रसार किया शिवजी के व्रत और त्योहार तथा उत्सव सोमवार के प्रदोष के और श्रावण मास के तथा शिवरात्रि और महाशिवरात्रि के माने जाते हैं *।

*शिव जी के द्वारा आविष्कार किए दो महामंत्र हैं पहला है ओम नमः शिवाय और दूसरा है महामृत्युंजय का ओम जूम शह मंत्र  ओम शिव पार्वती नमः  ओम नमः शिवाय  इत्यादि बोलकर  बेल पत्र गंगाजल अथवा दूध के साथ शिवलिंग पर चढ़ा कर उनका ध्यान करने और महामृत्युंजय मंत्र पढ़ने से मोक्ष और अमरत्व प्राप्त होता है सभी देवी देवताओं ने और भगवान श्री राम तथा कृष्ण और अर्जुन ने भी आसुरी और शैतानी शक्तियों पर विजय के लिए भगवान शिव का श्रद्धा के साथ पूजन करके उन्हें प्रसन्न किया और भगवान श्री राम द्वारा रामेश्वरम में स्थापित शिवलिंग तो विश्व विख्यात है ही*

*शिव के पुत्र कार्तिकेय का वाहन मयूर है जबकि शिव के गले में जो वासुकी नाग हैं वह शेषनाग के भाई हैं दुनिया में परस्पर सारे विरोधी चीजें भगवान शिव में मिलते हैं जैसे मोर और नाग एक दूसरे के प्रबल दुश्मन हैं भगवान गणेश का वाहन चूहा है जबकि सांप प्रबल मूषक भक्षी जीव हैं भगवती पार्वती का वाहन सिंह है और शिव जी का वाहन नंदी बैल है अनेकता में एकता भगवान शिव की अद्भुत देन है*।

 शिवजी के प्रमुख अवतारों में वीरभद्र पिप्पलाद नंदी भैरव महेश हनुमान शरभ दुर्वासा अश्वत्थामा वृषभ रतिनाथ कृष्ण दर्शन अवधूत भिक्षु आर्य सुरेश्वर किरात  सुमित नर्तक ब्रह्मचारी यक्ष विश्वनाथ दूधेश्वर हंस रूप द्विज नातेश्वर प्रसिद्ध है वेदों में रुद्र के 11 प्रमुख अवतार हैं जिनमें भव चंद्र शंभू बुद्ध आज पद शास्त्र विलो हित विरुपाक्ष भीम कपाली हैं । भगवान शिव कितने सुंदर हैं इसका वर्णन मिलता है एक बार भगवान गणेश ने उन्हें असली रूप दिखाने को कहा और उनका असली रूप देखकर तीनो लोग मोहित हो गया और गणेश जी चाहते थे कि उनकी मां भगवती पार्वती से सुंदर कोई ना हो इसलिए प्रार्थना करके उन्हें असली रूप में आने को कहा वैसे भगवान शिव ने मान लिया क्योंकि वह स्वयं भगवती पार्वती को सबसे अधिक चाहते हैं*

*भगवान शिव के अनेक चिन्ह मिलते हैं जिनमें उनके पैरों के चिह्न तमिलनाडु के नागपट्टनम के शेरू बंगड़ी क्षेत्र में शिव मंदिर में मिलता है और तिरुवन्नामलाई में भी उनके परिजन हैं तेजपुर असम में जागेश्वर उत्तराखंड मैं और रांची में पहाड़ी बाबा मंदिर पर उनके पद चिन्ह मिलते हैं शिवजी की गुफाएं विश्वविख्यात हैं पहली गुफा भस्मासुर से बचने के लिए त्रिकूट पर्वत पर जम्मू से 150 किलोमीटर की दूरियों पर है और दूसरा विश्व विख्यात अमरनाथ की गुफा है जहां आज भी हर वर्ष परम अद्भुत शिवलिंग का निर्माण होता है* ।

*शिव जी इतने सरल और भोले हैं कि कोई भी पद चिन्ह लेकर या किसी भी चीज की कल्पना करके उनकी पूजा कर सकते हैं पत्थर का ढेला बटिया रुद्राक्ष त्रिशूल डमरू और और शिवलिंग उनके विशिष्ट माने जाते हैं भगवान शिव एक तरफ तो देव गुरु बृहस्पति को दूसरी तरफ दैत्य गुरु शुक्राचार्य को और विधर्मी लोगों असुरों तथा शैतानों  के अंति प्रिय हैं सभी को उनकी तपस्या पर वरदान दिया है सभी जाति वर्ण धर्म और समाज के सर्वोच्च सर्वप्रिय देवता हैं*।

 *भगवान शंकर ने भगवान बुद्ध के रूप में भी जन्म लिया है उसमें 27 बुद्ध के नाम प्रसिद्ध हैं जिसमें तरंकर शंकर और मैं घमँ कर विशेष प्रसिद्ध हैं जितने धर्म संप्रदाय हैं अगर गहराई से अध्ययन किया जाए तो उसका मूल है भगवान शिव और शैव धर्म में ही प्रकट होता है*।

 *शिव की एक पंचायत भी है जिसमें भगवान सूर्य गणपति भगवती पार्वती रुद्रा और विष्णु सम्मिलित हैं इनके प्रमुख गणों में वीरभद्र भैरव मणिभद्र नंदी श्रृंगी भृंगी संदेश  गोकर्ण घंटाकर्ण जय विजय पिशाच दांत नाग नागिन और पशु प्रसिद्ध है*।

 *शिवजी के प्रमुख 7 शिष्य है जिन्होंने सातों महाद्वीपों पर ज्ञान धर्म और सभ्यता का प्रचार प्रसार किया उत्तरी दक्षिणी अमेरिका यूरोप और एशिया अफ्रीका और आस्ट्रेलिया तथा अंटार्कटिका पर उनके शिष्यों ने ज्ञान विज्ञान की कला बिखेरी बृहस्पति विशालाक्षी शुक्राचार्य सहस राक्षस महेंद्र प्रचेता मनु और भारद्वाज तथा गौर सिरस इनमें प्रसिद्ध है इनके 7 पुत्र गणेश कार्तिकेय सुकेश जालंधर अय्यप्पा भीम और हनुमान माने जाते हैं* ।।

*भगवान शिवकीे प्रथम पत्नी परम सती महादेवी सती थी जिन्होंने शिव के अपमान पर अपना प्राण त्याग कर पार्वती के रूप में जन्म लिया । जिनके अनंत नाम है जिन्हें महागौरी महाकाली उमा उर्मी अपर्णा भवानी पुत्री इत्यादि नामों से जाना जाता है। भगवती पार्वती और भगवान शिव मिलकर अर्धनारीश्वर के रूप में समस्त सृष्टि का पालन पोषण और संहार करते हैं*

 *पूरे विश्व के सभी अस्त्र-शस्त्र भगवान शिव ने ही बनाया और सब को दान दिए उसमें भी त्रिशूल पिनाक धनुष चक्र सुदर्शन चक्र पाशुपत विश्व विख्यात है संपूर्ण सृष्टि और देवी-देवताओं के निर्माता होने से ही भगवान शिव को आदि देव आदिनाथ और भगवती पार्वती को आदि देवी माना जाता है। सारे संसार में हर धर्म के लोग इनका साक्षात दर्शन करके अपना जीवन धन्य कर चुके हैं और सारा परम विश्व इन्हीं में समाहित है क्योंकि इन्हीं से उत्पन्न है*

 *डॉ दिलीप कुमार सिंह ज्योतिष शिरोमणि और निदेशकअलका शिप्रा वैष्णवी ज्योतिष मौसम और विज्ञान अनुसंधान केंद्र*

देव शयनी एकादशी -डॉक्टर दिलीप कुमार सिंह

देव शयनी एकादशी -डॉक्टर दिलीप कुमार सिंह 
देव शयनी एकादशी -डॉ दिलीप कुमार सिंह मौसम विज्ञानी ज्योतिष शिरोमणि 

सनातन धर्म दुनिया का सबसे प्राचीन सबसे वैज्ञानिक और सबसे प्रगतिशील धर्म है यहां पर प्रकृति पर्यावरण और जीव जगत का एक दूसरे से अभिन्न संबंध है हर महीने बहुत से व्रत पर्व त्यौहार ग्रह नक्षत्र के अनुसार पड़ते ही रहते हैं जिनका वैज्ञानिक महत्व है इसी क्रम में आषाढ़ माह की शुक्ल पक्ष एकादशी को पड़ने वाला देवशयनी महापर्व की एक बहुत प्रसिद्ध पर्व है इसको हरि शयनी महापर्व भी कहा जाता है यह महापर्व सृष्टि के पालनकर्ता भगवान श्री हरि विष्णु को समर्पित है जो आषाढ़ शुक्ल पक्ष 11से लेकर अगहन मास शुक्ल पक्ष दशमी तक 4 महीने तक योग निद्रा में सोते रहते हैं और फिर कार्तिक शुक्ल पक्ष एकादशी के दिन जागते हैं इसलिए उसी दिन को देव उठनी या हरि उठनी एकादशी का व्रत रहते हैं कहीं-कहीं इसको जुठवन भी कहा जाता है‌।

ग्रह नक्षत्र पंचांग के अनुसार जब सूर्य मिथुन राशि में आते हैं तब यह महापर्व प्रारंभ हो जाता है और जब सूर्य तुला राशि में कार्तिक माह में आते हैं तब 4 महीने की योग निद्रा भगवान श्री हरि विष्णु की समाप्त हो जाती है इसी दिन महान आतताई असुर शंखासुर मारा गया था और उसका विनाश करके श्री हरि विष्णु चार महीने की लंबी योग निद्रा में लीन हुए थे तभी से यह व्रत चला आ रहा है। 

इस बारे में एक और कथा है सतयुग में संपूर्ण पृथ्वी जीतने वाले महान सम्राट मांधाता के राज्य में एक बार तीन वर्ष का महान अकाल और सूखा पड़ गया जब मांधाता ने इसका कारण जानना चाहा तो महर्षि अंगिरा ने कहा कि राज्य में धर्म विरुद्ध ढंग से एक शूद्र तपस्या कर रहा है उसको मार दिया जाए तो यह अकाल और सूखा खत्म हो सकता है लेकिन सम्राट मांधाता ने इसको स्वीकार नहीं किया और दूसरा उपाय पूछा तब ब्रह्म ऋषि अंगिरा ने उन्हें एकादशी व्रत करने को कहा जिसके फलस्वरुप चारों ओर घनघोर वर्षा हुई और जन जीवन सुखी हो गया तब से लेकर आज तक यह व्रत लगातार चल आ रहा है।

सनातन धर्म बहुत ही सरल प्राकृतिक और मानवता का धर्म है जिसको हर कोई अपना सकता है इसमें व्रत पूजा पाठ यज्ञ हवन अनुष्ठान सरल से सरल है और कठिन से कठिन भी है कठिन उनके लिए है जो ऋषि मुनि तपस्वी या धर्म के आचार्य हैं और गृहस्थ जीवन के लिए बहुत सरल है इस दिन सुबह स्नान ध्यान करके भगवान श्री हरि विष्णु की सोने चांदी तांबे किसी एक प्रतिमा को स्नान कर कर सफेद तकिया और चादर बिछाकर फूल माला धूप दीप के साथ सोने के लिए रख दिया जाता है जो 4 महीने तक लगातार सोते हैं इन चार महीनों में सृष्टि की देखभाल भगवान शिव और माता पार्वती करती हैं यदि देवउठनी एकादशी को करने वाला व्यक्ति अपनी बुराई पाप छोड़कर सदाचार अपना ले और तामसी भोजन से दूर रहे जन कल्याण और मानवता के कार्य में लगा रहे तो उसकी न केवल मनोकामना पूरी होती है बल्कि भगवान श्री हरि विष्णु और माता महालक्ष्मी के दर्शन भी हो जाते हैं। 

लेकिन धर्म और आध्यात्मिक के अलावा इस व्रत का सबसे बड़ा वैज्ञानिक और दार्शनिक पक्ष भी हैं जो प्रकृति और पर्यावरण के अनुकूल है इन चार महीनों में किसी भी प्रकार के मांगलिक और शुभ कार्य करने के लिए वर्जित किया गया है ।यद्यपि आजकल खरीदे गए धर्माचार्य और ज्योतिषी इस कालखंड में अनेक कार्यों को करने की अनुमति देते हैं लेकिन यह पूरी तरह से धर्म विज्ञान और दर्शन के विरुद्ध हैं ऐसा नहीं करना चाहिए अन्यथा उसका फल विनाशकारी होता है ।

इस कालखंड में होने वाले विवाह मांगलिक कार्य किसी भी प्रकार की खरीद फरोक्त कभी सफल नहीं होती है जिस तरह से धन्वंतरि की जयंती को बर्तन और सोना चांदी वाहन की खरीद से जबरदस्ती जोड़ दिया गया है और अक्षय तृतीया को भी इसी प्रकार से गलत ढंग से जोड़ा गया है जो पूरी तरह गलत है इसलिए किसी भी प्रकार से शुभ मांगलिक कार्य करने से बचें जो करना चाहता है उसे करने दें।

4 महीने श्री हरि विष्णु के योग माया में सोने और सभी शुभ मांगलिक कार्य को वर्जित करने का वैज्ञानिक और लोक हित में सबसे बड़ा कारण है कि इन चार महीनों में घनघोर बरसात होती है चारों तरफ पानी ही पानी रहता है रास्ते डूब जाते हैं चारों ओर खतरनाक और विषैला जीव जंतु सांप बिच्छू फैल जाते हैं जिनके काटने का डर होता है वातावरण में नकारात्मक ऊर्जा फैल जाती है सूर्य का प्रकाश और गर्मी बहुत कमजोर हो जाता है और व्यक्ति की पाचन शक्ति भी बहुत क्षीण हो जाती है सूर्य भी दक्षिणायन हो जाता है और विवाह के मंगल कारक शुक्र और बृहस्पति ग्रह भी अस्त रहते हैं या प्रभाव नहीं देते हैं व्यावहारिक रूप से भी इस समय शुभ विवाह और शुभ मांगलिक कार्य करना प्रकृति और विधि के विरुद्ध है इस समय अग्नि जलाने में बहुत कठिनाई होती है और सूखी लकड़ी सूखे उपले मिलना भी बड़ा मुश्किल होता हैऔर खुले में यज्ञ हवन होता है जो बरसात में संभव नहीं हो सकता इसलिए बड़ी ही कुशलता से धर्म और लोक व्यवहार तथा विज्ञान सम्मत ढंग से इस समय समस्त शुभ और मांगलिक कार्यों को वर्जित किया गया है जो बिल्कुल सही है ।

आज इतनी सुविधा होने के बाद भी इन चार महीनों में शुभ कार्य और मांगलिक कार्य करना संभव नहीं है वह प्रकृति के द्वारा बाधित हो जाता है वातावरण में भी चारों ओर जीवाणु कीटाणु विषाणु रोगाणु फैले रहते हैं और भोजन फल फूल बहुत जल्दी खराब होता है इस समय पूजा सामग्री हवन सामग्री विभिन्न प्रकार की जड़ी बूटियां और पुष्प तथा अन्य चीज मिल पाना बहुत कठिन होता है इसलिए इस समय पूरे सावन महीने भर भगवान शिव की पूजा अर्चना होती है जिससे वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा फैलती है जिससे सांप बिच्छू और विषैले जीव जंतु ग्रामीण स्थान और मानव निवास स्थान से दूर हो जाते हैं और इस समय उपलब्ध बेल के पत्र से मुख्य पूजा की जाती है बेल के पत्र दूध शहद  घी  गन्ने के रस घी का मिट्टी से बने शिवलिंग पर अभिषेक करने से उसका पानी जल को शुद्ध करता है और उसकी सुगंध हानिकारक जीवाणु को मार कर खतरनाक विषैली चीजों को बाहर भगा देती है इन सभी वैज्ञानिक कर्म से ही चार महीने जब तक भगवान श्री हरि विष्णु योग निद्रा से जाग नहीं जाते हैं तब तक शुभ और मांगलिक कार्य संपन्न होना निषेध किया गया है ।

इस प्रकार हरिशयनी एकादशी या पद्मा एकादशी बहुत ही शुभ फल देने वाला महापर्व है और इस व्रत को विधि विधान से करने वालों की वे सभी इच्छाएं पूरी होती हैं जिनके वह पात्र होते हैं इतना अवश्य है कि उन्हें पवित्र होकर सदाचार पूर्वक पाप और बुराई छोड़ते हुए इस अनुष्ठान को करना चाहिए। बुराई और पाप पूर्ण ढंग से किया गया कोई भी व्रत पूजा पाठ यज्ञ हवन अनुष्ठान कभी भी सफल नहीं हो सकता है।



सनातन धर्म दुनिया का सबसे प्राचीन सबसे वैज्ञानिक और सबसे प्रगतिशील धर्म है यहां पर प्रकृति पर्यावरण और जीव जगत का एक दूसरे से अभिन्न संबंध है हर महीने बहुत से व्रत पर्व त्यौहार ग्रह नक्षत्र के अनुसार पड़ते ही रहते हैं जिनका वैज्ञानिक महत्व है इसी क्रम में असर माह की शुक्ल पक्ष एकादशी को पड़ने वाला देवशयनी महापर्व की एक बहुत प्रसिद्ध पर्व है इसको हरि शयनी महापर्व भी कहा जाता है यह महापर्व सृष्टि के पालनकर्ता भगवान श्री हरि विष्णु को समर्पित है जो स्थिति से लेकर 4 महीने तक योग निद्रा में सोते रहते हैं और फिर कार्तिक शुक्ल पक्ष एकादशी के दिन जागते हैं इसलिए उसी दिन को देव उठनी या हरि उठनी एकादशी का व्रत रहते हैं कहीं-कहीं इसको जुठवन भी कहा जाता है‌

ग्रह नक्षत्र पंचांग के अनुसार जब सूर्य मिथुन राशि में आते हैं तब यह महापर्व प्रारंभ हो जाता है और जब सूर्य तुला राशि में कार्तिक माह में आते हैं तब 4 महीने की योग निद्रा भगवान श्री हरि विष्णु की समाप्त हो जाती है इसी दिन महान आतताई असुर शंखासुर मारा गया था और उसका विनाश करके श्री हरि विष्णु चार महीने की लंबी योग निद्रा में लीन हुए थे तभी से यह व्रत चला आ रहा है। इस बारे में एक और कथा है सतयुग में संपूर्ण पृथ्वी जीतने वाले महान सम्राट मांधाता के राज्य में एक बार तीन वर्ष का महान काल और सूखा पड़ गया जब मांधाता ने इसका कारण जानना चाहा तो महर्षि अंगिरा ने कहा कि राज्य में धर्म विरुद्ध ढंग से एक शूद्र तपस्या कर रहा है उसको मार दिया जाए तो यह अकाल और सूखा खत्म हो सकता है लेकिन सम्राट मांधाता ने इसको स्वीकार नहीं किया और दूसरा उपाय पूछा तब ब्रह्म ऋषि अंगिरा ने उन्हें एकादशी व्रत करने को कहा जिसके फलस्वरुप चारों ओर घनघोर वर्षा हुई और जन जीवन सुखी हो गया तब से लेकर आज तक यह व्रत लगातार चल आ रहा है।

सनातन धर्म बहुत ही सरल प्राकृतिक और मानवता का धर्म है जिसको हर कोई अपना सकता है इसमें व्रत पूजा पाठ यज्ञ हवन अनुष्ठान सरल से सरल है और कठिन से कठिन भी है कठिन उनके लिए है जो ऋषि मुनि तपस्वी या धर्म के आचार्य हैं और गृहस्थ जीवन के लिए बहुत सरल है इस दिन सुबह स्नान ध्यान करके भगवान श्री हरि विष्णु की सोने चांदी तांबे किसी एक प्रतिमा को स्नान कर कर सफेद तकिया और चादर बिछाकर फूल माला धूप दीप के साथ सोने के लिए रख दिया जाता है जो 4 महीने तक लगातार सोते हैं इन चार महीना में सृष्टि का देखभाल भगवान शिव और माता पार्वती करती हैं यदि देवउठनी एकादशी को करने वाला व्यक्ति अपनी बुराई पाप छोड़कर सदाचार अपना ले और तामसी भोजन से दूर रहे जन कल्याण और मानवता के कार्य में लगा रहे तो उसकी न केवल मनोकामना पूरी होती है बल्कि भगवान श्री हरि विष्णु और माता महालक्ष्मी के दर्शन भी हो जाते हैं 

लेकिन धर्म और आध्यात्मिक के अलावा इस व्रत का सबसे बड़ा वैज्ञानिक और दार्शनिक पक्ष भी हैं जो प्रकृति और पर्यावरण के अनुकूल है इन चार महीना में किसी भी प्रकार के मांगलिक और शुभ कार्य करने के लिए वर्जित किया गया है ।यद्यपि आजकल खरीदे गए धर्माचार्य और ज्योतिषी इस कालखंड में अनेक कार्यों को करने की अनुमति देते हैं लेकिन यह पूरी तरह से धर्म विज्ञान और दर्शन के विरुद्ध हैं ऐसा नहीं करना चाहिए अन्यथा उसका फल विनाशकारी होता है इस कालखंड में होने वाले विवाह मांगलिक कार्य किसी भी प्रकार की खरीद फरोक्त कभी सफल नहीं होती है जिस तरह से धन्वंतरि की जयंती को बर्तन और सोना चांदी वहां की खरीद से जबरदस्ती जोड़ दिया गया है और अक्षय तृतीया को भी इसी प्रकार से गलत ढंग से जोड़ा गया है जो पूरी तरह गलत है इसलिए किसी भी प्रकार से शुभ मांगलिक कार्य करने से बचें जो करना चाहता है उसे करने दें।

4 महीने श्री हरि विष्णु के योग माया में सोने और सभी शुभ मांगलिक कार्य को वर्जित करने का वैज्ञानिक और लोक हित में सबसे बड़ा कारण है कि इन चार महीनों में घनघोर बरसात होती है चारों तरफ पानी ही पानी रहता है रास्ते डूब जाते हैं चारों ओर खतरनाक और विषैला जीव जंतु सांप बिच्छू फैल जाते हैं जिनके काटने का डर होता है वातावरण में नकारात्मक ऊर्जा फैल जाती है सूर्य का प्रकाश और गर्मी बहुत कमजोर हो जाता है और व्यक्ति की पाचन शक्ति भी बहुत क्षीण हो जाती है सूर्य भी दक्षिणायन हो जाता है और विवाह के मंगल कारक शुक्र और बृहस्पति ग्रह भी अस्त रहते हैं या प्रभाव नहीं देते हैं व्यावहारिक रूप से भी इस समय शुभ विवाह और शुभ मांगलिक कार्य करना प्रकृति और विधि के विरुद्ध है इस समय अग्नि जलाने में बहुत कठिनाई होती है और सूखी लकड़ी सूखे उपले मिलना भी बड़ा मुश्किल होता हैऔर खुले में यज्ञ हवन होता है जो बरसात में संभव नहीं हो सकता इसलिए बड़ी ही कुशलता से धर्म और लोक व्यवहार तथा विज्ञान सम्मत ढंग से इस समय समस्त शुभ और मांगलिक कार्यों को वर्जित किया गया है जो बिल्कुल सही है ।


आज इतनी सुविधा होने के बाद भी इन चार महीना में शुभ कार्य और मांगलिक कार्य करना संभव नहीं है वह प्रकृति के द्वारा बाधित हो जाता है वातावरण में भी चारों ओर जीवाणु कीटाणु विषाणु रोगाणु फैले रहते हैं और भोजन फल फूल बहुत जल्दी खराब होता है इस समय पूजा सामग्री हवन सामग्री विभिन्न प्रकार की जड़ी बूटियां और पुष्प तथा अन्य चीज मिल पाना बहुत कठिन होता है इसलिए इस समय पूरे सावन महीने भर भगवान शिव की पूजा अर्चना होती है जिससे वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा फैलती है जिससे सांप बिच्छू और विषैले जीव जंतु ग्रामीण स्थान और मानव निवास स्थान से दूर हो जाते हैं और इस समय उपलब्ध बेल के पत्र से मुख्य पूजा की जाती है बेल के पत्र दूध शहद  घी  गन्ने के रस घी का मिट्टी से बने शिवलिंग पर अभिषेक करने से उसका पानी जल को शुद्ध करता है और उसकी सुगंध हानिकारक जीवाणु को मार कर खतरनाक विषैली चीजों को बाहर भगा देती है इन सभी वैज्ञानिक कर्म से ही चार महीने जब तक भगवान श्री हरि विष्णु योग निद्रा से जाग नहीं जाते हैं तब तक शुभ और मांगलिक कार्य संपन्न होना निषेध किया गया है 

इस प्रकार हरिशयनी एकादशी या पद्मा एकादशी बहुत ही शुभ फल देने वाला महापर्व है और इस व्रत को विधि विधान से करने वालों की वे सभी इच्छाएं पूरी होती हैं जिनके वह पात्र होते हैं इतना अवश्य है कि उन्हें पवित्र होकर सदाचार पूर्वक पाप और बुराई छोड़ते हुए इस अनुष्ठान को करना चाहिए। बुराई और पाप पूर्ण ढंग से किया गया कोई भी व्रत पूजा पाठ यज्ञ हवन अनुष्ठान कभी भी सफल नहीं हो सकता है।

Sunday, 19 July 2026

विश्व का सबसे डरावना प्राणी सांप- डॉ दिलीप कुमार सिंह

विश्व का सबसे डरावना प्राणी सांप- डॉ दिलीप कुमार सिंह
सांप विश्व का एक ऐसा भयानक डरावना प्राणी है जिसका नाम सुनकर ही पूरे शरीर में भय की एक लहर दौड़ जाती है। यद्यपि संसार में एक से बढ़कर एक जीव जंतु और डरावनी चीज हैं जिनका नाम सुनकर शरीर में सिहरन दौड़ जाती है जैसे भूत-प्रेत पिशाच चुड़ैल डायन शैतान शेर भेड़िया लकड़बग्घा बिच्छू लेकिन इन सभी से डरावना और घातक प्राणी मानव जाति के लिए सर्प ही है। सांप पूरी दुनिया में अंटार्कटिका और न्यूजीलैंड को छोड़कर हर जगह पाए जाते हैं यह पानी और जमीन में पेड़ों पर जंगल और गुफाओं में निवास करते हैं और हर एक वातावरण के प्रति स्वयं को अनुकूलित कर लिया है इसलिए यह सृष्टि के सबसे सफल प्राणियों में से एक है ।

पूरी दुनिया में सांपों की 3900 के लगभग प्रजातियां पाई जाती हैं जिसमें 20% विषैली और 80% विषहीन होती हैं इसी तरह भारत में भी 69 प्रजातियां सांप की पाई जाती हैं जिसमें 29 समुद्र में और 40 जमीन पर मिलती हैं और इसमें से केवल 10% सांप विषैले और जानलेवा होते हैं पूरी दुनिया में सांपों की अधिकांश प्रजातियां जहरीली नहीं होती हैं

सांप के पैर नहीं होते यह सरीसृप अर्थात रेंग कर चलने वाले प्राणियों में से आते हैं इनके पैर की जगह शल्क होते हैं जिनकी सहायता से वे चलते हैं इनके बाहरी कान नहीं होते लेकिन आंतरिक कान होते हैं जिनमें हड्डियों की सहायता से जमीन से आने वाली आवाज को सुनते हैं इसके अलावा मस्तिष्क की विशेष ग्रहण की सहायता से हवा से आई हुई आवाजों को भी पकड़ लेते हैं इनकी श्वांस नली में एक फेफड़ा होता है और यह हर वर्ष अपना केंचुल उतारने रहते हैं जिसे कायांतरण या नवीनीकरण कहते हैं इनके नीचे का जबड़ा बहुत ही लचीला होता है जिसकी सहायता से अपने से बड़े शिकार को भी निगल जाते हैं सभी सांप मांसाहारी होते हैं यह विषैले और विषहीन दोनों प्रकार के होते हैं जो घात लगाकर या पीछा करके अपने शिकार को पकड़ते हैं।

सांप एक शीत रुधिर का प्राणी होता है अर्थात इसका शरीर अपने को मनुष्य की तरह वातावरण के अनुकूल नहीं कर सकता इसीलिए जाड़ों में बिल के अंदर चले जाते हैं और गर्मियों में बाहर आ जाते हैं जिससे उनका शरीर सर्दी गर्मी के प्रति अनुकूलित रहे इनका हृदय तीन खानों में विभक्त रहता है इनका पाचन तंत्र बहुत ही विकसित और संतुलित रहता है आंखों में पलक नहीं होता है इनके तेज और खोखले दांत होते हैं तो केवल खांच या अर्धचंद्र की तरह दो निशान पड़ते हैं जबकि विषहीन सांप के काटने पर छोटे-छोटे कई निशान पड़ जाते हैं सभी परिवार के साथ लंबे समय तक कभी-कभी 6 महीने से एक वर्ष तक बिना खाए पिए रह सकते हैं इसलिए महीने में एक बार भोजन उनके लिए पर्याप्त होता है। 

गर्मी और वर्षा ऋतु में सभी सांप बहुत ही भयानक और उत्तेजित रहते हैं और इसी समय में सबसे अधिक लोगों को काटते हैं जाड़े में वह लगभग निष्क्रिय रहते हैं क्योंकि ठंड में स्वयं को अनुकूलित न कर पाने के कारण धरती के अंदर या बिल में छुप जाते हैं वर्षा काल में सांपों का प्रजनन काल भी होता है इसलिए उस समय यह बहुत ही उग्र और भयानक होते हैं उसे समय उनसे बचना चाहिए। इस समय सांप क्रोध में काटते हैं और पूरा जहर शरीर में छोड़ देते हैं जिससे व्यक्तियों के मरने की संभावनाएं बहुत अधिक बढ़ जाती हैं इसके अलावा वर्षा काल में हर जगह पानी भर जाने से अपने शिकार को पकड़ने के लिए वह प्राय घर गांव बस्ती में आ जाते हैं इसलिए भी वर्षा काल में सांपों की घटनाएं काटने की बहुत अधिक हो जाती हैं। इसलिए हमेशा जूते चप्पल पहन कर टॉर्च लेकर लाठी के साथ निकालनाचाहिए।

दुनिया में सभी रंग रूप के सांप पाए जाते हैं लाल पीला काला सफेद नीला हीरे जैसा सोने जैसा होते हैं।सबसे छोटा सांप 10 सेंटीमीटर का थ्रेड नाग होता है जबकि सबसे बड़ा 10 मीटर का अफ्रीकी अजगर होता है किंग कोबरा भी काफी लंबा सांप होता है जो 18 से 20 फीट लंबा हो सकता है प्रमुख विषैले सांपों में नाग काला नाग भूरा नाग करैत वाइपर रसल वाइपर सा स्किल्ड वाइपर नागराज या किंग कोबरा बांस पिट वाईपर मांबा ब्लैक मांबा टाइपेन प्रमुख है जबकि विषहीन आंखों में अजगर ओलिव कीलबैक चेकर्ड कील बैक बेडडोम डोड़हा अषढ़िया धामिन घोड़ा पछाड़ जैसे सांप प्रमुख है। अजगर और अमेज़न नदी में पाए जाने वाले सांप सबसे लंबे होते हैं।

सांप का जहर दो प्रकार का होता है एक हीमोटोक्सिन और दूसरा न्यूरोटोक्सीन हीमोटोएक्सइन में बेहोशी और लकवा जैसी चीज हो जाती हैं जबकि न्यूरोटोक्सीन में खून का जाम जाना अंदर खून का रक्त स्राव होना जैसी घटनाएं होती हैं सांप अंडे और बच्चे दोनों देते हैं यह बहुत अद्भुत प्राणी है जो आदिकाल से लोगों के लिए  भय और जिज्ञासा का कारण बने हुए हैं माना जाता है कि जब हलाहल विष का पान भगवान शिव कर रहे थे तब उसे जहर की कुछ बूंदे धरती पर गिरी और उसको पीने वाले सांप और अन्य प्राणी विषैले हो गए थे सांप का जहर इतना घातक होता है की एक सांप सैकड़ो लोगों को मार सकता है सबसे अधिक जहर नागराज अर्थात किंग कोबरा में होता है और सबसे कम टाइपेन और करेत जैसे सांपों में होता है लेकिन जिस सांप में जितना ही काम जहर होता है वह उतना ही अधिक भयानक और घातक होता है।

 प्राचीन काल में नाग और सांप जातियां रहा करती थी और नाग कन्याएं भी होती थी याद रहे सांप या नाग नहीं होते थे बल्कि इनके बीच रहने वाले जो इनके विशेषज्ञ होते थे और सांपों से संबंधित झाड़ फूंक और उनके जहर से संबंधित काम करते थे उन्हें सांप और नाग जातियां कहा जाता था और वह सर्प और नाग बाहुल्य क्षेत्र में रहा करते थे नाग और सांपों की बहुत सी जातियां हुआ करती थी प्राचीन भारत के प्रसिद्ध और चर्चित नागों में वासुकी कर्कोटक र
तक्षक कुलक पद्म महापद्म शंखचूण धर्म चक्र अश्व सेन शेषनाग जैसे प्रसिद्ध नाग सरदार थे तो वहीं प्रमुख नाग कन्याओं में उलूपी कद्रू  अहिलवती सुलोचना मनसा जया विषहर शामिलबारी देव दोतली नागकन्याएं प्रमुख थी भगवान शिव की पंच नागकन्याएं थीं और उन्हीं पंच कन्याएं जो श्रावण महीने की शुक्ल पक्ष पंचमी को हुई थी के नाम पर नाग पंचमी आज भी मनाई जाती है कद्रू से नाग और क्रोधवशा से सांपों की प्रजातियां उत्पन्न हुई।

यह तो है नाग और सांप प्रजातियों की बात अब सीधे आते हैं कि सांपों से बचने के लिए क्या किया जाए इसके लिए कुछ ऐसे पेड़ पौधे जड़ी बूटियां जैसे सर्प बूटी सर्पगंधा हैं जिनको लगाने पर सांप भाग जाते हैं है घर में प्रवेश नहीं करती मिट्टी का तेल का प्रयोग करने पर भी सांप और जहरीले जीव जंतु घर में प्रवेश नहीं करते अंधेरी और नम जगह घर में नहीं होनी चाहिए क्योंकि सांप गर्मी में वहीं पर छुप जाते हैं जैसे अंधेरा कोना भूसा और खरपतवार जैसे स्थान उपली रखने का स्थान यहां बहुत सावधानी रखना चाहिए हमेशा नाजा नाम की होम्योपैथिक दवा घर में रखना चाहिए।

 अगर सांप काट ले तो बिल्कुल घबराए ने पहले देख की विषैला सांप हैं या विषहीन बिना समय गंवाएं सबसे पास के सुविधाओं वाले अस्पताल में जाएं ध्यान रहे जितना ही शांत रहेंगे और स्थिर रहेंगे सांप का विष उतना ही कम चढ़ेगा और अगर तेजी से भागेंगे घबरा जाएंगे तो रक्त संचार बहुत तेज हो जाएगा जिसके साथ सांप का विष भी शरीर में तेजी से  चढ़ेगा।पहले का मरीज को सोने न दें और तुरंत विषरोधी इंजेक्शन दिलाए जब तक डॉक्टर के यहां न पहुंचे तब तक घाव को साबुन से साफ करें घाव के ऊपर पट्टी बांधना घी पिलाना भी लाभदायक होता है 000 नंबर पर डायल करने से भी सेवाएं मिलती हैं 

अगर किसी ऐसे स्थान पर हैं जहां कोई भी चिकित्सा सुविधा उपलब्ध नहीं है तो झार फूंक देसी जड़ी बूटियां का और घी तथा काली मिर्च का नीम की पत्ती का और इस तरह किसी भी अन्य उपाय का प्रयोग कर सकते हैं अगर मुंह में कोई घाव न हो तो उसको चूस कर निकल भी सकते हैं लेकिन इसमें बहुत सावधानी आवश्यक है ।इससे व्यक्ति को मनोवैज्ञानिक मनोबल भी मिलता है अधिकांश बार सांप हल्के से काटते हैं जिससे व्यक्ति मरता नहीं है इन सब बातों का ध्यान रखना चाहिए नहीं तो कई बार घबरा कर व्यक्ति विषहीन सांप के काटने से भी मर जाते हैं।

सांपों के बारे में कुछ सच्चाई और किंवदंती जान लेना भी आवश्यक है जैसे कि क्या सचमुच नाग कन्या होती है विज्ञान इसको नहीं मानता लेकिन सच यही है कि नागकन्या होती हैं जैसे कि अर्जुन ने उलूपी नाम की नाग कन्या और घटोत्कच ने अहिल्यावती नाम की नाग कन्या से विवाह किया था अगला प्रश्न है क्या नागों में मणि होती है इस पर भी विज्ञान सही उत्तर नहीं देता है लेकिन सही उत्तर यही है कि नागों में मणि होती है जो हल्के नीले श्वेत रंग की चमकदार होती है मैंने स्वयं दो बार बांदा के जंगलों में और एक बार जौनपुर में नाग की मणि देखी है लेकिन लाखों नागों में किसी एक में नागमणि होती है जो बहुत अधिक आयु के हो जाते हैं ।

नागमणि बहुत अधिक शक्तिशाली और धन संपदा देने वाला होता है अगला प्रश्न है क्या सांप बदला लेते हैं विज्ञान इसके बारे में नकारात्मक उत्तर देता है लेकिन यह सच है कि अनेक प्रत्यक्ष प्रमाण है कि नाग बदला लेते हैं मैं खुद एक बार गांव में नाग मारा था तो उसकी नागिन कई दिनों तक मेरे पीछे पड़ी रही और एक बार पेड़ से कूद कर मेरे ऊपर आक्रमण कर दिया लेकिन मेरे पीछे चल रहे हैं लोगों के चिल्लाने पर मैं बच गया और उसे मार डाला अगला प्रश्न है क्या सचमुच मंत्र शक्ति और जड़ी बूटियां से सांप का भी सुधर जाता है इसका उत्तर निश्चित रूप से हां में है लेकिन सच्ची जानकारी होना चाहिए 

एक प्रश्न यह भी है कि अगर सांप से आमना सामना हो तो उसको मार दें या छोड़ दें मेरा मानना है कि सांप साक्षात काल के स्वरूप हैं और दुश्मन या काल को कभी भी छोड़ना नहीं चाहिए और मार देना चाहिए हां अगर फण वाले नाग अर्थात कोबरा है तो उसको छोड़ा जा सकता है अगला प्रश्न है क्या राजा जन्मेजय आस्तिक मुनि और कश्यप का नाम लेने से सांप भाग जाते हैं तो इसका उत्तर है बिल्कुल ।इसको करके आप देख सकते हैं इन तीनों का नाम लेकर अगर नाग को भागने को कहते हैं तो वह भाग जाता है कारण चाहे जो हो 

वैसे एक बात जान लीजिए सांप साक्षात काल के रूप हैं इसलिए जिसका काल आ जाता है उसी को यह काटते हैं इसीलिए महाकाल भगवान शिव ने इन्हें अपना आभूषण बना रखा है नाग  अर्थात कोबरा जल्दी बिना गलती के किसी को नहीं काटते और काटने के पहले फुफकार कर चेतावनी देते हैं लेकिन वाइपर करेत और रसल वाइपर कहीं भी किसी को भी बिना गलती के भी काट लेते हैं और कोई चेतावनी भी नहीं देते हैं। 

एक बात और है कि सभी सर्प प्रजातियां सारे संसार के विष को हवा के द्वारा सोचती रहती हैं और संसार विषैला होने से बचा रहता है इसके अलावा खेती बागवानी और मनुष्य के तमाम शत्रुओं को मार कर खा जाती हैं नहीं तो अन्य जानवर जैसे चूहे इत्यादि बेकाबू हो जाते हैं अगर विषैले सांप ने काट लिया है तो नीम की पत्ती कड़वी नहीं लगती और व्यक्ति दांत से जौ का दाना तोड़ नहीं पता यह पक्की पहचान है सभी सांपों को जहर भगवान ने उनकी सुरक्षा के लिए दिया है अन्यथा कब के वे समाप्त हो गए होते। दुनिया में कुछ ऐसे भी सांप होते हैं जो पेड़ों से छलांग दूर-दूर तक लगाते हैं तो लगता है कि वह उड़ रहे हैं सांप की आंखों में लगातार नहीं देखना चाहिए वरना व्यक्ति सम्मोहित हो जाता है ।
नाग पंचमी को विधि विधान से जो पूजा की जाती है उसके द्वारा एक विचित्र सुगंध उत्पन्न होती है जिसकी सुगंध से सभी जहरीली सांप प्रजातियां घर और समाज से दूर खेतों और जंगलों में भाग जाती है यही नाग पंचमी की पूजा का महत्व है

किस प्रकार सर्प प्रजाति ने संपूर्ण दुनिया पर अपना अधिकार जमा रखा है और प्रकृति में अपने को बखूबी सुंदर ढंग से जल थल जंगली पेड़ पौधे हर जगह के लिए अनुकूलित कर लिया है यह विश्व का सबसे आश्चर्यजनक प्राणी भी है वहीं यह दुनिया का सबसे भयंकर प्राणी भी है जिसका प्रमाण यह है कि अचानक सांप के आगे आ जाने से व्यक्ति हक्का-बक्का हो जाता है मैंने तो अपने जीवन में सैकड़ो विषैले सांपों को मारा है सांप को मारने का सबसे अच्छा तरीका उसके सिर पर प्रहार करना होता है अगर हल्का तेज प्रहार भी सिर पर पड़ गया तो सांप बेहोश हो जाता है या मर जाता है अगर आप तेज दौड़ते हैं तो कोई सांप आपको पकड़ नहीं पाएगा क्योंकि सांप के अधिकतम गति 15 से 25 किलोमीटर प्रति घंटा होती है और संकट पड़ने पर कोई भी व्यक्ति 30 से 35 किलोमीटर प्रति घंटे की गति से भाग लेता है इस प्रकार सांप दुनिया का सबसे अद्भुत और डरावना जीव है।