युवा और डिजिटल दुनिया की चुनौतियां।
युवा किसी भी देश और राष्ट्र की असली पूंजी होते हैं। राष्ट्र की प्रगति और उज्ज्वल भविष्य युवाओं की सोच और उनके विकास पर निर्भर करता है। आधुनिक तकनीक की बदौलत आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में जहां ज्ञान प्राप्ति के साधन और कौशल विकास के अपार अवसर पैदा हुए हैं, वहीं व्यक्तित्व निर्माण और नैतिक मूल्यों के पतन का खतरा भी मंडरा रहा है। आज के युवाओं ने डिजिटल दुनिया में खुद को इतना डुबो लिया है कि उन्हें अपने व्यक्तित्व को निखारने पर ध्यान देने की जरूरत भी महसूस नहीं होती। नतीजा यह है कि हमारे युवा डिजिटल दुनिया के नकारात्मक प्रभावों से बेखबर होकर इसके 'साइड इफेक्ट्स' को नजरअंदाज कर रहे हैं, जिसका असर न केवल उनके निजी जीवन पर दिख रहा है बल्कि समाज भी इन प्रभावों से सुरक्षित नहीं है।
आज के डिजिटल युग में सोशल मीडिया और इंटरनेट केवल सूचना, संपर्क और मनोरंजन के साधन नहीं रह गए हैं, बल्कि ये लोगों को गलत जानकारी और भ्रामक विचारों की ओर धकेलने के लिए भी इस्तेमाल किए जा रहे हैं। युवा, जो तकनीकी रूप से तो दक्ष हैं लेकिन अनुभव और नैतिक समझ के मामले में अभी नए हैं, अक्सर ऑनलाइन सामग्री के प्रभाव में आ जाते हैं। उनकी ऊर्जा और जोश की भावनात्मक संवेदनशीलता उन्हें और अधिक प्रभावित करती है। इस उम्र में युवा सामाजिक व्यवस्था, अन्य धर्मों और न्याय के मुद्दों के प्रति काफी संवेदनशील होते हैं, और यही भावनात्मक तीव्रता उन्हें "गलत या भ्रामक संदेशों" का शिकार बना सकती है—खासकर तब जब ये संदेश हिंसा या तोड़-मरोड़ कर पेश किए गए सिद्धांतों का समर्थन करते हों। इसलिए सोशल मीडिया का उपयोग करते समय सावधानी अनिवार्य है।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के 'एल्गोरिदम' यह सुनिश्चित करते हैं कि यूजर को वही सामग्री बार-बार दिखाई जाए जिसे उसने पहले देखा, लाइक किया या फॉलो किया हो। इस प्रक्रिया के दौरान यूजर के 'फीड' में उसी तरह की भ्रामक या पक्षपातपूर्ण जानकारी आने लगती है, जिससे यह आभास होता है कि उसके विचार और भावनाएं ही सार्वभौमिक सत्य हैं। समय के साथ युवा अनजाने में खुद को इनसे जोड़ लेते हैं। कभी उन्हें महसूस होता है कि उनका जीवन निरर्थक है, जिससे उनके मन पर निराशा छाने लगती है। कभी उन्हें लगता है कि वे "अलग" या "पीड़ित" हैं, तो यह अहसास उन्हें आक्रामकता या हानिकारक कदमों को सही ठहराने का आधार बन जाता है। कभी उन्हें लगता है कि जो कुछ वे देख रहे हैं वही असली दुनिया है, जिससे उनकी संबद्धता और गहरी हो जाती है। इसके प्रभाव में वे किसी भी नकारात्मक या कट्टरपंथी विचारधारा से प्रभावित होकर ऐसा कदम उठा लेते हैं जिसका असर न केवल उनके व्यक्तिगत जीवन पर, बल्कि उनके परिवार और समाज पर भी पड़ता है, जिसकी भरपाई संभव नहीं होती।
इस 'एल्गोरिद्मिक' प्रभाव को आमतौर पर "फिल्टर बबल" कहा जाता है, जो व्यक्ति को उसके पहले से मौजूद विश्वासों तक सीमित कर देता है और वैकल्पिक दृष्टिकोणों को छिपा देता है। परिणामस्वरूप, युवा यह मानने लगते हैं कि भ्रामक नैरेटिव ही वास्तविकता है। इस संदर्भ में कुरान हमें स्पष्ट मार्गदर्शन देता है: "ऐ ईमान वालों! किसी भी खबर को बिना जांच-पड़ताल के न मानो और जब तक तुम्हें प्रमाण न मिले, किसी पर विश्वास न करो।" (सूरह अल-हुजरात, 49:6)। यह आयत युवाओं को संदेश देती है कि किसी भी ऑनलाइन जानकारी पर बिना सत्यापन के भरोसा न करें।
कुछ ऑनलाइन पेज, चैनल और वेबसाइटें विशेष रूप से युवाओं को भ्रामक संदेशों के जरिए प्रभावित करने की रणनीति अपनाते हैं। ये प्लेटफॉर्म न केवल कट्टरपंथी विचार पेश करते हैं, बल्कि युवाओं में यह धारणा भी पैदा करते हैं कि समाज उन्हें नहीं समझता। उदाहरण के तौर पर, कुछ सोशल मीडिया अकाउंट युवाओं को बताते हैं कि दूसरों के त्योहारों में शामिल होना या विभिन्न समुदायों से संपर्क रखना गलत है। इस तरह युवा धीरे-धीरे लोकतांत्रिक सिद्धांतों और सामाजिक समरसता के बुनियादी मूल्यों से दूर हो जाते हैं।
अक्सर ये समूह युवाओं के मनोविज्ञान का फायदा उठाते हैं और उन्हें महसूस कराते हैं कि उनके साथ अन्याय हो रहा है और उन्हें इसके खिलाफ "अपने हक" के लिए लड़ना चाहिए। सोशल मीडिया एल्गोरिदम इस संदेश को बार-बार दिखाते हैं, जिससे भावुक या अकेलेपन का शिकार युवा इसे गंभीरता से लेने लगते हैं। भारत में ऐसी घटनाएं तुलनात्मक रूप से कम हैं, क्योंकि यहां का पारिवारिक ढांचा काफी मजबूत है जो युवाओं को ऐसे नकारात्मक रुझानों से बचाने में मददगार होता है। इसके अलावा, कुछ समूह व्यक्तिगत संदेशों, गेम्स और क्विज़ के माध्यम से युवाओं की पहचान करते हैं और धीरे-धीरे अपनी सोच उन पर थोपने की कोशिश करते हैं।
युवाओं के लिए इन समस्याओं का समाधान केवल पाबंदी नहीं है, बल्कि उन्हें विश्वसनीय स्रोतों से जानकारी प्राप्त करने के लिए मार्गदर्शन देना जरूरी है। युवाओं को चाहिए कि वे राष्ट्रीय मुख्यधारा के मीडिया, प्रतिष्ठित पत्रकारों, विश्वविद्यालय की पुस्तकों और प्रमाणित शोध पत्रिकाओं से तथ्य प्राप्त करें और अपने शिक्षकों या अभिभावकों से मार्गदर्शन लेते रहें। इससे वे न केवल भ्रामक सामग्री से सुरक्षित रहेंगे, बल्कि अपने विचारों को लोकतांत्रिक और नैतिक आधार पर विकसित कर सकेंगे। युवाओं को यह समझना चाहिए कि एल्गोरिदम उनके दृष्टिकोण को सीमित कर सकते हैं, इसलिए किसी भी संदेश को बिना शोध के स्वीकार न करें।
इस प्रक्रिया में दोस्तों, परिवार और शिक्षकों के साथ संवाद करना आवश्यक है। किसी भी संदिग्ध या परेशान करने वाली सामग्री को साझा करने के बजाय अनुभवी लोगों से सलाह लें। अपनी भावनात्मक प्रतिक्रिया पर गौर करें कि क्या कोई सामग्री आपको डरा रही है या "तत्काल प्रतिक्रिया" के लिए उकसा रही है। यदि ऐसा है, तो रुकें, सोचें और लाइक या शेयर करने से पहले उसके सकारात्मक और नकारात्मक दोनों पहलुओं पर विचार करें। कुरान भी हमें ज्ञान के महत्व की याद दिलाता है: "अल्लाह ने इंसान को ज्ञान दिया, और जो सही ज्ञान (हिदायत) प्राप्त करता है, वह पथभ्रष्टता से सुरक्षित रहता है।" (सूरह ताहा, 20:123)।
सामूहिक स्तर पर, समाज और शैक्षणिक संस्थान डिजिटल साक्षरता कार्यक्रमों के माध्यम से युवाओं को प्रशिक्षित कर सकते हैं। यदि युवा यह समझ जाएं कि उनकी सोच किस तरह प्रभावित हो रही है और सोशल मीडिया उनकी मानसिक सेहत पर कैसे असर डाल रहा है, तो वे अधिक सुरक्षित रह सकेंगे। ऑनलाइन भ्रामक सूचनाओं से निपटना केवल तकनीकी समाधान तक सीमित नहीं है; यह नैतिक शिक्षा, धार्मिक समझ और सामाजिक सहयोग का मिश्रण है। युवाओं को यह समझना होगा कि आज के डिजिटल युग में असत्यापित सामग्री का प्रसार न केवल भ्रामक है, बल्कि इसका बिना सोचे-समझे उपयोग इस्लामी शिक्षाओं के विरुद्ध और लोकतांत्रिक मूल्यों, सामाजिक सद्भाव तथा व्यक्तिगत स्वतंत्रता के लिए भी खतरा है।
फरहत अली खान
एम ए गोल्ड मेडलिस्ट