-डॉ दिलीप कुमार सिंह मौसम विज्ञानी ज्योतिष शिरोमणि
मैं बिल्कुल निष्पक्ष और बिल्कुल सही-सही तथ्य रख रहा हूं मेरे करना आपका काम है की महानतम योद्धा अर्जुन थे या कर्ण था
पहली बात महानतम व्यक्ति के लिए शांत रहना उत्तेजित न होना और अपनी शक्ति का सही प्रयोग करना चाहिए यह अर्जुन में पूरी तरह से था जबकि कारण में इसका अभाव था वह बहुत हठी दुराग्रही एवं स्वयं को महान समझने वाला व्यक्ति था जो एक चपरासी होकर कलेक्टर की कुर्सी जबरदस्ती हासिल करना चाहता था वह अभी बिना परीक्षा उत्तीर्ण किए हुए
यदि अस्त्र शस्त्रों की तुलना किया जाए तो भी अर्जुन करण से बहुत आगे थे सभी दिव्यास्त्र को छोड़ दिया जाए तो अकेले पाशुपत अस्त्र है संपूर्ण सृष्टि के विनाश करने के लिए काफी था करण ने अपने समस्त विनाशकारी अस्त्र-शस्त्रों का प्रयोग कर दिया था लेकिन अर्जुन सक्षम होने पर भी पाशुपत अस्त्र का प्रयोग नहीं किया अन्यथा कारण तुरंत समाप्त हो गया होता।
करण में दया और क्षमता तथा मानव गुना का पूर्ण अभाव था एक महान योद्धा होते हुए भी और दानवीर होते हुए भी उसके यह अवगुण उसको साधारण श्रेणी में खड़ा कर देते हैं लेकिन जो लोग कर्ण की तरह हैं रावण की तरह हैं कंस दुर्योधन जरासंध और कालयवन जैसे हैं वह लोग हमेशा कारण को बढ़ा चढ़ा कर प्रस्तुत करते हैं जैसे एक मदिरा पीने वाला हमेशा मदिरा को सर्वश्रेष्ठ सिद्ध करता है।
करण के पास जन्म जात अवैध कवच और कुंडल था उसको दान करने के बदले उसने अमोघ वासवी शक्ति इंद्र से मांग लिया जिससे उसकी दानवीरता पर प्रश्न चिन्ह लग गया यदि उसने यह शक्ति ठुकरा दी होती तो निश्चित रूप से उसकी महानता सिद्ध होती दान करते समय भी अर्जुन को महान शत्रु और प्रतिद्वंद्वी के रूप में देखना और करने की शक्ति प्राप्त करना कहीं से भी उचित और महान नहीं कहा जा सकता है।
यदि मूल महाभारत को अध्ययन करेंगे तो आपको प्राप्त होगा कि दुर्योधन और शकुनि तथा दुशासन की सभी छल कपट विश्वास घाट की योजनाओं में कर्ण सम्मिलित था चाहे अज्ञातवास हो चाहे उनका जलाकर मारने वाली स्थिति हो या वन में जाकर पांडवों की दुर्दशा देखना हो या फिर दुर्वासा को पांडव लोगों के यहां भेज कर उनको श्राप दिलाना हो या विराटनगर में युद्ध करना हो हर जगह कर्ण उपस्थित था यह दुआ चाहता तो बलराम की तरह अलग भी रह सकता था कम से कम इस अधर्म के युद्ध में तो उसे ऐसा ही करना चाहिए था।
अंग राज कर्ण ने राजकुमारों की हस्तिनापुर में द्रोणाचार्य द्वारा ली जा रही अस्त्र-शस्त्र परीक्षा में बिना किसी पात्रता और प्रवेश पत्र के जबरदस्ती घुसकर वातावरण में प्रदूषण भरकर तनाव पैदा कर दिया यह तो ऐसा ही दृश्य था कि बिना सिविल सेवा की परीक्षा दिए जबरदस्त की उसके साक्षात्कार में घुस जाना और यह कहना कि मैं इसके सर्वथा योग्य हूं ऐसा ही होता है इतना ही नहीं सारी चेष्टा करके भी वह संध्या काल तक अर्जुन को परास्त नहीं कर पाया था।
कारण यदि चाहता तो वारणावत में किसी के द्वारा युधिष्ठिर को सूचना देकर उन्हें बचा सकता था जबकि वह जानता था कि पांडव उसके सगे भाई हैं और माता कुंती उसकी सगी मां है फिर भी उसने बढ़ाने का कोई प्रयास नहीं किया इसी तरह उसने भरी सभा में कल वधू द्रौपदी की रक्षा का प्रयास किस लिए नहीं किया क्योंकि स्वयंवर में वह द्रोपदी का वर्णन नहीं कर पाया था इतने निम्न और घटिया स्तर के व्यक्ति को अर्जुन से तुलना करना पूरी तरह मूर्खता है
अर्जुन की महानता वर्णन से परे है जब इंद्रलोक में गए तो संपूर्ण ब्रह्मांड की सर्वश्रेष्ठ सुंदरी जिसके लिए बड़े-बड़े ब्रह्म ऋषि लालायित रहते हैं उसे उर्वशी को अर्जुन ने तत्काल ही ठुकरा कर एक ब्रह्मांड का कीर्तिमान स्थापित किया जो कोई सोच भी नहीं सकता इतना ही नहीं उत्तरा की शिक्षा देने वाले अर्जुन से जब कृतज्ञता के रूप में विराट राज ने उत्तर का विवाह अर्जुन से करने को कहा तो अर्जुन स्तब्ध रह गए उन्होंने कहा यह तो मेरी बेटी के समान है और ऐसा करने पर हमेशा के लिए गुरु शिष्य परंपरा कलंकित हो जाएगी यह आज के उन शिक्षक गुरु लोगों के लिए एक सर्वश्रेष्ठ शिक्षा है जो अपने बेटी समान छात्राओं से कुकर्म करते हैं इसके बाद अर्जुन की महानता पर कोई? नहीं रह जाता। उत्तर पूरे विश्व की सर्वश्रेष्ठ सुंदरी योग्य कन्या थी और उर्वशी ने तो बड़े-बड़े ब्रह्म ऋषि और ऋषि मुनि सुर नर मुनि साहब की तपस्या भंग ही कर दिया था।
करण को अच्छी तरह मालूम था कि द्रौपदी पांडव अभिमन्यु माता कुंती सब उसके अपने हैं जबकि पांडव पक्ष को अज्ञात नहीं था अन्यथा वे कर्ण को राजा बनाकर स्वयं जंगल में चले गए होते करण के सामने ही धर्म युद्ध में 16 वर्ष के अभिमन्यु का निर्माण हत्याकांड हुआ और करण ने ही इसमें सबसे प्रमुख भूमिका निभाई अभिमन्यु का कवच कोई नहीं काट सकता था जिसे कर्ण ने काटा था फिर वह कैसे महान हो सकता था
अर्जुन और पांडव इतने महान थे कि जैसे ही उनको पता लगा कि कर्ण उनके बड़े भाई थे उनके दुख क्रोध और शोक की कोई सीमा ही नहीं रही और युधिष्ठिर ने तो माता कुंती को श्राप दे दिया की है मां आज से स्त्रियों को कोई भी बात उनके हृदय में पच नहीं पाएगी और उन्होंने पूरे सम्मान से कर्ण का अंतिम संस्कार करके उसको जलांजलि दिया था आप स्वयं समझ सकते हैं कि कौन अधिक महान था।
कर्ण ने धोखे और छल कपट से स्वयं भगवान परशुराम से अस्त्र-शस्त्र विद्या सीखी और स्वयं को ब्राह्मण बताया बाद में जब उसका भांडा फूटा तो भगवान परशुराम के क्रोध की कोई सीमा न रही गुरु से छल कपट और झूठ बोलने से बड़ा पाप दुनिया में कोई नहीं हो सकता यह कारण की महानता पर प्रश्न चिन्ह लगता है इसके अतिरिक्त गाय का का वध और ब्राह्मण का श्राप उसको मिला जबकि अर्जुन के साथ ऐसा कुछ नहीं था। अर्जुन नेटवर्क ब्राह्मण पुत्र और गुरु सांदीपनी के लिए साक्षात यमलोक में जाकर यमराज से युद्ध किया और उन्हें परास्त किया था अर्जुन ने स्वयं सृष्टि के आदि देव भगवान शिव को भी युद्ध करके संतुष्ट कर दिया था जबकि कर्ण के साथ ऐसा कुछ नहीं था।
कारण यह जानता था कि भगवान श्री कृष्ण साक्षात भगवान श्री हरि विष्णु के अवतार हैं लेकिन उनके भी शिक्षा का कारण के अभिमानी और मूर्ख हृदय पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा वह केवल अंग्रेज बना दिए जाने की कृतज्ञता के कारण पूरी तरह से अधर्मी और अत्याचारी दुर्योधन के साथ बना रहा जबकि कृष्ण ने उसको यह भी बता दिया कि तुम पांडवों के सबसे बड़े भाई हो और कुंती तुम्हारी सगी मां है और यह भी कहा कि कम से कम तुम युद्ध से अलग हो जाओ तो यह संपूर्ण धरती का विनाश करने वाला युद्ध रुक जाएगा परंतु उसने स्वयं भगवान की भी एक नहीं सुनी एक समय तो उसने भगवान श्री कृष्ण से लड़ाई करके उनका चक्र ही जीने का प्रयास किया था इतना दुस्साहसी व्यक्ति महान कैसे हो सकता है।
कर्ण के सामने महाभारत के सारे अधर्म अत्याचार अन्याय घटित हुई लेकिन कभी भी वह धर्म न्याय और सच्चाई के पक्ष में नहीं दिखा। अर्जुन से प्रतिस्पर्धा करना ठीक था लेकिन उसे अर्जुन के अन्य महान गुणों को भी अपनाना चाहिए था उसकी सारी शक्तियां उनके कवच कुंडल और दिव्यास्त्रों में छिपी हुई थी जबकि अर्जुन ने अकेले ही दिग्विजय के समय सारी धरती को जीत लिया था।
अब सीधे-सीधे कारण और अर्जुन की युद्ध संबंधी महानता और अस्त्र-शस्त्र कुशलता पर आ जाते हैं जब त्रिगर्तराज सुशर्मा ने दुर्योधन को बुरी तरह पराजित करके राशियों में बांधकर अपमानित किया तब कर्ण पराजित होकर भाग आया जो काम करने सहित सारी कौरव सुना नहीं कर पाई उसी को अर्जुन ने अकेले बुरी तरह हार कर दुर्योधन सहित सारी कौरव सी को मुक्त किया था अब आप खुद अनुमान लगा लीजिए कि कौन परम अतिरथी योद्धा था।
करण को अर्जुन को करने और हारने के अनेक मौके मिले लेकिन वह कभी भी सफल नहीं हो पाया जबकि उसे समय तक उसके पास सारे दिव्यास्त्र के साथ इंद्र की दी हुई अमोघ शक्ति भी थी और कवच कुंडल भी था जब रंगभूम में कौरव पांडवों की शस्त्र परीक्षा हो रही थी तो कारण जबरदस्ती अर्जुन से युद्ध नियमों को तक पर रखकर किया फिर भी अर्जुन को हरा नहीं पाया
इसी तरह जब विराटनगर में विराट कौरव सेना महान अतिरथी योद्धाओं द्रोणाचार्य भीष्म पितामह कृपाचार्य कारण दुर्योधन अश्वत्थामा दुशासन के साथ गई थी तब अकेले ही अर्जुन ने संपूर्ण कौरव सी को हराकर विश्व कीर्तिमान स्थापित किया था चाहते तो सबको मार कर उसी दिन संपूर्ण राज्य पथ ले सकते थे लेकिन दया और करुणा से भरे अर्जुन ने छोड़ दिया और उसे दिन एक नहीं दो दो बार कारण को अर्जुन ने बुरी तरह से घायल करके छोड़ दिया चाहते तो उसका उसी दिन अंत कर सकते थे यदि कारण उनकी जगह होता तो अभिमन्यु की तरह अर्जुन को मार देता इससे स्पष्ट है कि करण अर्जुन का वध करने में सक्षम नहीं था
महाभारत युद्ध में भीष्म पितामह के पराजय के बाद कारण लगातार 7 दिन तक कौरव सेवा में अर्जुन से लड़ता रहा लेकिन अर्जुन को मार नहीं पाया इस बीच अर्जुन ने उसे कई बार पराजित करके भगा दिया था कारण के जीवित रहते ही दुर्योधन के 100 भाई दुशासन शकुनी सहित द्रोणाचार्य और सभी महान योद्धा मारे गए वह किसी को बचा नहीं पाया जब किसी भी तरह वह घटोत्कच से युद्ध में नहीं जीत सका तब उसने अमोघ शक्ति से उसका वध कर दिया इस प्रकार कारण महान नहीं था बल्कि उसके दिव्य अस्त्र-शस्त्र महान थे चक्रव्यूह निर्माण के दिन अभिमन्यु ने उसको दो बार परास्त किया था और उसके देखते-देखते दुर्योधन के पुत्र लक्ष्मण का वध कर दिया था कर्ण कुछ भी नहीं कर सकता था जबकि अर्जुन के सामने उनके एक भी योद्धा का वध कोई भी महारथी योद्धा नहीं कर पाया था सात्यकि को उन्होंने मृत्यु के मुंह से बचाया था।
वास्तव में लोग फिल्म टीवी चैनल सोशल मीडिया और मीडिया तथा धारावाहिक देखकर कारण को बहुत महान समझने की भूल करते हैं इसीलिए उनका यह सोचना है कि कर्ण बहुत महान योद्धा था जबकि ऐसा बिल्कुल नहीं था कुछ महा मूर्ख विद्वान तो यहां तक कहते हैं कि अर्जुन ने हत्या कर्ण का वध किया था जो पूरी तरह से झूठ है मूल महाभारत पढ़ कर देखो जब कर्ण का पहिया रस में धंस गया तब दयालु अर्जुन ने अपना गांडू धनुष रख दिया और श्री कृष्ण के बहुत समझाने पर ही कारण से लड़ने को तैयार हुए और कारण रस का पहिया निकलते हुए भी अर्जुन से लगातार युद्ध करता रहा इस क्रम में उसने ब्रह्मास्त्र सहित अनेक दिव्य अस्त्र शस्त्रों का प्रयोग किया जिसे अर्जुन ने काटकर उसको दबा दिया और जी अंजलि अस्त्र का प्रयोग अर्जुन ने रौद्रास्त्र भर कर किया था उसे अस्त्र का कर्ण के पास कोई भी उत्तर नहीं था इसलिए वह मारा गया। करण इतना बड़ा मूर्ख और अभिमानी था कि रंगभूमि में केवल अर्जुन को पराजित करने के लिए उसने भार्गव अस्त्र का प्रयोग करना चाहा था जो सूर्यास्त होने के कारण नहीं कर पाया यदि अर्जुन ने पाशुपत अस्त्र उठा लिया होता तो कर्ण का वही वध हो गया होता।
अर्जुन के अलावा सात्यकी कर्ण को चार बार अभिमन्यु ने चार बार सुशर्मा ने एक बार भीम ने चार बार और प्रद्युम्न ने एक बार हराया था और सबसे बड़ी बात है कि हारने के बाद कारण हर बार युद्ध भूमि छोड़कर भाग जाता था इस प्रकार कर्ण के अजेय योद्धा होने का भ्रम अपने आप टूट जाता है वैसे कारण को बेचारा बनाकर अनुचित लाभ लेने के लिए फिल्म और धारावाहिक वालों ने उसको इतना बड़ा चढ़ा कर दिखा दिया है की असली सच ही छप गया है उसे तो झूठ-मूठ में पहाड़ पर चढ़कर इंद्र पर आक्रमण करके इंद्र को परास्त होते हुए दिखाया गया है जो पूरी तरह से सत्य और अनुचित है। वास्तव में कर्ण प्राचीन काल में एक राक्षस था जिसका नाम दंभोद्भव था उसने ब्रह्मा जी से कठिन वरदान प्राप्त किया जिसके कारण भगवान विष्णु को चार बार अवतार लेना पड़ा जिसमें नर नारायण और कृष्ण अर्जुन भी सम्मिलित हैं
उपर्युक्त बिल्कुल सही तथ्य मूल महाभारत से लिए गए हैं अब आप लोग यह चुनने के लिए स्वतंत्र हैं की कर्ण एक महानतम योद्धा था या परमवीर अर्जुन अपने समय के सबसे महान योद्धा थे एक बात और है कि अर्जुन के पास भगवान शिव का पाशुपत अस्त्र था जो तीनों लोकों को नष्ट कर सकता था परंतु कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी अर्जुन ने उसका प्रयोग नहीं किया क्योंकि वह धरती और मानवता को नष्ट नहीं करना चाहते थे जबकि कारण बहुत ही क्रोधी अहंकार पूर्ण और उतावला होने वाला योद्धा था जिसे हर प्रकार के उपलब्ध है दिव्या स्टारों का प्रयोग कर लिया था -डॉ दिलीप कुमार सिंह मौसम विज्ञानी ज्योतिष शिरोमणि