Friday, 29 May 2026

जब आतंक इस्लाम का नाम ओढ़ लेता है: शास्त्रीय विद्वत्ता वास्तव में क्या कहती है?*

*जब आतंक इस्लाम का नाम ओढ़ लेता है: शास्त्रीय विद्वत्ता वास्तव में क्या कहती है?*

माली में जिहादी समूहों द्वारा किए गए हमलों ने एक बार फिर एक असहज सवाल को सतह पर ला दिया है। क्या इस्लाम के नाम पर किए गए हिंसा के ये कृत्य, किसी भी तरह से उस शिक्षा के अनुरूप हैं जो इस्लाम वास्तव में देता है? इसका उत्तर—जो एक हज़ार से अधिक वर्षों के इस्लामी न्यायशास्त्र और पैगंबर की परंपरा से लिया गया है—स्पष्ट रूप से 'नहीं' है। JNIM, अल-कायदा और ISIS जैसे समूह मुसलमानों को यह विश्वास दिलाना चाहते हैं कि वे एक धर्मयुद्ध लड़ रहे हैं। लेकिन जब उनके कार्यों को कुरान, सुन्नत और महान शास्त्रीय विद्वानों के लेखों की कसौटी पर कसा जाता है, तो जो सामने आता है वह 'जिहाद' नहीं है। यह जिहाद का एक घिनौना विकृत रूप है।
इस्लामी युद्ध में नागरिकों—जिनमें महिलाएं, बच्चे, बुजुर्ग और निहत्थे लोग शामिल हैं—की हत्या करना स्पष्ट रूप से वर्जित है। यह कोई आधुनिक पुनर्व्याख्या नहीं है। यह एक स्थापित शास्त्रीय कानून है। पैगंबर ने बार-बार अपने कमांडरों को निर्देश दिया कि वे उन लोगों को न मारें जिनके हाथों में हथियार न हों। अल-नवावी और इब्न कय्यिम जैसे विद्वानों ने इन नियमों को विस्तार से लिपिबद्ध किया है। शास्त्रीय इस्लामी कानून घरों को नष्ट करने, फसलों और संपत्ति को जलाने, और आम लोगों के बीच जान-बूझकर डर फैलाने पर भी रोक लगाता है। स्वयं कुरान भी संयम बरतने का आदेश देता है। सूरह अल-बकरा (2:190) विश्वासियों को निर्देश देता है कि वे युद्ध के दौरान भी सीमाओं का उल्लंघन न करें। सूरह अल-मुमताहना (60:8) आदेश देता है कि शत्रुओं के साथ भी निष्पक्षता से व्यवहार किया जाए, बशर्ते उन्होंने हथियार न उठाए हों। ये कोई गौण आयतें नहीं हैं। ये संघर्ष से संबंधित इस्लामी कानून की नैतिक रीढ़ हैं।
शास्त्रीय विद्वानों ने 'खवारिज' नामक एक खतरनाक संप्रदाय की पहचान की थी; ये ऐसे समूह थे जिन्होंने साथी मुसलमानों को 'धर्मत्यागी' घोषित करने और उसी आधार पर उनकी हत्या करने का जिम्मा खुद उठा लिया था। पैगंबर ने उनके आगमन के प्रति आगाह किया था। उन्होंने उन्हें ऐसे लोगों के रूप में वर्णित किया था जो कुरान का पाठ तो करेंगे, लेकिन जिनका ईमान उनके गले से नीचे नहीं उतरेगा। JNIM, ISIS और उनके सहयोगी ठीक इसी कार्यप्रणाली का पालन करते हैं। 'तकफीर' के सिद्धांत के माध्यम से—जिसमें वे आम मुसलमानों, विद्वानों, सैनिकों और नागरिकों को 'काफ़िर' (अविश्वासी) घोषित कर देते हैं और उन्हें मृत्यु का पात्र मानते हैं—वे ठीक उसी पैटर्न को दोहराते हैं जिसे इस्लामी विद्वत्ता ने चौदह शताब्दियों से लगातार निंदित किया है। उनका नाम या लेबल भले ही अलग हो, लेकिन उनका भटकाव (विचलन) बिल्कुल एक जैसा है।
शास्त्रीय इस्लामी न्यायशास्त्र में, सशस्त्र जिहाद कभी भी कोई 'स्वतंत्र' (freelance) या मनमानी करने वाला उपक्रम नहीं रहा है। यह विचार कि कोई भी व्यक्ति या छोटा-सा गुट युद्ध की घोषणा कर सकता है, सोशल मीडिया के ज़रिए लड़ाकों की भर्ती कर सकता है, और धर्म के नाम पर हत्याएँ शुरू कर सकता है—इस्लामी परंपरा में इसका कोई आधार नहीं है। इस्लाम शांति समझौतों को भी असाधारण महत्व देता है। संधियाँ, युद्धविराम और कूटनीतिक व्यवस्थाएँ इस्लामी चिंतन में कमज़ोरी के संकेत नहीं हैं। वे दायित्व हैं। पैगंबर ने स्वयं हुदैबिया की संधि में कठिन शर्तें स्वीकार की थीं, क्योंकि वे समझते थे कि जीवन और समुदाय की रक्षा युद्ध के मैदान की शान से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है।
इन गुटों को खत्म करने के लिए यह समझना ज़रूरी है कि वे भर्ती कैसे करते हैं। वे धार्मिक तर्कों से सफल नहीं होते। बल्कि, वे गरीबी, राजनीतिक हताशा, पहचान का संकट, नैतिक तनाव, अशिक्षा आदि जैसी वास्तविक पीड़ाओं का फायदा उठाकर सफल होते हैं। वे हिंसा को एक धार्मिक कर्तव्य के रूप में पेश करते हैं, जबकि बदले में किसी उद्देश्य या इनाम का वादा करते हैं। उन युवा पुरुषों से, जिन्होंने कभी कोई धार्मिक ग्रंथ नहीं पढ़ा है, कहा जाता है कि उनकी शिकायतें धार्मिक प्रकृति की हैं और हिंसा ही उनका एकमात्र समाधान है। मुस्लिम समुदायों, विद्वानों और नागरिक समाज को इस हेरफेर का पर्दाफाश करना चाहिए।
धार्मिक विद्वान, शिक्षक और सामुदायिक नेता, जिनकी जड़ें प्रामाणिक ज्ञान में गहरी जमी हैं, इस क्षेत्र में सबसे विश्वसनीय आवाज़ें हैं। उनका अधिकार उस भरोसे से आता है जो समुदाय उन लोगों पर करते हैं, जिन्होंने वास्तव में इस परंपरा का अध्ययन किया है। इस्लाम के नाम पर, चाहे मुसलमानों के खिलाफ हो या गैर-मुसलमानों के खिलाफ, की गई हिंसा शहादत नहीं है। यह जिहाद नहीं है। उसी परंपरा के अनुसार, जिसका प्रतिनिधित्व करने का दावा ये गुट करते हैं, यह एक गंभीर और दंडनीय भटकाव है। विद्वान यह जानते थे। ग्रंथ स्पष्ट हैं। अब हमारा काम यह सुनिश्चित करना है कि यह स्पष्टता हर उस कोने तक पहुँचे, जहाँ संदेह और निराशा को विनाश में बदला जा रहा है।
फ़रहत अली खान 
एम ए गोल्ड मेडलिस्ट

अंतरराष्ट्रीय एवरेस्ट दिवस******************

अंतरराष्ट्रीय एवरेस्ट दिवस
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माउंट एवरेस्ट दिवस हर साल 29 मई को मनाया जाता है। यह तारीख पर्वतारोहियों सर एडमंड हिलेरी और तेनजिंग नोर्गे शेरपा को सम्मानित करने के लिए चुनी गई थी, जिन्होंने 1953 में इसी दिन पर्वत पर चढ़ाई की थी। माउंट एवरेस्ट पर चढ़ाई करना एक ऐसी उपलब्धि है जिसका सपना बहुत से लोग देखते हैं, लेकिन कुछ ही लोग इसे हासिल कर पाते हैं। दुनिया के सबसे ऊंचे पर्वत पर चढ़ाई करना जानलेवा जोखिमों से भरा होता है। इसके लिए बेहतरीन शारीरिक क्षमता की आवश्यकता होती है। जो पर्वतारोही इस शिखर तक पहुंचते हैं, वे आमतौर पर सबसे ऊंचे पर्वत पर चढ़ाई करने से पहले कई वर्षों तक प्रशिक्षण लेते हैं। एक कुशल पर्वतारोही को शिखर तक पहुंचने में लगभग दो महीने लग सकते हैं।

माउंट एवरेस्ट दिवस का इतिहास
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माउंट एवरेस्ट समुद्र तल से सबसे ऊँचा पर्वत है। यह हिमालय की महालंगुर हिमालय उप-श्रृंखला में स्थित है। इसकी ऊँचाई लगभग 29,000 फीट है। कई पर्वतारोही, जिनमें अत्यधिक अनुभवी पर्वतारोही भी शामिल हैं, इस पर्वत की ओर आकर्षित होते हैं। पर्वत पर चढ़ने के दो मार्ग हैं। पहला मानक मार्ग है जो नेपाल के दक्षिण-पूर्व से शिखर तक पहुँचता है। दूसरा मार्ग तिब्बत के उत्तर से शिखर तक पहुँचता है। पर्वत पर चढ़ने के लिए उत्कृष्ट तकनीकी कौशल की आवश्यकता होती है। इसमें ऊँचाई पर होने वाली बीमारी, खराब मौसम, तेज़ हवाएँ और हिमस्खलन तथा खुंबू हिमपात जैसे गंभीर जोखिम भी शामिल हैं। कुछ पर्वतारोहियों ने चढ़ाई का प्रयास किया है लेकिन वे वापस नहीं लौट पाए।

माउंट एवरेस्ट दिवस उन साहसी पर्वतारोहियों को सम्मानित करने का अवसर है जो विशाल एवरेस्ट पर चढ़ाई का प्रयास करते हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि दृढ़ संकल्प से कुछ भी संभव है। यह दिवस वीरता और सहनशक्ति का प्रतीक है। माउंट एवरेस्ट जैसी खतरनाक चढ़ाई शुरू करने के लिए बहुत साहस की आवश्यकता होती है। विश्वभर के लोग इससे प्रेरित होकर और अधिक जोखिम उठाने और अपने सपनों को साकार करने के लिए आगे बढ़ सकते हैं। यह दिवस लोगों को दिखाता है कि वे अपने जीवन में आने वाली किसी भी चुनौती का सामना कर सकते हैं। यह दिवस इस प्राकृतिक चमत्कार के बारे में जागरूकता बढ़ाता है। इससे अंततः पर्वत के संरक्षण में सहायता मिलती है। पर्यावरण के प्राकृतिक खजानों का संरक्षण हमारे समाज और आने वाली पीढ़ियों के लिए महत्वपूर्ण है।

एवरेस्ट का महत्व
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8,848 मीटर (29,029 फीट) की ऊंचाई वाला माउंट एवरेस्ट पृथ्वी का सबसे ऊंचा पर्वत है। पृथ्वी के सबसे ऊंचे पर्वत के रूप में, यह मानव कल्पना को मोहित करता है, मानव साहस को चुनौती देता है और दृढ़ संकल्प की परीक्षा लेता है। एवरेस्ट अन्वेषण की खोज, व्यक्तिगत सीमाओं की खोज और साहसिक भावना का प्रतीक है जो मानवता को असाधारण उपलब्धियां हासिल करने के लिए प्रेरित करती है।

एवरेस्ट सबसे ऊँचा पर्वत है
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एवरेस्ट को सर्वोच्च पर्वत के रूप में मान्यता 19वीं शताब्दी के मध्य में मिली। 1856 में, भारत के महान त्रिकोणमितीय सर्वेक्षण ने इसकी ऊँचाई निर्धारित की और इसे शिखर XV नाम दिया। बाद में, 1865 में, भारत के पूर्व सर्वेयर जनरल सर जॉर्ज एवरेस्ट के सम्मान में इस शिखर का आधिकारिक नाम माउंट एवरेस्ट रखा गया। इस खोज ने भूगोल और अन्वेषण के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की।

राजेन्द्र गुप्ता,
ज्योतिषी और हस्तरेखाविद
मो. 9116089175
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कार्यालय, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, जौनपुर।

कार्यालय, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, जौनपुर।
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              प्रेस विज्ञप्ति         दिनांकः-29.05.2025

जनपद न्यायाधीश/अध्यक्ष जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के निर्देशानुसार जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, जौनपुर एवं पेनेसिया वेलफेयर एजुकेशनल सोसायटी के संयुक्त तत्वावधान में दिनांक 29.05.2026 को मधुमेह एवं हृदयाघात मुक्त भारत के सम्बन्ध में जागरुकता एवं निःशुल्क स्वास्थ्य परीक्षण शिविर का आयोजन दीवानी न्यायालय परिसर, जौनपुर के मीटिंग हाल में किया गया। 
उक्त शिविर में पेनेसिया वेलफेयर एजुकेशनल सोसायटी वाराणसी के डा0 आशुतोष मिश्रा व डा0 पल्लवी मिश्रा तथा पेनेसिया हास्पिटल वाराणसी के मेडिकल स्टाफ द्वारा प्रतिभाग किया गया। डा0 आशुतोष मिश्रा द्वारा मधुमेह के सम्बन्ध में विस्तृत जानकारी देते हुये दैनिक दिनचर्या में परिवर्तन कर किस प्रकार मधुमेह सम्बन्धित बीमारी पर रोक लगायी जा सकती है इसके सम्बन्ध में विस्तृत जानकारी दी।
डा पल्लवी मिश्रा द्वारा यह बताया गया कि आजकल के खानपान की वजह से कोलेस्ट्राल को बढ़ावा मिल रहा है जिससे हृदयाघात की समस्या बढ़ती जा रही है। उक्त बीमारी अब युवाओं में भी दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। उनके द्वारा हृदयाघात की रोकथाम के सम्बन्ध में आवश्यक जानकारी दी गयी।
 इस अवसर पर श्री सुशील कुमार शशि जनपद न्यायाधीश/अध्यक्ष जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, श्री सुशील कुमार सिंह सिविल जज सी0डि0/सचिव जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, श्रीमती प्रीति श्रीवास्तव प्रधान न्यायाधीश, श्री अनिल कुमार यादव अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश प्रथम, श्री रणजीत कुमार सिंह अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश द्वितीय, श्री सुरेन्द्र प्रताप यादव अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश एवं समस्त न्यायिक अधिकारीगण डॉ दिलीप कुमार सिंह डिप्टी चीफ डिफेंस काउंसिल सुबाषचन्द्र यादव बार अध्यक्ष, श्री रण बहादुर यादव एवं समस्त अधिवक्तागण, डिफेंस काउंसिल्स पीएलवीगण एवं  वादकारी आदि ने उपस्थित रहकर इस अवसर का लाभ उठायें।
 मेडिकल कैम्प में 100 से अधिक व्यक्तियों ने अपना स्वास्थ्य परीक्षण कराया।
 
 जिला सूचना अधिकारी, जौनपुर को इस निर्देश के साथ प्रेषित की जनपद जौनपुर के समस्त दैनिक समाचार पत्रों में निःशुल्क प्रकाशित कराकर पेपर कटिंग अधोहस्ताक्षरी कार्यालय में प्रेषित कराया जाना सुनिश्चित करें।

  ( सुशील कुमार सिंह )
     सिविल जज सी0डि0/सचिव 
     जिला विधिक सेवा प्राधिकरण,
  जौनपुर।

धरती पर क्यों बढ़ रही है ‌ प्रलयंकारी गर्मी -डॉ दिलीप कुमार सिंह मौसम विज्ञानी ज्योतिष शिरोमणि

: धरती पर क्यों बढ़ रही है ‌ प्रलयंकारी गर्मी -डॉ दिलीप कुमार सिंह मौसम विज्ञानी ज्योतिष शिरोमणि 

पृथ्वी लगातार गर्म हो रही है और ऐसा हमें प्रत्यक्ष देखने को मिल रहा है इस समय संपूर्ण भारत सहित धरती का बहुत बड़ा भाग प्रचंड गर्मी से जूझ रहा है अमेरिका और यूरोप जैसे ठंडे और सुंदर देश भी 35 से 40 डिग्री सेल्सियस की भयंकर और कल्पना के पार की गर्मी झेल रहे हैं जहां पहले हो वैशाख और जेठ अर्थात मैं और जून ही भयंकर गम महीने होते थे वही या गर्मी बढ़कर अब मार्च से अक्टूबर तक फैल गए हैं जिससे संपूर्ण बर्फ और हिम्मत सूखते जा रहे हैं और पर्वत शिखर बर्फ विहीन होते जा रहे हैं और दुनिया एक ग्रीनहाउस इफेक्ट का घर बन चुकी है और यह एक तपती भट्टी बन चुकी है तो आइए हम देखते हैं कि प्रकृति में ऐसा भयंकर परिवर्तन क्यों हो रहा है 

1-  ‌ हरियाली और पेड़ पौधों का विनाश-

धरती पर लगातार गर्मी बढ़ते चले जाने का सबसे प्रमुख कारण है हरियाली और पेड़ पौधे और वनस्पतियों का बहुत तेजी से विनाश होना मानव सभ्यता के जन्म से आज से 50 वर्ष पूर्व तक धरती का अधिकांश भाग हरा भरा पेड़ पौधों वनस्पतियों से अच्छा अधिक था और इसी हरियाली में मानव सभ्यता और जीव जंतुओं का विकास हुआ था आज से 100 वर्ष पहले धरती का 95% भाग 50 वर्ष पहले 90% भाग पेड़ पौधों हरियाली से ढका था और आज केवल 15% भाग पर बचा हुआ है। जिसके कारण इतना केवल भयंकर गर्मी बड़ी है बल्कि ऑक्सीजन की मात्रा भी बहुत तेजी से कम हुई है और वायु गुणवत्ता सूचकांक जो 100 वर्ष पहले 0 से 5 और 50 वर्ष पहले 10 से 20 तक था आज वह ऑस्टिन 100 के पार हो गया है। दुनिया के सबसे बड़े वन क्षेत्र हरियाली और वनस्पतियों वाले अमेजॉन कांगो असम और दक्षिण भारत और टाइगा तथा स्थिति जैसे प्रदेश वृक्ष और हरियाली से रहित हो गए हैं इसके कारण वर्ष भी बहुत कम हो गए हैं‌ महानगरों और नगरों की हालत तो यह है कि वहां कहीं छायादार स्थान ही नहीं बचे हैं 

2 -सीमेंट कंक्रीट और पत्थर के जंगलों का भयंकर विस्तार 

एक तरफ तो हरियाली हर क्षेत्र पेड़ पौधे वनस्पतियां भयंकर तेजी से घट रहे हैं वहीं दूसरी तरफ सीमेंट और कंक्रीट तथा पत्थर और ईद के जंगल सारी दुनिया में बढ़ते चले जा रहे हैं बड़े-बड़े महानगरों का विस्तार से करो किलोमीटर तक हो चुका है यह जंगल गर्मी को बहुत तेजी से सोखते हैं ‌ लेकिन गर्मी को बाहर निकलने नहीं देते और सूर्य की गर्मी से देखने लगते हैं जिसके कारण रात में भी भयंकर घर भी और भाप फैलती रहती है ‌ आज से 40 50 वर्ष पहले तक दिन चाहे जितने गम होते थे लेकिन रहते ठंडी और सुहावनी होती थी और रात में उत्तरी भारत के मैदाने में भी तापमान 20 डिग्री सेल्सियस से अधिक नहीं होता था आज या 25 से 35 डिग्री सेल्सियस पर पहुंच गया और इन ईद पत्थर सीमेंट कंक्रीट के जंगलों में दूर-दूर तक पेड़ पौधे हरियाली पत्तियों का नाम और निशान नहीं होता है। 

3- ‌ भीषण गति से बढ़ रहे वाहन और औद्योगीकरण 

सबसे पहले औद्योगिक क्रांति आज से 500 वर्ष पहले शुरू हुई और आज हर गली नगर कस्बे में फैल चुकी हैं यह सीधे-सीधे गर्मी धुआ और प्रदूषण बढ़ने वाले सभ्यता है जिस पेड़ पौधे हरियाली और ऑक्सीजन का भयानक विनाश होता है इस तरह आज के 50 वर्ष पहले यदि एक नगर में 10 कर 100 मोटरसाइकिल होती थी तो आज वहां पर लाखों कर और करोड़ों मोटरसाइकिल हो गई बड़े-बड़े चार पहिया से 20 पहिया वाले वाहन भयंकर गर्मी प्रदूषण और जहरीली गैस उत्पादित करते हैं और यह लगातार बढ़ता चला जा रहा है अब तो हालत इतनी खराब है कि लाल बत्तियां भीड़ के कारण जाम लग जाने पर गर्मी और जहरीले हुए से दम घुटने लगता है यह आप सभी ने अनुभव किया होगा 

4- ‌ कागज और भाषण पर कार्यवाही विज्ञापनों में ही हरियाली और वृक्षारोपण का होना 

सरकार और सरकारी तंत्र द्वारा बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं जौनपुर जैसे नगर में हर वर्ष 50 से 60 लाख पौधे लगाने का सरकारी दवा होता है जिसमें 50 पौधे भी नहीं बचते हैं संपूर्ण जौनपुर नगर क्षेत्र में एक भी पेड़ पौधा या छायादार स्थान नहीं बचा है जहां पर लोग छाया में खड़े होकर आराम कर सके इस प्रकार कई हजार करोड़ वृक्ष लगाने का नाटक होता है और इसमें समय पैसे और धन की बर्बादी होती है वृक्ष हरियाली पेड़ पौधों का नाम और निशान नहीं दिखता है यह प्रचंड गर्मी ताप और उमस बढ़ने का एक प्रमुख कारण है 

5- ‌ सड़क रेल मार्ग नहरे और बड़े-बड़े संस्थान बनने में पेड़ पौधे हरियाली का भयानक विनाश 

प्राचीन काल से आज तक राष्ट्रीय राजमार्ग या छोटे बड़े मार्ग के दोनों और घने छायादार उपयोगी पेड़ पौधे वृक्ष जड़ी बूटियां पाई जाती थी लेकिन आज बड़े-बड़े राजमार्ग रेल मार्ग हवाई अड्डे संस्थान बनाए जाते हैं तो पहले काम हरियाली पेड़ पौधे और वनस्पतियों का पूर्ण विनाश कर दिया जाता है और पेड़ पौधे लगाए नहीं जाते हैं जो पेड़ पौधे हैं उनको बुरी तरह से काट दिया जाता है सामान्य रूप से एक सड़क या राजमार्ग बनने में 2 से 5 वर्ष लगते हैं इतने समय में दोनों किनारो पर बड़े आराम से पेड़ पौधे लगाकर सड़कों के साथ उन्हें छायादार बनाया जा सकता है लेकिन ऐसा कुछ नहीं किया जाता है चारों तरफ केवल पैसे और धन की लूट मची होने के कारण आज किसी भी राज मर गया रेलवे ट्रैक के किनारे छाया का नाम और निशान नहीं है और यह प्रचंड गर्मी से दहकती हुई भट्टी बन जाती है। यहां तक कि जब पुरानी सड़क को चौड़ा किया जाता है तो भी बुद्धि का प्रयोग नहीं किया जाता यदि सरकार और उसका तंत्र चाहे तो इस सड़क के किनारे बिना छेड़छाड़ किया उसको चौड़ा करके दूसरी सड़क बनाई जा सकती है पेड़ पौधों को काटने की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी लेकिन ऐसा कुछ नहीं होता है

6- ‌ मूर्खतापूर्ण सरकारी नीतियां 

जहां एक तरफ सरकार से जुड़े तंत्र और ठेकेदार कल कारखाने वाले भयंकर पेड़ पौधों का विनाश करते हैं वहीं सामान्य जनता पेड़ पौधे लगाकर अपने ही पेड़ पौधों को बिना सरकारी अनुमति और वन विभाग की अनुमति लिए उसे काट नहीं सकती जबकि कृषि पशुपालन मुर्गी पालन दिलीप पालन के साथ बागवानी भी खेती किसानी में आती है और अपने ही लगाए पेड़ पौधों का यदि लोगों को लाभ नहीं मिलेगा और उसे काटने के लिए वन विभाग और सरकारी तंत्र को घूस देना पड़ेगा तो कोई पेड़ पौधा क्यों लगाएगी यह अभी एक बहुत बड़ा कारण है की हरियाली पेड़ पौधे काम होते चले जा रहे हैं यदि सरकार सड़क और मार्ग के किनारे के स्थान ठाणे लोगों को देखकर पेड़ पौधे लगाकर उसका उपयोग करने को प्रेरित करें तो बड़ी मात्रा में हरियाली पेड़ पौधे वनस्पतियां जड़ी बूटियां पैदा होगी और भयंकर उमस गर्मी और पसीने से लोगों को छुटकारा मिलेगा 

7- ‌ युद्ध परमाणु जैव रासायनिक परीक्षण और मोबाइल टावर इत्यादिका लगातार बढ़ता 

आज धरती के हर भाग पर कहीं न कहीं युद्ध छिड़ा हुआ है अनेक जैव रासायनिक परमाणु नाभिकीय परीक्षण प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप में किया जा रहे हैं भयानक प्रक्षेपास्त्र का परीक्षण और मोबाइल टावरों के द्वारा उत्पन्न विकिरण वातावरण को बहुत अधिक गर्म हानिकारक प्रदूषण और जहरीला बना रहा है छोटे-छोटे बम और पटाखों से वातावरण जहर और धुएं तथा प्रदूषण से भर जाता है तो उपयुक्त चीजों का कितना भयानक असर धरती पर पड़ता होगा जिससे जहरीले प्रभाव प्रदूषण के साथ भयानक गर्मी और विकिरण भी फैलता चला जाता है 

8-‌ विमान जलयान ट्रेन लोह पथयान‌ रॉकेट रॉकेट और उपग्रह का लगातार बढ़ता दायरा

‌ विमान जलयान लोह पथ यान ‌ रॉकेट और उपग्रह तथा इसी तरह के ड्रोन और अन्य चीजों के द्वारा बहुत भयानक गर्मी प्रदूषण और विषैला पदार्थ वातावरण में फैल जाते हैं जो गर्मी को सूखने चले जाते हैं और ऊपर जाने नहीं देते इससे सारी धरती पर बहुत भयानक गर्मी बढ़ती चली जाती है 

10-हरित गृह प्रभाव और ओजोन परत का भयानक विस्तार 


धीरे-धीरे धरती ग्रीनहाउस इफेक्ट में बदल रही है जिससे धरती की रक्षा करने वाली ओजोन परत का छेद बढ़ता चला जा रहा है और यह लाखों वर्ग किलोमीटर में हो चुका है ‌ सीधे धरती पर प्रहार करती हैं और यही अल्ट्रावायलेट किरणें लोगों को जानलेवा सिद्ध हो जाती हैं जहां पहले इनकी तीव्रता एक से पांच तक होती थी आज वहां यह 5 से 12 तक बढ़ चुकी है इन सभी पर तत्काल रोक नहीं लगाया गया तो धरती की गर्मी रहने लायक नहीं बचेगी 

11-: 11- ‌ जल स्रोतों का भयानक विनाश प्राचीन जीवन पद्धति का तिरस्कार 

भीषण गर्मी उमस पसीना बढ़ाने का एक प्रमुख कारण परंपरागत जल स्रोतों का विनाश और जल का भयंकर विनाश भी है प्राचीन काल के स्वच्छ जल के स्रोत हुए तालाब बावड़ी पोखरा नदियां झरने धीरे-धीरे समाप्त हो गए और उनका स्थान हैंडपंप जेट पंप सबमर्सिबल इत्यादि ने ले लिया है उपर्युक्त जल स्रोत भयंकर गर्मी में धरती की गर्मी को संतुलित रखते हुए लोगों को भरपूर पानी देते थे यह जल स्रोत शीतकाल में गम और गर्मी में ठंडे रहते थे इनका स्वच्छ और जड़ी बूटियां से मिला अमृत जैसा पानी पेड़ पौधे जीव जंतु और मनुष्य को बलवान बनाकर उन्हें स्वस्थ रखता था जबकि आज के पानी को पीकर मनुष्य पेड़ पौधे वनस्पतियां सभी छोटी बनी और जहरीली होती चली जा रही है बड़े-बड़े पेड़ पौधे वनस्पतियों का लगभग विनाश हो चुका है प्राचीन काल के लोग प्रकृति और पर्यावरण से संतुलन और सहचार्य बनाकर रहते थे आज का मानव उसको नियंत्रित करके नकली जीवन व्यवस्था विकसित कर रहा है इसलिए गर्मी की मात्रा बढ़ती जा रही है पहले घने पेड़ पौधे और बाघ की छाया में लोग बिना पंखा कूलर और एसी के रह लेते थे आज कलर और ए सी से भी गर्मी नहीं जा रही है ‌ आज का मनुष्य रोज कलर में सुबह शाम पानी भर सकता है लेकिन एक पेड़ लगाकर उसे दो-तीन वर्ष तक पानी नहीं दे सकता है जो सैकड़ो वर्ष तक उसे ईंधन लकड़ी छाया और ऑक्सीजन दे सके पढ़ी लिखी वैज्ञानिक पीढ़ी पूरी तरह से अपने विनाश और मूर्खता की तरफ बढ़ रही है 
अन्य कारण-

इन सबके अलावा अनेक अन्य छोटे-मोटे कारक हैं जैसे की पर्वत और पठार क्षेत्र की वनस्पतियां गायब होना बर्फ और हिम्मत समाप्त होना अंटार्कटिका की बर्फ का पिघलना सूर्य के सतह पर हो रहे प्रचंड विस्फोट और सौर ज्वालाओं का निकलना मानव सभ्यता द्वारा भयंकर रूप से डिटर्जेंट पाउडर साबुन तेजाब और अन्य जहरीले वस्तुओं का प्रयोग जिससे भयानक गर्मी पैदा होती है घास पोस्ट छप्पर और कच्चे तथा खपरैल के मकान की जगह सीमेंट और कंक्रीट के दहकने वाले मकान का बनाना ‌ जनमानस में पेड़ पौधे लगाने की रुचि का काम होना संयुक्त परिवार का विघटन जिसके कारण जहां 50 लोग पहले रह लेते थे उससे अधिक मकान में अब केवल पांच लोगों का रहना धरती का सीमेंट कंक्रीट और एट पत्थर से ढक जाना जैसे पानी सूखने की क्षमता बहुत कम हो जाना रसायन और रासायनिक करो का प्रयोग जो भयंकर गर्मी उत्पन्न करती हैं ‌ इसके साथ-साथ अन्य बहुत से छोटे-मोटे कारक हैं जिसमें समुद्र नदियों और अन्य जल स्रोतों का प्रदूषण होना बड़ी मात्रा में कूड़ा कचरा प्लास्टिक का कूड़ा कचरा और इलेक्ट्रॉनिक कचरा जो प्रदूषण के साथ भयानक गर्मी भी पैदा करते हैं इन सब के कारण आज पर्वतीय भाग यूरोप अमेरिका भी गर्मी के कारण जल रहे हैं और भारत तो आग की दहकती हुई भट्टी बन गया है।

Thursday, 28 May 2026

अखिल भारतीय मुस्लिम महासमुंद महासंघ हर धार्मिक और भारतीय पर्वों पर वृक्ष रोपण करते हैं

अखिल भारतीय मुस्लिम महासमुंद महासंघ हर धार्मिक और भारतीय पर्वों पर वृक्ष रोपण करते हैं 
जहां आज ईद पर लाखों जानवरों की कुर्बानी की जा रही है।
वही मुस्लिम महासंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष फ़रहत अली खान और खिलाड़ियों ने स्पोर्ट्स स्टेडियम में वृक्ष रोपित कर हर इंसान को यह संदेश दिया की वृक्ष लगाना सदका ए जरिया है।
 अपील करते हुए कहा की दुनिया ,देश, प्रदेश और जिले को सरसब्ज़ बनाना है 
अपनों के लिए या जो इस दुनिया से लोग जा चुके हैं उनके नाम से एक वृक्ष जरुर लगाएंगे।
नबी की हदीस है कि अगर कयामत बरपा हो और सूरज सवा नेजे पर हो और मौका मिले तो पेड़ जरूर लगा दें।
यह ऐसा सदक़ा है  जिसका सवाब इस दुनिया के अलावा दूसरी दुनिया में भी बराबर मिलता रहेगा।
तो आज ही अहद करें प्राण ले की एक खाली पड़ी जगह पर वृक्ष जरुर लगाएंगे और उसका पालन पोषण अपने नौजादा बच्चे की तरह करेंगे।

Tuesday, 26 May 2026

*शांति की आर्किटेक्ट के तौर पर महिलाएं: इस्लामिक समाज में शामिल होने को फिर से पाना*

*शांति की आर्किटेक्ट के तौर पर महिलाएं: इस्लामिक समाज में शामिल होने को फिर से पाना*

भारत का सामाजिक ताना-बाना हमेशा से अलग-अलग तरह के लोगों, साथ रहने और मिलकर हिस्सा लेने से बना है। फिर भी, सांप्रदायिक चिंताओं और इमोशनल बिखराव के समय में, शांति और पॉलिसी बनाने से जुड़ी बातचीत में एक ज़रूरी आवाज़ अक्सर अनसुनी रह जाती है, यानी महिलाओं की आवाज़। अलग-अलग समुदायों में, महिलाएं परिवारों और मोहल्लों में शांति के लिए चुपचाप बातचीत करने वालों के तौर पर काम करती रहती हैं, लेकिन फैसले लेने की औपचारिक जगहों पर उनकी भूमिका बहुत सीमित है।
मुस्लिम समाजों में, इस अलग-थलग करने को अक्सर परंपरा के नाम पर सही ठहराया जाता है, भले ही इस्लामिक इतिहास खुद एक बहुत अलग कहानी कहता हो। इस्लाम ने महिलाओं को समाज को चुपचाप देखने वाली नहीं माना; इसने उन्हें ज्ञान, सलाह-मशविरा, व्यापार, भलाई और कम्युनिटी लीडरशिप में योगदान देने वाली के तौर पर माना। शुरुआती इस्लामिक समाज में ऐसी महिलाएं शामिल थीं जिनकी समझदारी ने राजनीतिक फैसलों, सामाजिक सुधारों और दिमागी ज़िंदगी पर असर डाला। उनके उदाहरण इस आज की सोच को चुनौती देते हैं कि सार्वजनिक मामलों में महिलाओं की हिस्सेदारी किसी तरह से धर्म से मेल नहीं खाती। आज के भारत में, जहाँ बातचीत और सामाजिक मेलजोल की ज़रूरत पहले से कहीं ज़्यादा हो गई है, मुस्लिम महिलाएँ शांति बनाने और पॉलिसी में सुधार के लिए ताकतवर एजेंट के तौर पर उभर सकती हैं। उनका शामिल होना सिर्फ़ रिप्रेजेंटेशन के बारे में नहीं है; यह समाज की नैतिक और डेमोक्रेटिक नींव को मज़बूत करने के बारे में है।
इस्लामिक समाज में महिलाओं की भागीदारी की नींव इस्लाम की शुरुआत से ही देखी जा सकती है। खदीजा बिन्त खुवेलिद न सिर्फ़ एक सफल एंटरप्रेन्योर थीं, बल्कि शुरुआती मुस्लिम समुदाय को सपोर्ट करने वाले सबसे मज़बूत पिलर में से एक भी थीं। उनकी समझदारी, फाइनेंशियल इंडिपेंडेंस और इमोशनल मज़बूती ने बहुत ज़्यादा अनिश्चितता और ज़ुल्म के समय में अहम भूमिका निभाई। उनकी ज़िंदगी इस बात की याद दिलाती है कि इस्लाम में महिलाओं को लीडरशिप और असर से कभी वंचित नहीं रखा गया।
इसी तरह, आयशा बिन्त अबू बक्र इस्लामी इतिहास की सबसे बड़ी इंटेलेक्चुअल हस्तियों में से एक के तौर पर उभरीं। स्कॉलर्स, कानून के जानकारों और साथियों ने कानून, शासन और आस्था के मामलों में उनसे गाइडेंस ली। उनकी स्कॉलरशिप से हज़ारों कहानियों और कानूनी मतलबों को बचाया गया। उनके योगदान से पता चलता है कि मुस्लिम महिलाओं ने ऐतिहासिक रूप से इंटेलेक्चुअल अथॉरिटी और पब्लिक रिस्पेक्ट की जगहों पर कब्ज़ा किया है। इतिहास फातिमा अल-फ़िहरिया को भी याद करता है, जिन्होंने दुनिया की सबसे पुरानी यूनिवर्सिटी में से एक की स्थापना की थी। उनका योगदान उस गहरी बौद्धिक और सभ्यतागत भूमिका की निशानी है जो मुस्लिम महिलाओं ने कभी एजुकेशनल और सोशल संस्थाओं को बनाने में निभाई थी।
फिर भी इस समृद्ध विरासत के बावजूद, आज भी कई मुस्लिम समाज महिलाओं की भागीदारी को सिर्फ़ सिंबॉलिक जगहों तक ही सीमित रखते हैं। भारत में भी, मुस्लिम महिलाएं अक्सर सामाजिक संकट के समय दिखाई देती हैं, लेकिन उन मंचों से गायब रहती हैं जहां फैसले लिए जाते हैं। चाहे लोकल कम्युनिटी कमेटियां हों, एजुकेशनल संस्थाएं हों, सोशल ऑर्गनाइज़ेशन हों, या शांति बनाने की कोशिशें हों, उनका रिप्रेजेंटेशन बहुत कम है।
यह बहिष्कार समाज को कमज़ोर करता है क्योंकि महिलाएं सामाजिक सच्चाइयों को अलग तरह से और अक्सर ज़्यादा करीब से महसूस करती हैं। वे बेरोज़गारी, सांप्रदायिक तनाव, एजुकेशनल पिछड़ेपन, ऑनलाइन कट्टरता और घरों में अस्थिरता के असर को इन मुद्दों पर पब्लिक बहस बनने से बहुत पहले ही देख लेती हैं। उनके अनुभव ऐसी समझ देते हैं जो सही पॉलिसी बनाने और झगड़े सुलझाने के लिए ज़रूरी हैं।
पूरे भारत में, अनगिनत मुस्लिम महिलाएं पहले से ही एजुकेटर, काउंसलर, सोशल वर्कर, लीगल एक्टिविस्ट और अलग-अलग धर्मों के बीच सद्भाव के लिए आवाज़ के तौर पर काम कर रही हैं। अविश्वास और पोलराइजेशन से प्रभावित कई मोहल्लों में, औरतें चुपचाप घरों में नफ़रत को आने से रोकती हैं। वे बच्चों को हमदर्दी सिखाती हैं, कल्चरल कोएग्ज़िस्टेंस बनाए रखती हैं, और अक्सर अशांति के समय इमोशनल सहारा बन जाती हैं। शांति बनाने में उनका योगदान शायद हमेशा टेलीविज़न डिबेट या पॉलिटिकल प्लेटफ़ॉर्म पर न दिखे, लेकिन यह बहुत ज़रूरी है।
ऐसे समय में जब सोशल मीडिया पर गलत जानकारी और बांटने वाली बातें युवा पीढ़ी पर असर डाल रही हैं, लीडरशिप स्पेस में महिलाओं का शामिल होना और भी ज़रूरी हो जाता है। मांएं, टीचर और कम्युनिटी मेंटर नैतिक सोच और सामाजिक नज़रिए को बनाने में अहम भूमिका निभाते हैं। इसलिए पॉलिसी पर चर्चा से महिलाओं को बाहर रखने का मतलब है समाज के सबसे मज़बूत रिसोर्स में से एक को बाहर रखना जो टकराव को रोकने और बातचीत को बढ़ावा देने के लिए है।
ज़रूरी बात यह है कि मुस्लिम समाज में महिलाओं को मज़बूत बनाने को परंपरा को छोड़ना या बाहरी मॉडल की नकल करना नहीं समझना चाहिए। बल्कि, यह सलाह-मशविरा, न्याय, सम्मान और सामूहिक ज़िम्मेदारी के इस्लाम के असली उसूलों की ओर वापसी को दिखाता है। कुरान बार-बार पुरुषों और महिलाओं दोनों के लिए नैतिक जवाबदेही और सोच-विचार पर ज़ोर देता है। महिलाओं को पब्लिक लाइफ में हिस्सा लेने से रोकना अक्सर धार्मिक शिक्षा से ज़्यादा पुरुष-प्रधान संस्कृति का नतीजा होता है।
भारत का डेमोक्रेटिक ढांचा महिलाओं को शामिल करने की बात को और मज़बूत करता है। एक अलग-अलग तरह का देश आगे नहीं बढ़ सकता। जब समाज की आधी आवाज़ें अनसुनी रह जाती हैं, तो वह प्रगति नहीं कर सकता। स्थायी शांति के लिए समाज के सभी वर्गों की भागीदारी ज़रूरी है, खासकर उन लोगों की जो ज़मीनी स्तर पर समुदायों को संवारते हैं। मुस्लिम महिलाओं में समुदायों, पीढ़ियों और संस्थाओं के बीच सेतु बनने की क्षमता है, लेकिन ऐसा तभी संभव है जब समाज उनके नेतृत्व को पहचानने और उस पर भरोसा करने को तैयार हो।
आज के भारत में, जहाँ सामाजिक सद्भाव के सामने चुनौतियाँ बढ़ती जा रही हैं, उनकी भागीदारी पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। महिलाओं को केवल प्रतीकात्मक भूमिकाओं तक सीमित नहीं रहना चाहिए, जबकि शिक्षा, कल्याण, शांति और सामुदायिक सुधार जैसे महत्वपूर्ण निर्णय उनके बिना ही लिए जाते हों। वे केवल बदलाव की लाभार्थी नहीं हैं; वे बदलाव का नेतृत्व करने में भी सक्षम हैं।
सच्ची शांति बहिष्कार या चुप्पी से नहीं बनती। यह तब उभरती है जब समाज संवाद, सहानुभूति और साझा ज़िम्मेदारी के लिए जगह बनाता है। मुस्लिम महिलाओं को नीति-निर्माण और शांति-स्थापना के ढाँचों में शामिल करके, भारत न केवल एक महत्वपूर्ण इस्लामी विरासत को पुनर्जीवित करेगा, बल्कि अपनी लोकतांत्रिक और बहुलवादी भावना को भी मज़बूत करेगा।

फ़रहत अली खान 
एम ए गोल्ड मेडलिस्ट

Monday, 25 May 2026

जौनपुर के लोग दुनिया भर के गरम नगरों को खोजते रहे और खुद जौनपुर में आज दोपहर 2:25 पर 45.8 डिग्री सेल्सियस

जौनपुर के लोग दुनिया भर के गरम नगरों को खोजते रहे और खुद जौनपुर में आज दोपहर 2:25 पर 45.8 डिग्री सेल्सियस और कहीं कहीं कहीं 46 डिग्री सेल्सियस का तापमान दर्ज किया गया जो दुनिया के सबसे गर्म स्थानों में से एक है और इससे हमारे केंद्र की भविष्यवाणी भी सही हुई जिसमें इस वर्ष जौनपुर का अधिकतम तापमान 46 डिग्री सेल्सियस जाने की बात कही गई थी नेट और अन्य गूगल में भी जौनपुर का तापमान 46 डिग्री सेल्सियस दिख रहा है और यह बिल्कुल सही है -डॉ दिलीप कुमार सिंह मौसम विज्ञानी ज्योतिष शिरोमणि एवं निदेशक अलका शिप्रा वैष्णवी ज्योतिष मौसम पूर्वानुमान एवं विज्ञान अनुसंधान केंद्र जौनपुर