Friday, 25 September 2026

भारत के गैर मुसलमानों का बहुत ही भयानक कड़वा लेकिन नंगा सच यह है कि गैर मुसलमानों की 70% औरतें और 60% पुरुष मुसलमानों के इसलिए गुलाम है क्योंकि इन सभी का मैथुनी वीडियो मुसलमानों के पास सुरक्षित है।

 भारत के गैर मुसलमानों का बहुत ही भयानक कड़वा लेकिन नंगा सच यह है कि गैर मुसलमानों की 70% औरतें और 60% पुरुष मुसलमानों के इसलिए गुलाम है क्योंकि इन सभी का मैथुनी वीडियो मुसलमानों के पास सुरक्षित है। 

विशेष कर सांसद विधायक मंत्री और उससे ऊपर के लोग तथा सरकारी अधिकारी और प्रभावशाली कर्मचारी लोगों के लिए यह बिल्कुल सत्य है आप भी इस पर थोड़ा गहराई से खोज कीजिए अपने आप नंग3सच सामने आ जाएगा तब आप खुद समझ जाएंगे कि आखिर यह सभी लोग मुसलमानों का विकास क्यों कर रहे हैं 

और क्यों मुसलमानों से डरते हैं और क्यों मुसलमान से डरते हैं क्योंकि अपना काला नंगा मैथुनी सच सबके सामने लाए जाने के डर से वह सब कुछ करते हैं जो उनके वीडियो में कैद सच मुसलमानों के हाथ में सुरक्षित है
। 

मैंने कई लोगों पर खुद जांच करके देखा और सच पाया है हर महत्वपूर्ण स्थान पर लव जिहादी मुस्लिम महिला या पुरुष बहुत चालाकी के साथ घुसे हुए हैं कोई नाच गाने वाला है कोई समस्या भी है कोई एनजीओ वाला है कोई उदारवादी है तो कोई सफाई कर्मी है कोई कबाड़ वाला तो कोई पंचर छाप है कोई सांसद विधायक मंत्री है और यह भी सच है कि यदि आप मुसलमान के घर आते जाते हैं या मुसलमान आपके घर आते जाते हैं तो आप निश्चित रूप से उनके द्वारा बलात्कार के शिकार हैं जो लाज शर्म के नाते आप छिपाते रहते हैं लेकिन अंत में भांडा फूट जाता है
[9/25, 9:28 PM] Dr  Dileep Kumar singh: इसलिए इतनी जल्दी हो सके इन विधर्मी शैतानों से छुटकारा प्राप्त कर लो डरो नहीं सच अपने घर वालों को बता दो वरना यह लोग मरते समय तक ब्लैकमेल करके तुम सबको बार-बार मरते रहेंगे इनका एक ही धर्म है हर जगह फैल कर कब्जा करना और लाभ कमाना बाकी सब उनके लिए धर्म के विरुद्ध हैं लेकिन मूर्ख गैर मुसलमान इनमें भी अच्छा और खराब मुसलमान खोजते हैं या तो ऐसी ही बात हुई कि सांप में आप यह सोचें की नाग करैत ब्लैक मांबा और रसेल वाइपर में कौन काम खतरनाक है क्योंकि सबके काटने से मृत्यु होना निश्चित है और उधर से उधर अच्छे से अच्छा मुसलमान है तब भी उसके लिए कुरान पैगंबर अल्लाह शरीयत हदीस ही सब कुछ है वेद और पुराण भजन कीर्तन मंदिर और गुरुद्वारा नहीं और एक बात ध्यान रखो पूरी दुनिया का मुसलमान किसी भी आफत और विपत्ति में महामारी में दुर्घटना और भयंकर विनाश में मुस्लिम देश में नहीं जाता वह रोग आकर दया के नाम पर सांप की तरह दिल में घुस जाता है और मौका पाते ही काट कर सबको मार कर अपना अधिकार कर लेता है कुछ उदाहरण देखकर भी आपको समझ में नहीं आता जैसे कश्मीर केरल पश्चिम बंगाल बांग्लादेश अफगानिस्तान पाकिस्तान और अन्य मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र को देख लीजिए यूरोप में गोशनिया हरजोविनिया और रूस में 15 मुस्लिम देशों को देख लीजिए सब कुछ विनाश कर डाला पर भी समझ में नहीं आए तो आपको हलाल होना ही है इसे बचाना है तो आपको चीन म्यांमार श्रीलंका इजरायल अमेरिका जैसा बनना होगा

मौसम की भविष्यवाणी और पूर्व की भविष्यवाणी का आकलन - डॉ दिलीप कुमार सिंह मौसम विज्ञानी ज्योतिष शिरोमणि एवं निदेशक अलका शिप्रा वैष्णवी ज्योतिष मौसम पूर्वानुमान और विज्ञान अनुसंधान केंद्र जौनपुर 7017713978 15आज जौनपुर और संपूर्ण पूर्वांचल में और समस्त आसपास के

मौसम की भविष्यवाणी और पूर्व की भविष्यवाणी का आकलन - डॉ दिलीप कुमार सिंह मौसम विज्ञानी ज्योतिष शिरोमणि एवं निदेशक अलका शिप्रा वैष्णवी ज्योतिष मौसम पूर्वानुमान और विज्ञान अनुसंधान केंद्र जौनपुर 7017713978 15
आज जौनपुर और संपूर्ण पूर्वांचल में और समस्त आसपास के जनपदों में अधिकतम तापमान 28 डिग्री सेल्सियस और न्यूनतम तापमान और स्वच्छ हवा वाला रहेगा दिन भर रात भर लगातार अनवरत तूफानी वर्षा 40 से 60 किलोमीटर की भयानक तेज  हवाओं आंधी तूफान झंझा झकोर गर्जन तड़ित वारिदमाला और प्रचंड चक्रवार्ती हवाओं के साथ होगी। 

कल अर्थात 26 सितंबर के बारे में हमारे केंद्र की भविष्यवाणी है कि आंधी तूफान 40 से 65 किलोमीटर वाले प्रचंड चक्रवर्ती वायु वेग के साथ भारी वर्षा दिन भर रात भर होती रहेगी 

 और तापमान गिरकर न्यूनतम 23 और अधिकतम 27 डिग्री सेल्सियस तक आ जाएगा और ठंड और भी बढ़ जाएगी झंझा झकॊर घन तड़ित वारिदमाला और प्रचंड चक्रवार्ती हवाओं का क्रम अनवरत जारी रहेगा 27 को यह बहुत कमजोर पड़ जाएगा और 28 अक्टूबर तक मौसम साफ हो जाएगा जौनपुर और आसपास इस 4 दिन के कालखंड में 100 से 160 मिली मीटर वर्षा होने की भविष्यवाणी है 

  यह भविष्यवाणी आप सबको बार-बार 15 दिन से भेजी जा चुकी है और सभी को फसलों की सिंचाई करने से मना किया गया था ताकि सबके हजारों लाखों रुपए बच सके जहां तक संपूर्ण भारत की बात है तो उड़ीसा आंध्र प्रदेश बिहार झारखंड बंगाल बांग्लादेश नेपाल भूटान सिक्किम असम अरुणाचल प्रदेश मिजोरम त्रिपुरा नागालैंड मेघालय में भारी से बहुत भारी मूसलाधार वर्षा 60 से 100 किलोमीटर बैग वाली प्रचंड तूफानी हवाओं के साथ होगा जो आज समाप्त हो जाएगा इसके बाद लखनऊ से मध्य प्रदेश महाराष्ट्र राजस्थान दिल्ली उत्तराखंड पश्चिमी उत्तर प्रदेश पंजाब हरियाणा के कुछ भागों में आजकल और परसों यह चक्रवर्ती वर्षा 25 से 50 किलोमीटर प्रति घंटे वाली तूफानी हवाओं के साथ होगी और वहां भी मौसम 29 सितंबर को साफ हो जाएगा अर्थात पूरे भारत से इस चक्रवर्ती वर्ष का 29 सितंबर तक समापन हो जाएगा और इसी के साथ संपूर्ण भारत का मौसम बदल जाएगा और आश्चर्यजनक रूप से 25 सितंबर से ठंड  25 सितंबर से ठंड कब प्रारंभ हो जाएगा जो अगले वर्ष 15 मार्च तक चलता रहेगा इस वर्ष की ठंड बहुत विकराल होगी और सभी सीमाओं और कीर्तिमान को तोड़ देगी  25 सितंबर 2026 ई द्वारा डॉक्टर दिलीप कुमार सिंह

विशेष जागरूकता अभियान की विशिष्ट समिति में डॉक्टर दिलीप कुमार सिंह का चयन

विशेष जागरूकता अभियान की विशिष्ट समिति में डॉक्टर दिलीप कुमार सिंह का चयन
डॉक्टर दिलीप कुमार सिंह डिप्टी चीफ डिफेंस काउंसिल जनपद न्यायालय जौनपुर का गांधी जयंती के अवसर पर उत्तर प्रदेश राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण लखनऊ के निर्देशन में विशेष जागरूकता अभियान की विशिष्ट समिति में चयन किया गया है। उनके साथ अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश सुरेंद्र प्रसाद यादव अरविंद कुमार चौबे लिपिक और शिव शंकर सिंह पैरा लीगल वालंटियर इस समिति में है यह समिति विद्यालय के किशोर बालक बालिकाओं को लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम 2012 के विषय पर चुने गए विद्यालयों में जाकर सरल और सही जानकारी देकर 500 एक्ट के प्रावधानों से उनको अवगत कराते हुए इस विषय में जागरूक करने का दायित्व सौंपा गया है इस अवसर पर जनपद के प्रबुद्ध लोगों परिजनों और प्रेस तथा मीडिया से जुड़े लोगों ने डॉक्टर दिलीप कुमार सिंह को बधाई और शुभकामनाएं दिया है  ज्ञात होगी डॉक्टर दिलीप कुमार सिंह 35 वर्षों से लगातार जिला विधिक सेवा प्राधिकरण में परामर्शदाता मध्यस्थता अधिकारी स्थाई लोक अदालत पीठ में सदस्य सहित विविध पदों पर कार्य कर चुके हैं

: धर्म दर्शन विज्ञान और पितृविसर्जन का महापर्व -डॉ दिलीप कुमार सिंह मौसम विज्ञान ज्योतिष शिरोमणिप्रस्तावना

: धर्म दर्शन विज्ञान और पितृविसर्जन का महापर्व -डॉ दिलीप कुमार सिंह मौसम विज्ञान ज्योतिष शिरोमणि
प्रस्तावना 
अपने पूर्वजों पितरों के प्रति समर्पित इस बार का 16 दिनों का पितृपक्ष बहुत ही अद्भुत और अनूठा है बहुत वर्षों में एक दो बार ऐसा संजोग बनता है जब पितृपक्ष का आरंभ वर्षा से हो जो बहुत कम होता है  इसका अतिरिक्त इस वर्ष पितृपक्ष के आरंभ से ही ठंडा सुखद शीतल सुहाना मौसम है जो बहुत लंबे समय के बाद ही दिखता है अन्यथा शरद पूर्णिमा से ही ठंड का आरंभ होता है भादो महीने के कोख से ज्यादा निकलता है इस बार यह पूरी तरह सही हो रहा है 

पितृ विसर्जन के दिन क्या करें 

पितृ विसर्जन के दिन भी सामान्य रूप से वही सब किया जाता है जो इसके पहले 15 दिन में किया जाता है लेकिन इसमें एक अंतर है की दर्पण और श्राद्ध दोपहर की बेला में किया जाता है पिंडदान और श्रद्धा सुबह शाम नहीं किया जाता है लेकिन आपातकाल में ऐसा कर भी सकते हैं पितृपक्ष के दिन प्रतिदिन की भांति सुबह उठ कर नित्य क्रिया से निवृत्त होकर शुद्ध और शांत चित्र से स्नान करें इसके बाद प्रतिदिन की तरफ दक्षिण मुंह करके अपने पितरों को पानी गंगाजल दूध मिलकर उसमें अक्षत काला तिल और सफेद हल्के पीले पुष्प तथा कुश के साथ जलांजलि दें तत्पश्चात पिंडदान करें भजन को पिंड बनाकर पूर्वजों को अर्पित करने की क्रिया ही पिंडदान कहलाती है 

पंचबली और अन्य क्रियाएं 

इसके पश्चात भोजन जो श्राद्ध के निमित्त बना है उसको पांच प्राणियों में खिला देते हैं जिसमें गाय कुत्ता कौवा चींटी मछली या देवताओं के नाम पर निकाला गया भोजन होता है और इसी पांच लोगों के नाम पर इसे पंच बली कहा जाता है यह क्रिया संपन्न हो जाने पर पितरों को खीर और पूड़ी का भोग लगाया जाता है जो उन्हें अत्यंत प्रिय होता है फिर विद्वान सदाचारी सुपात्र व्यक्ति को भोजन कर कर अपने समर्थ के अनुसार दान दक्षिणा दे सकते हैं यह काम सबके लिए अनिवार्य नहीं है इच्छा अनुसार किया जा सकता है लेकिन आप पात्र व्यक्ति को भोजन और दक्षिण का दान नहीं करना चाहिए।

इसके पश्चात पीपल की पूजा करके उसमें जल देना चाहिए और दक्षिण दिशा में दीपक जलाना चाहिए विशेष श्राद्ध पूजा करने वालों को 16 बत्तियों वाले दीपक को जलाना चाहिए जो सरसों के तेल का होना चाहिए और यह दीपक दक्षिण दिशा में रखना चाहिए लेकिन यह नियम सबके लिए नहीं है यदि कोई श्रद्धा पूर्वक रोज की तरह तर्पण करके केवल गाय कुत्ते कौवे चींटी मछली को ही भोजन दे देता है तो वही पर्याप्त है। हमारे देवी देवता वैदिक रीति रिवाज के अनुसार शुद्ध विचार और अंतःकरण से अपनी पूजा से ही संतुष्ट हो जाते हैं बहुत अधिक पाखंड बढ़ने से लाभ की जगह हानि होती है जैसे आजकल विवाह संस्कार सहित हर शुभ और मांगलिक तथा दुख के कार्य में में हो रहा है।

पितृ विसर्जन के दिन क्या-क्या वर्जित है 

कुछ और बातों पर ध्यान पितृ विसर्जन के दिन रखना आवश्यक है इस दिन कोई भी नया कार्य शुरू न करें कोई भी शुभ और मांगलिक कार्य इस दिन करना मना है इसके साथ-साथ कम से काम पूरे दिन गलत आचरण या दूसरों की बुराई करना या किसी के साथ छल कपट करना भी पूरी तरह वर्जित है  यह दिन पितरों को खुशी के साथ विदाई देने का है और विदाई के दिन कोई भी नया काम वैसे भी नहीं किया जाता है सारे सारांश का मूल्य यही है क्योंकि विदाई के बाद व्यक्ति बाहर भीतर से पूरी तरह दुखी होता है ऐसे में शुभ मांगलिक और खुशी का काम वैसे भी नहीं किया जाता है पितर भी हमारे लिए जीवित व्यक्ति के समान है इसीलिए कोई भी नया काम या खुशी का काम इस दिन वर्जित किया जाता है इन 15 दिनों में चोरी बेईमानी झूठ अधूरा कर छल कपट विश्वास घाट जैसी चीज पूरी तरह वर्जित है जो हर एक पर्व त्यौहार पर वर्जित रहता है क्योंकि उन पितरों का दिन है जिन्होंने हमारे भविष्य के लिए अपना वर्तमान बलिदान किया है 

इस वर्ष कब से कब तक है पितृपक्ष

इस वर्ष रविवार 27 सितंबर से पितृपक्ष प्रथम दिन का प्रारंभ हो रहा है जो 10 अक्टूबर शनिवार के दिन समाप्त होगा इस प्रकार यह कालखंड 15 दिन का है इसमें पूर्णिमा तिथि को जोड़ देने पर यह 16 दिन का हो जाता है और पूर्णिमा की तिथि 26 सितंबर रविवार के दिन है पूर्णिमा के श्रद्धा से लेकर अमावस्या के श्राद्ध तक हर तिथि का विधि विधान ऊपर लेख में विस्तार से दिया गया है इतना अवश्य है की धरती के स्वर्ग अखंड कश्मीर से समुद्र के स्वर्ग कन्याकुमारी वर्षा और हरियाली के स्वर्ग आसाम चेरापूंजी की पहाड़ियों से शुष्कता वीरानी त्याग वीरता के स्वर्ग राजस्थान तक  फैले हुए दिव्य भारतवर्ष की पवित्र भूमि पर हम लोग पेड़ पौधे वृक्ष कंकड़ पत्थर पहाड़ नदी समुद्र के साथ पितरों की भी पूजा करते हैं और आज यह अटल ध्रुव वैज्ञानिक सत्य है कि ब्रह्मांड के कण-कण  में जीवन है और जिन पितरों की हम पूजा करते हैं उन्हीं के कारण आज हम जीवित हैं इसलिए आप केवल स्नान करके अपने पूर्वजों को याद करते हुए केवल जल ही दे दे वही उनके लिए पर्याप्त होगा और सनातन धर्म अखंड भारत के लिए बलिदान होने वाले पितरों को भी मेरी तरह तर्पण करें  तो और भी अच्छा रहेगा ।

यह उस संधिकाल की गाथा है जब द्वापर युग अपनी अंतिम सांसें गिन रहा था और काल के गर्त से एक नया, अंधकारमय युग जन्म लेने को तड़प रहा था। महाभारत का भीषण महायुद्ध समाप्त हो चुका था। अधर्मियों के लहू से सिंचित भूमि पर धर्मराज युधिष्ठिर ने न्याय और सत्य के शासन की नींव रखी थी। परंतु, नियति का चक्र कभी थमता नहीं।

यह उस संधिकाल की गाथा है जब द्वापर युग अपनी अंतिम सांसें गिन रहा था और काल के गर्त से एक नया, अंधकारमय युग जन्म लेने को तड़प रहा था। महाभारत का भीषण महायुद्ध समाप्त हो चुका था। अधर्मियों के लहू से सिंचित भूमि पर धर्मराज युधिष्ठिर ने न्याय और सत्य के शासन की नींव रखी थी। परंतु, नियति का चक्र कभी थमता नहीं।

एक दिन द्वारका से आए महाविनाशकारी संदेश ने पांडवों की चेतना को सुन्न कर दिया। लीला पुरुषोत्तम भगवान श्री कृष्ण ने अपनी देह लीला समेटकर वैकुंठ प्रस्थान कर लिया था। श्री कृष्ण के जाते ही, इस धरती से सत्य, करुणा, तेज और पवित्रता का अंतिम महान स्तंभ भी ढह गया। पांडव जान गए कि जिस नारायण के साए में उन्होंने धर्म की रक्षा की थी, उनके जाते ही अब अधर्म का साया यानी 'कलयुग' इस पृथ्वी को निगलने आ रहा है।

संसार से विरक्त होकर, शोक में डूबे पांडवों ने राज-पाठ अपने एकमात्र जीवित वंशज, अर्जुन के पौत्र और अभिमन्यु के तेजस्वी पुत्र, राजा परीक्षित को सौंप दिया और स्वयं महाप्रस्थान के लिए हिमालय की ओर चल दिए।

राजा परीक्षित कोई साधारण शासक नहीं थे। वे गर्भाधान के समय ही अश्वत्थामा के ब्रह्मास्त्र से जल रहे थे, तब भगवान श्री कृष्ण ने सूक्ष्म रूप में उनके गर्भ में प्रवेश कर उनके प्राणों की रक्षा की थी। गर्भ में ही भगवान के दर्शन करने के कारण उनका नाम 'परीक्षित' पड़ा। उनका शासन न्याय, ऐश्वर्य और प्रजा-रक्षण का प्रतीक था। उनके राज्य में चोर-उचक्कों, पाखंडियों और पापियों के लिए कोई स्थान नहीं था। राजा भली-भांति जानते थे कि कलयुग सीमाओं पर घात लगाए बैठा है, इसलिए वे लगातार अपने साम्राज्य का भ्रमण करते थे ताकि प्रजा को किसी भी अधार्मिक शक्ति के प्रभाव से बचा सकें।

एक दिन, राजा परीक्षित अपने दिव्य रथ पर सवार होकर साम्राज्य की सीमाओं का निरीक्षण कर रहे थे। घूमते-घूमते वे सरस्वती नदी के पवित्र तट (कुरुक्षेत्र के समीप) पहुंचे। वहां उन्होंने एक ऐसा दृश्य देखा जिसने चक्रवर्ती सम्राट के हृदय को कंपा दिया।

सामने एक बैल खड़ा था, जो अत्यंत दुर्बल, कांतिहीन और भयभीत था। सबसे वीभत्स बात यह थी कि उस बैल की चार टांगों में से तीन टांगें कटी हुई थीं; वह केवल एक टांग पर बड़ी मुश्किल से अपना संतुलन बनाए खड़ा था और दर्द से कराह रहा था।

उसके ठीक पास एक गाय खड़ी थी। उसकी आंखों से अश्रुओं की अविरल धारा बह रही थी। वह इतनी कमजोर थी कि लग रहा था मानो अभी प्राण त्याग देगी। वह अपनी वात्सल्यमयी दृष्टि से उस बैल को देख रही थी और गहरे विलाप में डूबी हुई थी।

तभी राजा की नजर एक तीसरे पात्र पर पड़ी। वहां एक काले रंग का, भयानक और क्रूर दिखने वाला शूद्र खड़ा था। उसने राजाओं के वैभवशाली वस्त्र और मुकुट पहन रखा था, लेकिन उसके हाथ में एक भारी डंडा था। वह नीच पुरुष उस असहाय बैल और रोती हुई गाय को बेरहमी से पीट रहा था।

राजा परीक्षित का क्षत्रिय लहू खौल उठा। उन्होंने तुरंत अपनी म्यान से चमचमाती तलवार निकाली और मेघ के समान गरजते हुए उस क्रूर पुरुष की ओर बढ़े।

राजा ने दहाड़ते हुए कहा, "अरे पापी! मेरे रहते इस पवित्र भूमि पर असहाय जीवों पर ऐसा अत्याचार करने का दुस्साहस तूने कैसे किया? राजा का भेष धरकर इस धर्मभूमि को कलंकित करने वाले दुष्ट, तू वध के योग्य है! बता, तू कौन है?"

तलवार उठाने से पहले, राजा परीक्षित ने उस पीड़ित बैल और गाय की ओर देखा। अपनी दिव्य बुद्धि से वे समझ गए कि ये कोई साधारण पशु नहीं हैं।

राजा ने बैल से पूछा, "हे दिव्य जीव! तुम कौन हो? किसने तुम्हारी यह दुर्दशा की है? सम्राट शांतनु और अर्जुन के इस वंशज के जीवित रहते तुम्हारे नयनों में आंसू किसने दिए?"

बैल ने उत्तर दिया, "हे राजन! आप जैसे न्यायप्रिय राजा के लिए यह प्रश्न शोभा देता है। परंतु इस संसार में दुखों का कारण कौन है, यह कहना कठिन है। कुछ लोग इसे भाग्य कहते हैं, कुछ कर्म, और कुछ प्रकृति। मैं स्वयं 'धर्म' हूँ।"

राजा परीक्षित चकित रह गए। तब उन्हें ज्ञात हुआ कि सतयुग में धर्म के चार पैर थे—सत्य, तप, पवित्रता और दान। त्रेतायुग में मनुष्य की वासना के कारण 'तप' नष्ट हो गया। द्वापर युग में 'पवि‍त्रता' भी समाप्त हो गई। अब, द्वापर के अंत में 'दान' भी लुप्त हो चुका था। धर्म रूपी यह बैल अब केवल अपने आखिरी पैर—'सत्य'—पर टिका हुआ था, और यह दुष्ट उस आखिरी पैर को भी तोड़ना चाहता था।

फिर राजा ने गाय की ओर देखा, जिसने रोते हुए कहा, "हे चक्रवर्ती सम्राट! मैं साक्षात 'पृथ्वी देवी' हूँ। जब तक जगदीश्वर श्री कृष्ण के चरण मुझ पर पड़ते थे, मैं सर्वगुण संपन्न और सुखी थी। उनके जाने के बाद मैं अनाथ हो गई हूँ। अब यह दुष्ट मुझ पर हावी होना चाहता है और मुझे अपवित्र करना चाहता है।"

राजा परीक्षित ने जैसे ही यह सुना, उनका क्रोध चरम पर पहुंच गया। उन्होंने तलवार उठाई और उस राजा का स्वांग रचे शूद्र की गर्दन पर रख दी।

जैसे ही काल रूपी तलवार उसकी गर्दन से छुई, वह क्रूर पुरुष थर-थर कांपने लगा। उसने तुरंत अपना डंडा फेंक दिया, अपने राजा के वस्त्रों को त्याग दिया और साष्टांग दंडवत होकर राजा परीक्षित के चरणों में गिर गया। वह साक्षात 'कलयुग' था।

कलयुग ने रोते हुए गुहार लगाई, "हे शरणागतवत्सल सम्राट! त्राहि-त्राहि! मुझे क्षमा करें। आप पूरे ब्रह्मांड के स्वामी हैं। पांडवों के वंशज कभी शरणागत पर वार नहीं करते। मैं आपकी शरण में हूँ, मेरे प्राणों की रक्षा करें!"

राजा परीक्षित धर्मसंकट में पड़ गए। शास्त्र कहते हैं कि शरण में आए शत्रु का वध नहीं करना चाहिए। राजा ने तलवार थोड़ी पीछे खींची और कड़ककर कहा, "अरे कलयुग! तू अधर्म, झूठ, चोरी, पाखंड और विनाश का मूल कारण है। तूने मेरे राज्य में कदम रखने की जुर्रत कैसे की? तू तुरंत मेरी सीमाओं से बाहर निकल जा, अन्यथा मेरी यह तलवार तेरे टुकड़े-टुकड़े कर देगी।"

कलयुग ने हाथ जोड़कर अत्यंत चतुरता से संवाद शुरू किया:

कलयुग: "हे महाराज! आप सत्य कह रहे हैं। मैं बुराइयों का प्रतीक हूँ। परंतु कृपा कर ठंडे दिमाग से सोचें। इस ब्रह्मांड की रचना ब्रह्मा जी ने की है। उन्होंने ही कालचक्र बनाया है, जिसके अनुसार सतयुग, त्रेता और द्वापर के बाद मेरा आना अनिवार्य है। यह नियति का नियम है। यदि आप मुझे मार भी देंगे, तो भी काल का यह चक्र नहीं रुकेगा। मैं अपने समय पर आया हूँ। जब आपका राज्य चारों ओर फैला है, तो मैं इस संसार को छोड़कर कहाँ जाऊँ? ईश्वर के विधान के अनुसार मुझे भी जीने का हक है। कृपा कर मुझे इस पृथ्वी पर रहने के लिए कोई निश्चित स्थान दे दें।"

राजा परीक्षित: "ठीक है कलयुग, तू मेरी शरण में है इसलिए मैं तुझे स्थान देता हूँ। सुन! तू आज से इन चार स्थानों पर वास करेगा—

द्यूत (जुआ): जहाँ छल, कपट, सट्टा और चोरी होती है।
मद्यपान (मदिरा/शराब): जहाँ मनुष्य विवेक खो देता है और होश गंवा बैठता है।
स्त्री-संसर्ग (व्यभिचार/अनैतिक संबंध): जहाँ वासना, लज्जाहीनता और अपवित्रता होती है।
सून (हिंसा/पशु वध): जहाँ निर्दोष और मूक जीवों की हत्या कर उनका मांस खाया जाता है।"*

कलयुग मन ही मन मुस्कुराया, लेकिन वह अत्यंत महत्वाकांक्षी था। उसने देखा कि ये चारों स्थान तो समाज के सबसे निचले और घृणित हिस्से हैं। इतने कम स्थानों से वह पूरी पृथ्वी पर अपना साम्राज्य कैसे फैला पाता? उसने अत्यंत दीन बनकर राजा से एक और विनती की।

कलयुग: "हे महादानी सम्राट! आपके द्वारा दिए गए ये चारों स्थान अत्यंत संकुचित और पापी लोगों के हैं। मेरा स्वरूप बहुत बड़ा है। इतने छोटे स्थानों में मेरा निर्वाह कैसे होगा? कृपा करके मुझे कोई एक ऐसा श्रेष्ठ और शक्तिशाली स्थान भी प्रदान करें, जो अत्यंत प्रभावशाली हो, जिसे समाज का हर वर्ग स्वीकार करे और जहाँ बैठकर मैं पूरे संसार के मानस पर शासन कर सकूं।"

राजा परीक्षित उस समय दानवीरता के अति-विश्वास में थे। उन्होंने क्षण भर के लिए सोचा और कलयुग को पांचवां स्थान दे दिया—'सुवर्ण' (सोना, अर्थात अनैतिक और गलत तरीके से कमाया गया धन)।

राजा परीक्षित: "तथास्तु! कलयुग, तू सुवर्ण (सोने) में भी वास करेगा।"

यह सुनते ही कलयुग की आँखें चमक उठीं। उसने देखा कि राजा परीक्षित उसे केवल दोषों की खान समझकर घृणा कर रहे हैं। कलयुग ने तब मुस्कुराते हुए मनुष्य जाति के कल्याण का सबसे बड़ा रहस्य प्रकट किया, जो कलयुग का एकमात्र लेकिन सबसे बड़ा फायदा था।

कलयुग का संवाद:

"हे राजन! आप मुझे केवल बुरा समझ रहे हैं, लेकिन मुझमें एक ऐसा महान गुण (फायदा) भी है, जो सतयुग, त्रेता और द्वापर, तीनों युगों में से किसी के पास नहीं है! मेरे इसी एक गुण के कारण भविष्य में ऋषि-मुनि और देवता भी कलयुग में मनुष्य रूप में जन्म लेने तरसेंगे।

हे राजन! सतयुग में मनुष्यों को भगवान को पाने, मोक्ष प्राप्त करने या अपनी आत्मा को शुद्ध करने के लिए हजारों वर्ष तक कठोर तपस्या, व्रत और कठिन समाधि लगानी पड़ती थी। त्रेतायुग में बड़े-बड़े कठिन यज्ञ, अनुष्ठान और तप करने के बाद भगवान प्रसन्न होते थे। द्वापरयुग में मंदिरों में अत्यधिक विधि-विधान से की जाने वाली पूजा और असीम सेवा-अर्चना से प्रभु मिलते थे।

परंतु, मेरे युग (कलयुग) में मनुष्यों के पास न तो लंबी आयु होगी, न उतनी शारीरिक शक्ति होगी और न ही वैसा शुद्ध वातावरण होगा। इसलिए भगवान ने मेरे लिए नियम बहुत सरल कर दिए हैं—कलयुग में भगवान को पाने के लिए न कठिन तप की आवश्यकता है, न महंगे यज्ञों की और न ही जटिल विधियों की। मेरे युग में केवल 'हरि नाम संकीर्तन' (भगवान के नाम का सच्चे मन से स्मरण और कीर्तन) करने मात्र से ही मनुष्य को वही मोक्ष और परम पद मिल जाएगा, जो सतयुग में दस हजार वर्ष की तपस्या से मिलता था! (कलयुग केवल नाम अधारा। सुमिरि सुमिरि नर उतरहिं पारा॥)

इसके अलावा, मुझमें एक और बड़ा फायदा यह है कि सतयुग या त्रेता में यदि मनुष्य मन में भी कोई पाप का विचार लाता था, तो उसे उसका पाप-फल भोगना पड़ता था। परंतु कलयुग में मन में सोचे गए पाप का कोई दंड नहीं मिलेगा, दंड तभी मिलेगा जब मनुष्य उसे असल में करेगा। वहीं दूसरी ओर, यदि कोई मनुष्य मन में भी किसी के कल्याण या भगवान के नाम का विचार लाएगा, तो उसे उसका पूरा पुण्य-फल तुरंत मिल जाएगा!"

यह सुनकर राजा परीक्षित चकित रह गए और उन्होंने समझा कि प्रकृति का संतुलन कितना अद्भुत है। कलयुग राजा को प्रणाम कर वहाँ से अंतर्ध्यान हो गया।

कलयुग गायब तो हो गया, लेकिन वह बहुत प्रतिशोधी था। वह जानता था कि जब तक राजा परीक्षित जीवित हैं, तब तक कलयुग इन पांच स्थानों से बाहर नहीं निकल पाएगा। उसने राजा परीक्षित को ही अपना पहला शिकार बनाने की कुटिल योजना बुनी।

एक दिन, राजा परीक्षित वन में शिकार खेलने गए। दोपहर के समय सूर्य की किरणें अत्यंत तेज थीं और राजा बहुत थक चुके थे। उन्हें तीव्र प्यास लगी थी। वन में भटकते हुए वे शमीक ऋषि के पवित्र आश्रम में पहुंचे। शमीक ऋषि उस समय भगवान के ध्यान में लीन थे। वे गहरे ध्यान (समाधि) में थे और उन्होंने मौन व्रत धारण कर रखा था। राजा परीक्षित ने आश्रम में प्रवेश किया और अत्यंत विनम्रता से जल माँगा। परंतु समाधिस्थ होने के कारण ऋषि को राजा की आवाज सुनाई नहीं दी और वे शांत बैठे रहे।

प्यास से व्याकुल राजा को लगा कि ऋषि जानबूझकर उनका अपमान कर रहे हैं। वास्तव में, राजा परीक्षित कभी ऐसा सोच ही नहीं सकते थे। लेकिन नियति का खेल देखिए—उस दिन राजा परीक्षित ने अपने सिर पर एक विशेष सोने का मुकुट पहन रखा था। यह मुकुट महापापी राजा जरासंध का था, जिसे भीमसेन ने युद्ध में जीता था। चूंकि वह मुकुट अधर्म के धन से बना था, इसलिए कलयुग उस सोने के मुकुट के भीतर जाकर बैठ गया था।

मुकुट में बैठे कलयुग ने राजा की बुद्धि को पूरी तरह भ्रष्ट कर दिया। कलयुग के प्रभाव में आकर राजा का विवेक शून्य हो गया। उन्होंने क्रोध और मतिभ्रम के वश में होकर, पास ही पड़ा एक मृत सर्प अपने धनुष की नोक से उठाया और ध्यानमग्न शमीक ऋषि के गले में डाल दिया। इसके बाद वे हस्तिनापुर लौट आए।

जब शमीक ऋषि के परम प्रतापी और क्रोधी पुत्र श्रृंगी ऋषि नदी से स्नान करके आश्रम लौटे, तो उन्होंने अपने परम पूज्य पिता के गले में मरा हुआ सांप देखा। ध्यान लगाने पर उन्हें ज्ञात हुआ कि यह कृत्य राजा परीक्षित का है। क्रोध से कांपते हुए श्रृंगी ऋषि ने कौशिकी नदी का पवित्र जल अपने हाथ में लिया और राजा परीक्षित को घोर शाप दे दिया: "जिस राजा ने मद में अंधा होकर मेरे मौन और समाधिस्थ पिता का ऐसा घोर अपमान किया है, आज से ठीक सातवें दिन तक्षक नाग उसे डसेगा और उसकी मृत्यु हो जाएगी।"

इधर, हस्तिनापुर के महल में कदम रखते ही जब राजा परीक्षित ने अपने सिर से वह सोने का मुकुट उतारा, तो कलयुग का प्रभाव उनके मस्तिष्क से हट गया। मुकुट उतरते ही उनका विवेक वापस आ गया। उन्हें तुरंत अहसास हुआ कि उन्होंने वन में कितना बड़ा पाप किया है। वे पश्चाताप की अग्नि में जलने लगे।

जब उन्हें ऋषि पुत्र के शाप का समाचार मिला, तो उन्होंने इसे अपनी भूल का न्यायसंगत दंड माना। राजा परीक्षित ने अपने जीवन के अंतिम सात दिनों को सार्थक करने के लिए तुरंत राज-पाठ अपने पुत्र जनमेजय को सौंप दिया। वे गंगा के तट पर आसन बिछाकर बैठ गए। वहाँ महान शुकदेव जी महाराज का आगमन हुआ, जिन्होंने राजा परीक्षित को अंतिम सात दिनों में श्रीमद्भागवत पुराण की परम पावन कथा सुनाई, जिससे राजा को मृत्यु का भय छूट गया और उन्हें मोक्ष की प्राप्ति हुई। ठीक सातवें दिन, तक्षक नाग ने आकर राजा परीक्षित को डस लिया और उनके स्थूल शरीर के प्राण पखेरू उड़ गए।

जैसे ही पृथ्वी के रक्षक और न्यायप्रिय चक्रवर्ती सम्राट राजा परीक्षित का अंत हुआ, वैसे ही कलयुग के मार्ग का आखिरी और सबसे बड़ा कांटा हट गया। कलयुग ने पूरी स्वतंत्रता के साथ पूरी पृथ्वी को अपने आगोश में ले लिया। मनुष्यों के दिलों से संतोष, सत्य और त्याग धीरे-धीरे लुप्त होने लगा और इस तरह इस धरती पर 'कलयुग' का पूर्ण और आधिकारिक साम्राज्य स्थापित हो गया।

पुराणों में वर्णित 'कलयुग के प्रत्यक्ष लक्षण'

कलयुग के अंतर्ध्यान होने के बाद, श्रीमद्भागवत पुराण के बारहवें स्कंध में शुकदेव जी ने राजा परीक्षित को कलयुग के उन भयावह लक्षणों (भविष्यवाणियों) के बारे में बताया, जो आज के समाज में सच होती दिख रही हैं:

धन ही श्रेष्ठता का आधार: कलयुग में मनुष्य के गुण, सदाचार या कुल की कोई महत्ता नहीं रह जाएगी। जिस व्यक्ति के पास जितना अधिक धन होगा, समाज में उसे उतना ही कुलीन, सदाचारी और बुद्धिमान माना जाएगा। न्याय और कानून भी केवल उसी के पक्ष में काम करेंगे जिसके पास पैसा और शक्ति होगी।

रिश्तों और विवाह का पतन: विवाह पवित्र धार्मिक बंधन नहीं, बल्कि स्त्री-पुरुष की केवल क्षणिक शारीरिक रुचि और आपसी समझौते का साधन रह जाएगा। पारिवारिक मूल्य पूरी तरह गिर जाएंगे; संतान अपने माता-पिता का सम्मान करना छोड़ देगी, बूढ़े माता-पिता को बोझ समझा जाएगा और लोग केवल अपने स्वार्थ तक सीमित रहेंगे।

पाखंड ही धर्म बनेगा: कलयुग में जो व्यक्ति जितना बड़ा ढोंगी और कपटी होगा, उसे उतना ही बड़ा संत और व्यवहार-कुशल माना जाएगा। लोग केवल बाहरी वेशभूषा, तिलक या जटा बढ़ाकर खुद को धार्मिक घोषित करेंगे, जबकि उनके भीतर वासना और लालच भरा होगा।

प्रकृति का विकराल रूप और अकाल: मौसम अपना संतुलन खो देगा। कभी भयंकर सूखा पड़ेगा तो कभी बाढ़ आएगी। नदियां सूखने लगेंगी, धरती बंजर हो जाएगी और पेड़ फल देना बंद कर देंगे। जनता भुखमरी, भारी टैक्स (करों) और महामारियों से इतनी त्रस्त हो जाएगी कि लोग आत्महत्या करने को मजबूर होंगे।

शारीरिक और मानसिक पतन: मनुष्यों की आयु, स्मरण शक्ति और शारीरिक बल दिन-प्रतिदिन घटते जाएंगे। कलयुग के अंत तक आते-आते मनुष्य की अधिकतम आयु केवल 20 से 30 वर्ष रह जाएगी और उनका कद घटकर कुछ फीट का हो जाएगा।

स्त्रियों और पुरुषों का स्वभाव: स्त्रियाँ अत्यंत क्रोधी, लोभी और विलासी स्वभाव की हो जाएंगी। लोग बिना स्नान किए भोजन करेंगे, मेहमानों और पितरों का सत्कार बंद हो जाएगा। एक हाथ दूसरे हाथ की जेब से चोरी करेगा और भाई ही भाई के खून का प्यासा बन जाएगा...❤️🌻

सोच लीजिए सारी धरती के एक छात्र सम्राट परीक्षित इतने शक्तिशाली थे जो कलयुग का भी गला काट सकते थे यदि आज भारत के प्रधानमंत्री के सामने कलयुग खड़ा हो जाए तो उनका क्या हाल होगा एक बात और कलयुग सोने में रहता है और कलयुग के लोगों का सबसे बड़ा आकर्षण अर्थात लालच सोने में ही होता है इसलिए जितने लोग सोना पहनते हैं सबके अंदर कलयुग का वास हो जाता है इसलिए मैंने सोना पहनना बहुत लंबे समय से त्याग दिया है और केवल वही कलयुग के प्रभाव से बचकर सच्ची भक्ति ईश्वर का दर्शन देवी देवताओं को देख सकते हैं जो किसी भी रूप में सोने का प्रयोग ना करें लेकिन पापी कलयुग के प्रभाव से कोई बिना सोने के रहने की कल्पना ही नहीं कर सकता विशेष कर स्त्रियां क्योंकि धरती पर सत्य धर्म न्याय सदाचार उनके ही कारण रहता है इसलिए अब ऐसा होना संभव नहीं है

Thursday, 24 September 2026

आनंद चतुर्दशी और भगवान श्री हरि विष्णु - डॉ दिलीप कुमार सिंह मौसम विज्ञानी ज्योतिष शिरोमणि

आनंद चतुर्दशी और भगवान श्री हरि विष्णु - डॉ दिलीप कुमार सिंह मौसम विज्ञानी ज्योतिष शिरोमणि
अनंत चतुर्दशी भगवान श्री हरि विष्णु का व्रत है जो सनातन धर्म के प्रमुख व्रत में गिना जाता है इस दिन क्षीरसागर में सोए हुए श्री हरि विष्णु भगवान अर्थात अनंत की पूजा की जाती है जिनका चरण देवी मां लक्ष्मी दबते रहते हैं और जो शेषनाग के ऊपर आराम से लेते रहते हैं इसका वैज्ञानिक अर्थ है कि संपूर्ण गुरुत्वाकर्षण के केंद्र भाग में भगवान श्री हरि विष्णु अपनी धनात्मक ऊर्जा और देवी लक्ष्मी की रचनात्मक ऊर्जा अर्थात प्रोटॉन इलेक्ट्रॉन के रूप में रहते हैं और न्यूट्रॉन के रूप में संपूर्ण गुरुत्वाकर्षण उनमें समय रहता है  और क्षीरसागर एक ऐसा अनंत समुद्र है जिसमें ऊर्जा द्रव्यमान विद्युत चुंबकत्व और गुरुत्वाकर्षण एकाकार  हो जाता है। 


यह महान व्रत उदया तिथि के अनुसार भादो महीने के शुक्ल पक्ष 14 के दिन मनाया जाता है इस बार यह शुक्रवार को पड़ रहा है क्योंकि 24 सितंबर को चतुर्दशी की तिथि रात में 11:18 पर लग रही है और 25 सितंबर को 11:06 पर समाप्त हो रही इस प्रकार पूजा पाठ का शुभ मुहूर्त सुबह 6:11 से 11:05 तक रहेगा


अनंत चतुर्दशी को 14 गांठ वाला धागा पूजा पाठ के समापन पर पुरुष अपने दाहिने हाथ और महिलाएं बाएं हाथ में बांधती हैं जो धरती आकाश पाताल के 14 लोगों का प्रतीक है जिसमें तल अतल वितल सुतल तलातल रसातल और पाताल एवं जन तप मह  भुव बह्म शिवलोक और सत्यलोक आते हैं

इस व्रत के समापन के पश्चात विष्णु पुराण और नारद पुराण में वर्णित अनंत भगवान की कथा को पढ़ना चाहिए जिसमें अनंत पांच लाख खराब प्रकाश वर्ष में फैले हुए अनंत ब्रह्मांड के गुरुत्वाकर्षण का भगवान श्री हरि विष्णु प्रोटॉन और माता लक्ष्मी इलेक्ट्रॉन एवं बैकुंठ लोग न्यूट्रॉन का प्रतीक है और समग्र द्रव्य और ऊर्जा एवं श्वेत पदार्थ तथा श्याम पदार्थ पदार्थ और प्रति पदार्थ ऊर्जा और प्रतीक ऊर्जा चीयर सागर में समाहित रहती है जिसके एक सिरे पर कृष्ण विवाह और दूसरे सिरे पर श्वेत विवर होता है और अनंत चतुर्दशी के दिन ही अंतिम रूप से गणेश पूजा के बाद भगवान गणेश की प्रतिमाओं का विसर्जन भी किया जाता है

Wednesday, 23 September 2026

आज का भारत जो इंडिया बन चुका है ऐसे नहीं बना है इसमें ईसाई और मुस्लिम धर्म वालों ने दो तरफ आक्रमण किया उन्होंने फिल्म साहित्य धारावाहिक पत्र पत्रिकाएं मीडिया बीते हुए सनातनी बुद्धिजीवी लोगों को वामपंथी और कांग्रेस को और ऐसे नेताओं को

आज का भारत जो इंडिया बन चुका है ऐसे नहीं बना है इसमें ईसाई और मुस्लिम धर्म वालों ने दो तरफ आक्रमण किया उन्होंने फिल्म साहित्य धारावाहिक पत्र पत्रिकाएं मीडिया बीते हुए सनातनी बुद्धिजीवी लोगों को वामपंथी और कांग्रेस को और ऐसे नेताओं को जो केवल कहने को हिंदू थे लेकिन मन वचन कर्म से काले अंग्रेज या फिर मुस्लिम थे या वर्ण शंकर दोगले और मुस्लिम ईसाई वीर्य की औलाद थे इन सबको माध्यम बनाया और अपवाद स्वरूप छोड़कर उपर्युक्त चीजों के द्वारा भारत के सनातनी हिंदुओं को निम्नलिखित चीजेः सिखाया सनातनी धर्म अंधविश्वास है कल्पना है वैज्ञानिक नहीं है और  धर्मगंथों में लिखी हुई बातें स्त्रियों और निम्न वर्ग के विरुद्ध हैं इसका परिणाम हुआ कि लोग गृत्समद सूची वाल्मीकि शबरी मातंग दादू रविदास कागभूसुंडी गरुड़ जैसे लोगों को भूल गए। 

1000 वर्ष तक लगातार इन लोगों ने फिल्म सिनेमा रेडियो धारावाहिक साहित्य नौटंकी नाच गाने के द्वारा कुरान बाइबल का प्रचार करते हुए सनातनी वेद पुराण रामायण महाभारत उपनिषद जैन बौद्ध और सिख धर्म की सर्वश्रेष्ठ बातों को सबसे खराब बताते हुए विशेष कर फिल्म साहित्य रेडियो और अब इंटरनेट तथा मोबाइल के माध्यम से सिखाया की सनातन धर्म में जाति-पाठ उच्च में छुआछूत का भेद है।


 हर जातियों के और धर्म के कुछ लोगों को खरीद लिया और उनकी सहायता से कहीं चांद मियां को साइ बाबा बना दिया कहीं ईसा मसीह को कृष्ण और राम के रूप में मंदिर में बैठ कर दिखाया जाने लगा कि हम लोगों ने पहाड़ के टुकड़े करना चांद को फाड़ देना सूर्य का कीचड़ में डूबना पृथ्वी का चिट्ठी होना और कालीन पर बिना ऑक्सीजन के आसमान में उड़ना जैसी चीज स्वीकार कर लिया और ग्रहण नक्षत्र ग्रहण सूर्य चांद तारे अनंत ब्रह्मांड ब्लैक होल व्हाइट होल दिव्यास्त्र आकाशवाणी महाकाली महाशिव जैसी वैज्ञानिक बातों को भूल गए या उस पर प्रश्न करने लगे जानू को बहुत पहले ही हमारे ऋषि मुनियों वैज्ञानिकों ब्रह्म ऋषियों ने खोज लिया था भास्कर आर्यभट्ट और कारण श्रीधर पंडित ने हजारों हजार साल पहले गुरुत्वाकर्षण शून्य और दशमलव अंग गणित बीजगणित ज्योतिष विज्ञान धाम दर्शन की हर चीज खोज लिया था जिसकी नकल करके अब के बराबर खानाबदोश नर पिशाच और यूरोप के चरवाहे और नाविक भी बड़े-बड़े वैज्ञानिक बन गए। 


इनलोगों के द्वारा सिखाया की माता-पिता की सेवा मत करो चोरी बेईमानी करो कामवासना के नए-नए तरीके अपने देवी देवताओं की हंसी उड़ाना धर्म के विरुद्ध चलना सीखते हुए बताएं कि कैसे हम नर पिशाच होकर देवदूत बनने में संतुष्टीकरण अनुभव करते हैं अपनी सभ्यता संस्कृति भाषा भूलकर हम सभी लोग शिक्षा और पहनाओगे ऐसा रहन-सहन और वेशभूषा भाषा में अंग्रेज बन गए और कौन-कौन में पूरी तरह मुस्लिम बन गए। 


हम घर के बने हुए अनंत प्रकार के भजन पकवान स्वास्थ्य वर्धक चीजे छोड़कर मुस्लिम और क्रिश्चियन धर्म के द्वारा बनाया गया कूडा कचरा बिस्किट मार रोटी मैगी पिज्जा चाऊमीन बर्गर सदी गली ब्रेड और नकली बटर रिफाइंड तेल जैसी चीज खाकर शारीरिक मानसिक और आर्थिक रूप से रोगी और कंगाल बन गए और ऐसे रोगों से गिर गए जिनके बारे में कभी सुना नहीं जाता था सुबह ब्रह्मचर्य की जरूरत 8 से 10:00 बजे उठने लगे रात में देर तक जागने लगे और इस प्रकार के बाद भी ईरान से इंडोनेशिया और कजाकिस्तान तिब्बत से श्रीलंका का 7/8 भारत हो बैठे केवल एक बटे आठ भारत बचा हुआ है  - डॉ दिलीप कुमार सिंह मौसम विज्ञानी ज्योतिष शिरोमणि एवं निदेशक अलका शिप्रा वैष्णवी ज्योतिष मौसम पूर्वानुमान और विज्ञान अनुसंधान केंद्र जौनपुर 7017713978 15