Monday, 5 October 2026

तांत्रिक और अंधविश्वास के नाम पर 70 लाख की ठगी, 4 गिरफ्तार

तांत्रिक और अंधविश्वास के नाम पर 70 लाख की ठगी, 4 गिरफ्तार
धामपुर। बीमारी ठीक करने, झाड़-फूंक और पूजा-पाठ के नाम पर एक परिवार से करीब 70 लाख रुपये की ठगी करने के मामले का धामपुर पुलिस ने खुलासा किया है। पुलिस ने मामले में चार आरोपियों को गिरफ्तार कर उनके कब्जे से स्विफ्ट डिजायर कार और 1.04 लाख रुपये नकद बरामद किए हैं।

पुलिस के अनुसार, नंगला नैंसी निवासी संदीप कुमार ने 1 अक्टूबर को शिकायत दर्ज कराई थी। आरोप है कि परिचित मोनू चौधरी ने उन्हें कथित ‘पहाड़ी पंडित’ संजय शर्मा से मिलवाया। इसके बाद बेटे की बीमारी और जान का खतरा बताकर परिवार को झाड़-फूंक व पूजा के नाम पर डराया गया।

आरोप है कि मकान बिकवाकर 38 लाख रुपये, पत्नी के गहने बेचवाकर 14 लाख रुपये, नौकरी पर 13 लाख रुपये का लोन और पूजा सामग्री के नाम पर 5 लाख रुपये लिए गए। आरोपियों ने परिवार को धमकाते हुए ₹10 के स्टाम्प पर यह भी लिखवाया कि किसी को बताने पर ‘काली माता के प्रकोप’ से मृत्यु हो जाएगी।

पुलिस ने संजय शर्मा उर्फ पहाड़ी पंडित, मोनू चौधरी उर्फ देशपाल, यश चौधरी और कोमल सिंह को गिरफ्तार किया है।

मामले में मु.अ.सं. 390/2026 के तहत BNS की संबंधित धाराओं में कार्रवाई की गई है। पुलिस ने आरोपियों को न्यायालय के समक्ष पेश कर जेल भेज दिया।

बरामदगी:
🚗 स्विफ्ट डिजायर कार — UP 20 CJ 9771
💰 नकदी — ₹1,04,000

कार्रवाई में स्वाट टीम प्रभारी निरीक्षक सचिन मलिक, धामपुर थाना प्रभारी रवेन्द्र प्रताप सिंह, सर्विलांस प्रभारी हिमांशु गोस्वामी समेत पुलिस टीम की महत्वपूर्ण भूमिका रही।

TN NEWS | सच के साथ

Sunday, 4 October 2026

भारत देश को बर्बाद कर उसे इंडिया बनाने का गहरा कुचक्र - डॉ दिलीप कुमार सिंह मौसम विज्ञानी ज्योतिष शिरोमणि

भारत देश को बर्बाद कर उसे इंडिया बनाने का गहरा कुचक्र - डॉ दिलीप कुमार सिंह मौसम विज्ञानी ज्योतिष शिरोमणि

क्या हो रहा है भारत देश में क्या सचमुच सारी व्यवस्था और सरकार सो रही है और जनता नरक भोग रही है क्या जनता भी इसमें बराबर की दोषी नहीं है सस्ती मदिरा अश्लील फ़िल्में, मोबाइल फोन में आती बिना मांगे अनचाही नग्न अर्धनग्न तसवीरें, नंगे रील्स, सस्ता नशा, देश में फैले हुए दवा माफिया, जातिवादी हिंसा, हर वस्तु में हो रही मिलावट, नकली घी, तेल, दाल, चावल, आटा, सब्जियां, लगातार प्राकृतिक संसाधनों का निजीकरण पर्वत पहाड़ जल, वन, पशुओं की हत्या, बेरोजगारी, भूख.. क्या यही हमारा भारत है?

तो फिर नर्क किसे कहते हैं? गुगल पर मुफ्त मे पोर्न साइट, फिर ओयो होटेल, 14 फरवरी पूर्ब नियोजित संभोग दिवस, यही तो नर्क है ! देश के युवा सिर्फ सुरा सुन्दरी में डूबा गया है !
फिर लिव इन रिलेशन ( विवाह पूर्व संभोग ) आया है, लोगों के 25- 25 वर्ष के रिश्ते टूट गए, कोई सुनवाई नहीं, कोई कानून का भय नहीं, कोई शर्म लाज लिहाज नहीं, रोटी मिले ना मिले नशा मोबाइल सुरा सुन्दरी मिल जाए बस यही स्वप्न होता है, अश्लीलता रोकने के बजाय इतनी फैला दी गई है कि अब वेश्यालयों की आवश्यकता नहीं होती है, किसी देश का बेड़ा गर्क करना है तो वहाँ की सभ्यता संस्कृति प्रथाओं  परम्पराओं को सरकार और बुद्धि देवी लोगों के एक वर्ग को ब्लैकमेल करके पैसों से खरीद कर  तोड़ दीजिए और यही किया जा रहा है।

फिल्मी नायक नायिका यही कर रहे हैं, अब तो स्त्रियों ने चड्डी की रंग बताते बताते पहनना भी बंद कर दिया है, स्तन के चूचुक ढ़क कर बाकी सब कुछ दिखा देना फैशन बन गया है , नग्नता सीधे घरों में आ रही है, पहले फ़िल्में थोड़ी साफ सुथरी होती थी रेडियो पर मन्ना डे हेमलता लता आशा किशोर मुकेश हेमंत कुमार के कर्णप्रिय गीत होते थे, जो आत्मा को प्रेम की पवित्रता से भर देते थे, आजकल संगीत ही फूहड़ है काला कौवा काट खाएगा सात सहेलियां खड़ी-खड़ी चोली के पीछे क्या है? चने के खेत में, मुझको राना जी माफ करना क्यों की रात मे किसी और के साथ सो गयी इत्यादि बेहद गंदे भद्दी अश्लील मैथुनी द्विअर्थी और उत्तेज़क गीतों ने लोगों के मस्तिष्क में गन्दगी भर दी है,। और समाज भी इतना लज्जा रहित बेशर्म हो गया है कि धर्म ईश्वर का डर नहीं रह गया छोटे बच्चों से बुद्ध तक जवान से अधेड़ सभी लाज शर्म छोड़कर प्रेम से सुनते हैं और मटकते हैं 

जब विचार गंदे होते हैं तभी कामुकता  गंदगी अश्लीलता जन्म लेती है, विचारों को गीतों द्वारा नग्न स्त्रियों द्वारा  गंदे बर्थडे अश्लील विज्ञापनों द्वारा जापानी तेल के द्वारा और भी तमाम गंदी चीजे द्वारा जानबूझकर किशोरों को भड़काया जाता है, जो आप परिपक्व होते हैं और बहुत जल्दी उत्तेजित भी हो जाते हैं और फिर अपराध बलात्कार होने पर कड़े कानून का ना होना अपराधी का छूट जाना उसके हौसले बुलंद करता है,

 कितना हास्यास्पद है कि जमीन के नीचे पानी का दोहन टनों में किया जाता है और लोगों को टूथपेस्ट करते वक्त पानी बचाने की सलाह दी जाती है, उसी प्रकार लोगों की काम भावनाओं को जानबूझकर उत्तेजित किया जा रहा है और फिर बलात्कार के लिए निर्दोष स्त्रियों को दोषी ठहराया जाता है, जातिवाद समाप्त नहीं किया जाता है सरकारी रिकार्ड में सबसे पहले जन्म लेते ही फार्म भरवा लिया जाता है और फिर असमानता कि बात कही जाती है, कैसे आएगी समानता कौन लाएगा? सदियाँ बीत गई लेकिन हम लोग भारतीय नहीं बन सके.... लोग ब्राह्मण , क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र है लेकिन अफसोस भारतीय कोई नहीं है, और जाते जाते कड़वा सच - ये सभी नेता विदेशों में भाग जायेगे इनके बच्चे वहीं पढ़ते हैं और बर्बाद होगे आप और हम और हमारी आने वाली पीढ़ी !
विचार अवश्य कीजिये , आपकी  पीढ़ी का भविष्य वर्तमान के माता-पिता आप हम और सभी के ऊपर हैं इसको सुधारने ना सरकार आएगी नाराज नेता न अधिकारी ना कोई देवदूत आएगा हमको आपको कितना शीघ्र जा सके जागना होगा संस्कार नैतिकता संस्कृति सभ्यता जगा कर जल्दी से जल्दी प्राचीन विरासत को आगे लाना होगा - डॉ दिलीप कुमार सिंह मौसम विज्ञानी ज्योतिष शिरोमणि

आधुनिक विज्ञान की चरम सीमा और चरम आश्चर्य

आधुनिक विज्ञान की चरम सीमा और चरम आश्चर्य 
आधुनिक विज्ञान की दो अलग-अलग दुनिया है पहली दुनिया हमारे लिए है जिसमें प्रकाश की गति से चलते रहने पर भी हम दृश्यमान ब्रह्मांड की आखिरी सीमा तक 46 अरब वर्ष में पहुंच पाएंगे 


और ऐसे अर्बन खरबन अन्वदेखे अनजाने ब्रह्मांड है दूसरी दुनिया वह है जिसमें हम स्वयं प्रकाश बनकर प्रकाश के वेग से यात्रा करते हुए धरती से ब्रह्मांड की आखिरी दूरी तक जाते हैं तब वह हमारे लिए एक सेकंड भी नहीं लगता ।

क्योंकि जैसे ही हम प्रकाश की गति से या प्रकाश बनकर यात्रा करते हैं तो समय और दूरी दोनों शून्य हो जाती है अर्थात 46 अरब वर्ष की जगह हम सेकंड के खरबवें भाग से भी कम समय में वहां पहुंच जाते हैं। 

मनुष्य जीव जंतु ब्रह्मांड बूढ़ा होता है लेकिन प्रकाश कभी बूढ़ा नहीं होता इसलिए प्रकाश की एक अलग दुनिया है हमारी एक अलग दुनिया है। 

अब इसको भारत के दर्शन और विज्ञान से देखें तो हमारे ब्रह्म ऋषि और तपस्वी योगी सन्यासी लोगों ने पहले ही कह दिया कि यह ब्रह्मांड अनंत है इसका कोई ओर छोर नहीं है और यह जिस परमेश्वर से जन्म लिया है वह उनके एक रोम के बराबर भी नहीं है इसीलिए विज्ञान कभी भी अपनी आकाशगंगा नहीं पार कर सकता 


जबकि हम प्रकाश में बदलकर फोटोंन से भी छोटे होकर अनंत गति के साथ संपूर्ण ज्ञात और अज्ञात खरबों ब्रह्मांडों की यात्रा कर सकते हैं क्योंकि प्रकाश के कण का कोई भार नहीं होता है इसीलिए प्राचीन काल में हमारे ऋषि मुनि आकाशगंगा और अनेक ब्रह्मांड पल मात्र में पार करके वापस चले आते थे। 


इसको और विस्तार से जानना है तो समझ लीजिए धरती से चंद्रमा सवा सेकंड में धरती से सूर्य 8 मिनट में सूर्य के आखिरी ग्रह यम तक 5 घंटे में और ऊर्ट बादलों को पार करने में पूरे 2 वर्ष लग जाएंगे अपने नजदीकी आकाशगंगा देवयानी अर्थात एंड्रोमेडा तक पहुंचने में हमें 25 लाख वर्ष लगेंगे जबकि अपने आकाशगंगा पार करने में 100000 वर्ष लगेंगे


 इस तरह लगातार 46 अरब वर्ष चलने पर हम अपने ज्ञात ब्रह्मांड के आखिरी छोर पर पहुंच जाएंगे उसके आगे क्या है यह विज्ञान को और वैज्ञानिकों को मालूम नहीं है जबकि भारत के प्राचीन ऋषि मुनि तपस्वी ब्रह्म ऋषि लोग जानते थे कि रोम रोम में ईश्वर के कोटि-कोटि ब्रह्मांड है और समय धीमे तेज भी चलता है इसीलिए जब राजा रेवतक ब्रह्मा जी के यहां पहुंचे तो ब्रह्मा जी का एक दिन धरती के लाखों वर्ष के बराबर था जब वह वापस आए तो सतयुग त्रेता बीत गया था द्वापर आखिरी चरण में चल रहा था 

सरल भाषा में यदि आप चंद्रमा पर अंतरिक्ष यान से जाएंगे तो आपको तीन दिन लगेंगे और प्रकाश यहां से जाएंगे तो आपको सवा सेकंड लगेंगे इस प्रकार जितना तेज चलेंगे उतना ही दूरी और समय घटता चला जाएगा जब महाभारत युद्ध के समय भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को लेकर श्वेत द्वीप में भगवान महा विष्णु के यहां गए थे जो श्वेत विवर के केंद्र में रहते थे तो वहां प्रकाश अंधेरा सब कुछ गायब हो गया था और ब्लैक होल से गुजरते समय उनके सुदर्शन चक्र का प्रकाश मोमबत्ती जैसा दिख रहा था जबकि सुदर्शन चक्र के तेज के बराबर होता है लेकिन मानव ज्ञान और मुक्ति की जगह अपना सारा जीवन पैसे कमाने और पाप करने में बिता देता है और जब वह साथ 65 वर्ष में पहुंचता है तब उसे लगता है कि सारा जीवन व्यर्थ में ही गंवा दिया है और यही धरती का सच है। 
- डॉ दिलीप कुमार सिंह मौसम विज्ञानी ज्योतिष शिरोमणि एवं निदेशक अलका शिप्रा वैष्णवी ज्योतिष मौसम पूर्वानुमान और विज्ञान अनुसंधान केंद्र जौनपुर 7017713978

आंदोलन, जवाबदेही

👉 *सम्पादकीय*

✍️

*आंदोलन, जवाबदेही और सत्ता : इतिहास के आईने में 1966 से 2026 तक*

लोकतंत्र में आंदोलन केवल सड़कों पर उमड़ती भीड़ का नाम नहीं है। आंदोलन उस असहमति की आवाज है, जो तब पैदा होती है जब नागरिकों को लगता है कि उनकी बात सत्ता के गलियारों तक पर्याप्त रूप से नहीं पहुंच रही। भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में छात्र आंदोलनों से लेकर सामाजिक और धार्मिक आंदोलनों तक अनेक ऐसे प्रसंग हैं, जिन्होंने सरकारों को अपने फैसलों पर पुनर्विचार करने और जवाबदेही तय करने के लिए मजबूर किया है।
वर्ष 2026 में शिक्षा व्यवस्था से जुड़े विवादों के बीच लंबे समय तक चले छात्र आंदोलन के बाद केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने 25 जुलाई को इस्तीफा दिया। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार आंदोलन में परीक्षा व्यवस्था और NEET-UG से जुड़े कथित अनियमितताओं तथा पेपर लीक को लेकर जवाबदेही की मांग प्रमुख थी। सरकार ने उनका इस्तीफा स्वीकार किया और शिक्षा मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार प्रह्लाद जोशी को दिया गया।
यह घटनाक्रम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे लोकतंत्र में जवाबदेही की अवधारणा पर बहस फिर सामने आई है। किसी मंत्री का इस्तीफा अपने आप में किसी आंदोलन की सभी समस्याओं का समाधान नहीं होता, लेकिन यह राजनीतिक व्यवस्था में जिम्मेदारी तय करने की एक स्थापित प्रक्रिया का हिस्सा है। दूसरी ओर, सरकार का पक्ष भी यह रहा कि व्यापक परिस्थितियों, छात्रों के भविष्य और कानून-व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए निर्णय लिया गया।
भारत के इतिहास में लगभग छह दशक पहले का एक और आंदोलन इस संदर्भ में याद आता है। 7 नवंबर 1966 को गोहत्या पर राष्ट्रव्यापी प्रतिबंध की मांग को लेकर साधु-संतों और अन्य प्रदर्शनकारियों ने दिल्ली में संसद की ओर मार्च किया था। प्रदर्शन के दौरान हिंसा भड़की और पुलिस ने आंसू गैस, लाठीचार्ज तथा गोलीबारी की। ऐतिहासिक रिकॉर्ड और उपलब्ध फैक्ट-चेक के अनुसार इस घटना में सात प्रदर्शनकारियों और एक पुलिसकर्मी समेत आठ लोगों की मौत हुई थी।
इस घटना के बाद तत्कालीन केंद्रीय गृहमंत्री गुलजारी लाल नंदा ने अपने पद से इस्तीफा दिया था। इसलिए 1966 के प्रसंग को शिक्षा मंत्री के इस्तीफे से जोड़ना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा।
1966 और 2026 के दोनों प्रसंगों के बीच परिस्थितियां, मुद्दे और राजनीतिक संदर्भ बिल्कुल अलग हैं। एक तरफ धार्मिक-सामाजिक मांग को लेकर संसद के बाहर बड़ा आंदोलन था, दूसरी तरफ शिक्षा और परीक्षा व्यवस्था से जुड़े सवालों को लेकर छात्रों का आंदोलन। इसलिए दोनों घटनाओं को समान घटना के रूप में देखना इतिहास को सरल बनाना होगा। लेकिन दोनों से एक व्यापक लोकतांत्रिक प्रश्न जरूर उठता है—जब जनता, छात्र या कोई बड़ा सामाजिक समूह अपनी मांग लेकर सड़क पर उतरता है, तब सत्ता की जवाबदेही किस तरह तय होनी चाहिए?
लोकतंत्र की ताकत इसी में है कि असहमति को सुना जाए। आंदोलन शांतिपूर्ण हो तो संवाद उसका पहला रास्ता होना चाहिए। वहीं यदि आंदोलन हिंसक हो जाए या सार्वजनिक संपत्ति और कानून-व्यवस्था प्रभावित होने लगे तो राज्य के सामने कानून लागू करने की जिम्मेदारी भी होती है। इन दोनों दायित्वों के बीच संतुलन ही लोकतांत्रिक शासन की वास्तविक परीक्षा है।
1966 की घटना यह भी याद दिलाती है कि पुलिस कार्रवाई के बाद केवल तत्कालीन स्थिति को नियंत्रित करना पर्याप्त नहीं होता। ऐसी घटनाओं के बाद जवाबदेही, जांच और राजनीतिक जिम्मेदारी जैसे प्रश्न लंबे समय तक सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बने रहते हैं। संसद के रिकॉर्ड में भी 7 नवंबर 1966 की घटनाओं और गोहत्या प्रतिबंध की मांग पर औपचारिक चर्चा दर्ज है।
2026 का छात्र आंदोलन एक अलग संदेश देता है। आज का युवा केवल परीक्षा पास करने की चिंता नहीं करता; वह परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता, पारदर्शिता और अपने भविष्य की सुरक्षा को भी शासन की जिम्मेदारी मानता है। जब लाखों युवाओं का भविष्य प्रतियोगी परीक्षाओं से जुड़ा हो, तब परीक्षा में किसी भी प्रकार की गड़बड़ी का असर केवल एक परीक्षा तक सीमित नहीं रहता।
इसलिए असली सवाल यह नहीं होना चाहिए कि किस सरकार के समय किस मंत्री ने इस्तीफा दिया। असली सवाल यह होना चाहिए कि क्या लोकतांत्रिक व्यवस्था नागरिकों की आवाज को समय रहते सुनती है? क्या शिकायतों की स्वतंत्र और पारदर्शी जांच होती है? क्या दोष तय होने पर जिम्मेदारी निर्धारित होती है? और क्या आंदोलनकारियों तथा राज्य—दोनों के लिए कानून की समान कसौटी लागू होती है?
इतिहास सत्ता बदलने के लिए नहीं, सत्ता को आईना दिखाने के लिए भी पढ़ा जाता है। 1966 की गोलीबारी हो या 2026 का छात्र आंदोलन—दोनों घटनाएं अपने-अपने समय की परिस्थितियों से पैदा हुईं। लेकिन लोकतंत्र के लिए उनका साझा सबक यही है कि सत्ता चाहे किसी भी दल की हो, जनता की आवाज को सुनना, गलतियों की जिम्मेदारी तय करना और संस्थाओं में विश्वास बनाए रखना शासन की मूल कसौटी है।
लोकतंत्र में सरकारें आती-जाती रहती हैं, मंत्री बदलते रहते हैं और आंदोलन भी समय के साथ समाप्त हो जाते हैं। लेकिन नागरिकों का यह अधिकार स्थायी है कि वे सवाल पूछें, जवाब मांगें और शांतिपूर्ण तरीके से अपनी असहमति दर्ज कराएं। यही अधिकार लोकतंत्र को केवल चुनावी व्यवस्था नहीं, बल्कि जवाबदेह शासन व्यवस्था बनाता है।

Saturday, 3 October 2026

स्मित मच्छर के बाद सभी सनातनी लोगों को सभी गैर मुसलमान लोगों को यह जानने का अधिकार होना चाहिए की बस ट्रक हवाई जहाज पानी का जहाज ऑटो रिक्शा टेंपो या कोई भी वाहन चलाने वाला व्यक्ति कौन है और वह किस धर्म का है कहीं वह शैतान जिहादी तो नहीं है हर दुकान पर भी आधार कार्ड के साथ उसका नाम पता मोबाइल नंबर होना चाहिए

स्मित मच्छर के बाद सभी सनातनी लोगों को सभी गैर मुसलमान लोगों को यह जानने का अधिकार होना चाहिए की बस ट्रक हवाई जहाज पानी का जहाज ऑटो रिक्शा टेंपो या कोई भी वाहन चलाने वाला व्यक्ति कौन है और वह किस धर्म का है कहीं वह शैतान जिहादी तो नहीं है हर दुकान पर भी आधार कार्ड के साथ उसका नाम पता मोबाइल नंबर होना चाहिए 

हर वाहन पर चलने वाले का नाम उसका धर्म और आधार कार्ड चिपकाना अनिवार्य कर दिया जाए और हवाई जहाज उड़ाने के पहले यात्रियों को तीन बार बताया जाए कि इसमें विमान का चालक कौन है सहचालक कौन है एयर होस्टेस किस जाति धर्म की है ताकि लोगों को अपनी सुरक्षा करने का अधिकार प्राप्त हो सके। 


स्मित मच्छर को तो हनुमान जी ने बचा लिया लेकिन सबको बचाने तो हनुमान जी नहीं आ सकते हैं ना 

और याद आ गया जौनपुर में अभी प्रिया सरोज किसी परवीन नाम की महिला के विमान चालक होने पर बधाई शुभकामनाएं देने गई थी देखना है आगे वह क्या-क्या गुल खिलाती हैं और प्रिया सरोज का नाम कितना रोशन करती हैं। 


क्योंकि सांप है तो वह कटेगा अवश्य और काटेगा तो उससे जहर ही निकलेगा अमृत नहीं यह तो अटल और ध्रुव सत्य है। 

और सभी जानते हैं कि मुस्लिम महिलाएं मुस्लिम पुरुषों से अधिक कट्टर जिहादी और अपने धर्म का प्रचार प्रसार करने वाली होती हैं जिनका काम ही होता है कि एक से लेकर 100 गैर मुसलमान को किसी भी प्रकार से मुसलमान बनाना इसके लिए यह लोग नकाब हिजाब बुर्का भयंकर गर्मी में भी पसीने से डूबे होने पर भी धारण करके चलती हैं


 और उसकी आड़ में अनेक पवित्र इस्लामी कार्य कर दिखाती हैं जबकि गैर धर्म की स्त्रियां मुफ्त में अपने शरीर का प्रदर्शन सबको करते हुए सीधे स्वर्ग जाने का रास्ता साफ करती हैं।

लेकिन एक बात के लिए सभी गैर मुसलमान और सनातनी मच्छर के आभारी रहेंगे जो उन्होंने खुले आम कहा कि उनकी रक्षा स्वयं श्री हनुमान जी ने किया जबकि सनातनी लोग कोई पद पाए जाते हैं तो सबसे पहले अपना धर्म और फिर भगवान का नाम छोड़ देते हैं जिसका फल या होता है कि धर्म और भगवान भी उनको छोड़ देते हैं और उनका अंत बहुत भयानक होता है जय श्री राम जय हनुमान

“मैं तुम्हारे बिना नहीं जी सकता…”लेकिन तुम्हें मेरे बिना भी अपने पैरों पर खड़ा होना सीखना होगा!🌿 इस रविवार हर पति-पत्नी को यह एक बार जरूर पढ़ना चाहिए…

❤️ “मैं तुम्हारे बिना नहीं जी सकता…”

लेकिन तुम्हें मेरे बिना भी अपने पैरों पर खड़ा होना सीखना होगा!

🌿 इस रविवार हर पति-पत्नी को यह एक बार जरूर पढ़ना चाहिए…
एक शाम पत्नी ने अपने पति से कहा—

“सुनिए… आपसे एक बात पूछूँ? नाराज़ मत होना। मुझे सच-सच जवाब चाहिए।”

पति मुस्कुराकर बोले—

“फिर कोई मुश्किल सवाल पूछने वाली हो क्या? पूछो…”

पत्नी थोड़ी गंभीर हो गई।

“हमारे बच्चे अब विदेश में बस गए हैं। हम दोनों यहाँ अकेले रहते हैं। भगवान की कृपा से हमें खाने-पीने, रहने या किसी जरूरी चीज़ की कोई कमी नहीं है। हम दोनों एक-दूसरे के साथ हैं और शांति से अपना जीवन जी रहे हैं।

लेकिन अब उम्र बढ़ रही है… शरीर पहले जैसा साथ नहीं देता। हम हमेशा की तरह बच्चों के पास जाकर नहीं रह सकते। उनकी भी नौकरी है, बच्चों की पढ़ाई है और अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियाँ हैं। वे हमेशा हमारे साथ रह भी नहीं सकते।

इसीलिए मुझे एक डर सताता है… अगर मुझे कुछ हो गया तो आप अकेले कैसे रहेंगे?

कभी-कभी इसी सोच के कारण रात को नींद भी नहीं आती।”

पति कुछ क्षण चुप रहे।

फिर उन्होंने पत्नी का हाथ अपने हाथ में लिया और धीरे से कहा—

“मुझे भी यही डर लगता है… लेकिन मेरे मन में सवाल थोड़ा अलग है।

तुम सोचती हो—‘अगर तुम नहीं रहे तो मैं कैसे जीऊँगी?’

और मैं सोचता हूँ—‘अगर मैं नहीं रहा तो तुम कैसे जीओगी?’”

उन्होंने आगे कहा—

“मैं तुमसे पाँच साल बड़ा हूँ। कौन पहले जाएगा, यह किसी को पता नहीं। इसलिए आज हमें एक बहुत जरूरी बात करनी चाहिए।”

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❤️ प्यार सिर्फ एक-दूसरे पर निर्भर रहना नहीं है…

“हमने पूरी जिंदगी एक-दूसरे का सहारा बनकर बिताई है। लेकिन सच्चा प्यार सिर्फ यह नहीं कि ‘तुम मेरे लिए हो।’

सच्चा प्यार यह भी है कि अगर एक दिन हममें से कोई साथ न हो, तो दूसरा टूटे नहीं… बल्कि हिम्मत से अपना जीवन संभाल सके।

इसलिए मैं तुमसे कुछ पूछना चाहता हूँ—

अगर मैं नहीं रहूँ तो क्या तुम…

- ATM से खुद पैसे निकाल सकती हो?
- UPI से पैसे भेज सकती हो?
- OTP क्या होता है और उसका उपयोग कैसे करना है, यह जानती हो?
- Google Pay, PhonePe या Net Banking चला सकती हो?
- जरूरत पड़ने पर Cab बुक कर सकती हो?
- 112 या 108 जैसी Emergency Services की मदद ले सकती हो?
- मेरे फोन में Emergency Contacts कहाँ सेव हैं, यह पता है?
- बच्चों को Video Call कर सकती हो?
- WhatsApp पर अपनी Location Share कर सकती हो?
- Google Maps से घर की Location भेज सकती हो?
- हमारे डॉक्टर, हॉस्पिटल और Health Insurance की जानकारी कहाँ रखी है, यह जानती हो?
- Insurance Card का उपयोग कैसे करना है, यह पता है?
- गैस सिलेंडर बुक कर सकती हो?
- बिजली का बिल भर सकती हो?
- मोबाइल Recharge कर सकती हो?
- हमारे Bank Accounts की जानकारी कहाँ है, यह पता है?
- FD और दूसरी Investments की जानकारी कहाँ रखी है, यह जानती हो?
- Aadhaar, PAN, Insurance, घर के कागज और बैंक से जुड़े जरूरी Documents कहाँ सुरक्षित रखे हैं, यह पता है?”**

पत्नी चुपचाप सब सुनती रही।

फिर धीरे से बोली—

“आपने मुझे यह सब कई बार बताया है… लेकिन मैंने कभी सोचा ही नहीं कि मुझे सच में यह सब सीखना चाहिए।

मैं तो हमेशा यही सोचती रही कि आप हैं ना… आप सब संभाल लेंगे।”

पति मुस्कुराए और बोले—

“बस, यही हमारी सबसे बड़ी भूल है।”

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🌱 “वह है ना…” और “वह है ना…”

“पूरी जिंदगी हम ‘वह है ना’ कहकर एक-दूसरे पर निर्भर रहे।

लेकिन जिंदगी की कोई गारंटी नहीं है।

इसलिए आज से एक नई शुरुआत करते हैं।

तुम मुझे सिखाओ… मैं तुम्हें सिखाता हूँ।

तुम UPI और Online Banking सीखो,
मैं घर के कुछ काम सीखता हूँ।

तुम बैंक के काम समझो,
मैं Insurance और जरूरी Documents की जानकारी रखता हूँ।

तुम Emergency Contacts और Technology सीखो,
मैं दवाइयाँ, Medical Reports और जरूरी कागज कहाँ रखे हैं, यह व्यवस्थित करता हूँ।

हम साथ-साथ ही रहेंगे… लेकिन अगर कभी एक को अकेले रहना पड़े, तो दूसरा असहाय न हो—इतना सक्षम जरूर बने।”

पत्नी की आँखों में आँसू आ गए।

वह बोली—

“यह सब सुनकर मुझे डर लग रहा है…”

पति ने उसका हाथ थामते हुए कहा—

“डरने की जरूरत नहीं है।

जो हमारे हाथ में नहीं है, उसकी चिंता करने से अच्छा है कि जो हमारे हाथ में है, उसकी तैयारी करें।

भगवान ने हमें कितने दिन दिए हैं, यह हमें नहीं पता।

लेकिन हर दिन प्यार से, आत्मविश्वास से और एक-दूसरे का हाथ थामकर जीना—यह हमारे हाथ में है।”

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🕊️ तैयारी करना डर नहीं, समझदारी है

हम अपने बच्चों को बचपन से सब कुछ सिखाते हैं—

पढ़ाई, नौकरी, गाड़ी चलाना, खाना बनाना, तैरना, Technology, पैसे संभालना…

लेकिन जब हमारी उम्र बढ़ती है तो हम अक्सर कहते हैं—

“मुझे यह सब सीखने की क्या जरूरत है?”

इसके बजाय हमें खुद से एक सवाल पूछना चाहिए—

“अगर कल अचानक इसकी जरूरत पड़ गई, तो क्या मैं यह काम खुद कर पाऊँगा?”

यही सवाल हमें आत्मनिर्भर बनाता है।

जीवन की तैयारी करना मृत्यु के बारे में सोचना नहीं है।
बल्कि जीवन को आत्मविश्वास के साथ जीना है।

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🙏 एक-दूसरे का सहारा बनिए… और एक-दूसरे को सक्षम भी बनाइए

पति पत्नी की जगह नहीं ले सकता।

पत्नी पति की जगह नहीं ले सकती।

लेकिन दोनों एक-दूसरे को इतना सक्षम जरूर बना सकते हैं कि जीवन की किसी भी परिस्थिति में दूसरा व्यक्ति पूरी तरह असहाय न हो।

इसलिए—

Technology सीखिए।
Digital Payment सीखिए।
Banking समझिए।
Emergency Services के नंबर याद रखिए।
जरूरी Documents व्यवस्थित रखिए।
महत्वपूर्ण जानकारी सुरक्षित रखिए।
बच्चों से नियमित संपर्क में रहिए।
और सबसे जरूरी—एक-दूसरे से प्रेम और सम्मान बनाए रखिए।

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❤️ अंत में सिर्फ तीन बातें…

“मैं तुम्हारे बिना नहीं जी सकता…”
— यह प्रेम है।

“तुम नहीं रहोगी, तब भी मैं हिम्मत से खड़ा रहूँगा…”
— यह जीवन को समझना है।

और—

“जब तक तुम मेरे साथ हो, मैं हमेशा तुम्हारे साथ खड़ा रहूँगा।”

— यही सच्ची जीवनसंगिनी और जीवनसाथी की पहचान है।

हमारा कर्तव्य करना हमारे हाथ में है।

हमारी रक्षा करना उसके हाथ में है। 🙏

इसलिए जब तक हम एक-दूसरे के साथ हैं—

सिर्फ एक-दूसरे से प्यार मत कीजिए…
एक-दूसरे को जीवन जीना भी सिखाइए।

क्योंकि प्रेम की सबसे सुंदर अभिव्यक्ति यह नहीं कि—

“तुम्हारे बिना मैं नहीं जी सकता…”

बल्कि यह है कि—

“अगर कभी मैं तुम्हारे साथ न रहूँ, तो भी तुम हिम्मत से अपना जीवन जी सको—इसके लिए मैं तुम्हें आज से तैयार करूँगा।” ❤️

और शायद…

यही सच्चे जीवनसाथी की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है। 🙏🌿

घर की स्त्रियों को पढ़ाई शिक्षा नौकरी काम के बाहरी बहाने बाहर निकालो बेटी बढ़ाओ बेटी बेटी पढ़ाओ नारी का सशक्तिकरण करो इस तरह अंकित नारे देकर नारियों का भरपूर शारीरिक और यौन शोषण करो और घर को बर्बाद कर दो

घर की स्त्रियों को पढ़ाई शिक्षा नौकरी काम के बाहरी बहाने बाहर निकालो बेटी बढ़ाओ बेटी बेटी पढ़ाओ नारी का सशक्तिकरण करो इस तरह अंकित नारे देकर नारियों का भरपूर शारीरिक और यौन शोषण करो और घर को बर्बाद कर दो कुछ दिन बाद नारा देना स्त्रियों को बाहर निकालो पुरुषों को घर का चौका बर्तन करने को लगाओ उसे दिन के बाद स्त्रियों को इतना स्वतंत्र और सत्संग कर देना विवेक कहने लगे कि हम बच्चे पैदा क्यों करें क्योंकि हमारा भी बराबर का अधिकार है पुरुष लोग बच्चे पैदा करें इसके बाद मन इतना बढ़ा दो कि वह कहीं हम तो पेंट शर्ट टाई लगाकर घूमेंगे और पुरुष साड़ी साया ब्लाउज समीज सलवार पहने और आराम से सारी दुनिया मिट जाए केवल मुसलमान बैठे हैं क्योंकि मुसलमान तो कभी नहीं मानेंगे कि स्त्रियां घर के बाहर निकले बच्चे पैदा ना करें किस प्रकार एक प्रकार से सारी दुनिया के राजनेता मुसलमान के द्वारा ब्लैकमेल होकर मोदी की तरह मुस्लिम दुनिया बनाने में जुटे हुए हैं क्योंकि ऊपर लिखी बातें जब होने लगेगी तो बच्चे कोच्चि दुनिया पर मुसलमान अपने आप ही अधिकार कर लेंगे वैसे भी हर परिवार विनाश के कगार पर खड़ा हो चुका है केवल 5 से 10 प्रतिशत घर समाज देश और धर्म को समझदार महिलाओं ने बचा कर रखा है जो राजनेताओं और कल बुद्धिजीवियों की हर चाल को समझ चुके हैं प्रकृति के नियम को बदलने चले हैं आज के भ्रष्टाचारी नेता और शासन जो एक दिन में करोड़ों रुपए का नाश्ता भोजन शिलाजीत वियाग्रा खाकर दुनिया के तमाम देशों में जाकर मौज मस्ती करते हैं और समझते हैं जनता इतनी मूर्ख है कि जो भी नारा देंगे जनता मान लेगी विदेश नहीं जाएगी सोना नहीं खरीदेगा घर में एक पैसे नहीं रखेगी आज क्या स्थिति बनी है 1000 2000 के नोट समाप्त करके नौटंकी कर दिया 10 20000 घर में आपत्ति के समय पड़े रहते थे वह भी नहीं है पूरा समाज और घर पूरी तरह बर्बाद कर दिया है इंद्राज नेताओं ने नियम कानून इनके ऊपर नहीं लागू होता केवल जनता को दिखाते हैं बिजली बचाओ पानी बचाओ इतनी हद हो गई है कि खुद तो एक गांव और कॉलोनी के बराबर एक सांसद विधायक मंत्री बिजली खर्च करते हैं पानी खर्च करते हैं जितने में एक परिवार नहाता है उतने में उनके कुत्ते स्नान करते हैं और देश को मूर्ख बनाकर घर परिवार पति पत्नी बाप बेटा बेटी लड़ा कर मजा ले रहे हैं महिलाओं के हरियाणवी क्षण में यही वर्ग सबसे आगे रहता है लोकराज के कारण भले न बताएं लेकिन पढ़ाई लिखाई नौकरी करने वाली एक भी लड़की औरत ऐसी नहीं है जो घर के बाहर यौन हिंसा का शिकार ना हुई हो लेकिन अपना घर परिवार बढ़ाने के कारण कोई मुंह नहीं खोलता है यही हमारे देश की सुरक्षा व्यवस्था और रामराज हैं पहले समस्त उतना अच्छा बना चारों ओर जंगली कुत्ते भेजिए घूम रहे हैं