ब्रह्मांड के महानायक ब्रह्म ऋषि विश्वामित्र -डॉ दिलीप कुमार सिंह मौसम विज्ञानी ज्योतिष शिरोमणि
समस्त संसार के सबसे प्रतापी सम्राट और सबसे बड़े ब्रह्म ऋषि विश्वामित्र की जीवन कथा उनके जीवन के समान ही परम अद्भुत और अपने ढंग की पूरे विश्व में अकेली कथा है ।ब्रह्म ऋषि विश्वामित्र कान्यकुब्ज अर्थात कन्नौज के सम्राट थे उनकी एक और राजधानी गाधिपुर थी जिसको आज गाज़ीपुर कहा जाता है वह कुश वंश के थे और उनका समय सतयुग के अंत से लेकर द्वापर के बीच तक पाया जाता है वह एक बहुत ही न्याय प्रिय और प्रजा को अपना मानने वाले सबके प्रति समान भाव वाले पूरी पृथ्वी के एकछत्र सम्राट थे उनके पिता का नाम गाधि और मां का नाम सुमति था तथा पत्नी का नाम सत्यवती था। उनके राज्य में प्रजा पूरी तरह प्रसन्न थी और संपूर्ण धरती हरियाली धन-धान्य से आच्छादित थे और चारों ओर शीतल मंद सुगंधित मलय पवन के झोंके बहते रहते थे ।
हजारों वर्षों तक राज करने के बाद एक बार वह सेना सहित संपूर्ण पृथ्वी की परिक्रमा करने और शिकार खेलने निकले और घूमते-घूमते ब्रह्म ऋषि वशिष्ठ के आश्रम में जाकर पहुंचे वहां पर वशिष्ठ ने उनका अपूर्व स्वागत सत्कार किया और कुछ देर रुकने को कहा इस पर विश्वामित्र सोच में पड़ गए कि वह इतने बड़े सेना और दलबल के साथ वहां पर कैसे रुकेंगे।
लेकिन ब्रह्म ऋषि वशिष्ठ का आग्रह देखकर वह रुक गये और उन्हें यह देखकर बहुत ही आश्चर्य हुआ कि ब्रह्म ऋषि विश्वामित्र की कामधेनु गाय ने पलमात्र में ही उनके लाखों सैनिकों के लिए छह प्रकार के स्वादिष्ट व्यंजन और प्रत्येक चीजें उत्पन्न कर दिया। इस गाय का चमत्कार देखकर विश्वामित्र आश्चर्यचकित हो गए और वह गाय मांगने लगे वशिष्ठ जी ने कहा कि गाय मेरी मां के समान है और वही हमारे संपूर्ण आश्रम और शिष्यों का आधार है इसको छोड़कर आप कुछ भी ले लीजिए लेकिन ब्रह्म ऋषि की बात ना मानकर सम्राट विश्वरथ अर्थात विश्वामित्र अपने है पर अड़े रहे। और बलपूर्वक सैनिकों को कामधेनु को ले जाने को कहा कामधेनु ने उन सैनिकों को मार गिराया और वशिष्ठ के पास जाकर बोले कि मेरी रक्षा कीजिए ।
वशिष्ठ ने कहा की विश्वामित्र भूमंडल के स्वामी हैं और मैं राजा को श्राप भी नहीं दे सकता और उनके सैनिकों से लड़ भी नहीं सकता इस पर कामधेनु ने अनगिनत शक हूण किरात पहलव और अन्य विकराल विदेशी सैनिक पैदा किए जिन्हें विश्वमित्र ने पल भर में मार गिराया इस पर उसने भयंकर अस्त्र-शस्त्रों से सज्जित महा पराक्रमी योद्धाओं को उत्पन्न किया और वशिष्ठ के साथ मिलकर विश्वामित्र के 100 में से 99 पुत्रों को और सारी सेना को मार गिराया।
सम्राट विश्वामित्र अपनी दुर्दशा पर अत्यंत लज्जित हुए एकमात्र बचे अंतिम पुत्र को संपूर्ण धरती का राज पाट सौंप दिया और उन्होंने कठोर परिश्रम करके भगवान शिव को प्रसन्न करके समस्त दिव्यास्त्र प्राप्त किया और बदला लेने की भावना से फिर वशिष्ठ के आश्रम में आए और अग्नि अस्त्र छोड़कर उनके आश्रम को भस्म कर दिया इस पर वशिष्ठ ने खुद आगे आकर अपने ब्रह्म दंड की सहायता से विश्वामित्र का सामना किया विश्वामित्र ने भगवान शिव से प्राप्त सभी दिव्यास्त्रों अग्नि वरुण रूद्र इंद्र पाशुपत मोहन गंधर्व जूंभण दारुण वज्र ब्रह्म पाश नागपाश नाग अस्त्र वरुण पास पिनाक दंड पैशाच क्रंच धर्म चक्र कालचक्र विष्णु चक्र मंथन कराल विद्याधर कालास्त्र सम्मोहन प्रतीप भार्गव ब्रह्मशिर नारायण अस्त्र और ब्रह्मास्त्र के साथ प्रस्वाप्न अस्त्र का प्रयोग किया लेकिन वशिष्ठ के ब्रह्म दंड के आगे वे सब के सब विफल रहे।
इसके बाद इसके बाद विश्वामित्र अत्यंत ही दुखी हुए और उन्होंने कहा धिग बलं क्षत्रिय बलं ब्रह्म तेजो बलो बलं और उन्होंने ब्रह्म ऋषि बनाने के लिए सारा जीवन दांव पर लगा दियाब्रह्म ऋषि बनने के क्रम में उन्होंने उत्तरी और दक्षिणी अमेरिका ग्रीनलैंड उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव सहित मंगोलिया अरब प्रायद्वीप अफ्रीका हर जगह घनघोर तपस्या किया लेकिन कुछ नहीं मिला इसके बाद देवभूमि में हिमालय पर्वत क्षेत्र में उन्होंने इतना भयंकर और घनघोर तपस्या किया कि इंद्र डर गए और विश्वामित्र की तपस्या भंग करने के लिए मेनका नाम की अप्सरा को भेजा जिसने विश्वामित्र की तपस्या भंग किया और उससे शकुंतला नाम की कन्या हुई जिसके पुत्र भरत के नाम पर इस देश का नाम भारत पड़ा। काम के वशीभूत होकर तपस्या भंग होने से विश्वामित्र अत्यंत ही दुखी हुए और उनकी घोर तपस्या से प्राप्त शक्तियां नष्ट हो गई और इस क्रम में उन्होंने एक बार फिर से तपस्या प्रारंभ किया। इसके बाद अपनी पत्नी के साथ विंध्य क्षेत्र पर करके दक्षिण भारत में चले गये और 1000 वर्ष तक घनघोर तपस्या किया और ब्रह्मा जी ने प्रसन्न होकर उनका राजर्षि कहकर संबोधित किया।
इस पर विश्वामित्र बहुत ही दुखी हुए की चले थे ब्रह्म ऋषि बने और केवल राजर्षि बन पाए इसी बीच उन्होंने तपस्या कर रहे वशिष्ठ को मारने के लिए सरस्वती का आवाहन किया सरस्वती ने वशिष्ठ को विश्वामित्र के सामने तो लाया लेकिन फिर से किनारे पर प्रवाहित कर दिया और विश्वामित्र ने सरस्वती नदी को श्राप दे दिया वशिष्ठ के मन में भी विश्वामित्र को जान से मारने की विचारधारा आई लेकिन उन्होंने इस पर नियंत्रण स्थापित कर लिया।
इसी बीच महाराजा त्रिशंकु ने सदेह स्वर्ग जाने के लिए वशिष्ठ से प्रार्थना किया लेकिन उन्होंने ठुकरादिया जब उनके पुत्र से कहा तो उन्होंने क्रोधित होकर उन्हें श्राप दे दिया। जब उन्होंने यह निवेदन विश्वामित्र से किया तो उन्होंने कहा यदि दुराचारी और छल कपट युक्त इंद्र को स्वर्ग का राजा बनाया जा सकता है तो त्रिशंकु स्वर्ग क्यों नहीं जा सकते यह कहकर उन्होंने दिव्य विमान का निर्माण कर अपने तपोवन से उन्हें स्वर्ग में पहुंचा दिया लेकिन देवताओं ने त्रिशंकु को स्वर्ग से नीचे फेंक दिया लेकिन विश्वामित्र ने उन्हें अपने तपबल से रोक दिया और वह उल्टे रह गए इस पर क्रोधित होकर विश्वामित्र ने अपने तप की शक्ति से प्रति ऊर्जा प्रति ब्रह्मांड प्रतिकण श्याम ऊर्जा सप्त ऋषि और 27 नक्षत्र जैसी चीजों से युक्त एक अलग से सृष्टि रची और वहां पर त्रिशंकु को स्थापित कर दिया नर्मदा नदी का जन्म त्रिशंकु से ही हुआ माना जाता है।
अब तक विश्वामित्र की शक्ति इतनी बढ़ चुकी थी की संपूर्ण ब्रह्मांड में उनको चुनौती देने वाला कोई नहीं बचा था अपने को ब्रह्म ऋषि सिद्ध करने के लिए उन्होंने एक महान यज्ञ किया जिसमें वशिष्ठ और उनके पुत्रों को छोड़कर सारी सृष्टि के लोग उपस्थित हुए और वशिष्ठ के पुत्रों को विश्वामित्र ने आवेश में आकर मार दिया इसी बीच उन्होंने हरिश्चंद्र की परीक्षा लेते हुए उनके मृतक पुत्र रोहित को जीवित कर दिया।
वशिष्ठ और विश्वामित्र के संघर्ष का एक और बड़ा मोड़ भारत के लिए आया जब 10 राजा विश्वामित्र की तरफ से लड़े और सुदास वशिष्ठ की तरफ से अकेले लड़े विश्वामित्र का कथन था यदि सबको चांडाल यवन और मलेक्छ कहकर भारत से निकाल दिया गया तो आगे चलकर वे भारत के लिए खतरा बनेंगे और यही सही हुआ। इन सब के अलावा कुछ अन्य घटनाएं भी हुई ,जब विश्वामित्र ने सब कुछ त्याग कर सारा ध्यान घनघोर तप पर लगाया और उन्होंने गायत्री मंत्र का आविष्कार किया जिन्हें वेद माता कहते हैं अकेले ही उन्होंने ऋग्वेद कर तृतीय मंडल और उसके 62 सूक्त लिख डाले इसके अलावा उन्होंने नए-नए ग्रह नक्षत्र की रचना किया और एक अलग अलग से सृष्टि का निर्माण प्रारंभ किया उन्होंने बलि प्रथा को समाप्त करते हुए बालक शुन:शेप की रक्षा किया और किसी भी प्रकार की बाली को यज्ञ के विरुद्ध बताया ।
उन्होंने ही योग विद्या की खोज किया और विश्वरथ सम्राट से विश्वामित्र हो गए जिसका अर्थ संपूर्ण सृष्टि में सभी का मित्र होना है और वास्तव में वह इस योग्य थे मानवता के प्रति समर्पित व्यक्तित्व पूरे श्रेष्ठ में ऐसा अन्य कोई नहीं पाया गया।
हमारे देश का यह दुर्भाग्य रहा है कि जो अति महामानव थे जो देवताओं से भी योग्य थे उनको भुला दिया गया है ताकि लोग अपने इतिहास को भूल जाएं यही हाल ब्रह्म ऋषि विश्वामित्र को लेकर भी हैं जबकि उनकी शिक्षाओं को हर जगह पढ़ना चाहिए संपूर्ण सृष्टि में वही अकेले ऐसे व्यक्ति हैं जिनके पास ब्रह्म ऋषि चक्रवर्तीसम्राट और समस्त अस्त्र शस्त्रों का सर्वोच्च ज्ञान हो वह एक ऐसे महान वैज्ञानिक थे जिन्होंने परमाणु हाइड्रोजन जैव रासायनिक हथियारों का और माया विद्या का अविष्कार करके हर एक प्रकार के दिव्यास्त्रों का निर्माण किया था।
वह कुटी में या पेड़ के नीचे बैठकर माला जपने वाले ब्रह्म ऋषि नहीं थे बल्कि सृष्टि को सर्वोच्च बनाने वाले महान महामानव थे जिन्होंने अपने महान तप शक्ति से देवताओं को पीछे छोड़कर ब्रह्म ऋषि का परम पद प्राप्त किया भारत भूमि को रावण जैसे राक्षसों से मुक्त करने शिवजी का धनुष तोड़ने में उनकी सबसे बड़ी भूमिका थी जिन्होंने श्री राम और लक्ष्मण को हर प्रकार से शास्त्र और शास्त्र से और ज्ञान से भूख और प्यास से सुरक्षित करके बला और अतिबला विद्या सीखकर और हर प्रकार के ज्ञान विज्ञान शास्त्र और शास्त्र तथा दिव्यास्त्रों का ज्ञानदेकरउन्हें विश्व का सर्वश्रेष्ठ महायोद्धा बनाया भूत प्रेत पिशाच और माया अस्त्रों से बचने का उपाय खोजने वाले वे पहले और अंतिम महान वैज्ञानिक थे अभी उनके बारे में जितना ज्ञात है उससे भी अधिक अज्ञात है देश की रक्षा करने वाले सभी लोगों को सुबह उठकर ब्रह्म ऋषि विश्वामित्र का स्मरण करके उनके पद चिह्न पर चलने का प्रयास करना चाहिए। भगवान श्री राम और लक्ष्मण को जगत विजेता बनने का सौभाग्य प्राप्त उन्होंने अहिल्या का उद्धार कराया और भगवती सीता के विवाह में महत्वपूर्ण भूमिकाओं का निर्माण किया उन्होंने भूख प्यास पर विजय पाने के लिए मंत्रों और रसायनों का निर्माण किया अहिल्या का उद्धार करना उनकी एक महान उपलब्धि है एक ही यज्ञ करके उत्तर भारत को राक्षसों से मुक्त कर दिया था।
ब्रह्म ऋषि विश्वामित्र कितने महान हो गए थे कि एक बार पूरी धरती पर महान दुर्भिक्ष पड़ा लोग सारे उपाय करके हार गए लेकिन काल दूर नहीं हुआ तब उन्होंने चांडाल बहेलिया के घर रखी हुई कुत्ते की हड्डी खाकर उसकी शक्ति के द्वारा सारी धरती पर वर्षा करा कर सारी धरती हरा-भरा कर दिया था इस प्रकार उनके चरित्र ना भूतों न भविष्यति वाला है और आज तक विश्वामित्र इस सृष्टि में केवल एक ही हुए हैं और आगे भी एक ही रहेंगे आज इस महान संकट काल में पड़े हुए सनातन धर्म और भारत देश को विश्वामित्र के पद चोन पर चलते हुए शास्त्र और शस्त्र दोनों ज्ञान सीख कर देश से हर प्रकार की शैतानी और राक्षसी शक्तियों को समाप्त करना चाहिए
No comments:
Post a Comment