: कृष्ण प्रेमगीता
( भाग ५० )
२१/४/२२
महारास की भूमिका पूर्ण हो चुकी थी.... अब समय था महारास के प्रारंभ का.... जामवती रानी रासेश्वर श्री कृष्ण को बीच में ही टोकते हुए पुछती है.... हे गोविन्द मेरे नाथ कृपा कर पहले ये बताए की महारास का अर्थ क्या है....??? आपने गोपियों के साथ ही महारास क्यों किया....??? ये प्रश्र सुनते ही गोविन्द अतिप्रसन्न हुए..... वाह प्रिये यथार्थ प्रश्र पूछा है.... तुम धन्य हो जामवाती तुम्हारे इस प्रश्न से संसार को ज्ञान होगा महारास क्या है.... और गोपियों के संग ही क्यों महारास किया गया..... सब ध्यान से सुनो पूर्ण भाव से सुनो....सबसे पहले ये बताता हु की गोपियां ही क्यों...??
ये वृन्दावन में गोपी रूप में जो जन्मी है ना ये सारी गोपियां कई युगोसे मेरे मिलन के लिए तपस्या करने वाले मेरे परम भक्त है.... ये वेदोकी श्रुतिया है... जो निरंतर मेरी स्तुति करती रहती है.... मेरे लीलाओं का गुणगान करती रहती है.... जिन्होंने हजारों वर्ष तपस्या की थी किसी अवतार में वो सब मुझसे मिले मेरी लीलाएं देखे उनका पात्र बने..... द्वापर युग में जब मैं श्रीराम अवतार में था और मिथिला पूरी गया था .... मेरी स्वामिनी राधा मुझे सीता के रूप में मिली थी.... मिथिला की राजकुमारी.... उनसे मेरी पहली भेट पुष्प वाटिका में हुई थी..... सीता उसकी सखियों के साथ पुष्प वाटिका में आई थी.... कितनी सुंदर मनमोहक रूप... उनकी खिलखिलाती हसी जैसे वीणा का झंकार... उनकी पायल की धुन भी इतनी मनोहारी थी की मेरा हृदय मुझे उस ओर ले गया था.... राम अवतार में मैं काफी शांत सौम्य धीर गंभीर ऐसी मेरी व्यक्ति रेखा थी.... पर प्रेम तो प्रेम है.... हृदय तो अपने प्रेम को पहचान ही लेता है.... मेरा हृदय मुझे उनके सामने ले गया... सीता के साथ साथ सारी सखियां भी मुझे देखती रही.... और हर एक के हृदय में कामना जागी ऐसा ही युवक हमे पति रूप में मिले..... फिर शिवधनुष्य को तोड़कर मैने स्वयंवर जीता जब सीता वरमाला लेकर आई तो उसकी सारी सखियां भी उसके साथ थी.... तब भी वो मन ही मन प्रार्थना कर रही थी के ही नारायण हमे भी ऐसा ही पति दीजिए.... अब नारायण तो सब की सुनते है.... वो तो प्रेम से शुद्ध हृदय से जो भी मांगो दे ही देते है.... कृष्ण हसते है.... फिर सब रानियों की ओर देखते हुए पूछते है... है ना...??? सारी रानियां मुस्कुराती हुई हा में गर्दन हिलाती है.... वही सीता की सखियां त्रेता युग में राधा की सखियां बन कर फिर अवतरित हुई है.... राम अवतार में मैं हर तरहसे मर्यादा में बंधा हुआ था.... तो उस समय मैने उनकी और एक दृष्टि तक नही डाली थी.... उसके पश्चात जब मैं वन में लक्ष्मण और सीता के साथ प्रस्तान कर रहा था तो मिलने वाले सारे ऋषि गण मुनि गण बोहोत विनती करते की हम उनके आश्रम में आए... उनके कुटी में रहे.... उनका भोग स्वीकार करे.... पर उस समय मैं वो सब औपचारिकता स्वीकार नहीं कर पाया था..... तो उन सब ऋषि मुनियों को मैंने वचन दिया था की मैं आप लोगोके घर आऊंगा और आप सब का भोग भी स्वीकार करूंगा..... वही सारे ऋषि मुनि ब्रज की मेरी गोपियां है जिनके घरोमे जाकर मैं उनका दही दूध माखन सब ग्रहण कर के आता था.... खिलखिला कर हसते है कृष्ण और तब वो मैया से मेरी शिकायत करने आती थी.... ये गोपियां कोई मामूली नारियां नही है.... ना ही इनकी कोई तुलना हो सकती है... तो संसार में कोई गोपियों की बराबरी कभी नही कर सकते... गोपी बनाना इतना सरल नहीं है.... गोपी का अर्थ है गो यानी इन्द्रिय और पी माने पी लेना... नष्ट कर देना... अपनी इंद्रियों की सारी कामनाओं को नष्ट करने वाली , अपने सारे सुखोंका परित्याग करने वाली, गोपी कहलाती है.. अपने प्रेम केलिए अपने प्रियतम के सुख के लिए अपने आप को पूर्ण रूप से समर्पित करनेवाली गोपी है.... अब तुम विचार करो संसार में है कोई जो अपने आप को गोपी कह सके..... स्वार्थ रहित कामना रहित प्रेम करने वाली गोपी है.... इसीलिए पूर्ण संसार में बस गोपियां ही है जिनके साथ महारास किया जा सकता है.... अनंत तक चलने वाली है ये महारास की लीला.... अब सुनो महारास क्या है..... रस ही रस का मण्डल है महारास .... आत्मा का परमात्मा से होनेवाला मिलन है महारास.... कण कण में चेतन्य, उत्साह भरने वाला है महारास.... भगवानको भक्त का दास बना दे वो है महारास.... ह्रदय में प्रेम रस का सागर भरने वाला है महारास.... एक ही कृष्ण और हर गोपी को राधा बना दे वो है महारास.....
( शेष भाग कल )
कृष्ण की दिवानी कृष्णदासी
आज के विचार
“वृन्दावन के भक्त - 96”
!! पण्डित बाबा - श्रीरामकृष्ण दास जी !!
3, 10, 2022
**************************************
गतांक से आगे -
“गौरांग दास ! मेरे लिए एक रज का चबूतरा तैयार करो ।”
ओह ! पण्डित बाबा ने ये आदेश जैसे ही दिया सबके प्राण सूख गये ।
पर बाबा ! अभी जयपुर से गोविन्द देव जी की प्रसादी माला आयी नही है ....गौरांग बाबा ने सजल नेत्रों से कहा था ।
वो लोग भरतपुर से आगे आ चुके हैं बस पहुँचने ही वाले हैं तुम रज का चबूतरा तो तैयार करवाओ । गौरांग बाबा अपने बहते अश्रुओं को पोंछते हुए बाहर आये ...कदम्ब का वृक्ष है वहीं तुलसी जी हैं ....रज का चबूतरा बनाने की आज्ञा मिली है .....प्रियाशरण बाबा रुँधे कण्ठ से बोले ....”अब हमारे पण्डित बाबा चले जायेंगे”....लोगों के आने का ताँता शुरू ही था ....आज कलकत्ते के सिद्ध श्रीराम दास जी पधारे थे पण्डित बाबा की कुटिया में .....ये भी श्रीधाम आए थे और आते ही इन्होंने पूछा था पण्डित बाबा कैसे हैं ? लोगों ने कहा ...वो तो अन्तिम साँसें ले रहे हैं शरीर छोड़ने वाले हैं .....तुरन्त सिद्ध बाबा रामदास जी उठे और ये बोलते हुये चल दिये येसे कैसे पण्डित बाबा चले जायेंगे । वो भी वहाँ पर पहुँचे तो गौरांग बाबा चबूतरा तैयार कर रहे थे ...अन्य सब लोग उदास से हरिनाम संकीर्तन किये जा रहे थे ।
सिद्ध राम दास जी को देखा तो सब चकित थे ...इतने बड़े सन्त ....पण्डित बाबा कहाँ हैं ? आते ही पूछा .....प्रियाशरण बाबा ने कहा कुटिया में हैं ....चलिए भगवन् ! प्रियाशरण बाबा रामदास जी को लेकर भीतर गये ....पण्डित बाबा लेटे हुये थे ...उन्होंने जैसे ही देखा सिद्ध राम दास जी आए हैं ...वो बैठ गये .....आगे बढ़कर सिद्ध रामदास जी ने उनके चरण छुए तो पण्डित बाबा ने और बढ़ा दिए अपने चरण ...इस तरह तीन बार उन्होंने चरण वन्दन किया और वहाँ से चले गये ।
हमें तो देवे नही हैं बाबा चरण छूने , और श्रीराम दास जी को दे दियो ।
प्रिया शरण जी ने व्यंग किया - हाँ बड़े लोग लोगन ते छवावे बाबा अपने चरण ।
पण्डित बाबा ने तुरन्त उत्तर दिया .....वो मुझ से बड़े हैं आज्ञा पालन तो करनी पड़ेगी ना ! उन्होंने मेरी कुटिया में आते ही संकेत किया अपने पाँव आगे करो ....क्या मुझे उनकी आज्ञा नही माननी चाहिए थी ...और तुम सब तो मेरे बालक हो मेरी आज्ञा तुम मानो...तुम्हारी आज्ञा में, मैं थोड़े ही चलूँगा ?
तभी राजर्षि वनमाली राय जी भी आये पण्डित बाबा के दर्शन करने ....पर अब पण्डित बाबा की कुटिया में जाने के लिए रोक दिया गया था ...राजर्षि वनमाली राय बाहर ही खड़े हैं ...ये भी श्रीवृन्दावन के परम भक्त हैं ....हरिबाबा जी भी अभी अभी आए हैं ...वनमाली जी ने उनको देखा तो ये उनके पास गये ....विलक्षण महात्मा , सिद्ध के सिद्ध....हरिबाबा जी ज़्यादा नही बोलते हैं ....वो इतना ही बोले ....पर राजर्षि वनमाली जी ने एक बात कही .....बाबा ने जो कुछ भी लिया बस बृजवासी के यहाँ से ही लिया । मधुकरी ये बाहरी व्यक्ति के यहाँ से नही लेते थे यहाँ के बृजवासीयों के प्रति इनकी ये निष्ठा थी । राजर्षि हंसे - मैंने अपने यहाँ से प्रसाद भेजा तो पण्डित बाबा ने लौटा दिया ....बस सिर से लगाकर लौटा दिया ....मुझे बुरा लगा ...चलो मैं बृजवासी नही हूँ पर ये प्रसाद तो ठाकुर विनोद बिहारी जी का है । पर मैं भी पण्डित बाबा से गुस्सा हो गया था ।
तो दूसरे दिन ही पण्डित बाबा मेरे मन्दिर में आए और आकर बोले ....”तुमने शिकायत करी होगी अपने ठाकुर जी ते ? “ वो मेरे सपने में आए और आकर बोले ...मैं तो बृजवासी हूँ ...मेरो प्रसाद चौं ना खायो बाबा तेने ? बस मैं आय गयो ...अब खिला प्रसाद । राजर्षि वनमाली कहते हैं ....मेरे आनन्द का ठिकाना नही था उस दिन ....मैंने तुरन्त भोग उतरवाया ....और बाबा ने भी झिक कर प्रसाद पाया । ये इनकी निष्ठा थी ।
तभी उड़िया बाबा जी भी वहाँ आगये थे ...हरि बाबा जी ने आगे बढ़कर उन्हें बिठाया .....
आज फिर श्रीवृन्दावन के सिद्ध महात्माओं की भीर लगी है पण्डित बाबा की कुटिया में ।
चार लाख नाम जाप , रात्रि के दो बजे भजन में बैठते और दोपहर के दो बजे तक कुटिया में भजन ही करते रहते ......ऐसा नाम जाप । मैं गया था इनके दर्शन करने गोवर्धन ...तब पण्डित बाबा गोवर्धन में रह रहे थे .....उड़िया बाबा जी बता रहे हैं ...रोग से ग्रस्त थे ....कोई उदर घाव बन गया था पण्डित बाबा का.....पर रोग बढ़ता ही गया था ....हम दोनों थे हरि बाबा और हम । मैंने दर्शन किये ...मैं समझ गया कि इनके उदर में घाव है और उसके कारण इनको पीड़ा भी होती है ....तो मैंने पण्डित बाबा से कहा था आपके पास तो इतनी भगवान के नाम की शक्ति है ....कि आप चाहें तो सम्पूर्ण जगत के रोगों का नाश कर सकते हैं .....फिर ये मामूली रोग क्या है ? तब पण्डित बाबा का उत्तर था - स्वामी जी ! एक मच्छर को मारने के लिए ब्रह्मास्त्र का प्रयोग करना क्या उचित है ?
हरि बाबा जी ने कहा ....वो रोटी साग की घटना सुनाइये तो ? उड़िया बाबा जी से कहा ।
मैं तुरन्त ही आया था श्रीवृन्दावन ...उड़िया बाबा जी फिर बताने लगे थे ....यहाँ के भाव प्रेम आदि को कुछ नही जानता था ....मुझे कुछ पता नही था ....मैं जब आया तो मुझे पण्डित बाबा के बारे में ही बताया गया ...मैं इनके पास आया ...ये उन दिनों श्याम कुटी में रहते थे .....मधुकरी लेकर आते ...और मधुकरी में भी दो रोटी ....एक रोटी से आधी रोटी सुबह और आधी शाम को ...बची रोटी धरती में दवा देते ....ऐसा विरक्त साधु ......
उड़िया बाबा कहते हैं - मैंने जाकर प्रणाम किया और बैठ गया ....वो आधी रोटी पा रहे थे ..मुझे बोले ..स्वामी जी ! मधुकरी लोगे ? मैंने भी कहा हाँ , उन्होंने रज से रोटी निकाली और मुझे दिया ...मैं झाड़ने लगा रज को ....तो मुझ से बोले ...स्वामी जी ! नये आए हो बृज में , अरे जे रज तो साग है ...रोटी के साथ साग लो और पाओ ....यहाँ या बृज रज की ही तो महिमा है ।
उड़िया बाबा कहते हैं - इनकी निष्ठा अनुपम थी श्रीवृन्दावन के प्रति ...और विरक्त , परम विरक्त ...अपने में मग्न ...अपने में मस्त । इतना बोलकर उड़िया बाबा जी भी वहीं बैठ गये थे .....रज में ही....।
श्री प्रमथ नाथ तर्कभूषण वो भी आगये .....पण्डित बाबा जा रहे हैं ये सुनकर इनका हृदय भी व्यथित था ......मैं तो दो वर्ष पहले ही मिला था ....पण्डित बाबा के दर्शन करके मैं बहुत प्रभावित हुआ ....मैंने इनसे एक ही प्रश्न किया था .....कलियुग में नाम-जप का इतना महत्व क्यों ?
तो इन्होंने उत्तर दिया था - और कुछ हो नही सकता ना .....क्यों की कलि में द्रव्य शुद्ध है नही ...योग आदि से भगवान की प्राप्ति हो नही सकती क्यों कि जन्म शुद्ध नही है ....जन्म शुद्ध होगा तभी तो योग आदि में सहज गति होगी । कर्मकाण्ड तो कलि में पूर्णता से करना बड़ा असम्भव सा है .....क्यों की उनमे विधि निषेध बहुत है ..कलि के लोग कहाँ ये सब कर पायेंगे ...इसलिए नाम , नाम- जाप ही इस युग में सर्वश्रेष्ठ है ।
**********************************************************
बाहर का पूरा प्रांगण खचा खच भर गया था .....पण्डित बाबा के लिए रज का चबूतरा भी बनकर तैयार हो गया था ...प्रिया शरण बाबा बोले ...पण्डित बाबा कह रहे हैं उनको बाहर लाओ ।
गौरांग बाबा प्रिया शरण बाबा अन्य कुछ युवा विरक्त भीतर गये ....महामन्त्र का कीर्तन करते हुये पण्डित बाबा जी को बाहर लेकर आये .....चारों ओर से कीर्तन की मंगल ध्वनि .....महामन्त्र गूंज रहा है ....पण्डित बाबा बाहर रज में लेटे हुये हैं ....तभी उन्होंने संकेत किया चरणामृत पिलाने का, गौरांग बाबा ने चरणोदक लाकर बाबा के मुख में डाल दिया था कि तभी .......
बाबा के लिए गोविन्द देव जी की प्रसादी माला आगयी थी ।
जयपुर के लोग आगये थे .....वो प्रसादी माला लेकर आए थे .....और मन्दिर के गोसाईं जी ने कुछ कहा है ......क्या कहा है ? ये मैं पण्डित बाबा के कान में ही कहूँगा .....”बाबा ! हम जयपुर से गोविन्द देव जी के मन्दिर” ....ये सुनते ही मुखमंडल खिल गया बाबा का .....प्रसादी माला पहनाई बाबा को ....बाबा आनंदित हो गये ....मेरे गोविन्द ने कुछ कहा है ? इतना भर पूछा था पण्डित बाबा ने .....हाँ , ये कहते हुये वो लोग बाबा के कान के पास गये और बोले - गोसाईं जी ने हमें बताया कि उनको गोविन्द देव जी ने कहा ....उस “रामप्रताप” को कहना ....मेरे गोलोक में आकर मुझे सामवेद सुनाये ।
ये सुनते ही पण्डित बाबा का रोम रोम खिल उठा वो हंस पड़े ....उनके मुखारविंद से श्रीमदभागवत जी का ये श्लोक प्रकट हो रहा था ....हा नाथ , रमण प्रेष्ठ.......और पण्डित बाबा का देह बृज रज में मिल गया । सम्पूर्ण श्रीधाम उदास हो गया था ....बड़े बड़े महापुरुष भी अश्रु पोंछते हुए दिखाई दे रहे थे ....”हरे कृष्ण हरे कृष्ण” इस महामन्त्र का गायन गगन को चूम रहा था ।
जय हो - श्री पण्डित बाबा जी की ।
जय हो - श्रीराधारमण लाल जी की ।
जय हो - भक्त और उनके भगवान की ।
: मीरा चरित
भाग- 78
उदयकुँवर बाईसा का आश्चर्य उनके हृदय को मथे जा रहा था। भजन पूरा होने पर मीरा ने धोक दी।हृदय का उत्साह थमता ही न था।विक्षिप्त की भाँति उन्होंने मूरत को छाती और गालों से लगाकर प्रीत की अनगित मोहरें दीं।उदयकुँवर बाईसा उठकर धीरे धीरे बाहर चली गईं।
‘बाईसा हुकम ! बाईसा हुकम !’- दासियाँ उदयकुँवर बाईसा के जाते ही रोती हुई एक साथ ही अपनी स्वामिनी के चरणों में जा पड़ीं - ‘यह आपने क्या किया? अब क्या होगा? हम क्या करें?’
‘क्या हो गया बावरी? क्यों रो रही हो तुम सब?’- मीरा ने चम्पा की पीठ सहलाते हुए कहा।
‘आपने जहर क्यों आरोग लिया?’
मीरा हँस पड़ी- ‘जहर कब पिया पागल, मैंने तो चरणामृत पिया है। विष पिया होता तो मर न जाती अब तक। उठो, चिंता मत करो। भगवान पर विश्वास करना सीखो। प्रह्लाद को तो सांपों से डँसवाया गया, हाथियों के पाँव तले कुचलवाया गया और आग में जलाया गया, पर क्या हुआ? यह जान लो कि मारनेवाले से बचानेवाला बहुत बड़ा है।’
‘बाईसा हुकम, अपने मेड़ते चले जायें’- चम्पा ने आँसू ढ़रकाते हुये कहा।
‘क्यों भला? प्रभु मेड़ते में हैं और चित्तौड़ में नहीं बसते? यह सारी धरती और इसपर बसने वाले जीव भगवान के ही निपजायें हुये हैं। तुम भय त्याग दो। भय और भक्ति साथ नहीं रहते।’
‘पी लिया’- महाराणा विक्रमादित्य ने पूछा।
‘हाँ, अन्नदाता’- दयाराम पंडाजी ने कहा।
‘क्या बात है पंडाजी, ऐसे क्यों हो रहे हो?’
‘कुछ नहीं हुकुम’
‘कुछ तो’
‘जब कुँवराणीसा आरोगने लगीं तो बाईसा हुकुम ने अर्ज कर दिया कि मत आरोगो भाभा म्हाँरा यह तो विष है।यह सुनकर मेरी तो पिंडलियाँ काँने लगीं सरकार, कि ड्योढ़ी पर बैठे मेड़तिये राठौर अभी मेरे टुकड़े टुकड़े कर देगें, किंतु कुँवराणी सा तो उनका बात सुनकर हँस पड़ीं।उल्टे बाईसा को समझाने लगीं कि आई मौत टलती नहीं और दूर हो तो कोई खींच कर पास ला नहीं सकता।आप चिंता न करे।मेरी आँखों के सामने ही उन्होंने कटोरा होठों से लगाकर खाली कर दिया।ऐसे जानबूझकर कौन प्रत्यक्ष काल को गले लगाता है सरकार, मैं तो देखकर चकित रह गया।
‘गले लगाया सो तो उसके साथ जाना भी पड़ेगा’- महाराणा बोले- ‘दो घड़ी में सुन लेना मेड़तणीजी सा बड़े घर पहुँच गईं, पर जीजा हुकुम यह क्या सूझी कि उन्होंने कह दिया?’
‘अब आज्ञा हो अन्नदाता’
‘जाओ, इस बात की कहीं चर्चा न करना’
‘खातिर जमा रखें सरकार’
उसके जाते ही उदयकुँवर बाईसा पधारीं।सूखा मुँह, भाल पर पसानें की बूँदें औक साँस जैसे छाती में समा नहीं रही हो।उन्हें देखकर महाराणा ने अपना मनोरथ पूर्ण माना।मुस्कराते हुए उन्होंने पूछा- ‘क्या हुआ जीजा हुकुम, काम हो गया न’
उदयकुँवर बाईसा ने अस्वीकृति में माथा हिला दिया।
‘हैं? भाभी म्हाँरा जीवित हैं?’- उनकी आँखे आश्चर्य से फैल गईं।
‘हाँ हुकुम, दयाराम पंडा के साथ मैं भी तमाशा देखने गई थी।चरणामृत का नाम सुनकर वे बहुत प्रसन्न हुईं।प्याले को ठाकुर जी के चरणों में रखकर उन्होंने एक भजन गाया और फिर प्याले को उठाकर होंठों से लगा लिया।यह देखकर मुझसे न रहा गया।दौड़ कर मैनें उनका हाथ थाम लिया और कहा कि मत आरोगो भाभीसा, यह जहर है, किंतु वे न मानीं।उसे सहज पी लिया।उनके मुख पर दु:ख या असंतोष की एक रेखा तक नहीं आई।सहज शांत प्रसन्न मुख से उन्होंने वह हलाहल पान कर लिया।कटोरा लेकर पंडाजी इधर आये और वे आनंद में मतवाली होकर और पाँवों में घुँघरू बाँध कर नाचने लगीं।भजन पूरा करके वे भगवान पर बलिहार हो रही थीं, फिर मैं इधर चली आई।वे सचमुच भक्त हैं हुकुम, हमें नहीं सताना चाहिए।वे जैसे भी रहना चाहें, रहने दीजिए।’
‘वाह जीजा हुकुम वाह, आप भी आ गईं न उस जादूगरनी के जाल में।वैद्य ने अवश्य कुछ चतुराई की है।अभी बुलाता हूँ उसे। प्रहरी।’- उन्होंने पुकारा।
‘वैद्यजी को बुलाने भेज किसी को’- अभिवादनकर पीछे की ओर चलता हुआ प्रहरी कक्ष से बाहर हो गया।
‘आज्ञा हो अन्नदाता’- वैद्य ने उपस्थित होकर अभिवादन किया।
‘तुम तो कहते थे कि इस विष से आधी घड़ी में हाथी मर जायेगा, किन्तु यहाँ तो मनुष्य का रोम भी (ताता) गर्म न हुआ।’- महाराणा उफन पड़े।
‘यह नहीं हो सकता सरकार, मनुष्य के लिए तो उसकी दो बूँद ही बहुत हैं।ऐसा कौन सा लोहे का मनुष्य है, मुझे बताने की कृपा करें अन्नदाता, यह बातमैं किसी प्रकार नहिं मान पा रहा हूँ- वैद्यजी ने कहा।
‘चुप रह नीच, हरामखोर’- राणा दाँत पीसते हुए बोले- ‘मेरा ही दिया खाता है और मुझसे ही चतुराई करता है? बड़ी भाभी म्हाँरा को आरोगाया था यह, पर वह तो मजे से नाच गा रही हैं।’
‘भक्तों का रक्षक तो भगवान हैं अन्नदाता, जहाँ चार हाथवाला रक्षा करता है, वहाँ दो हाथवालों की क्या चलेगी हुजूर? अन्यथा मनुष्य के लिए तो इस कटोरे में शेष बची ये दो बूँदे ही पर्याप्त हैं।’
‘फिर वही बात’- महाराणा गरज उठे- झूठ बोलकर मुझे भरमाना चाहता है? ये दो बूँदे तू ही पी।देखूँ तो तेरी बातों में कितनी सच्चाई है?’
‘मैं अन्नदाता?’- वैद्यजी का मुँह पीला पड़ गया।
‘हाँ तू, पी इसको।मुझे ही धोखा देना चाहता है?’
अरे अन्नदाता, मैनें धोखा नहीं दिया।यह हलाहल है’- वैद्यजी गिड़गिड़ाये- ‘मेरे बूढ़े माँ बाप का और छोरे छोरी का कौन धणी है? उन्हें कौन रोटी देगा? मेहर मेरे सरकार, मैनें हुजूर से कोई धोखा नहीं किया है।’ वैद्यजी रोने लगे।
‘ये त्रिया चरित्र मुझे नहीं सुहाते।पी इसे।’
काँपते हाथों से वैद्यजी ने कटोरा उठाया और भीतर की ओर स्थिर दृष्टि से देखते हुये बोले- ‘हे नारायण ! तुम्हारे भक्त के अनिष्ट में मैंने सहयोग दिया, उसी का दण्ड हाथों-हाथ मिल गया प्रभु, किंतु मैं अनजान था।मुझ पर नहीं, मेरे अनाथ बालकों और बूढ़े माँ बाप पर कृपा बनाये रखना स्वामी।’- उसने कटोरा ऊपर उठा कर मुँह खोला।विष की दो बूँदे जीभ पर टप-टप टपक पड़ी।थोड़ी देर में कटोरा हाथ से छूटा और झनझनाता हुआ दूर जा गिरा।वैद्यजी की आँखे चक्कर खाने लगीं।मुँह खुल गया और हल्का सा चक्कर खाकर वे भूमि पर जा गिरे।एक दो बार हाथ पैरों ने खींचातानी की, गले से अस्पष्ट आर्तनाद फूटा, गर्दन लुढ़क गई, आँखें फट गईं।
क्रमशः
[2/23, 8:47 AM] +91 75270 39073: आज के विचार
( "श्रीकृष्णचरितामृतम्" - भाग 76 )
!! "पनघट पे" - एक प्रेम प्रसंग 3 !!
******************
दुःखी हो गए थे श्यामसुन्दर .......मुदरिया मिल गयी थी इनके पास .....".चोर" नाम अब तो पूरा ही सार्थक हो गया था इनका ।
ज्यादा सोच विचार ठीक नही है .........इधर उधर देखा कन्हाई नें कमरिया ओढ़ कर सो गए ...........क्या सोचना ...........तान दुपट्टा सो गए ..........उदासी तो घनी थी ........जिससे अभी अभी परिचय हुआ था उसी के सामनें चोर बन गए थे .....उनकी ही मुदरिया चुरा ली थी ।
पर कन्हाई इतना सोचते कहाँ हैं .........पनघट में आज हवा अत्यन्त शीतल चल रही थी .......नींद आगयी कन्हाई को ।
*******************************************
प्यारी रुको !
ललिता सखी नें श्रीराधारानी को रोका ।
क्या हुआ सखी ! क्यों रुको ? अब तो बरसानें चल !
नही राधिका जु ! एक बार चलो , देखें तो श्याम सुन्दर को , कि वो कर क्या रहे हैं ? ललिता सखी नें राधारानी से कहा ।
सखी ! देख उनको बहुत अपमान कर दियो है हमनें .......वे दुःखी हैं बहुत .........इसलिये अब चल बरसानें ।
अजी ! वाह ! चोरी करें वो ............और अपमान कियो हमनें !
स्वामिनी जु ! चोरी करि है उन्होंने आपकी ...........ललिता फिर मुखर हो चली थी ।
फिर कुछ सोचकर ललिता नें कहा ..........किशोरी जु ! चलें एक बार उनको देखें तो ..........कि वे कर क्या रहे हैं ?
उद्धव की भावातिरेक स्थिति है आज ..............वो जिस प्रेम लीला का बखान कर रहे हैं .......वो उच्चतम लीला है ।
श्याम सुन्दर किसका मन नही मोहता ........इसका नाम "मनमोहन" ऐसे ही तो नही पड़ा.......जो इसे देख ले उसका मन ये अपनी ओर खींच ही लेता है ।
चलो !
राधिका जी को लेकर ललिता सखी फिर उसी पनघट में आयी .........तो क्या देखती हैं ............काली कमरिया ओढ़ कर सो रहे हैं कन्हाई ............गहरी नींद आगई थी उन्हें ।
स्वामिनी जु ! ये तो सो गए हैं ..............
राधा जी देख रही हैं .........ये सोते हुये भी कितनें अच्छे लग रहे हैं ......केश राशि बिखरकर मुख मण्डल में आगये थे.........
श्याम की सुन्दरता को देखती रहीं राधा रानी ..........देह भान भूल गयी थीं .........अपनें आपको भूल गयी थीं ।
स्वामिनी जु ! एक काम करें ............अति उत्साहित होती हुयी ललिता सखी बोली ..............इन्होनें हमारी मुद्रिका चुराई हम इनकी बाँसुरी चुरा लेती हैं ..........ये ठीक रहेगा ...........हँसी ललिता ये कहते हुए - हिसाब बराबर ।
नही ललिता ! ये काम ठीक नही है .............ये मत करो .........राधारानी नें रोका.......पर ललिता सखी आज मान नही रही .......चुपके से उसनें श्याम सुन्दर के फेंट में से बाँसुरी निकाल ही ली ।
स्वामिनी जु ! अब इनकूँ पतो चलेगी कि बरसानें वारिन ते उलझनों कितनों टेढ़ो काम है ।
आप रखो इसे .......ललिता सखी नें वो बाँसुरी राधा जी को दे दी ।
वे आएंगे माँगनें, तो मैं दे दूंगी .............
नही ...........ऐसे नही देना है ...........नही तो उलटे हम चोर कहलाएंगी स्वामिनी जु ! आप इस बाँसुरी को छुपा कर रख लो ।
राधा रानी कुछ नही बोलीं.....बस बाँसुरी को रख लिया अपनें पास ।
*************************************************
सन्ध्या होनें को आरही है .......सूर्य अस्ताचल को जा रहे हैं ।
कन्हाई उठे ............अंगड़ाई ली .............इधर उधर देखा ........जम्हाई लेते हुये चुटकी बजाई ।
मन ही मन कहनें लगे ...........आज तो मैं बहुत सोय गयो .........देखो तो साँझ है वे वारी है ..............चलो अब घर चलूँ ।
अरे ! मेरी बाँसुरी कहाँ है ? कन्हाई नें जब देखा इधर उधर तो बाँसुरी गायब थी ............
'चरोरन घर चोरी है गयी".............हँसें कन्हाई ...........या बृज को सबते बड़ो चोर मैं हूँ .........पर मेरो भी चोर कौन है !
सोचनें लगे .........तभी , श्याम सुन्दर सब समझ गए ।
ओह ! तो राधारानी नें मेरी बाँसुरी चुराई है .......ललिता नें उकसाये के मेरी बाँसुरी चुराय लिनी है .........वो बाँसुरी तो राधा रानी के पास है अब .............
नींद नही आवे बिना बाँसुरी के .........चैन नही पड़े बिना बाँसुरी के ।
कन्हाई उठे .............और चल दिए श्रीराधारानी के पास ।
**************************************************
दिव्य कुञ्ज है ..............तमाल का कुञ्ज घना है ..........सामनें ही एक सरोवर भी है ..........कमल खिल रहे हैं उसमें .............लताओं का झुकाव अलग ही कुञ्ज की शोभा को और दिव्य बना रहा है ।
कुञ्ज के मध्य में श्रीराधा रानी विराजमान हैं ..........अष्ट सखियाँ चारों ओर खड़ी हैं ...................
श्याम सुन्दर गए उस दरबार में ।
ललिता सखी नें देखा तो आगे आकर खड़ी हो गयी ।
क्यों आये हो श्याम सुन्दर ! ललितासखी अकड़ कर बोली ।
कहाँ है ? कन्हाई बोले ।
हम पे नही है .....ललिता सखी नें कहा ।
का नही है ? हँसे कन्हाई ।
तुमनें कही , "कहाँ है "........तो हमनें भी कही ......"हम पे नायँ" ......
प्यारे ! हम नें तो तुक मिलाई है..........ललिता अब हँसी ।
सखी ! तुक बाद में मिलइयो ........पहले हमारी बाँसुरी दे दो ।
जाओ कन्हाई ! जाओ ! ये राधारानी को दरबार है .........यहाँ चोरन को काम नही है .......जाओ ।
कन्हाई नें राधारानी से हाथ जोड़कर कहा ............
मैं बाँसुरी के बिना रह नही सकता.........मोकूँ नींद नही आवे है .........हे राधे ! मेरी बाँसुरी दे दो !
ललिता सखी फिर आगे आयी ...........
हमारे पास में नही है ..श्याम सुन्दर !
......अगर मैने तुम्हारे पास ते बाँसुरी निकाल दियो तो ?
अब जाओ तुम यहाँ ते ........ललिता नें छेड़ते हुए श्याम को कहा ।
मैं भी नन्द को छोरा नही .....जो मैने तुमते बाँसुरी नही लई तो !
मैं भी नन्द गाँव को हूँ .........मैं तुम बरसानें वारिन कुँ चोर बनाय के ही मानुंगो .............और अपनी बाँसुरी कुँ ले जाउंगो ।
कन्हाई भी बोल कर चल दिए .........ललिता जोर से बोली ........चोर तो तुम हो ............हमारी प्यारी जु चोरी नायँ करें ........।
ये सुनकर कन्हैया भी गुस्से में चरण पटकते हुए चले गए थे ।
ये क्या है ? हँसे विदुर जी ।
आत्माराम की लीला ............अपनी ही आत्मा राधारानी से लीला करते हैं श्याम सुन्दर ..........यही तो सुन्दरता है इस लीला की .........उद्धव नें कहा ...........तात ! अब आगे सुनिये -
शेष चरित्र कल -
Harisharan
No comments:
Post a Comment