*श्रीगणेश - पुराण अध्याय – २२७:--*
*(२. एकदन्त अवतार – मदासुर की उत्पति)*
*सूतजी बोले - 'हे शौनक ! अब भगवान् गणेश्वर का एकदन्ताववार का उपाख्यान तुम्हें सुनाता हूँ।*
"एकदन्तावतारो वै देहिनां ब्रह्मधारकः । मदासुरस्य हन्ता स आखुवाहनगः स्मृतः ॥"
*“एकदन्त' संज्ञक अवतार देही ब्रह्म को धारण करने वाला और मदासुर का संहारक है । हे शौनक ! उसका वाहन मूषक कहा जाता है ।*
*एक बार महर्षि च्यवन के प्रमाद से मद नामक असुर की उत्पत्ति हो गई।*
*उस असुर ने अपने जन्मदाता महर्षि के चरणों में प्रणाम कर पूछा - 'प्रभो ! मैं कहाँ रहूँ ? क्या करूँ ?'*
*महर्षि बोले - 'वत्स ! तू पाताल-लोक में शुक्राचार्य के पास जा । वे दैत्यगुरु तेरी सम्पूर्ण व्यवस्था करेंगे।*
*उनसे कहना कि महर्षि च्यवन ने मुझे आपकी सेवा में भेजा है।'*
*मदासुर पाताल में पहुँचकर शुक्राचार्य की सेवा में उपस्थित हुआ और प्रणाम कर बोला - 'प्रभो ! मैं आपके भाई महर्षि च्यवन का पुत्र हूँ, इस कारण आपके भी पुत्र के समान हूँ।*
*उन्होंने मेरा नाम मदासुर रखा है और आपका शिष्य बनने के लिए मुझे भेजा है ।*
*हे नाथ ! मैं समस्त ब्रह्माण्ड के राज्य की कामना करता हूँ। आप मेरा अभीष्ट प्राप्त कराने का कष्ट करें।*
*शुक्राचार्य बोले - 'वत्स ! मैं तुम्हारा अभीष्ट पूर्ण कराऊँगा । तुम इस एकाक्षरी शक्ति मन्त्र 'ह्रीं' का अनुष्ठान करो।*
*यह कह उन्होंने अनुष्ठान की विधि बताई और मदासुर उन्हें प्रणाम करके घोर अरण्य में तप करने के लिए चला गया ।*
*मदासुर ने वहाँ शक्ति का ध्यान और जप करते हुए घोर तपस्या की तथा हजारों वर्षों पर्यन्त निराहार और निर्जल रहा ।*
*इससे उसका शरीर अस्थियों का अवशेष मात्र और बल्मीक से आवृत हो गया । यहाँ तक कि उसके शरीर के चारों ओर वृक्ष एवं लताएँ उत्पन्न हो गईं ।*
*अन्त में सिंहवाहिनी भगवती ने प्रसन्न होकर उसे दर्शन दिया तथा वह माता के दर्शन करते ही प्रसन्न होता हुआ विह्वल हृदय से उनके चरण-कमलों में गिर पड़ा।*
*तदुपरान्त उसने भाव-विभोर होकर माता की स्तुति की - 'हे जगज्जननि ! आप ही इस संसार की उत्पत्ति, स्थिति, और प्रलय करने वाली हैं । आप सर्वसमर्था को भक्तों के लिए कुछ भी अदेय नहीं है । माता ! आपके दर्शन करके मैं धन्य हो गया हूँ। आप मुझपर कृपा कीजिए।'*
*भगवती ने वर प्रदान किया - 'वत्स ! तू ब्रह्माण्ड का स्थिर, एवं निष्कंटक राज्य प्राप्त करेगा । तुझे कभी रोग नहीं सतायेगा, और समय-समय पर तेरी इच्छाएँ पूर्ण होती रहेंगी।'*
*वर देकर देवी अन्तर्धान हो गईं ।*
*मदासुर भी प्रसन्न मन से अपने स्थान पर लौटा तथा वहाँ जो नगर था उसे अपने अधिकार में करके उसे अत्यन्त वैभवशाली बनाया ।*
*फिर उसने प्रमदासुर की अत्यन्त सुन्दरी 'लालसा' नाम की कन्या से विवाह किया।*
*उसकी वीरता और वैभव की बात सर्वत्र फैलने लगी । दूर-दूर के बड़े-बड़े पराक्रमी असुर उससे मित्रता करने लगे । बहुत से दैत्य तो वहाँ आकर ही बस गये।*
*फिर मदासुर दैत्यगुरु शुक्राचार्य को प्रार्थनापूर्वक वहाँ ले गया और उन्हें अपना राजपुरोहित बनाकर रखा ।*
*शुक्राचार्य ने उसका दैत्यराज के पद पर अभिषेक कर दिया ।*
जय श्री कृष्णा
*श्रीरामचरितमानस*
*स्वामि सखा पितु मातु गुर*
*जिन्ह के सब तुम्ह तात ।*
*मन मंदिर तिन्ह कें बसहु*
*सीय सहित दोउ भ्रात ।।*
_(अयोध्याकाण्ड, दो. 130)_
_राम राम बंधुओं, राम जी वन गमन करते हुए बाल्मीकि आश्रम पहुँचते हैं और मुनि से अपने वास का स्थान पूछते हैं। बाल्मीकि जी कहते हैं कि जिनके स्वामी, सखा, माता पिता और गुरु सब कुछ आप ही हैं उनके मन मंदिर में आप सीता सहित दोनों भाई निवास करें।_
मित्रों! हमारे मन में राम जी का वास उन्हें अपना सब कुछ मानने पर हैं पर हम तो बस उन्हें अपनी सारी इच्छाओं को पूरा करने का साधन बनाना चाहते हैं इसीलिए राम जी हमसे दूर हैं। अस्तु आप चाहते हैं कि राम जी आपके मन में वास करें तो राम जी में ही सारे संबंध जोड़ लें अस्तु
🙏🏻राम राम
जय राम राम🙏🏻🚩🚩🚩
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👉 *रात्रि* में देव कार्य तथा पूजन सदा *उत्तर मुख* होकर ही करना चाहिए।
👉 *शिवपूजन* भी पवित्र भाव से सदा *उत्तर मुख* होकर करना उचित है।
👉 जहॉं शिवलिङ्ग स्थापित हो, उससे *पूर्व दिशा* का आश्रय लेकर बैठना या खड़ा नहीं होना चाहिए; क्योंकि वह दिशा भगवान शिव के आगे या सामने पड़ती है। इष्टदेव का सामना रोकना ठीक नहीं है।
👉 शिवलिङ्ग से *उत्तर दिशा* में भी ना बैठे; क्योंकि उधर भगवान शंकर का वामांग है, जिसमें शक्ति स्वरूपा देवी उमा विराजमान हैं।
👉 शिवलिङ्ग से *पश्चिम दिशा* में भी नहीं बैठना चाहिए; क्योंकि वह आराध्य देव का पृष्ठ भाग है। पीछे की ओर से पूजा करना उचित नहीं है।
👉 अतः अवशिष्ट दक्षिण दिशा ही ग्राह्य है, उसी का आश्रय लेना चाहिए। तात्पर्य है कि शिवलिङ्ग से *दक्षिण* दिशा में *उत्तराभिमुख* होकर बैठे और पूजा करें।
👉 बिना *भस्म* लगाए, बिना *रुद्राक्ष* धारण किए और बिना *बिल्वपत्र* के भगवान शिव का जप और पूजन नहीं करना चाहिए।
👉 प्रतिदिन पञ्चाक्षर मन्त्र दोनों सन्ध्याओं के समय *एक - एक हजार* का जप करना चाहिए।
👉 *उत्तम फल* की प्राप्ति के लिए दीक्षा पूर्वक *गुरु* से मन्त्र ग्रहण करना चाहिए।
👉 *ब्राह्मणों* को प्रतिदिन प्रातःकाल एक हजार आठ (1008) बार *गायत्री का जप* नियम पूर्वक करने का महत्त्व बताया गया है। (विद्येश्वर संहिता अध्याय 11)
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