Friday, 11 August 2023

श्रीकृष्णचरितामृतम्" - भाग 223 )!! चिन्मय वृन्दावन - "उद्धव प्रसंग 7" !!

: आज  के  विचार

( "श्रीकृष्णचरितामृतम्" - भाग 223 )

!! चिन्मय वृन्दावन - "उद्धव प्रसंग 7" !! 

5, 11, 2021 

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ओह !  ये वृन्दावन है  ?    मैं स्तब्ध - चकित था  ।

तात !  मैने देवताओं का वन नन्दनकानन देखा था ......मेरे गुरु बृहस्पति जी मुझे वहाँ लेकर गए थे .......वो कानन सुन्दर था  अति सुन्दर, सुन्दरतम था ........मुझे स्मरण है  उन देवों का वन देखकर मैं अपनें गुरु बृहस्पति जी को बारबार धन्यवाद दे रहा था .........पर  ये वृन्दावन ! 

ये तो  सुन्दरतम नही ......ये तो चिन्मय है .......हाँ,   वो नन्दनकानन भले ही विश्व ब्रह्माण्ड का सुन्दर वन था   पर ये वृन्दावन तो चैतन्य है........इसका कण कण चैतन्य है ........इसके वृक्ष इसकी लताएँ   सब  बोलती हैं .......पूछती हैं......अपनी ओर खींचतीं हैं .......उद्धव विदुर जी को  बता रहे हैं     जब उनके रथ नें  वृन्दावन में प्रवेश किया  तब उन्हें  जो अनुभूति हुयी ......वो अद्भुत थी  ।

क्या पूछ रही थीं वृन्दावन की लताएँ !  क्या कहकर अपनी और खींच रहे  थे वहाँ के वृक्ष ?     विदुर जी नें पूछा  ।

तात !   क्या कहूँ मैं.........मेरे रथ नें जैसे ही वृन्दावन की सीमा में प्रवेश किया  -  "स्वागत - समुत्सुका"  ,  वृन्दावन को देखकर सर्वत्र मुझे तो प्रथम  यही अनुभूति हुयी.....मानों  सब  स्वागत के लिये उत्सुक थे  ।

मुझे देखते ही वृक्ष झूमनें लगे थे .......लताएँ  हिलकर अपना आनन्द अभिव्यक्त कर रही थीं ...........मुझे देखते ही  नाना सरोवरों के कमल खिल गए थे ...........सुरभित हवाएँ चल पडीं थीं .............स्वच्छ भूमि .........कुछ सूखे पत्ते भी थे .......पर हवा नें उन्हें  क्षण में ही उड़ा दिया था ......मेरे देखते ही देखते  शुष्क और पीले पत्ते गायब ही हो गए थे ......उनके स्थान पर हरित भूमि मानों बिछ गयी थी......मैं जिधर देख रहा था  उधर ही हरीतिमा के सिवा और कुछ नही दिखाई दे रहा था ।

उद्धव विदुर जी को आगे बताते हैं  -  तात !   मैं अब धीरे धीरे आगे बढ़ रहा था ...........पर  उसी समय मेरे कन्धे पर  कनक लता झुक गयी थी ......उस समय न वायु का चलना था  ......न किसी नें झुकाया था ........वो स्वयं झुक गयी थी ........और मानों मुझ से पूछ रही थी......."कहाँ हैं मेरे श्याम" !

मैं चौंक गया.....तभी दूसरे ही क्षण मेरी पीताम्बरी  "कदम्ब" में उलझ गयी थी , ....और वो कदम्ब भी यही पूछ रहा था ....."श्याम कहाँ" ।

पुष्प झरनें लगे थे मेरे ऊपर.....और सबका यही प्रश्न था -  "श्याम कहाँ हैं"     इतना ही नही  अब तो पक्षी आगये थे .....तोता मैना कोयल सब आकर  मेरे रथ के आगे पीछे मण्डरानें लगे थे ........कहाँ हैं श्याम !

सब का यही प्रश्न था ............जब मैने कोई उत्तर नही दिया .....तो  सब नें एक साथ मुझसे पूछा  ..........मेरी बुद्धि  कुछ समझ न पा रही थी........उसको कुछ सूझ नही रहा था ..........तब मैने  खड़े होकर  वृन्दावन से कहा ............"श्याम नही आये"  ।

बस -   पक्षी कहाँ चले गए  पता नही,   तृण सूखे दिखाई देनें लगे क्षण में ही  मानों ऐसा लगा  की  दावानल  लग गयी है  अभी अभी  और सब कुछ जल कर राख हो गया हो......पुष्प सूख गए थे.......लताएँ बस नाम मात्र के लिए  हरी थीं ........पवन  में वैसी शीतलता अब नही रही थी   ।

अब तो ऐसा लग रहा था  मानों वृन्दावन रो रहा है........उसका अणु अणु  "श्याम श्याम श्याम"   कहते हुए विलाप कर रहा है ........मैने रथ को रोक लिया ........वहीं कुछ समय के लिये बैठा रहा  ।

अन्धड़ चल पड़ा था अब .......वियोग की अग्नि में जल रहा था ये वन ......अभी अभी जो वन  सुरों के वन को भी लज्जित करनें वाला था  वही  "श्याम नही आये"    सुनकर  श्रीकृष्ण वियोग की भीषण ज्वाला में धधक उठा था .....।

लम्बी साँस खींची उद्धव नें ......फिर  आह भरते हुए बोले ......ये वृन्दावन की स्थिति थी......फिर ग्वालों की , गोपियों की, मैया बाबा , श्रीराधा रानी  इनका वर्णन तो असम्भव ही है........हंसे उद्धव ......तात !  मेरा  "ज्ञान गर्व"  तो यहीं से गलित होना शुरू हो गया था .......मैं बहुत देर तक  वृन्दावन को देखता रहा । 

."मथुरा में कैसा है मेरा श्याम".......ये प्रश्न  इस वन के अधिदैव की थी अब  .....यानि वृन्दा देवी की.........मैं रथ में  उठकर खड़ा हो गया....."ठीक हैं"......मैं इतना ही बोल सका   ।    पर ये क्या   आकाश में बादल में छा गए थे  एकाएक  और वर्षा होनें लगी थी........यहाँ ऋतुएँ क्षण क्षण में बदल रही थीं ..........ये क्या है ?  ये वर्षा क्यों  ?         "ये  वृन्दा देवी के आँसू हैं"............ये बात किसनें कही  मुझे पता नही चला .......पर  किसी वृक्ष या लता नें ही ये कहा था.........उफ़ !     

सच !  इस प्रेम नगरी की डगर बहुत कठिन थी......ज्ञान सरल है  पर ये प्रेम  बड़ा कठिन है ......फिर  इस प्रेम नगरी की बात,   वहाँ  तो  बुद्धि से नही चला  जा सकता था .......वृन्दावन !   वृन्दावन !  मेरो वृन्दावन !  

और मैं  क्या कहूँ  तात !     

शेष चरित्र कल -

Harisharan
: आज के विचार

“वृन्दावन के भक्त - 243”

!! साक्षात् ठाकुर - श्रीघनश्याम जी !! 

27, 2, 2023

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गतांक से आगे - 

श्रीराधा बाबा जी की इच्छा है कि  एक रासलीला  गीता वाटिका में आयोजित की जाये ।

पोद्दार जी से अपने हृदय की बात की ...तो तुरन्त पोद्दार जी बोले ...ये तो मेरी भी इच्छा थी ।

पर लीला ऐसी होगी जिसमें  केवल रस को जानने वाले रसिक ही उपस्थित होंगे ...बाहर कोई प्रचार नही होगा ...पोद्दार जी ने हंसते हुए कहा ...बाबा !  यही इच्छा मेरी थी ।

तैयारियाँ प्रारम्भ हो गयीं ...लीला श्रीराधाबाबा जी बताते थे ...घनश्याम ठाकुर जी और श्रीराम जी को बैठाकर ये लीला समझाते थे ...फिर उसी लीला  का मंचन होता था ।  रास मण्डली वाले  बड़े आनंदित थे ....पर इस लीला को गुप्त रखने की बात कही गयी थी ...इसलिये लीला का समय रात्रि में रखा गया था ...और लीला के दर्शक भी  दस या पन्द्रह ही होते ।

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बनखण्डी नागा ,  

ये प्रसिद्ध महात्मा थे ....बड़े तपस्वी ...गर्मी में पंचाग्नी तापना और सर्दी में कण्ठ भर जल में खड़े रहकर तप करना ....इन्होंने दो बार नर्मदा की परिक्रमा की थी ....ये बड़े कड़े स्वभाव के थे ....जो प्रायः तपस्वी होते ही हैं ।

ये भ्रमण करते हुए  गोरखपुर आये तो गीता वाटिका में ही रुके ....जयदयाल जी ने इन्हें यहीं रुकवा दिया था । 

रात्रि में ये अपनी साधना करते थे ....प्राणायाम इन्हें सिद्ध था .....

आज ये साधना कर रहे थे ....रात्रि के एक बज रहे हैं .....ये ध्यान में मग्न हैं .....

तभी इन्हें मधुर ध्वनि सुनाई दी .....ध्वनि इतनी प्यारी थी कि इनका मन साधना से बाहर हो गया ...इन्होंने बहुत कोशिश की ....पर साधना में मन नही लग रहा ....इन्हें झुँझलाहट भी हुई ...इन्होंने सेठ जयदयाल जी को लगे हाथ बहुत कुछ बोल भी दिया ....कि कहते हैं साधनास्थली है ये गीतावाटिका  पर देखो अर्ध रात्रि में ...ये राग रंग चल रहा है ....इन्होंने फिर कोशिश की पर असफल ...क्यों की  वो मधुर ध्वनि इनके मन को अपनी ओर बरबस खींच रही थी ....इनसे अब रहा नही गया ....ये उठे  और  ...........

ओह !   दिव्य , दिव्यातिदिव्य .....कुँज में  मंच लगाया गया था ....यमुना जी की झांकी ...उसमें नौका लेकर एक अत्यन्त सुन्दर बालक .....उस बालक की मधुरिमा अद्भुत थी ...वो  सामने देखकर ..नाव चलाने का स्वाँग करते हुये गा रहा था ...वो श्रीकृष्ण का स्वरूप धारण किया हुआ था ....नागा देखने लगे .....देखते देखते  उन्हें लगने लगा ये कोई बालक नही है ...ये तो साक्षात् श्रीकृष्ण ही हैं .....श्रीकृष्ण नागा की ओर देखकर मुस्कुराते ....तो नागा को रोमांच हो जाता ...ये गा रहे थे ....क्या गा रहे थे ?    नागा समझने की कोशिश करते हैं .......

“जग नैया हमार  नैया मैं हम हैं  और हम में संसार”

नागा स्तब्ध हो रहे थे ...इनका देह स्तब्ध था ...मानों समाधि ही लग गयी हो ।

ठाकुर जी कह रहे थे ...”ये जगत हमारी नाव है ,इस नाव में मैं हूँ ,और मुझ में ये सब है । 

सम्पूर्ण ज्ञान इसी में समा गया था ...सम्पूर्ण वेदान्त का तत्व यही था .....इतना ही नही , घनश्याम कोई साधारण बालक तो थे नही ....ये तो साक्षात् ठाकुर जी ही थे ।

“लोग जप करें हैं ...तप करें हैं ...और कर कर के थक जावें ...पर उनकुँ रस की प्राप्ति नही होवे ....सिद्ध लोकन में जाए के वो करोड़न बरस तक वास करें हैं .....बेचारे  जे सिद्ध !  अजी !   प्रेम नही चखो तो व्यर्थ ही जीवन कुँ गँवाय दियो । “

मुझे अपनी शरण में ले लो ....मुझे अपनी शरण में ले लो ...मुझे चखना है प्रेम रस ।   

एकाएक पीछे से चिल्लाते हुए नागा  ठाकुर जी के चरण में आकर गिर गये थे । 

श्रीराधा बाबा जी मुस्कुराने लगे ...पोद्दार जी  गम्भीर भाव से घनश्याम ठाकुर जी की ओर देख रहे हैं ....कि अब ठाकुर जी क्या करते हैं । 

“भैया !   मैं तो प्रेम के वश में हूँ ....ना ज्ञान के वश में , ना योग के वश में ..जो कोई मोकूँ प्रेम ते भजे वही मेरो प्यारो है ....मेरो प्रेम वाही पे बरसे है”।  ये कहते हुए  सिर में हाथ रख दिया था ठाकुर जी ने उन नागा के ...बस फिर क्या था ..वो तो उन्मत्त होकर नाचने लगे ..कभी हंसते कभी रोते .....

बनवारी ! ओ बनवारी !    अब तू जा और बैठ जा ! नित्य मेरो मानसिक पूजा कियो कर ।

ठाकुर जी ने  नाम भी रख दिया था “बनवारी” ....और साधना भी बता दी थी ।    श्रीराधा बाबा जी आनंदित होकर बोल उठे ...वाह रे ठाकुर !  वाह !   ऐसी उदारता !  सब कुछ दे दिया ...सब कुछ बता दिया ....बनवारी !  ऐसा सरल सहज नाचता  थिरकता भगवान कहाँ मिलेगा ...इन्हीं को पकड़ ले ...तेरा बेड़ा पार है । 

बनवारी शरण ,   यही नाम इनका पड़ा .....इन्होंने सब कुछ छोड़ दिया और घनश्याम ठाकुर जी के साथ ही लग गये ....मानसिक पूजा इन्हें सिद्ध हो गयी थी ।   

शेष कल - 

Hari sharan

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