हमारे पितर केवल तीन अंजलि जल से ही संतुष्ट हो जाते हैं यदि कुछ ना हो तो घर झील तालाब सरोवर या किसी भी जल कुंड पर आप दक्षिण की और मुंह करके पितरों का आवाहन करते हुए उन्हें तीन बार जल दान करें और यह जलांजलि अंगूठे की तरफ से होना चाहिए यही सबसे उत्तम विधि है और इतने से सारे पितर तृप्ति और संतुष्ट हो जाते हैं
यही उचित विधि है इसके अंतर्गत और कुछ नहीं करना है सुबह स्नान करके शुद्ध चित्र से साफ कपड़े पहनकर या भीगे कपड़े पहनकर भी जल अंजलि दिया जाता है
एक और बहुत बड़े भ्रम शंका और संदेह का निवारण कर देना चाहता हूं बहुत से लोग कहते हैं कि क्या इस प्रकार तर्पण किया गया फल पितरों को प्राप्त होता है तो ऐसे मूर्ख लोगों को मैं बताना चाहता हूं कि बिल्कुल प्राप्त होता है जिस तरह अमेरिका से टेलीफोन या टेलीविजन की चीज भारत में देखी जा सकती हैं और वह दिखाई नहीं पड़ती जिस तरह दूरबीन अर्थात टेलिस्कोप से हम अर्बन प्रकाश वर्ष देखसकते हैं जो आंखों से संभव नहीं है वैसे ही बहुत सी चीज जैसे अल्ट्रासोनिक और सुपर सोनिक तरंगे अल्ट्रावायलेट किरणें भी हमको नहीं दिखती परमाणु और हवा भी हमको नहीं दिखता लेकिन क्या हुआ इस दुनिया में नहीं है इसी तरह से जो तर्पण हम करते हैं उनका सूक्ष्म तत्व पितरों को प्राप्त होता है ठीक वैसे ही जैसे हल्दी तेल मसाले का अर्क निकाल लेने पर भी वे ज्यों का त्यों रहते हैं वही स्थिति यहां भी हैं
दुनिया के विज्ञान विरोधी मानवता विरोधी सभी धर्म के लोग यह जानते हुए भी कि उनका धर्म असत्य और धर्म पर टिका है जब अपने धर्म को जी जान से मानते हैं तो दुनिया के सबसे सुंदर वैज्ञानिक मानवातावादी उदार धर्म वाले अपने धर्म पर संदेह क्यों करते हैं इसका एक ही कारण है इस सनातन धर्म में दिया गया अत्यधिक छूट मूर्खों के लिए वरदान सिद्ध हो गया है इनके लिए एक ही दावा है विनय न मानत जलधि ही जड़ गए तीन दिन बीत और काटेहि पे कदली फरै कोटि जतन कोउ सींच।
सनातनी लोगों में बहुत से ऐसे हैं जो जिस थाली में खाते हैं उसी में छेद करते हैं उनके लिए कोई भी उपदेश देना व्यर्थ है ऐसे ही लोगों के लिए कहा गया है फूलहिं फलहिं ना बेंत कोटि जतन बरसहिं जलदि मूरख हृदय नाश चेत जो गुरु मिले विरंचि सम।
अगर आपके पास ईश्वर का दिया सब कुछ है तो आप जलांजलि देते समय कुछ पानी मिला दूध काला तिल गंगाजल और अक्षत हल्के सुगंध वाले सफेद या पीले पुष्प भी लेकर पितरों को तर्पण कर सकते हैं सब कुछ हाथ में लेकर तीन बार जलांजलि दें अगर अब भी संदेह है तो सफेद कमल चंपा रात रानी चमेली गेंदा और कनेर के फूलों को अक्षत काला तिल कुश के साथ गंगाजल और दूध मिले हुए पानी में डाल दें वैसे पितरों को केवल आपकी सच्ची श्रद्धा चाहिए और तीन अंजलि पानी और कुछ नहीं ।
आगे अगर अपने श्रद्धा भाव है तो पितरों के कारण आज आप धरती पर हैं उन्हें आप सादा भोजन या उनकी पसंद की चीज भी साथ में दे सकते हैं वैसे यह सभी अंतिम दिन देना चाहिए । हमेशा याद रखें कि किसी भी प्रकार का तेल मसाला पितरों को प्राप्त नहीं होता है एक बात और याद रखें कि जो धर्म या अनुष्ठान बहुत अधिक जटिल और कर्मकांडी हो जाता है वह चल नहीं पता पूजा पाठ हवन अनुष्ठान में स्वच्छ और निर्मल मन होना चाहिए रामायण में भगवान श्री राम भगवती सीता और महाभारत में भगवान श्री कृष्णा और पांडवों ने केवल नदी में और सरोवर में तीन अंजलि जल अपने पितरों को दिया था यह प्रामाणिक रूप से लिखा है बाकी चीज तो जड़ी बूटियां की रक्षा और प्रकृति पर्यावरण को शुद्ध रखने के लिए किया जाता है।
अगर आपको याद है तो जिस तिथि को आपके पितरों का स्वर्गवास हुआ है उसे दिन उनका विशेष रूप से तर्पण करें नहीं तो किसी दिन कर सकते हैं किसी भी पिक्चर के बारे में मालूम ना हो तो उनका तर्पण भादो महीने की पूर्णिमा को कर सकते हैं वैसे यह याद रखें कि सच्चे शुद्ध मन से पूजा पाठ दान करने पर कीर्तन करके भोजन खिलाने पर आपका कुछ घटना नहीं बढ़ता ही चला जाता है चाहे छोटे लोग हो चाहे टाटा बिरला अंबानी हो लेकिन जो धर्म विरोधी अंधविश्वासी और अपने ही धर्म की निंदा करने वाले हैं उनका धन-धन संतान सुख कीर्ति वैभव कुछ भी नहीं मिलता है यह सब देखकर आप अपने धर्म अपने ईश्वर देवी देवताओं और पितरों के प्रति आज से ही समर्पणभाव से पूजा पाठ शुरू कर दें तो आपकी भी सारी इच्छाएं पूरी हो जाएंगी आज धर्म के विरुद्ध चलने का ही परिणाम है कि बिना विवाह के लोग बूढ़े हो जा रहे हैं लव जिहाद सहित तमाम जिहाद में फंसकर घर परिवार देश समाज और धर्म के लिए कलंक बनते जा रहे हैं संताने नहीं हो रही है सारी कमाई भोगने वाला कोई नहीं है।
वैसे तो हमारे आपके सभी पितर नया जन्म ले लेते हैं लेकिन उनमें से कुछ पितर लोग और स्वर्ग लोक और इससे भी ऊंचे लोगों में पहुंचकर हमारी क्रिया विधि देखते हैं कि उनकी संताने क्या कर रही है जैसे मृत्यु के बाद 13 दिन तक आत्मा अपने घर परिवार सगे संबंधी लोगों के पास घूम-घूम कर देखते हैं कि मैंने इनके के लिए क्या-क्या नहीं किया और यह लोग हमारे लिए क्या कर रहे कर रहे हैं।
अगर संभव हो सके तो आप रोज कुत्ता गाय चींटी कौवा और मछली को भी कुछ अन्न दान करें इसी को पंचबली कहते हैं और थोड़ा सा अन्न भगवान श्री नारायण के नाम पर निकाल देने पर वह नारायण बलि कहा जाता है इस प्रकार अगर समर्थ है तो सदाचारी और सुपात्र को अन्य धन-धन या कोई भी गुप्त दान करें याद रखें कि दान के लिए ब्राह्मण जरूरी नहीं है हां पहले के ब्राह्मण इतने अच्छे और शुद्ध होते थे कि दान का मतलब ब्राह्मण ही समझा जाता था ज्ञान का मतलब ब्राह्मण ही समझा जाता था दया परोपकार और अपने को बलिदान करके देश की रक्षा करने वाला ब्राह्मण ही कहा जाता था वह भोग में नहीं पूजा पाठ धर्म में लिफ्ट रहकर ईश्वर को प्राप्त कर लेते थे लेकिन अब की बात दूसरी है अब तो छतरी की जगह शूद्र राज कर रहे हैं और ब्राह्मणों का कर्म अन्य लोग कर रहे हैं और कमल की बात है कि जिन-जिन चीजों के लिए वह ब्राह्मण और क्षत्रियों का विरोध करते थे राजा और पांडा पुरोहित महंत संत योग गुरु पुजारी धर्मगुरु बनकर उसे भी घिनौनी क्रियाएं वह लोग कर रहे हैं और जनता बुरी तरह से पीड़ित प्रताड़ित हो रही है
पितृ विसर्जन अर्थात आश्विन महीने की अमावस्या के दिन अंतिम बार पितरों को तर्पण करके उनकी विधि विधान से विदाई की जाती है पितरों को देव माना गया है इसलिए जलांजलि देते समय **ऊं पितृभ्य स्वाहा**या सर्व पितृ: प्रसन्नं भव मंत्र का उच्चारण करना चाहिए पितरों का आधार तो देवी देवता और ईश्वर भी करते हैं और उनका दिया हुआ आशीर्वाद कभी निष्फल नहीं होता ईश्वर भी उसकी लज्जा रखते हुए उसको पूरा करते हैं
यह सारी बातें सभी धर्म ग्रंथो का विज्ञान दर्शन अध्यात्म का गहन अध्ययन करके लिख रहा हूं और 47 वर्ष से लिखता चला आ रहा हूं देशकाल और परिस्थितियों को देखकर ही काम करना चाहिए अगर रोज जलांजलि देना संभव नहीं है तो पहले दिन और अमावस्या के दिन दो दिन भी पितरों से क्षमा याचना करके जलांजलि देने पर पूरा फल प्राप्त होता है ।
अगर बालक वृद्ध रोगी या गर्भवती महिला हैं तो उस पर यह नियम लागू नहीं होता शरीर जितना समर्थ है उतना ही पूजा पाठ व्रत उपवास करना चाहिए वरना लेने के देने पड़ जाते हैं विवाह और मांगलिक कार्य में जब डीजे आर्केस्ट्रा बजाया जा सकता है कोट सूट बूट टाइप पहनकर राजा महाराजा की तरह सिंहासन पर बैठा जा सकता है अनेक धर्म विरुद्ध बातें सुर सुंदरी का सेवन दुराचार शुभ और मांगलिक और स्वरूप पर किया जा सकता है तो पूजा पाठ व्रत त्यौहार के लिए इतनी कठोरता का नियम क्यों है ऐसा नहीं होता और ना होना चाहिए तो बहुत अधिक अंधविश्वासी नहीं बनना चाहिए जैसे की 15 दिनों तक साबुन निरमा तेल का प्रयोग न करना दवा ना खाना नाखून न काटना बोल नाबनाना देवी देवता ईश्वर की पूजा ना करना यह सब बातें आज संभव नहीं है और ऐसा करने वाला तमाम रोग और बीमारियों से ग्रस्त हो जाएगा ।
लेकिन वैज्ञानिक दृष्टि से आश्विन महीने में सादा भोजन बिना तेल मसाले का भजन खाना हर प्रकार से उचित रहता है और कुछ ही ऐसी चीज हैं जिनको नहीं खाया जाता जैसे आलू प्याज लहसुन मसालेऔर तली भुनी चीजें तामसिक भोजन सभी प्रकार का नशा मदिरा और मांसाहार पूरी तरह वर्जित है क्योंकि इन चीजों में इस समय देशकाल और ऋतुओं के प्रभाव से बहुत अधिक जहर भर जाता है जिसका शरीर पर विशेष रूप से रक्त और हृदय पर फेफड़ों पर हड्डी और प्रजनन अंगों पर बहुत बुरा असर पड़ता है इन 15 दिनों में ईश्वर और पितरों का चिंतन करना चाहिए और यह सोचना चाहिए कि आखिर मानव योनि में जन्म लेने का हमारा उद्देश्य क्या है।
सनातन धर्म सबसे श्रेष्ठ वैज्ञानिक और सबसे प्राचीन धर्म है यह कभी मिट नहीं सकता कम हो सकता है लेकिन दुनिया अंत में सनातन धर्म की शरण में जाएगी अगर आप सनातनी हैं अर्थात क्रिश्चियन मुसलमान यहूदी नहीं है तो आपको गर्व करना चाहिए की इतना उदार और वैज्ञानिक प्रकृति पर्यावरण के अनुकूल धर्म दुनिया में कोई नहीं है और ना यहां पर कोई बंधन है और ना कोई कठोरता है की आपको क्रिश्चियन और मुसलमान की तरह अमुक चीज करना ही करना है ।
जिन पूर्वजों पितरों माता-पिता के कारण आप इस दुनिया में हैं और जिनका दिया हुआ सब कुछ पाकर आनंद से जीवन जी रहे हैं उनके लिए 15 दिन या कम से कम दो दिन श्राद्ध तर्पण तो किया ही जाना चाहिए और इन 15 दिनों में सादा जीवन उच्च विचार अपने आप चरितार्थ हो जाता है और व्यक्ति का शरीर तरो ताजा होकर 90% रोग बीमारियों से मुक्त हो जाता है। ऊं पितृभ्य स्वाहा -
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