Sunday, 8 February 2026

‌ मृत्यु भोज का विरोध विदेशी षड्यंत्र का परिणाम है -डॉ दिलीप कुमार सिंह

‌ मृत्यु भोज का विरोध विदेशी षड्यंत्र का परिणाम है -डॉ दिलीप कुमार सिंह 
गद्दार और देशद्रोही तथा विदेशी लोगों से पैसा लेकर ऐसा कह रहा है। ‌ वरना यह और इसके जैसे धर्म गुरु संत महंत आचार्य महात्मा दहेज प्रथा का समाज में फैले हुए धन के असमान वितरण का बहुत महंगे और ऊंचे होटल में आयोजित होने वाले विवाह और मांगलिक समारोह का पैसा लेकर धर्म कथा और राम कथा कहने वाले लोगों का विदेशी परिधान और डीजे आर्केस्ट्रा फिल्मी और भोजपुरी गंदे गानों पर होने वाले विवाह और मंगल समारोह का समाचार पत्र और टेलीविजन चैनल और सोशल मीडिया पर आने वाले अश्लील कामसूत्र और एवं शक्ति वर्धक विज्ञाप और गंदे विज्ञापनों का विरोध करते ‌ और इन्हीं लोगों के कारण सनातन धर्म के देवी देवताओं धर्म कर्म की हंसी पूरी दुनिया में उड़ाई जाती है क्योंकि यह नकली साधु संत है जिनके पास ब्रह्मचर्य तपस्या और सदाचार जैसा कुछ भी नहीं है।

मृत्यु भोज खाने से लोगों की ऊर्जा इसलिए नष्ट होती है क्योंकि वह मरे हुए व्यक्ति का थोड़ा बहुत पाप अपने ऊपर लेते हैं इससे उसे व्यक्ति के पापों का बोझ कम हो जाता है और नरक की आग से छुटकारा मिल जाता है ।

रसमलाई रबड़ी काजू किशमिश बादाम शिलाजीत केसर और यौन शक्ति वर्धक दवाई का सेवन करके एक कुंतल की दें और गाल गुलाबी नैन शराबी वाले ऐसे ही साधु संत सनातन धर्म को बर्बाद कर रहे हैं और इनको पड़ा गठबंधन का पूरा सहयोग भी मिलता है ।

जब मूर्ख लोगों के हाथ में व्याख्या पड़ जाती है तो ऐसे ही अर्थ का अनर्थ हो जाता है मृत्यु भोज संस्कार इसलिए बनाया गया है कि किसी के मर जाने पर इसी बहाने लोग एकत्र होते हैं मृतक परिवार के सुख-दुख में सहभागिता करते हैं और उसे लगता है कि वह दुनिया में अकेला नहीं है उसके अपने बहुत से लोग हैं जैसे आप किसी विपत्ति में पड़ जाते हैं तो डूबते को तिनके का सहारा मिल जाता है ।

यहां एक बात बता देना चाहते हैं कि प्राचीन काल से लेकर अभी 50 वर्ष पहले तक किसी की मृत्यु हो जाने पर लोग अपना सहयोग करते थे और कुछ भी खाते पीते नहीं थे दास संस्कार हो जाने पर लोग गुड़ खाकर पानी पीकर घर चले जाते थे और आज के लोग मरे हुए परिवार से रसमलाई और खोवा छेना  ‌ उच्चतम श्रेणी की मदिरा और यौन शक्तिवर्धकदवाएं लेते हैं तब ऐसे मोटे ताजे संत कुछ नहीं कहते ।

मैं इन मोटे ताजे संत ‌ महात्मा बुद्धिजीवी धर्मगुरु ‌ जो हजारों लोगों का भजन रोज का जाते हैं और एक से पांच कुंतल देने वाले नैन शराबी गाल गुलाबी हैं और उनके समर्थक लोगों विदेशी गद्दारों और इनका पालन पोषण करने वाले देश के छिपे देशद्रोहियों से पूछना चाहता हूं कि किसी भी विवाह में केवल दो संस्कार होते हैं पहले सप्तपदी और दूसरा सिंदूरदान है ।बाकी  वर यात्रा जिसको आर्केस्ट्रा डीजे कोट पैंट सूट बूट शर्ट टाइ असली नाच गाने नग्न और अर्धनग्न होकर सड़कों पर गंदे भद्दे अश्लील दो अर्थी मैथुनिक फिल्मी और भोजपुरी गीत गाने का नियम किस वेद पुराण रामायण महाभारत महाकाव्य धर्म ग्रंथ जातक जैन कथाओं में या गुरु नानक देव के ग में लिखा हुआ है । इसका यह लोग कभी विरोध क्यों नहीं करते रात्र में होने वाले विवाह संस्कार का विरोध क्यों नहीं करते।


एक बार और बता देना चाहते हैं कि यदि क्षत्रिय और ब्राह्मण सचमुच सुधर जाएंगे तो यह सब करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी जब वह खुद ही गिर गए हैं तो दूसरों को अपने से ऊंचा समझ रहे हैं और इसीलिए समाज नष्ट और बर्बाद हो रहा है क्योंकि जब ब्राह्मण रूपी समाज का मस्तिष्क और ‌ सबको शरण देखकर रक्षा करने वाली क्षत्रिय रूपी भुजा समाप्त हो जाएगी तो यह सारा धन दौलत गाड़ी बंगला कर घर की सुंदर स्त्रियां बच्चे सब विदेशी विधर्मी शैतान कब्जा कर लेंगे ‌ 58 मुस्लिम देश संपूर्ण यूरोप और अमेरिका कश्मीर बंगाल केरल बांग्लादेश पाकिस्तान अफ़गानिस्तान का हाल देख रहे हो फिर भी समझ में नहीं आ रहा है उसे पर यह लोग कुछ नहीं बोल रहे हैं जबकि चाहते तो एक करोड़ की संख्या के 1 से 5 कुंतल वाले लोग इन सभी शैतानों का सफाया कर देते इसीलिए ‌ मृत्यु भोज और अन्य चीजों के बहाने इन संत महंतों को आगे करके शंकराचार्य की तरह सनातन धर्म को नष्ट और बर्बाद किया जा रहा है ।


इन लोगों से पूछो कि इन्हें तो जंगल में आश्रम कुटी बनाकर धर्म कर्म करके सत्य धर्म का प्रचार करना चाहिए फिर यह चार्टर्ड हवाई जहाज और रेल के सबसे ऊंचे दर्जे में सबसे कुछ श्रेणी का भोजन किस लिए करते हैं ‌ क्यों बड़े-बड़े लोगों के यहां पंचमकार का सेवन करते हैं और तामसी भोजन का सेवन करके रक्षा बनाकर लोगों को देवता बनने का उपदेश देते हैं बड़े-बड़े हमारे योग और धर्म के आचार्य सब कुछ विदेशी ढंग का यहां तक की शौचालय भी विदेशी ढंग का प्रयोग करके सबको स्वदेशी का भाषण देते हैं ।क्या हमारे ऋषि मुनि तपस्वी विश्वामित्र ब्रह्म ऋषि जैसे लोग राज पाठ में सूरज सुंदरी में डूब कर सत्य और धर्म का प्रचार करते थे ।

एक बात और बता दे आज बंदर के हाथ में छुरा और पागल के हाथ में स्टेनगन देकर देश धर्म को और भारत को बचाने का जिम्मा ऐसे लोगों को दिया जा रहा है जो खुद ही इसको बर्बाद कर देंगे मैं जो भी कहता हूं सत्य धर्म और अपने सनातन ग्रंथो को प्रामाणिक रूप में ‌ अध्ययन करके कहता हूं अब इस एक कुंतल की तोंद वाले गाल गुलाबी नैन शराबी लोगों के समर्थन में और मुझे बताएं कि इसमें एक भी शब्द क्या गलत कहा गया है 

**दुनिया भर को इस्लाम बनाओ** वैदिक सूत्र से लिया गया है जिसमें कहा गया है **समस्त विश्व को आर्य बनाओ** वास्तव में जितने भी हमारे युद्ध हुए हैं वह सभी अरब और यूरोप के राक्षसी शैतानी शक्तियों से हुए हैं चाहे वह विश्वामित्र और वशिष्ठ के समय दश राजाओं का युद्ध हो चाहे रावण का युद्ध हो याद रखें रावण लंका का नहीं था वह भी अब देश का ही था चाहे सिकंदर का चाहे अन्य जंगली शैतानी जातियों का आक्रमण रहा हो ।

इसलिए इन सब के चक्कर में पड़कर वाद विवाद करने की आवश्यकता नहीं है नए बने हुए बौद्ध लोग भी यही करते हैं बस केवल थोड़ा सा रूप बदल दिया गया है और बाकी लोग भी यही करते हैं जो संस्कार सनातन धर्म के है वही क्रिश्चियन और यहूदी करते हैं और वही मुस्लिम भी करते हैं जो कार्य बनारस में और गया में पिंडदान का होता है वही मक्का मदीना में हज की यात्रा करते समय भी किया जाता है इसमें बहुत कुछ देशकाल और परिस्थितियों का भी अंतर होता है ।


बर्फ वाले प्रदेशों में और रेगिस्तान में जहां लकड़ी उपलब्ध नहीं थी जहां पानी उपलब्ध नहीं था वहां लकड़ी और पानी बचाने के लिए अनेक नियम बनाए गए थे जैसे की लाशों को दफन कर देना वहां जनसंख्या भी बहुत कम थी एवं ऐसे बर्तनों का आविष्कार करना जिससे पानी कम से कम खर्च हो भारत में हर चीज की प्रचुरता थी इसलिए यहां पर हर कार्य स्नान करने के बाद का नियम बनाया गया यहां जलवायु भी अच्छी और गर्म है ‌ वहां जंगली असभ्य म्लेच्छ ‌ जैसी अपराधी प्रकृति की भारत से निकल गई जातियों का निवास है जहां स्त्रियों की कमी है इसलिए एक स्त्री सेकंड लोगों का काम चला सकती है लूटमार ही इनका धंधा था क्योंकि वहां पहले कुछ होता नहीं था भारत में ऐसी चीज बनाने की क्या आवश्यकता है।

चलते-चलते एक बात बता दे यदि ब्राह्मण क्षत्रिय लाला और बनिया वर्ग अभी भी सुधर जाएं और सफल जाएं तो किसी भी सरकारी नियम की सहायता की उनको आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी मैं तो कहता हूं सारी नौकरी सारे पद और सारी सी अनुसूचित जाति जनजाति और पिछड़ी जातियों का बना दो और 5 साल में देखो क्या से क्या हो जाता है जिस तरह बिना देश के इसराइल महाशक्ति बन गया। नहीं तो गुजराती मारवाड़ी ‌ पंजाबी सिंधी लोग कितने ऐसे हैं जो नौकरी करते हैं और पूरी दुनिया में इनका राज है यहूदी लोगों को भी देख सकते हैं दुनिया में सबसे कम है और सबसे अधिक इन्हीं का दबदबा कायम है 58 मुस्लिम देश इनका कुछ नहीं उखाड़ सकते।

 वैसे ही यदि जाग सके तो क्षत्रिय ब्राह्मण वैश्य और लाला लोग आज भी 10 वर्ष में पूरी दुनिया में अपना साम्राज्य खड़ा कर सकते हैं लेकिन यह पतित हो गए हैं और योग्यता बढ़ाने की जगह आरक्षण जैसी चीजों का व्यर्थ में विरोध करके अपनी ऊर्जा समाप्त कर रहे हैं ‌ इससे अच्छा होता कि सारा समय अपने योग्यता और प्रतिभा बढ़ाने में करते दुनिया भर के दरवाजे खुले हैं लेकिन दुर्भाग्य से अभी पंचमकार वाली मैथुनी संस्कृत के जाल में और सूरज सुंदरी में डूब रहे हैं

चलते चलते आपको बता दे की देवताओं को संविधान नियम विधान और कानून की आवश्यकता नहीं है और राक्षसों के लिए शैतानों के लिए कानून बनाना व्यर्थ है क्योंकि वह उसका पालन ही नहीं करेंगे सारे नियम कानून मनुष्य अर्थात मनु की संतानों के लिए बने हैं इसलिए अन्य धर्म के लोगों को मानव समझने की भूल मत करो यह चलते फिरते विषैला सांप हैं जो कहीं भी आपको डंस कर खत्म कर देंगे एपस्टीन फाइल्स को ‌ देख लो जो लोग मनु की संतान अर्थात मानव नहीं है वह कैसी शैतानी हरकतें कर रहे हैं यही इनके सभ्यता की चरम उन्नति का फल है जिसमें सनातन धर्म को छोड़कर बाकी सारे धर्म शामिल हैं और सनातन धर्म का अर्थ है वह सारे लोग जो क्रिश्चियन मुस्लिम और यहूदी नहीं है इसमें हिंदू सिख जैन बौद्ध आस्तिक नास्तिक चार्वाक जंगली गुफा वाशी वनवासी सब शामिल है-डॉ दिलीप कुमार सिंह

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