कब और क्यों मनाया जाता है देव शिल्पी विश्वकर्मा की जयंती का दिन
प्राचीन काल से लेकर अभी कुछ समय पहले तक सनातन धर्म के पंचांग और धर्म ग्रंथो के अनुसार देव शिल्पी विश्वकर्मा की जयंती आश्विन माह की चतुर्दशी को मनाई जाती थी लेकिन अचानक की उनका जन्मदिन अर्थात जयंती 17 सितंबर को स्थिर कर दी गई क्यों कर दी गई यह एक रहस्य है क्योंकि यह सनातन धर्म और देव शिल्पी विश्वकर्मा के प्रतिकूल है यह कुछ ऐसा ही है जैसा पहले मकर संक्रांति अर्थात खिचड़ी को 14 जनवरी को स्थिर कर दिया गया था लेकिन अब उसको बदल गया है इस महान पर्व को सृष्टि के प्रथम अभियंता अद्भुत शिल्पकार वास्तु विद्या के परम ज्ञानी और बड़े-बड़े निर्माण कार्यों के करने वाले देव शिल्पी विश्वकर्मा की याद में मनाया जाता है और ईश्वर से 17 सितंबर को बुधवार के दिन मनाया जाना निश्चित हुआ है।
कैसे मनाई जाती है भगवान विश्वकर्मा की जयंती
देव शिल्पी विश्वकर्मा की जयंती मनाने के लिए अन्य पर्व त्यौहार की तरह ही हर एक दुकान और निर्माण करने वाली संस्था को सजाया जाता है और हर कोई बिना जाति धर्म के भेदभाव के उस दिन अपने दुकान कल कारखाने फैक्ट्री और संस्थान को सजा कर कल पुर्जे और यंत्रों की पूजा करता है इसके लिए सुबह उठकर स्नान करके एक चौकी पर पीला वस्त्र बिछाते हैं इसके बाद उसको कुमकुम से लाल रंग का स्वास्तिक बनाकर गणेश जी की पूजा करते हैं फिर चौकी पर देव शिल्पी विश्वकर्मा की स्थापना करके विधि विधान से उनकी पूजा करते हैं और अपने कल कारखाने दुकान संस्थान की उन्नति की प्रार्थना करते हैं
देव शिल्पी विश्वकर्मा के कुछ अद्भुत अद्वितीय और अमर निर्माण कार्य
विश्वकर्मा ने जो अद्भुत और जादू जैसे निर्माण काम किया वह कोई सोच भी नहीं सकता सबसे पहले काम उन्होंने समुद्र के बीच श्रीलंका में जो पहले सिंहल दीप कहा जाता था सोने की लंका का निर्माण किया और यह इतना अदभुत था की जिसमें पहुंच पाना उसके स्वामी की इच्छा के विरुद्ध संभव था और अद्भुत बात यह है कि श्रीलंका के तीन तरफ कोई मानव बस्ती थी ही नहीं केवल उत्तर में भारत था और उन्होंने समुद्र पार करते समय शत्रु को पकड़ने के लिए एक अद्भुत जल राक्षसी का निर्माण किया था इसके बाद लंका पहुंच जाने पर भी बहुत ऊंचे पर कोठी और खाई का निर्माण किया था इसको पार करके यदि कोई पहुंच जाता तो उसको सुपर कंप्यूटर और सेंसर लगे हुए परम अद्भुत यंत्रों के साथ लंकिनी नाम की एक रक्षिका को तैनात किया गया था इन सभी को मार कर तब हनुमान जी श्रीलंका में प्रवेश कर पाए थे कालांतर में हनुमान जी के द्वारा श्रीलंका को जला देने पर वह पूरी तरह नष्ट हो गई और आज भी उसके अवशेष मिलते हैं इस शंका का निर्माण देव शिल्पी ने भगवान शिव माता पार्वती के लिए किया था जिस पर पहले कुबेर का अधिकार था बाद में रावण ने भगवान शिव को प्रसन्न करके लंका पर अधिकार कर लिया था
स्वर्ग नगरी अमरावती का निर्माण
भगवान विश्वकर्मा ने सौरमंडल और आकाशगंगा के बीच परम अद्भुत देवनागरी अमरावती का निर्माण कार्य किया था जिसमें केवल देवता ही प्रवेश कर सकते थे यह देवताओं की सहायता से कोई अन्य उसमें जा सकता था इसमें रहने वालों को भूख प्यास नहीं लगती थी और चारों ओर पारिजात अपराजिता कल्पवृक्ष जैसे अदभुत पेड़ पौधे वृक्ष नदी सरोवर विद्यमान थे और जहां कामधेनु जैसी गए थी कल्पवृक्ष और कामधेनु से जो कुछ मांगा जाता था वह अपने आप पूरा हो जाता था इस अद्भुत नगरी का और कर किसी को मालूम नहीं था जो धरती के साथ आकाशगंगा का चक्कर काटती रहती थे इस अमरावती में देवताओं की कृपा से या भगवान शिव की कृपा से ही कुछ गिने चुने लोग और रक्षा तथा दैत्य प्रवेश कर सकते थे बहुत बार से राक्षसों ने जीता और कालांतर में स्वर्ग कहां चला गया उसका कुछ आता पता नहीं है।
परम अद्भुत इंद्रप्रस्थ और वहां का जादू जैसा सभा भवन
इसका निर्माण देव शिल्पी विश्वकर्मा ने मय दानव के साथ मिलकर किया था जो रक्षा होने के बावजूद उनका शिष्य था कृष्ण के आवाहन पर इंद्रप्रस्थ नगर का और उसकी सभा भवन का निर्माण हुआ था जो धरती पर अपने ढंग का एकमात्र अद्वितीय नगर और सभा भवन था यह इतना विचित्र था कि दुर्योधन जैसे लोगों को जल के स्थान पर स्थल और स्थल के स्थान पर जल दिखाई देता था जिसमें गिरकर अपमानित दुर्योधन ने अंत में महाभारत युद्ध में सब कुछ नष्ट कर दिया आज उसके कुछ खंडहर बचे हुए मिलते हैं
इंद्र का वज्र और अदिति के कवच कुंडल
देव शिल्पी विश्वकर्मा ने आसमान में चमकने वाली महा भयंकर विद्युत द्वारा इंद्र का वज्र बनाया था जिसमें 100 विचित्र अस्त्र-शस्त्र लगे थे जो प्रकाश की गति से शत्रु पर प्रहार करता था और जिस पर चलाया जाता था उसका अंत निश्चित हो जाता था इसी को पाकर ही इंद्र एक महान और अजेय योद्धा बन गए थे इसके केंद्र भाग में हीरे और सोने से जड़े हुए अल्फा बीटा गामा किरणें निकलने वाले यंत्र थे इसके अतिरिक्त देव माता आदित्य के लिए परम अद्भुत सोने के कुंडल विश्वकर्मा ने बनाए थे जिसकी चमक कभी फीकी नहीं पड़ती थी और जो कभी नष्ट नहीं होता था
इन सब के अलावा देव शिल्पी विश्वकर्मा ने दुनिया के अधिकांश अस्त्र-शस्त्र और दिव्यास्त्र तथा भयंकर अस्त्र शस्त्रों का निर्माण किया था उन्होंने ही अपने पिता के साथ मिलकर वास्तु और शिल्प कला का विकास किया था आज भी बड़े-बड़े और छोटे घर वास्तुशास्त्र के अनुसार बनाए जाते हैं और आज भी वैसे हथियार आधुनिकतम यंत्र से सज्जित सुपर कंप्यूटर भी नहीं बना सकते जैसा कि उन्होंने बनाया था देव शिल्पी विश्वकर्मा के लिए केवल न भूतो न भविष्यति ही कहा जा सकता है।
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