मासूमियत पर हमला और समाज की जिम्मेदारी
मासूम अदाओं से माँ-बाप का दिन सँवर जाता था,
उसकी एक मुस्कान के आगे पत्थर भी मोम बन जाता था।
जिस घर में खिलखिलाहट थी, आज वहाँ सन्नाटा छाया है,
नन्ही परी की पीड़ा ने हर दिल को रुलाया है।
आज मासूम पीड़िता रो रही है, तड़प रही है, दर्द से चीख रही है।
वह बार-बार कह रही होगी,
“माँ, मुझे बचा लो… बहुत दर्द हो रहा है।
माँ, मुझे घर ले चलो… कल मुझे स्कूल जाना है।
माँ, अब मैं तुझे परेशान नहीं करूँगी।
जो तू कहेगी, वही करूँगी… बस एक बार मुझे घर ले चलो।”
शायद यही शब्द उस पीड़िता गुड़िया के मासूम होंठों से निकल रहे होंगे,
जो आज दर्द और भय से जूझते-जूझते अपनी माँ की गोद को पुकार रही है।
जरूरत इस बात की है कि पुलिस जवानों को ऐसा प्रशिक्षण दिया जाए कि इंसान रूपी भेड़ियों पर समय रहते सटीक वार किया जा सके।
सलमान जैसे दरिंदे को पुलिस की गोली पैर पर नहीं, सीने पर लगनी चाहिए थी—क्योंकि ऐसे लोग समाज में रहने के लायक नहीं होते।
मासूम गुड़िया, जिसने सिर्फ छह साल की उम्र देखी थी, उसके साथ हुई यह अमानवीय ज्यादती सोचकर ही दिल कांप उठता है।
सच पूछा जाए तो हम इंसानों से बेहतर तो जानवर हैं, जो कम से कम अपनी संतान की रक्षा करते हैं।
हमारे समाज में बच्चियाँ केवल घर की खुशी नहीं—वे भविष्य की आशा, संवेदनशीलता और पवित्रता का प्रतीक होती हैं।
लेकिन यही मासूमियत आज सबसे बड़े खतरे के सामने खड़ी है—बच्चियों के साथ होने वाला यौन शोषण।
यह केवल एक अपराध नहीं, बल्कि मानवता पर सबसे घिनौना और निर्मम प्रहार है।
एक बच्ची के साथ यह अत्याचार उसकी उम्र, उसकी समझ और उसकी पूरी मासूम दुनिया को चकनाचूर कर देता है।
यह घाव सिर्फ शरीर पर नहीं, आत्मा पर बनता है—और कई बार जीवनभर नहीं भरता।
सलमान को “असुर” कहना भी छोटा शब्द लगता है।
उसने न केवल इंसानियत, बल्कि अपने धर्म और पूरे समाज को कलंकित किया है।
गोहरगंज के नागरिकों ने संयम रखा, वरना यह शहर आज दंगे की पहचान का दाग झेल रहा होता।
पुलिस से बस एक गलती हुई,
गोली गलत जगह लगी।
अगर गोली डेढ़–दो फीट ऊपर लगती, तो न वकील की जरूरत पड़ती, न दलील की, न अदालत की लंबी प्रक्रिया…
जहाँ अपराध हुआ था, वहीं उसका अंत हो जाता।
लेकिन वह असुर बच गया।
अब छोटा कोर्ट, फिर बड़ी अदालत, और फिर देश की सर्वोच्च अदालत…
सालों-साल लग जाएंगे।
और इस दौरान पीड़ित माँ की आँखों में बहे खून के आँसू—क्या वे किसी कानून की किताब देख पाएगी?
सोचिए उस माँ के दिल पर क्या बीती होगी,
जब उसकी नन्ही गुड़िया दर्द से तड़प रही होगी,
जिंदगी और मौत के बीच झूल रही होगी।
केवल छह साल पहले ऊपरवाले ने उसकी गोद में यह नन्ही परी भेजी थी—
छोटी-सी, प्यारी-सी, भोली-सी बच्ची।
जब रोती थी, तो माँ उसे सीने से लगा लेती;
जब मुस्कुराती थी, तो उसकी मुस्कान माँ की दुनिया रोशन कर देती थी।
लेकिन आज वही माँ अस्पताल में अपनी बेटी की चीख़ें सुनकर टूट चुकी है।
बीती यादें उसकी आँखों में आँसुओं की धारा बनकर बह रही हैं।
अब आप ही बताइए—
ऐसे दरिंदों, ऐसे असुरों, ऐसे हैवानों को आखिर कौन-सी सज़ा मिलनी चाहिए?
पुलिस से बस इतनी ही गलती हुई—गोली गलत जगह लगी।
अगर दो फीट ऊपर चलती, तो समाज एक दानव से मुक्त हो जाता।
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बच्चियों को बचाना केवल उनके माता-पिता की नहीं, बल्कि पूरे समाज की जिम्मेदारी है।
जब एक बच्ची सुरक्षित रहती है — समाज सुरक्षित रहता है।
जब एक बच्ची हँसती है — समाज मुस्कुराता है।
और जब एक बच्ची पर अत्याचार होता है — वह पूरे मानव समाज पर कलंक बन जाता है।
यदि हम सच में एक बेहतर कल बनाना चाहते हैं,
तो सबसे पहले अपनी मासूम बेटियों की सुरक्षा को प्राथमिकता देनी होगी।
क्योंकि बच्चियाँ सिर्फ घरों की रोशनी नहीं—समाज की आत्मा हैं।
🙏🙏🙏
मोहम्मद जावेद खान
संपादक, भोपाल मेट्रो न्यूज
मो.: 9009626191
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