सम्राट गाधि के पुत्र विश्वामित्र और पुत्री सत्यवती थी बाद में विश्वामित्र आर्यावर्त के सम्राट बने और सत्यवती का विवाह ऋचीक ऋषि से हो गया और यही ऋचीक परशुराम के दादा थे और ब्रह्म ऋषि विश्वामित्र की बहन सत्यवती थी इसलिए ब्रह्म ऋषि विश्वामित्र भगवान परशुराम के नाना हुए
कालांतर में एक अजर अमर अजय पुत्र की इच्छा से परशुराम के पिता और माता रेणुका ने भगवान विष्णु की घनघोर तपस्या किया और भगवान विष्णु ने स्वयं उनके गर्भ से अवतरित होने का वरदान दिया और उनके पांचवें पुत्र के रूप में भगवान विष्णु के छठे अवतार भगवान परशुराम का जन्म हुआ
भगवान परशुराम की कथा समझ पाना इतना आसान नहीं है वह पूरे भूमंडल पर किसी के विरुद्ध नहीं थे बल्कि सत्य के साथ थे और जो भी आता है अत्याचारी थे उनको पराजित करके उनका विनाश करना उनका मुख्य लक्ष्य था
अपने पिता से सभी शास्त्रों का ज्ञान प्राप्त करने के बाद भगवान परशुराम ने शस्त्र विद्या सीखने की इच्छा की तो उन्होंने उन्हें नाना परशुराम के पास भेजा जो समय भूमंडल पर अस्त्र-शस्त्र और दिव्यास्त्रों के सबसे बड़े और महान ज्ञाता थे उनके साथ रहकर परशुराम ने शस्त्र विद्या में अभूतपूर्व कुशलता प्राप्त की और उनसे याचना की कि हमें ऐसी शक्ति दो कि हम दुनिया में सभी लोगों को यहां तक की देवताओं को भी परास्त कर सके तब विश्वामित्र ने आशीर्वाद देते हुए उन्हें भगवान शिव की आराधना करने को कहा जो संसार की सारी शक्तियों के स्रोत हैं
इस पर भगवान परशुराम ने भगवान शिव की एकाग्र भाव से घनघोर तपस्या की और उन्होंने प्रसन्न होकरपरशुराम को आशीर्वाद और वरदान दिया और एक दिव्य परसु दिया और कहा कि जब तक उनके हाथ में रहेगा उन्हें कोई नहीं हरा सकता पारस धारण करने के कारण ही उनका नाम राम से परशुराम हो गया
अस्त्र-शस्त्र विद्या सीकर में अपने पिता के आश्रम में लौट आए और नियम पूर्वक रहने लगे इसी बीच कालांतर में रेणुका पूजा पाठ के लिए जल लेते समय राजा सहस्त्रबाहु और उनकी रानियां की कम खरीद देखकर मोहित हो गई और तपस्या में देरी होते देखा सही कारण जानकर क्रोधित हुए जमदग्नि ऋषि ने अपने सभी पुत्रों को मां का वध करने की आज्ञा दी लेकिन कोई तैयार नहीं हुआ लेकिन परशुराम ने तत्काल ही पिता की आज्ञा पालन किया और मां का सिर काट दिया बाद में ऋषि प्रसन्न हुए और वर मांगने को कहा तो परशुराम ने अपनी मां को जीवित करने और उन्हें इसकी याद ना रहने का वरदान मांगा प्रसन्न पिता ने उन्हें अजर अमर और अजेय होने का वरदानदिया
एक बार सम्राट सहस्त्रबाहु सेवा के साथ ऋषि के आश्रम में आया अतिथि धर्म का पालन करते हुए ऋषि ने उनका और उनकी सेवा का कुबेर और कामधेनु की सहायता से अभूतपूर्व सम्मान किया लेकिन सम्राट सहस्त्रबाहु के द्वारा कामधेनु और कुबेर मांगने पर उन्होंने असमर्थता व्यक्त किया और कहा यह हमारी नहीं स्वर्ग की चीज हैं इसे कोई मानव नहीं ले सकता क्रोधित हुए सहस्त्रबाहु अर्जुन ने आश्रम उजाड़ कर परशुराम के पिता ऋषि जमदग्नि की क्रूरता से हत्या कर दिया।
माता रेणुका की आर्तनाद करने पर तपस्या लीन भगवान परशुराम को अभूतपूर्व क्रोध आया और उन्होंने माहिष्मती में जाकर सम्राट सहस्त्रबाहु से घनघोर युद्ध करते हुए उसकी हजार भुजाएं काट गिराया और गर्दन भी काट दिया यहां तक तो सब कुछ ठीक था लेकिन बाद में फिर से उनके तपस्या में लीन होने पर उसे अहंकारी लंपट और दुष्ट सम्राट के पुत्रों ने आश्रम के सभी ऋषि मुनियों को परशुराम के भाइयों को मार डाला और मां रेणुका को करने के लिए पीछा किया तो उन्होंने नदी में जल समाधि ले लिया परशुराम को सब कुछ पता चला तो उन्होंने सारे पुत्रों को मार गिराया और ईश्वर की कृपा से अपने चारों भाइयों माता और पिता को पुनर्जीवित किया।
जिस तरह माता काली को चंद मुंड का संघार करके अत्यंत क्रुद्ध हुआ था उसी तरह भगवान परशुराम इतने अधिक क्रोधित थे कि उन्होंने खोज खोज कर 21 बार है वंश के राजाओं को और उनके वंश को मिटा डाला और संपूर्ण संघार करने को तैयार देख उनके दादा ऋचीक स्वर्ग से उतरे और उन्हें बहुत ही धिक्कारा और उन्होंने दिखाया की धरती राजाओं के न रहने से अस्त्र-शास्त हो गए हैं उन्होंने परशुराम को सब कुछ छोड़कर तपस्या करने का आदेश दिया परशुराम ने उनकी आज्ञा का पालन किया और संपूर्ण धरती को कश्यप ऋषि को दान कर दिया और तपस्या करने चले गए आज भी रेणुका कुंड परशुराम तालाब विद्यमान है और जौनपुर का जमैथा गांव जिसे पहले जमदग्नि ऋषि के नाम जमदग्नि पुरम कहा जाता था और आज का जौनपुर जनपद है
कालांतर में भगवान श्री हरि विष्णु के अगले अवतार भगवान राम हुए और उन्होंने भगवान शिव के धनुष को तोड़कर भगवती सीता का वर्णन किया उसे धनुष की घनघोर टंकार सुनकर परशुराम की तपस्या भंग हुई बाद में भगवान राम से उनका घनघोर युद्ध हुआ और परास्त होने पर वह फिर से महेंद्र पर्वत पर चले गए।
कालांतर में बहुत अधिक समय बीत जाने पर जब धरती पर राक्षसी और विधर्मी शक्तियों का प्रादुर्भाव हो गया और वह बहुत बलवान हो गए तब एक बार फिर शास्त्र शिक्षा देने के लिए भगवान परशुराम अपने आश्रम आए और वहां पर देवव्रत भीष्म और कारण जैसे लोगों ने उनको गुरु मानकर शिक्षा लिया और संसार के सबसे बड़े योद्धा बने कालांतर में भीष्म से अंबा को लेकर परशुराम का भीषण युद्ध हुआ जिसमें परशुराम परस्त हुए फिर भी गुरु शिष्य परंपरा को सम्मान देते हुए उन्होंने भीष्म को आशीर्वाद दिया और अंतिम बार महेंद्र पर्वत पर तपस्या करने चले गए यही उनका अंतिम प्रमाणिक वर्णन मिलता है यद्यपि यह सत्य है कि वह आज भी जीवित हैं और उनको बहुत बार देखे जाने की घटनाएं भी हुई है
भगवान परशुराम का जीवन चरित्र इतना विस्तृत है जिस पर बहुत से महाकाव्य लिखे जा सकते हैं लेकिन यह छोटा सा लेख इसलिए लिखा गया है जिससे यह बताया जाए कि भूमंडल पर एक भी व्यक्ति एक भी क्षत्रिय या राजपूत ऐसा नहीं है जो परशुराम के किसी कार्य का विरोध करें इसी तरह संपूर्ण धरातल पर एक भी व्यक्ति या ब्राह्मण नहीं है जो भीष्म या भगवान श्री राम की बुराई करें लेकिन कालांतर में विदेशी लोगों ने बाद में मुसलमानों और फिर अंग्रेजों ने इसमें गद्दार देशद्रोही धर्मद्रोही पैसों पर बाइक पंचमकार से युक्त कुछ सनातनी लोगों को मिलाकरब्राह्मण क्षत्रिय फूट का बीज बोया इसलिए ऐसी चीजों से दूर हटाना ही श्रेयस्करहैं हमारे दिव्या और पवन देश में तो ब्राह्मण और क्षत्रिय भी वाल्मीकि वेदव्यास रविदास जी कबीर दादू काग भूसुंडी शबरी मतंग ऋषि जैसे वैश्य और शूद्र ऋषि मुनियों की पूजा करते हैं यह सब कुछ राजनेताओं और उपयुक्त कह गए लोगों की चाल है जो आज सनातन धर्म बट गया है और आपस में लड़कर समाप्त हो रहा है जबकि क्रिश्चियन में 12 और मुसलमान में 172 जातियां हैं लेकिन वह आपस में नहीं लड़ते हैं अगर लड़ते भी हैं तो धर्म के नाम पर एक हो जाते हैं
भगवान परशुराम की जीवन गाथा बहुत ही विस्तृत है जो सम्राट मांधाता मुछुकुंद वेदव्यास वाल्मीकि भगवान श्री राम विश्वामित्र की तरह दिग्विगंत में व्याप्त है एक बार उन्होंने रावण को परास्त कर क्रोधित होकर उसका वधकरने के लिए अपना परशु उठाया लेकिन भगवान शिव का भक्त और श्री राम के अवतार द्वारा उसका वध होने की बात याद आने पर उन्होंने उसे जिंदा छोड़ दिया उन्होंने ही रावण को सहस्त्रबाहु अर्जुन के कारागार से मुक्त कराया था बाल्य काल में भगवान श्री राम और लक्ष्मण भी उनके आश्रम में कुछ समय रहे थे एक बार उन्होंने क्रोधित होकर भगवान श्री गणेश से युद्ध करके गणेश जी का एक दांत काट डाला था भगवती पार्वती के परम क्रोधित होने पर उन्होंने स्तुति करके उनकी कृपा प्राप्त किया था।
आज हमारा भारत देश तमाम झंझावाद से आतंकवाद उग्रवाद नक्सलवाद से अन्याय अत्याचार से भ्रष्टाचार घूसखोरी से और राजनेताओं के द्वारा अपनी साथ पीढ़ियां सवार कर जनता को लूटने जैसी प्रवृत्तियों से भरा है अन्याय अत्याचार आज्ञा अंधकार और विधर्मी प्रबल हो रहे हैं सनातन धर्म और अखंड भारत दिनों दिन क्षीण होता जा रहा है ऐसे में आज एक साथ भगवान श्री राम परशुराम जैसे दिव्य अवतारी पुरुषों की आवश्यकता है हमारे राजनेता और अधिकारी तथा सरकारी तंत्र जनता की एक भी समस्या का हल नहीं कर सकता। भारत के मुख्य भूभाग की भूमि जो ईरान से लेकर इंडोनेशिया कजाकिस्तान तिब्बत से श्रीलंका और मालदीप तक फैली है आज वह एक बटे सात भाग में सीमित रह गए हैं इसको अखंड बनने के लिए एक अधूतपूर्व सिंह जैसे पराक्रमी परशुराम जैसे क्रोधी और भगवान श्री राम जैसे धनुर्धारी की आवश्यकता है भारत का कोई भी राजनेता ऐसा नहीं है जो भारत की 1 इंच छीनी गई जमीन को भारत में मिल सके भगवान परशुराम को ध्यान से पढ़कर हर व्यक्ति अन्य अत्याचार शैतानी राक्षसी शक्तियों के विरुद्ध होकर उनका वध करने के लिए तत्पर हो जाएगा
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