Wednesday, 13 July 2022

भगवान शिव सभी धर्म सभी सभ्यताओं में पूजे जाते हैं और सम्मानित हैं मक्का मदीना के मक्केश्वर माया और इंका सभ्यताओं के पशुपतिनाथ और मातृ देवी तथा सिंधु घाटी हड़प्पा लोथल की सभ्यता में चीन मिश्र यूनान और रोम की सभ्यता में और ऑस्ट्रेलिया की सभ्यताओं में भी उनके अलग-अलग रूप दिखाई पड़ते हैं थोड़े से ही तपस्या से प्रसन्न होकर अपने ही विरुद्ध वरदान देने वाले संपूर्ण सृष्टि के एकमात्र देव हैं और जब व प्रसन्न होते हैं तो 1000000000 करोड़ ब्रह्मांड खुशी से नाच उठते हैं और उनके तांडव नृत्य करते हैं सारे सृष्टि टूट टूट कर बिखरने लगती है अरबों आकाशगंगाएँ नष्ट हो जाती हैं। अनगिनत ब्लैक होल अर्थात कृष्ण नक्षत्र चकनाचूर हो जाते हैं

*अखिल ब्रह्मांड में सृष्टि के मूल देवों के देव आदि देव महादेव भगवान शिव के बारे में पूर्ण वैज्ञानिक और मौलिक जानकारी*

 भगवान शिव और भगवती पार्वती इस सारी सृष्टि के मूल हैं जो 1000000 अरब प्रकाश वर्ष में संपूर्ण लोगों में  एक करोड़ अरब प्रकाश गंगा के रूप में फैली है भगवान शिव का प्रत्येक कार्य परम अद्भुत परम विचित्र और सृष्टि की समझ के परे है । भगवान शिव का स्वरूप परम अद्भुत है यह आशुतोष हैं  अवढरदानी हैंऔर इनकी गति अनंत है इनकी अर्धांगिनी भगवती पार्वती का एक रूप कृष्ण नक्षत्र अर्थात महाकाली है जिसे आधुनिक विज्ञान ब्लैक होल के नाम से जानता है जिसमें सारा लोक और ब्रह्मांड विनष्ट हो कर समाहित हो जाता है उनके वेग को रोकना भगवान शिव के ही बस में है ।

जब प्रबल क्रोध में भगवती महाकाली ने चंड मुंड रक्तबीज और असंख्य राक्षसों का वध कर पूरे ब्रह्मांड को जलाना चाहा और सारी शक्तियां उन्हें रोकने में असफल रही तब भगवान शिव उनकी राह में लेट गए और उनके वक्षस्थल पर मां काली का पैर पड़ते ही उनकी सारी शक्तियां स्वयं भगवान शिव में समाहित हो गई उनकी लपलपाती निकली जीभ का यही वैज्ञानिक प्रमाण हैं जो भगवान शिव के आनंद बेद और अल्फा बीटा गामा किरणों में समा जाती है।
इनके तीन नेत्र जहां अल्फा बीटा और गामा किरणों का प्रतीक है तो वहीं इन का त्रिशूल प्रोटॉन इलेक्ट्रॉन और न्यूट्रॉन की ऊर्जा से  भरा हुआ है जिससे पलक झपकते ही वे संपूर्ण सृष्टि का संहार कर सकते हैं इनके तेज से निकलने वाली किरणे़ संपूर्ण विश्व को जीवन देती है तो जब क्रोध में इनकी तीसरी आंख खुलती है तो उससे लेजर और क्वाजर किरणों के साथ गामा की महाप्रलयंकारी किरणें निकल कर सामने पड़ने वाले सभी प्राणियों ग्रह नक्षत्र आकाशगंगा को भस्मीभूत कर देती हैं ।भगवान शिव अर्धनारीश्वर हैं पशुपतिनाथ हैं त्रिपुरारी हैं नंदीश्वर हैं  महाकाल हैं  रूद्र हैं  बसु हैं  और भैरव तथा  वीरभद्र के अवतार हैं और संपूर्ण सृष्टि में सबसे भयंकर हलाहल कालकूट विष को पान करने के बाद भी जीवित रहने वाले हैं जिस कालकूट विष की कुछ बूंदें गिरने से ही संपूर्ण संसार के विष और विषैले प्राणी उत्पन्न हुए हैं ।

उनके मस्तक पर विराजमान अमृत वर्षा करने वाला चंद्रमा उनके कालकूट महा विष को और उस के दुष्प्रभाव को निरंतर पीता रहता है जटाओं में समाहित गंगा प्रत्येक अहंकारी अभिमानी का मान मर्दन कर देती हैं और त्रिशूल में बंधा हुआ डमरु ध्वनि अर्थात नाद शब्द की महत्ता दिखाता है जिससे संपूर्ण सृष्टि उत्पन्न हुई है इतना ही नहीं बल्कि उसी डमरू से सारे ध्वनि ओंकार और पाणिनि के 14 सूत्र भी निकले हैं जिससे सारे संसार की भाषाओं का व्याकरण और लिपियों का निर्माण हुआ।  और आज का विज्ञान है यह मान चुका है कि ध्वनि और नाद शृष्टि का मूल है जिसकी ऊर्जा अनंत होती है।

  भगवान शिव सभी धर्म सभी सभ्यताओं में पूजे जाते हैं और सम्मानित हैं मक्का मदीना के मक्केश्वर माया और इंका सभ्यताओं के पशुपतिनाथ और मातृ देवी तथा सिंधु घाटी हड़प्पा लोथल की सभ्यता में चीन मिश्र यूनान और रोम की सभ्यता में और ऑस्ट्रेलिया की सभ्यताओं में भी उनके अलग-अलग रूप दिखाई पड़ते हैं थोड़े से ही तपस्या से प्रसन्न होकर अपने ही विरुद्ध वरदान देने वाले संपूर्ण सृष्टि के एकमात्र देव हैं और जब व प्रसन्न होते हैं तो 1000000000 करोड़ ब्रह्मांड खुशी से नाच उठते हैं और उनके तांडव नृत्य करते हैं सारे सृष्टि टूट टूट कर बिखरने लगती है अरबों आकाशगंगाएँ  नष्ट हो जाती हैं। अनगिनत ब्लैक होल अर्थात कृष्ण नक्षत्र चकनाचूर हो जाते हैं

 उनके क्रोध और भैरवनाद से वीरभद्र जैसे महागण प्रकट होते हैं जो दक्ष जैसे तीनों लोकों के स्वामी का सर काट कर शिवजी को चढ़ा देते हैं शिव जी के द्वारा मान्य बेलपत्र बेर भांग और धतूरे तथा अन्य पुष्प पत्र दुनिया की सबसे चमत्कारी औषधियां हैं जिन पर व्यापक शोध हो रहा है ।
और आगे भी जारी हैं।  उनका रहन-सहन वेशभूषा सब कुछ परम आश्चर्य का विषय है व्याघ्र का  चर्म सांप की माला बैल और व्याघ्र तथा मयूर सिर पर गंगा हृदय स्थल में पार्वती मां श्मशान घाट में निवास सब कुछ परम आश्चर्यजनक और वैज्ञानिक  है।

 भगवान शिव दुग्ध और पुष्प पत्रों का अभिषेक सावन मास में स्वीकार करते हैं जो वर्षा की बूंदों से और वर्ष भर की गंदगी से विषैले हो जाते हैं परंतु दुग्ध के साथ शिवलिंग पर चढ़ते ही उनका सारा विष अमृत में बदलकर बहने लगता है जो वर्षा ऋतु में सभी नदियों जलाशयों तालाब याद में एकत्र होकर संपूर्ण विषैले जल को जो तेजाब और अम्ल युक्त होता है उसे औषधि और अमृत में बदल देता है उनके शिवलिंग की महिमा न्यारी है जिसमें संपूर्ण  परमाणु जैव नाभिकीय रासायनिक धार्मिक और  आध्यात्मिक शक्तियां विद्यमान रहती हैं ।  महा रुद्राभिषेक में प्रयुक्त किए गए जड़ी बूटियों औषधियों और पूजा हवन सामग्री को मिला देने पर सबसे जहरीला और प्रदूषित पदार्थ और पानी शुद्ध हो जाता है जिन पेड़ों में तीन पत्ते होते हैं जैसे बेर बेल वे शिवजी को अत्यधिक प्रिय हैं।

बाघ का चर्म पहनकर हिम मंडित कैलाश शिखर पर रहना और मानसरोवर झील में भगवती पार्वती के साथ निवास करना और बिहार करना सबके लिए परम आश्चर्य का केंद्र है जहां तापमान ऋणात्मक बिंदु से भी 70 से 80 डिग्री नीचे पहुंच जाता है और हवाएं इतनी भयंकर गति से चलती है कि चारों ओर ओम की ध्वनि बिखरती रहती है इतना ही नहीं कैलाश पर्वत पर भी ऊपर से देखने पर ओम स्पष्ट लिखा हुआ दिखता है और सारे संसार में आज तक कोई भी कैलाश पर्वत पर अपनी पताका फहरा नहीं पाया है । इसे जीतने के पर्वतारोहियों के सारे प्रयास विफल हुए हैं ।

वे देव दनुज दानव मानव नाग अवर्ण सवरण आदिवासी वनवासी सबके लिए एक समान है जो परम उदार हैं और अपनी परम प्रिय अर्धांगिनी पार्वती के लिए बड़े मनोयोग से सोने की  निर्मित लंका को दान में रावण को बिना किसी हिचकिचाहट के दे देते हैं शिवजी हर देश काल समय में रचे बसे हैं।और उसके ऊपर हैं। वे स्वयं सभी देवी देवताओं द्वारा पूज्य होकर भी भगवान विष्णु की पूजा करते हैं इस प्रकार अपनी विश्व के सबसे दूसरा स्थान जैसे श्मशान और कैलाश मानसरोवर और अमरनाथ की गुफाएं उनके सबसे प्रिय स्थान हैं।

 सतयुग त्रेता द्वापर कलयुग में हर समय विद्यमान रहते हैं सतयुग त्रेता द्वापर में तो शिवजी का प्रामाणिक वर्णन है ही कलयुग में ही सम्राट विक्रमादित्य सम्राट हर्षवर्धन देवराहा बाबा तैलंग स्वामी बाबा कीनाराम अवधूत भगवान राम जैसे तमाम लोगों ने इनका प्रत्यक्ष दर्शन किया है और हम आप भी साधना में भगवान शिव भगवती पार्वती का प्रत्यक्ष अनुभव करते हैं सभी के प्रति समान होते हुए भी घनघोर संकट और आपत्ति काल में भगवान शिव उसी का साथ देते थे जो अधिक सच्चाई और सत्य की ओर रहता था उन्होंने देव दानव मानव सबको ऐसे वरदान दिया जाए उन्हीं के लिए संकट का कारण बने परंतु इससे उन पर कोई अंतर नहीं पड़ा।

 बे दैत्य राक्षस दानव भूत महाभूत काल महाकाल दानव मानव शैतान प्रेत  यक्ष किन्नर गंधर्व पशु पक्षी मानव  सबके परम प्रिय हैं और उनका सबसे प्रिय स्थान शमशान है और शमशान की राख बड़े प्रेम से अपने शरीर पर भस्म के रूप में लगाकर परम आनंदित होते हैं संसार का कल्याण करने के नाते उनका नाम शंकर और अत्यधिक प्रिय और कल्याणकारी होने के नाते शिव है और भोलेनाथ भूत भावन इसलिए कि आसानी से प्रसन्न हो जाते हैं ।

और भूतों के प्रिय महाभूत और  काल के महाकाल हैं क्योंकि सारे भूत और काल उन्हीं में समाहित हो जाते हैं वह संपूर्ण समय द्रव्यमान पदार्थ काल की अंतिम सीमा है एक तरफ भगवान राम को प्रत्यक्ष दर्शन देकर वरदान देते हैं तो दूसरी तरफ रावण को भी वर देते हैं नंदी और महाकाल रावण और बाणासुर जैसे लोग उनके द्वार पाल हैं देवताओं के सभा के में सबसे सम्मानित सदस्य हैं अपने संपूर्ण ज्ञान कला को स्वरूप में पारित करना लोक कल्याण के लिए लगा देना और अंतहीन कल्पना करना शिव जी का स्वभाव है ।

उनके अस्तित्व को सभी भौतिक जीव और रसायन विज्ञानियों ने भी माना है वे अनंत हैं अक्षय हैं आदिदेव के साथ आदि पुरुष भी हैं भारत में प्रकृति पर्यावरण और शक्तियों को संतुलित स्वच्छ करने के लिए तमाम ज्योतिर्लिंग अर्थात शिवलिंग की स्थापना किया गया जिसमें सोमनाथ मल्लिकार्जुन महाकालेश्वर ओमकारेश्वर बैद्यनाथ भीम शंकर रामेश्वर नागेश्वर विश्वनाथ त्रंबकेश्वर केदारनाथ घृष्णेश्वर पूरे भारत में फैले हुए हैं और इनसे हमेशा तेजस्वी किरणें अर्थात रेडियो एक्टिव तत्व निकलते रहते हैं ।

भारत में गिरने वाले तेजस्विता पूर्ण पिंडों से शिव की शक्ति से ही ज्योतिर्लिंगों का निर्माण हुआ महा प्रलय काल में वायु पुराण और शिव पुराण के अनुसार सारी सृष्टि शिवलिंग में लीन हो जाती है और एक ही सृष्टि का बिंदु नाथ स्वरूप है और महा विस्फोट सिद्धांत के अनुसार जिसे  बिग बैंग थ्योरी कहते हैं ध्वनि ऊर्जा धन और ऋण बिंदुओं से फिर से आकाशगंगा ओं का निर्माण और जीवन की सृष्टि होती हैं बिना ऊर्जावान नर नारी के सृष्टि का निर्माण संभव है ।

शिव जी की महत्ता की गौरव गाथा वेद पुराण उपनिषद विज्ञान धर्म दर्शन भैरव और शिव ग्रंथों शिव पुराण शिव संगीता मैं ही नहीं संपूर्ण दुनिया की लोक कथाओं में समाई है तंत्र मंत्र यंत्र और सारे अस्त्र-शस्त्र और  पाशुपत पिनाक नारायण अस्त्र चक्र सहित सभी दिव्यास्त्र भगवान शिव ने ही बनाए हैं और देवताओं सहित असुरों और दैत्यों तथा मनुष्यों को उन्होंने ही प्रदान किया है भगवान श्री राम रावण अर्जुन को दिए गए पशुपता अजगव जैसे अस्त्र-शस्त्र इसके प्रमाण हैं।  गीत संगीत शब्द नाद व्याकरण सब कुछ भगवान शिव से उत्पन्न हुए हैं

 संसार को मोक्ष प्रदान करने के लिए भगवान शिव ने भगवती पार्वती को अपने अमृत कथा अमरनाथ की पवित्र गुफा में किए जिससे तमाम शाखाए निकली और विज्ञान भैरव तंत्र का भी निर्माण हुआ है संपूर्ण धरती पर एकमात्र अमरनाथ की पवित्र गुफा में ही शिवलिंग का निर्माण होता है शिव जी ने ही हठयोग सहित समस्त ज्ञान विज्ञान की शाखाओं का निर्माण किया है ।

शिव जी के अनंत नामों में 108 नाम अधिक प्रचलित हैं उसमें भी शिव महादेव महाकाल नीलकंठ शंकर पशुपतिनाथ गंगाधर नटराज त्रिनेत्र भोलेनाथ आदिदेव आदिनाथ त्रियंबक जटाशंकर जगदीश विश्वनाथ शिव शंभू भूतनाथ महारुद्र वीरभद्र और हनुमान अधिक प्रचलित है जय परंपरा में शिव जी की भक्ति और उनकी पूजा करने का किसी को मना ही नहीं है इसीलिए सब वैष्णव शाक्त दशनामी दिगंबर श्वेतांबर लिंगायत तमिल शैेव काल मुख कश्मीरी शैव वीरशैव नाग पाशुपत कापालिक काल दमन महेश्वर चंद्रवंशी सूर्यवंशी अग्रवंशी नागवंशी सभी शिव की परंपरा को मानते हैं।

 यक्ष किन्नर गंधर्व राक्षस मानव सबके आदि देव भगवान शिव हैं सभी बनवासी कोल भील किरात आदिवासी उनका ही धर्म मानते हैं कामदेव को जीतने और भस्म करने की क्षमता भगवान शिव में ही है गणेश और दक्ष के कटे सिरों को जोड़कर फिर से जीवित कर के विज्ञान का सबसे बड़ा चमत्कार किया जो आज भी किसी के द्वारा असंभव है ब्रह्मा जी के छल करने पर त्रिशूल से पांचवा सिर काटकर उनके अहंकार को समाप्त किया और उन्हें पवित्र किया।

 भगवान शिव के वैसे तो अनंत अनुयाई और शिष्य है लेकिन उसमें भी मनु विशालाक्षी बृहस्पति शुक्र सहसराक्ष महेंद्र प्रचेता भारद्वाज अगस्त गौरी कार्तिकेय भैरव गोरखनाथ वीरभद्र मणिभद्र नंदी श्रृंगी घंटाकर्ण बाणासुर रावण विजय दत्तात्रेय शंकराचार्य मत्स्येंद्रनाथ का नाम प्रमुख है जिन्होंने शिव भक्ति का व्यापक प्रचार प्रसार किया शिवजी के व्रत और त्योहार तथा उत्सव सोमवार के प्रदोष के और श्रावण मास के तथा शिवरात्रि और महाशिवरात्रि के माने जाते हैं ।

शिव जी के द्वारा आविष्कार किए दो महामंत्र हैं पहला है ओम नमः शिवाय और दूसरा है महामृत्युंजय का ओम जूम शह मंत्र  ओम शिव पार्वती नमः  ओम नमः शिवाय  इत्यादि बोलकर  बेल पत्र गंगाजल अथवा दूध के साथ शिवलिंग पर चढ़ा कर उनका ध्यान करने और महामृत्युंजय मंत्र पढ़ने से मोक्ष और अमरत्व प्राप्त होता है सभी देवी देवताओं ने और भगवान श्री राम तथा कृष्ण और अर्जुन ने भी आसुरी और शैतानी शक्तियों पर विजय के लिए भगवान शिव का श्रद्धा के साथ पूजन करके उन्हें प्रसन्न किया और भगवान श्री राम द्वारा रामेश्वरम में स्थापित शिवलिंग तो विश्व विख्यात है ही 

शिव के पुत्र कार्तिकेय का वाहन मयूर है जबकि शिव के गले में जो वासुकी नाग हैं वह शेषनाग के भाई हैं दुनिया में परस्पर सारे विरोधी चीजें भगवान शिव में मिलते हैं जैसे मोर और नाग एक दूसरे के प्रबल दुश्मन हैं भगवान गणेश का वाहन चूहा है जबकि सांप प्रबल मूषक भक्षी जीव हैं भगवती पार्वती का वाहन सिंह है और शिव जी का वाहन नंदी बैल है अनेकता में एकता भगवान शिव की अद्भुत देन है।

 शिवजी के प्रमुख अवतारों में वीरभद्र पिप्पलाद नंदी भैरव महेश हनुमान शरभ दुर्वासा अश्वत्थामा वृषभ रतिनाथ कृष्ण दर्शन अवधूत भिक्षु आर्य सुरेश्वर किरात  सुमित नर्तक ब्रह्मचारी यक्ष विश्वनाथ दूधेश्वर हंस रूप द्विज नातेश्वर प्रसिद्ध है वेदों में रुद्र के 11 प्रमुख अवतार हैं जिनमें भव चंद्र शंभू बुद्ध आज पद शास्त्र विलो हित विरुपाक्ष भीम कपाली हैं ।

भगवान शिव के अनेक चिन्ह मिलते हैं जिनमें उनके पैरों के चिह्न तमिलनाडु के नागपट्टनम के शेरू बंगड़ी क्षेत्र में शिव मंदिर में मिलता है और तिरुवन्नामलाई में भी उनके परिजन हैं तेजपुर असम में जागेश्वर उत्तराखंड मैं और रांची में पहाड़ी बाबा मंदिर पर उनके पद चिन्ह मिलते हैं शिवजी की गुफाएं विश्वविख्यात हैं पहली गुफा भस्मासुर से बचने के लिए त्रिकूट पर्वत पर जम्मू से 150 किलोमीटर की दूरियों पर है और दूसरा विश्व विख्यात अमरनाथ की गुफा है जहां आज भी हर वर्ष परम अद्भुत शिवलिंग का निर्माण होता है ।

शिव जी इतने सरल और भोले हैं कि कोई भी पद चिन्ह लेकर या किसी भी चीज की कल्पना करके उनकी पूजा कर सकते हैं पत्थर का ढेला बटिया रुद्राक्ष त्रिशूल डमरू और और शिवलिंग उनके विशिष्ट माने जाते हैं भगवान शिव एक तरफ तो देव गुरु बृहस्पति को दूसरी तरफ दैत्य गुरु शुक्राचार्य को और विधर्मी लोगों असुरों तथा शैतानों  के अंति प्रिय हैं सभी को उनकी तपस्या पर वरदान दिया है सभी जाति वर्ण धर्म और समाज के सर्वोच्च सर्वप्रिय देवता हैं।

 भगवान शंकर ने भगवान बुद्ध के रूप में भी जन्म लिया है उसमें 27 बुद्ध के नाम प्रसिद्ध हैं जिसमें तरंकर शंकर और मैं घमँ कर विशेष प्रसिद्ध हैं जितने धर्म संप्रदाय हैं अगर गहराई से अध्ययन किया जाए तो उसका मूल है भगवान शिव और शैव धर्म में ही प्रकट होता है।

 शिव की एक पंचायत भी है जिसमें भगवान सूर्य गणपति भगवती पार्वती रुद्रा और विष्णु सम्मिलित हैं इनके प्रमुख गणों में वीरभद्र भैरव मणिभद्र नंदी श्रृंगी भृंगी संदेश  गोकर्ण घंटाकर्ण जय विजय पिशाच दांत नाग नागिन और पशु प्रसिद्ध है।

 शिवजी के प्रमुख 7 शिष्य है जिन्होंने सातों महाद्वीपों पर ज्ञान धर्म और सभ्यता का प्रचार प्रसार किया उत्तरी दक्षिणी अमेरिका यूरोप और एशिया अफ्रीका और आस्ट्रेलिया तथा अंटार्कटिका पर उनके शिष्यों ने ज्ञान विज्ञान की कला बिखेरी बृहस्पति विशालाक्षी शुक्राचार्य सहस राक्षस महेंद्र प्रचेता मनु और भारद्वाज तथा गौर सिरस इनमें प्रसिद्ध है इनके 7 पुत्र गणेश कार्तिकेय सुकेश जालंधर अय्यप्पा भीम और हनुमान माने जाते हैं ।।

भगवान शिवकीे प्रथम पत्नी परम सती महादेवी सती थी जिन्होंने शिव के अपमान पर अपना प्राण त्याग कर पार्वती के रूप में जन्म लिया । जिनके अनंत नाम है जिन्हें महागौरी महाकाली उमा उर्मी अपर्णा भवानी पुत्री इत्यादि नामों से जाना जाता है। भगवती पार्वती और भगवान शिव मिलकर अर्धनारीश्वर के रूप में समस्त सृष्टि का पालन पोषण और संहार करते हैं

 पूरे विश्व के सभी अस्त्र-शस्त्र भगवान शिव ने ही बनाया और सब को दान दिए उसमें भी त्रिशूल पिनाक धनुष चक्र सुदर्शन चक्र पाशुपत विश्व विख्यात है संपूर्ण सृष्टि और देवी-देवताओं के निर्माता होने से ही भगवान शिव को आदि देव आदिनाथ और भगवती पार्वती को आदि देवी माना जाता है।

 डॉ दिलीप कुमार सिंह ज्योतिष शिरोमणि और निदेशकअलका शिप्रा वैष्णवी ज्योतिष मौसम और विज्ञान अनुसंधान केंद्र

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