Thursday, 11 August 2022

*_स्वतन्त्रता की 75 वीं वर्षगाँठ पर यह लेख विस्मृत कर दिए गए सभी स्वातन्त्र्य वीरों और वीरांगनाओं को सादर समर्पित_*

*_स्वतन्त्रता की 75 वीं वर्षगाँठ पर यह लेख विस्मृत कर दिए गए सभी स्वातन्त्र्य वीरों और वीरांगनाओं को सादर समर्पित_*

झांसी के अंतिम संघर्ष में महारानी की पीठ पर बंधा उनका बेटा दामोदर राव (असली नाम आनन्द राव) सबको याद है। रानी के दाह संस्कार के बाद उस बेटे का क्या हुआ ? वह कोई कहानी का किरदार भर नहीं था बल्कि 1857 के विद्रोह की सबसे महत्वपूर्ण कहानी को जीने वाला राजकुमार था,जिसने उसी गुलाम भारत में जिंदगी काटी, जहां उसे भुलाकर उसकी माँ के नाम की कसमें खाई जा रही थीं।

अंग्रेजों ने दामोदर राव को कभी झांसी का वारिस नहीं माना था, इसलिए उसे सरकारी दस्तावेजों में कोई जगह नहीं मिली। ज्यादातर हिंदुस्तानियों ने सुभद्रा कुमारी चौहान के कुछ सही,कुछ गलत आलंकारिक वर्णन को ही इतिहास मान कर इतिश्री कर ली।

1959 में छपी वाई.एन.केलकर की मराठी किताब "इतिहासाच्य सहली" (इतिहास की सैर) में दामोदर राव का इकलौता वर्णन छपा।

महारानी की मृत्यु के बाद दामोदर राव ने एक तरह से अभिशप्त जीवन जिया। उनकी इस बदहाली के जिम्मेदार सिर्फ फिरंगी ही नहीं हिंदुस्तान के लोग भी बराबरी से थे। आइए,दामोदर राव की कहानी दामोदर राव की जुबानी सुनते हैं ------

" 15 नवंबर 1849 को नेवलकर राज्य परिवार की एक शाखा में मैं पैदा हुआ ज्योतिषी ने बताया मेरी कुंडली में राजयोग है और मैं राजा बनूँगा। यह बात मेरी जिंदगी में सबसे दुर्भाग्यपूर्ण ढंग से सच हुई। तीन साल की उम्र में महाराज ने मुझे गोद ले लिया। गोद लेने की औपचारिक स्वीकृति आने से पहले ही पिताजी नहीं रहे।

मां साहेब (महारानी लक्ष्मी बाई) ने कलकत्ता में लॉर्ड डलहौजी को संदेश भेजा कि मुझे वारिस मान लिया जाए, मगर ऐसा नहीं हुआ। डलहौजी ने आदेश दिया कि झांसी को ब्रिटिश राज में मिला लिया जाएगा। मां साहेब को रुपये 5,000 सालाना पेंशन दी जाएगी। इसके साथ ही महाराज की सारी संपत्ति भी मां साहेब के पास रहेगी। मां साहेब के बाद मेरा पूरा हक उनके खजाने पर होगा, मगर मुझे झांसी का राज नहीं मिलेगा। इसके अलावा अंग्रेजों के खजाने में पिताजी के सात लाख रुपए भी जमा थे। फिरंगियों ने कहा कि मेरे बालिग होने पर वह पैसा मुझे दे दिया जाएगा।

मां साहेब को ग्वालियर की लड़ाई में शहादत मिली। मेरे सेवकों (रामचंद्र राव देशमुख और काशी बाई) और बाकी लोगों ने बाद में मुझे बताया कि मां ने मुझे पूरी लड़ाई में अपनी पीठ पर बैठा रखा था। मुझे खुद यह ठीक से याद नहीं। इस लड़ाई के बाद हमारे कुल 60 विश्वासपात्र ही जिंदा बच पाए थे।

नन्हे खान रिसालेदार,गणपतराव, रघुनाथ सिंह और रामचंद्र राव देशमुख ने मेरी जिम्मेदारी उठाई। 22 घोड़े और 60 ऊँटों के साथ बुंदेलखंड के चंदेरी की तरफ चल पड़े। हमारे पास खाने पकाने और रहने के लिए कुछ नहीं था। किसी भी गांव में हमें शरण नहीं मिली। मई-जून की गरमी में हम पेड़ों तले खुले आसमान के नीचे रात बिताते रहे। शुक्र था कि जंगल में फलों के चलते कभी भूखे सोने की नौबत नहीं आई।

असली दिक्कत बारिश शुरू होने के साथ शुरू हुई। घने जंगल में तेज मानसून में रहना असंभव हो गया। किसी तरह एक गांव के मुखिया ने हमें खाना देने की बात मान ली। रघुनाथ राव की सलाह पर हम 10-10 की टुकड़ियों में बंटकर रहने लगे।

मुखिया ने एक महीने के राशन और ब्रिटिश सेना को खबर न करने की कीमत 500 रुपये,9 घोड़े और 4 ऊँट तय की। हम जिस जगह पर रहे,वह किसी झरने के पास थी और खूबसूरत थी।

देखते देखते दो साल निकल गए।ग्वालियर छोड़ते समय हमारे पास 60,000 रुपये थे,जो अब पूरी तरह खत्म हो गए थे।मेरी तबीयत इतनी खराब हो गई कि सबको लगा कि मैं नहीं बचूंगा। मेरे लोग मुखिया से गिड़गिड़ाए कि वो किसी वैद्य का इंतजाम करें।

मेरा इलाज तो हो गया मगर हमें बिना पैसे के वहां रहने नहीं दिया गया। मेरे लोगों ने मुखिया को 200 रुपये दिए और जानवर वापस मांगे,उसने हमें सिर्फ तीन घोड़े वापस दिए। वहाँ से चलने के बाद हम 24 लोग साथ हो गए।

ग्वालियर के शिप्री में,गाँव वालों ने हमें बागी के तौर पर पहचान लिया। वहाँ तीन दिन उन्होंने हमें बन्द रखा,फिर सिपाहियों के साथ झालरपाटन के पॉलिटिकल एजेंट के पास भेज दिया।मेरे लोगों ने मुझे पैदल नहीं चलने दिया। वह एक एक कर मुझे अपनी पीठ पर बैठाते रहे। हमारे ज्यादातर लोगों को पागलखाना में डाल दिया गया। माँ साहेब के रिसालेदार नन्हे खान ने पॉलिटिकल एजेंट से बात की।

उन्होंने मिस्टर फ्लिंक से कहा कि झांसी रानी साहिबा का बच्चा अभी 9-10 साल का है। रानी साहिबा के बाद उसे जंगलों में जानवरों जैसी जिंदगी काटनी पड़ रही है। बच्चे से तो सरकार को कोई नुकसान नहीं। इसे छोड़ दीजिए,पूरा मुल्क आपको दुआएँ देगा।

फ्लिंक एक दयालु आदमी थे,उन्होंने सरकार से हमारी पैरवी की। वहाँ से हम अपने विश्वस्तों के साथ इंदौर के कर्नल सर रिचर्ड शेक्सपियर से मिलने निकल गए। अब हमारे पास एक भी पैसा नहीं था।

सफर का खर्च और खाने के जुगाड़ के लिए माँ साहेब के 32 तोले के दो तोड़े हमें देने पड़े। माँ साहेब से जुड़ी वही एक आखिरी चीज हमारे पास थी"।

इसके बाद 5 मई 1860 को दामोदर राव को इंदौर में  रुपये 10,000 की सालाना पेंशन अंग्रेजों ने बांध दी। उन्हें सिर्फ सात लोगों को अपने साथ रखने की इजाजत मिली। ब्रिटिश सरकार ने महाराज के रुपये सात लाख लौटाने से भी इंकार कर दिया। दामोदर राव के असली पिता की दूसरी पत्नी ने उनको बड़ा किया। 1879 में उनको एक लड़का लक्ष्मण राव हुआ। दामोदर राव के दिन बहुत गरीबी और गुमनामी में बीते। इसके बाद भी अंग्रेज उन पर कड़ी निगरानी रखते थे। दामोदर राव के साथ उनके बेटे लक्ष्मण राव को भी इंदौर से बाहर जाने की इजाजत नहीं थी।

इनके परिवार वाले आज भी इंदौर में "झांसीवाले" सरनेम के साथ रहते हैं। रानी के एक सौतेला भाई चिंतामन राव ताम्बे भी था। ताम्बे परिवार इस समय पूना में रहता है। झांसी की रानी के वंशज इंदौर के अलावा देश के कुछ अन्य भागों में रहते हैं, वह अपने नाम के साथ झाँसीवाले लिखा करते हैं। जब दामोदर राव नेवालकर 5 मई 1860 को इंदौर पहुँचे थे,तब इंदौर में रहते हुए उनकी चाची जो दामोदर राव की असली माँ थी,ने बड़े होने पर दामोदर राव का विवाह करवा दिया, लेकिन कुछ ही समय बाद दामोदर राव की पहली पत्नी का देहांत हो गया। दामोदर राव की दूसरी शादी से लक्ष्मण राव का जन्म हुआ। दामोदर राव का उदासीन तथा कठिनाई भरा जीवन 28 मई 1906 को इंदौर में समाप्त हो गया।

अगली पीढ़ी में लक्ष्मण राव के बेटे कृष्ण राव और चंद्रकांत राव हुए। कृष्ण राव के दो पुत्र मनोहर राव,और अरुण राव तथा चंद्रकांत के तीन पुत्र अक्षय चंद्रकांत राव,अतुल चंद्रकांत राव व शांति प्रमोद चंद्रकांत राव हुए।

दामोदर राव चित्रकार थे। उन्होंने अपनी माँ की याद में उनके कई चित्र बनाये हैं, जो झांसी परिवार की अमूल्य धरोहर हैं। उनके वंशज लक्ष्मण राव व कृष्ण राव इंदौर न्यायालय में टाइपिस्ट का कार्य करते थे। अरुण राव मध्यप्रदेश विद्युत मण्डल से बतौर जूनियर इंजीनियर 2002 में सेवा निवृत्त हुए हैं।उनका बेटा योगेश राव साफ्टवेयर इंजीनियर है।

वंशजों में प्रपौत्र अरुण राव झाँसीवाला उनकी पत्नी वैशाली बेटा योगेश व बहू प्रीति का धन्वंतरि नगर,इंदौर में सामान्य नागरिक की तरह मध्यम वर्गीय परिवार है।

कांग्रेस के चाटुकारों ने तो सिर्फ नेहरू परिवार की ही गाथा गाई है, इन लोगों को तो भुला ही दिया गया है, जिन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ असली लड़ाई लड़ी थी।

स्वतंत्रता के 75 वीं वर्षगांठ पर यह लेख सभी भुला दिए स्वातन्त्र्य वीरों और वीरांगनाओं को सादर समर्पित।

विनम्र श्रद्धांजलि   


(उपेन्द्र श्रीवास्तव)

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