खेलो इंडिया और राष्ट्रमंडल खेल एक निष्पक्ष विवेचन*
* इस वर्ष 215 सदस्यों की भारतीय टीम बड़े जोर शोर से राष्ट्रमंडल खेलों में भाग लेने गए थे और खेलो इंडिया का बहुत जमकर जोर शोर से प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के अलावा अन्य जगहों पर भी प्रचार करके अरबों रुपए विज्ञापन पर बहाए गए थे और सभी को यह विश्वास था कि इस बार भारत दो हजार अट्ठारह के राष्ट्रमंडल खेलों के 26 स्वर्ण सहित कुल 66 पदकों के कीर्तिमान को भारी अंतर से तोड़ते हुए कम से कम इसका दुगुने पदक प्राप्त करके तीसरे स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंच जाएगा*
इसके अनेक बहुत बड़े कारण भी थे क्योंकि सबसे बड़ा कारण तो यह था कि दुनिया की सबसे बड़ी 10 खेल शक्तियां इन खेलों में भाग ही नहीं ले रही थी जिनमें अमेरिका रूस चीन फ्रांस जर्मनी जापान दक्षिण कोरिया क्यूबा थाईलैंड जैसे विश्व की खेल शक्तियां शामिल थी दूसरे इन राष्ट्रमंडल खेलों का स्तर विश्व और ओलंपिक खेलों को तो छोड़ो एशियाई स्तर के बराबर भी नहीं है इसलिए इनका वैसे भी कोई बहुत महत्त्व नहीं था यहां पर तो कम से कम भारत को 50 स्वर्ण पदकों के साथ 135 पदक जीतना चाहिए था लेकिन हुआ उल्टा भारतीय खिलाड़ी केवल 22 स्वर्ण 16 रजत 23 कांस्य पदक के साथ केवल 61 पदक ही जीत सके इस तरह स्वर्ण रजत कंस और कुल पदक हर क्षेत्र में भारत दो हजार अट्ठारह के राष्ट्रमंडल खेलों से काफी पीछे रह गया
वह भी भला हो कुश्ती मुक्केबाजी और बैडमिंटन तथा भारोत्तोलन का और टेबल टेनिस का जिनमें कुल 22 स्वर्ण पदकों के मुकाबले भारतीय खेलों के इन खिलाड़ियों द्वारा कुश्ती में साथ मुक्केबाजी में चार टेबल टेनिस और बैडमिंटन में तीन तीन स्वर्ण पदक प्राप्त किए गए अर्थात 17 स्वर्ण पदक इन्हीं चार खेलों के 17 खिलाड़ियों ने प्राप्त किया बाकी 197 खिलाड़ियों के द्वारा केवल पांच स्वर्ण पदक जीते गए
*इस देश में सदैव पक्षपातपूर्ण और राजनीति से प्रेरित खेल राजनीति विज्ञान सिनेमा पत्रकारिता सब कुछ होती है इसीलिए उपर्युक्त का स्तर बेहद निम्न और घटिया है और जब नोबेल पुरस्कारों की बात होती है तो भारत का कहीं नामोनिशान नहीं होता इसी तरह खेलों में जैसे ही हम विश्व और ओलंपिक खेलों की ओर बढ़ते हैं तो हम अपने को क्यूबा इजरायल और कोरिया जैसे छोटे-छोटे देशों से भी बहुत पीछे अपने को पाते हैं जिनमें से जमैका इजराइल जैसे देश तो 1 जिले से अधिक नहीं है*
अगर भाग्य के सहारे किसी चमत्कार के द्वारा भारत के खिलाडी राष्ट्रमंडल खेलों में पिछले बार से अधिक स्वर्ण रजत और कांस्य पदक पा जाते तो उसका श्रेय सरकार खेल मंत्रालय और मोदी जी ले लेते की खेलो इंडिया का कमाल है जिसमें सभी खिलाड़ियों को सिर से पैर तक सुविधा और अच्छे-अच्छे खाद्य पदार्थों कथा अच्छे खेल उपकरणों से लाद दिया गया था लेकिन अब खिलाड़ियों के पहले खेलों से भी खराब प्रदर्शन करने पर कोई भी आगे जिम्मेदारी लेने को नहीं आ रहा है कल को यही लोग कह सकते हैं कि इसके लिए खिलाड़ी और जनता जिम्मेदार है
*जब भारत में विद्यालय महाविद्यालय और विश्वविद्यालय से ही भ्रष्ट्राचार भाई भतीजावाद जातिवाद सोर्स सिफारिश का खेल शुरू हो जाता है और योग्य खिलाडी नीचे ही रह जाते हैं जैसे कि भारत के हर क्षेत्र में नौकरी से लेकर व्यवसाय रखो रहा है तब वह अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कैसे पहले दूसरा या तीसरा स्थान प्राप्त करेंगे इसका एक प्रमाण और है कि जहां विश्व की 10 प्रमुख खेल शक्तियों के खिलाडी विश्व ओलंपिक स्तर पर खेलो में अपने रिकार्ड प्रदर्शन को और अधिक बेहतर बनाते है भारत के खिलाडी स्वर्ण रजत जीतने के बाद भी पुराने प्रदर्शन तक भी नहीं पहुंच पाते इसका क्या कारण हो सकता है इसका यही कारण है कि उन्हें ज्यादातर को जबरदस्ती गलत कीर्तिमान के सहारे चुना जाता है और बेईमानी के ये शेर वहां जाकर ढेर हो जाते हैं*
बात इतनी ही नहीं है सुना तो यहां तक जाता है कि खिलाड़ियों को प्राप्त सुविधाएं और पैसे का काफी हिस्सा खेला अधिकारी और खेल मंत्रालय तथा दलाल लोग डकार जाते हैं इस प्रकार भारत के खिलाड़ी दुनिया के 100% फिट खिलाड़ियों के आगे जाकर नतमस्तक होते हैं हमारे आधे भूखे नंगे सुविधाओं से विहीन और तमाम वादों का शिकार खिलाड़ी फिर भी सारी सीमाओं को तोड़कर देश और देश की जनता के लिए अपना खून पसीना बहा कर अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति के सहारे अत्यधिक उत्तम प्रदर्शन करते हैं और वह देश की जनता की अनंत कोटि बधाइयां के उसी तरह हकदार हैं जैसे हमारी सेना हर अभाव और असुविधा तथा भेदभाव को सहते हुए भी देश की रक्षा में अपने प्राण दे देती है
*एक और बात गहराई से सोचने वाली है कि भारतीय खिलाड़ियों के खेल अधिकारी और उपस्थित लोग नियम कानूनों से ज्यादातर अनभिज्ञ होते हैं इसलिए वे उचित समय पर विरोध नहीं कर पाते जबकि अन्य देशों के कोच और खेल विशेषज्ञ जरा भी गलती होने पर ही अपना विरोध दर्ज करा देते हैं और वह स्वीकार भी होता है*
देश और हम लोग अत्यंत आभारी हैं बजरंग पुनिया दीपक पुनिया रवी दहिया रवी दहिया अनु मलिक विनेश फोगाट भावना पटेल nikhat zareen अचंता शरत कमल श्रीजा कुलम साथिया मनिका वत्रा र श्रीकांत पी वी सिंधु और सात्विक साईं राजरिंकी रेडी चिराग शेट्टी मीराबाई चानू जेरेमी लालरिन्नूंगा अचीनतो सोली महिला टीम लान बाल पुरुष टीम टेबल टेनिस पावर लिफ्टर सुधीर कुमार साक्षी मलिक दीपक पुनिया रवी दहिया विनेश फोगाट अंशु मलिक अमित पंघाल फ्री कूद के एल्डोसपास लक्ष्य सेन पैरा टेबल टेनिस भावना हसमुखभाईजैसे खिलाड़ियों के लिए जिन्होने हर पीड़ा कष्ट अभाव भेदभाव के बावजूद हमारे लिए स्वर्ण पदक जीते एक या दो या तीन नहीं पूरे 22 स्वर्ण पदक जोकि इतिहास का पत्थर है
अगर सब कुछ सही रहा होता खेल मंत्रालय और सरकार ने केवल कागजों पर ही खेल इंडिया नहीं खेला होता तो निश्चित रूप से सभी एक साथ स्वर्ण पदक होते इसमें कोई दो राय नहीं है भारत के लिए एक ही बात सब से निराशा की रही की भारत की हॉकी टीम जो सभी मैचों में अच्छा खेली लेकिन आस्ट्रेलिया के आगे फाइनल में सात गोल से इतना बुरी तरह से हारी कि आने वाले भारत के खेल प्रेमी इस मैच को कभी याद नहीं रखना चाहेंगे और हद तो तब हो गई जब भारत एक गोल भी नहीं कर सका
दिव्या काकारण जैसे कुछ अत्यधिक साहसी और निडर खिलाड़ियों ने आखिरकार इसकी खुलेआम tv चैनल पर सिफारिश शिकायत दिखावे और स्पर्श रुप से कहा कि दिल्ली में इतने साल रहते हुए भी मुख्यमंत्री सरकार द्वारा उन्हें कोई सुविधाएं नहीं दी गई इस पर आप की पार्टी केअरविंद केजरीवाल की सरकार ने बेहद लज्जा जनक म इंडिया कि आपके लिए खेलती है तो योगी आदित्यनाथ जी से सुविधाएं ले इस तरह के महा बेशर्म नेता खेलों का कितना भला करेंगे आप पार्टी और केजरीवाल से कोई यह नहीं पूछ रहा है कि इतना घटिया और निम्न स्तर का बयान उन्होंने कैसे दिया क्या खिलाडी भी अब देश के लिए ना होकर प्रदेश स्तर पर नेताओं द्वारा बाद दिए जा रहे हैं भारत को टुकडे टुकडे करके लोगों को संतोष नहीं हुआ हम भी और क्याक्या करना चाहते हैं*
*जो भी हो राष्ट्रमंडल खेल तो बीत गए और भारत पिछले प्रदर्शन को भी दोहरा नहीं पाया और ओवरऑल में भी पिछली बार वह तीसरे स्थान पर रहा था लेकिन इस बार वह चौथ स्थान पर आस्ट्रेलिया इंग्लैंड न्यूजीलैंड के पीछे चला गया बहुत दुखी बात है आगामी ओलंपिक खेलों में 1 वर्ष का समय बचा है यदि भारत की सरकार और खेल मंत्रालय तथा खेल से जुड़े अन्ना अधिकारी समय रहते नहीं चेत गए तो भारत पिछले ओलंपिक 16 पजीजीडीको को दोहरा नहीं पाएगी झांसी रहे क्या और उत्पादकों को शतक बनाते हैं वही भारत आज तक कभी भी ओलंपिक खेलों में ढाई की अंक कोटक नहीं पहुंचा है कागज पर और विज्ञापन में खेल खेलना अलग बात है और सच्चाई में उसे खेलने दूसरी बात है गलती सरकार और मोदी जी के भी नहीं है क्योंकि वह लाके हमारा सरकारी तंत्र वही है जो पूरी तरह गौर सर चुका है इसलिए अगर वास्तव में देश को खेल की महाशक्ति बहाना है तो चारों और पक्षपात बंद करके उचित सुविधाएं और उचित खाद्य पदार्थ खिलाडी को लिए जाए तभी वह ओलंपिक खेलों और विश्व खेलो में कुछ कमाल कर सकेंगे दिलीप कुमार सिंह*
अब संक्षेप में राष्ट्रमंडल खेलों का इतिहास भी जान लें जो लोग अपनी आज आदमी बेशर्म तरीके से खोकर अंग्रेजों के गुलाम बन गए थे और बाद में उनको भारत की तरह सत्ता सौंप दी गई लेकिन पूर्ण रूप से आजादी नहीं दी गई उन्हें पहले ब्रिटिश एंपायर और बाद में राष्ट्रमंडल खेल का गया भारत में केवल 4 बार इन राष्ट्रमंडल खेलों में भाग नहीं लिया बाकी लगातार लिया है भारत में पहला पदक कंस के रूप में पहली ही बार में पाया था जब खेलो इंडिया का नामोनिशान नहीं था तब भारत ने नई दिल्ली में 2010 में कांग्रेस के बेहाल जर्जर शासनकाल में भी 39 स्वर्ण26 रजत और 36 कांस्य पदक के साथ कुल 101 पदक पाया था जो आज तक एक रिकॉर्ड बना हुआ है
इसके बाद आज तक भारत उस प्रदर्शन को दोहरा नहीं सकता 2002 में तो मोदी जी का राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में कुछ पता ही नहीं था तब 2002 के मैनचेस्टर खेलों में भारत ने भयंकर प्रदर्शन करते हुए 30 स्वर्ण 22 रजत और 17 कांस्य पदकों के साथ कुल 69 पदक प्राप्त किए थे जो एक आश्चर्य माना गया था दिल्ली में भारत को दूसरा और मैनचेस्टर में तीसरा स्थान मिला जबकि तमाम ढोल नगाड़ों के साथ प्रचार प्रसार के बाद और खेलो इंडिया के लंबे समय के बाद भारत को केवल चौथा स्थान ही मिल पाया है उसमें भी हाकी की लज्जा जनक शून्य के मुकाबले 7 वोटों की हार ने सभी का मजा किरकिरा कर दिया राष्ट्रमंडल खेलों में तैराकी ऐसा खेल है जो विश्व और ओलंपिक का स्तर का है और उसमें भारत आज तक कोई भी पदक प्राप्त नहीं कर सका है
राष्ट्रमंडल खेलों में भारत ने सबसे अधिक स्वर्ण पदक और कुल पदक लक्ष्यवेध है अर्थ अर्थ निशानेबाजी में प्राप्त किया है इसीलिए इस बार लक्ष्य भेद और तीरंदाजी को हटा दिया गया जिससे भारत के खिलाड़ी अधिक पदक प्राप्त न कर सके इसके बाद भारोत्तोलन में भारत को 125 और कुश्ती में कुल 101 पदक प्राप्त हुए हैं जसपाल सिंह राणा 9 स्वर्ण सहित कुल 15 पदक प्राप्त करके भारत ही नहीं राष्ट्रमंडल खेलों के सबसे बड़े खिलाड़ी हैं मुझे आदेश में किसी को भारतीय खिलाड़ियों से कोई भी शिकायत नहीं है क्योंकि उन्होंने अपनी अपेक्षाओं और आशाओं से बढ़कर प्रदर्शन किया और देश का मान सम्मान काफी हद तक बचा लिया लेकिन सरकार और सरकारी योजनाएं जिस तरह कागजों पर खेली जाती हैं उसका भ्रष्टाचार सामने खुलकर आ गया
Ek chij aur Bharat ke liye bahut acchi Rahi ki Bharat ne kul 12 khelon mein bhag liya और किसी भी खेल में वह पदक भी नहीं रहा कुश्ती में भारत को छह स्वर्ण एक रजत 5 कांस्य सहित कुल 12 पदक मिले टेबल टेनिस में भारत को चार स्वर्ण एक रजत दो कांस्य सहित 7 पदक भारत दोलन में भारत ने तीन स्वर्ण तीन रजत 4 कांस्य सहित कुल 10 पदक बैडमिंटन में भारत ने तीन स्वर्ण एक रजत दो कांस्य पदक सहित कुल 6 पदक ट्रैक एंड फील्ड में भारत ने 1 स्वर्ण चार रजत तीन कांस्य पदक सहित कुल 8 पदक मुक्केबाजी में भारत ने तीन स्वर्ण एक रजत 3 कांस्य सहित 7 पदक लान बाउल्स में भारत ने एक स्वर्ण एक रजत सहित 2 पदक पैरा पावर लिफ्टिंग में भारत ने 1 स्वर्ण क्रिकेट में भारत ने एक रजत और पुरुष हॉकी में भारत ने एक रजत पदक तथा जोड़ों में दो रजत एक कांस्य सहित 3 स्क्वायर में 2 कांस्य सहित दो और कुल मिलाकर 61 पदक प्राप्त किए
खेल मंत्रालय और भारत सरकार तथा मोदी जी को इस बात को गंभीरता से सोचना चाहिए किस तरह कागजों पर हम ताली बजाकर खेलो इंडिया जैसे नारे देकर कभी भी ऊंची सफलता नहीं प्राप्त कर सकते जब राष्ट्रमंडल खेलों में खेलो इंडिया हवा हवाई हो गया तब आने वाले पेरिस के ओलंपिक खेल विश्व खेलों और एशियाई खेलों में भारत की क्या स्थिति रहेगी यह सोचने वाली बात है इसलिए खिलाड़ियों को वास्तव में सुविधाएं दिलाया जाए खेलों से परिवारवाद भाई भतीजावाद सोर्स शिफारस यौन उत्पीड़न भ्रष्टाचार खत्म हो खिलाड़ी और खेल अधिकारी तथा उससे जुड़े हुए मंत्री और राजनेता खिलाड़ियों का हक ना खाएं बल्कि उन्हें संपूर्ण सुविधाएं वास्तव में दिया जाए और विद्यालय महाविद्यालय विश्वविद्यालय स्तर से सच्चाई से खिलाड़ियों को सामने लाया जाए वरना इसी तरह विश्व खेलों में हमारी कोई हैसियत नहीं रहेगी डॉ दिलीप कुमार सिंह
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