*लैटिन अमेरिका बड़े आर्थिक संकट की क़गार पर: मौजूदा पूँजीवादी व्यवस्था के ख़ात्मे के सिवा इस संकट का कोई हल नहीं*
लैटिन अमेरिका अपने साहित्य, संगीत और संघर्षों के कारण एक अनोखी जगह रखता है। लगभग दो दर्जन छोटे-बड़े मुल्क़ों और 60 करोड़ की आबादी वाले इस क्षेत्र का पिछली करीब आधी सदी का इतिहास अंदरूनी आर्थिक-राजनीतिक संकट, सैन्य तानाशाहियाँ, साम्राज्यवादी दख़ल और इसके ख़िलाफ़ जनाक्रोश का इतिहास है। पर पूँजीवाद की नवउदारवादी नीतियों का पहला कार्यक्षेत्र बना यह क्षेत्र आज गंभीर आर्थिक संकट का शिकार है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की रिपोर्ट के मुताबिक़ लैटिन अमेरिका और कैरीबियन द्वीपों के मुल्क़ों में कोरोना लॉकडाउन और यूक्रेन जंग के बाद अब बढ़ती ब्याज़ दरों के कारण संकट के रूप में तीसरा झटका लगने वाला है। इसी तरह संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार, इस क्षेत्र में नौजवानों की आबादी का 45% ग़रीबी रेखा से नीचे जीवन व्यतीत कर रहा है और 5.6 करोड़ लोग भुखमरी का शिकार हैं। ग़रीबी, बेरोज़गारी की मार से बचने के लिए आबादी का बड़ा हिस्सा लगातार प्रवास कर रहा है। लैटिन अमेरिका में प्रवास की गिनती में 66% का इज़ाफ़ा हाल ही में हुआ, जिसमें से बड़ा हिस्सा क्षेत्र के ही अन्य मुल्क़ों जैसे कि अर्जेंटीना, ब्राज़ील आदि की ओर या फिर मेक्सिको के रास्ते अमेरिका तक क़ानूनी-ग़ैर क़ानूनी ढंग से हो रहा है। इस गहरे हो रहे आर्थिक संकट के कारण इस क्षेत्र में राजनीतिक संकट भी गहराता जा रहा है, दक्षिणपंथी ताक़तों का उभार और उन्हें अमेरिकी साम्राज्यवादियों की शह बढ़ रही है।
पूँजीवादी संकट और
“प्रगतिवाद” का अंत
लैटिन अमेरिका ही वह क्षेत्र है, जहाँ पिछले 20-25 सालों में ऐसी सरकारें बनीं, जो ज़ाहिरा तौर पर अपने साम्राज्यवाद-विरोध, नवउदारवाद विरोध और विकासमुखी मक़सद की बातें करती थीं। अपनी सब विशेषताओं के बावजूद पूरे लैटिन अमेरीकी क्षेत्र के कई मुल्क़ों में होने वाली इस परिघटना को ‘प्रगतिवाद’ की लहर, ‘इक्कीसवीं सदी का समाजवाद’, ‘गुलाबी लहर’, ‘परिवर्तन मॉडल’ आदि के रूप में प्रचारित किया गया, कि अब पहले की तरह पूँजीवाद विरोधी समाजवादी क्रांतियों का दौर गुज़र चुका है, कि अब लैटिन अमेरिकी शैली के मॉडल को ही अपनाना चाहिए। पर क्या वास्तव में लैटिन अमेरिका का यह ‘प्रगतिवादी’ आंदोलन पूँजीवाद का विकल्प था? क्या पूँजीवादी व्यवस्था में पैदा होने वाली ग़रीबी-बेरोज़गारी, ग़ैर-बराबरी को पूरी व्यवस्था बदले बिना ख़त्म किया जा सकता है? आख़िर क्या कारण था कि 1998 में शावेज़ की जीत से शुरू हुई यह परिघटना 2016 में ब्राज़ील में रॉसेफ़ के तख़्तापलट से ख़त्म हो गई?
‘इक्कीसवीं सदी के समाजवाद’ के तथाकथित मॉडल वेनेज़ुएला, बोलीविया, इक्वेडोर, अर्जेंटीना, उरुग्वे, ब्राज़ील और अन्य मुल्क़ों में क़ायम हुई ऐसी सरकारों को कहा जाता है, जिन्होंने अपने ऐलानों में पूँजीवादी व्यवस्था द्वारा पैदा की गई ग़रीबी, ग़ैर-बराबरी, बेरोज़गारी आदि ख़त्म करने के लिए लैटिन अमेरिका से अमेरिकी साम्राज्यवाद को जड़ से उखाड़ने के लक्ष्य को उभारा था। इस परिघटना को ‘गुलाबी लहर’ भी कहा जाता है, जिसकी शुरुआत वेनेज़ुएला में शावेज़ की जीत से बताई जाती है। लेकिन, दरअसल शावेज़ की चुनावी जीत से अहम था लैटिन अमेरिका के कई मुल्क़ों में 1990 के दशक में पूँजीवादी व्यवस्था की बुराइयों के ख़िलाफ़ जन आंदोलन, जिन्होंने अगले एक-डेढ़ दशक के लिए इस ‘वैकल्पिक’ राजनीति की नींव रखी।
साम्राज्यवादी अमेरिका के पड़ोस में मौजूद लैटिन अमेरिका वह पहली जगह थी, जहाँ पूँजीवादी व्यवस्था के सबसे नए दौर नवउदारवाद की शुरुआत की गई थी। इन नीतियों की शुरुआत 1970 के दशक में चिले में फ़ौजी जरनैल पिनोशे की ज़ालिम तानाशाही के तहत हुई थी। निजीकरण-उदारीकरण-वैश्वीकरण की बुनियाद पर चिले में सैन्य तानाशाही के तहत बड़े स्तर पर सरकारी संस्थानों को पूँजीपतियों के हवाले किया गया, क़ानूनी श्रम अधिकारों को ख़त्म किया गया और बाग़ी आवाज़ों को कुचलने के लिए सैन्य-तानाशाही का सहारा लिया गया और हज़ारों प्रगतिशील कार्यकर्ताओं को या तो मार दिया गया या जेलों में डाल दिया गया और यह सब कुछ संयुक्त राज्य अमेरिका (आगे सिर्फ़ अमेरिका) की सरकार की पूरी देख-रेख के तहत किया गया। इसी मॉडल को बाद में लैटिन अमेरिका के अन्य मुल्क़ों में भी लागू किया गया।
नवउदारवादी नीतियों के कारण बहुत तेज़ी से ग़रीबी, बेरोज़गारी, ग़ैर-बराबरी बढ़ने लगी, शिक्षा-स्वास्थ जैसी जन-सुविधाओं का ढाँचा बिखरने लगा तो इसके ख़िलाफ़ आम लोगों में ग़ुस्सा पैदा हुआ, जिसका इज़हार प्रमुख रूप से बोलीविया में पानी के निजीकरण के ख़िलाफ़ 1990 के अंत में जनांदोलन के रूप में हुआ। बोलीविया के अलावा मेक्सिको और इक्वेडोर में आदिवासी लोगों की बग़ावतें शुरू हुई और अन्य मुल्क़ों में भी पूँजीवादी व्यवस्था की बुराइयों के ख़िलाफ़ गुस्सा बढ़ने लगा। वेनेज़ुएला में इन्ही आंदोलनों की पृष्ठभूमि के सहारे शावेज़ की 1998 के चुनावों में जीत हुई और अगले कुछ सालों में ही लैटिन अमेरिका के अनेकों मुल्क़ों में नवउदारवादी नीतियों का स्पष्ट विरोध करने वाली सरकारें बनीं। चुनाव में इन्हीं नेताओं की जीत को पश्चिम के बुद्धिजीवियों ने और उनकी नक़ल में भारत के बुद्धिजीवियों ने “21वीं सदी का समाजवाद” घोषित करते हुए कहा कि अब सोवियत यूनियन या चीन के समाजवाद की तरह क्रांतिकारी ढंग से पूँजीवादी व्यवस्था को नहीं बदला जा सकता और आज यही लैटिन अमेरिकी शैली के मॉडल अपनाए जाने चाहिए। इस पृष्ठभूमि के साथ अब चर्चा करते हैं लैटिन अमेरिका के इन ‘विकल्पों’ की।
शुरुआती 2000 के दशक का समय पूरी दुनिया में तेल, गैस जैसे ऊर्जा स्रोतों, तांबा, लोहा, सोना जैसी प्राकृतिक धातुओं और सोयाबीन, मक्की, कॉफ़ी जैसी खेती जिंसों की क़ीमतों में तेज़ी का दौर था। लैटिन अमेरिका के सबसे बड़े मुल्क़ जिनमें ऐसे “विकल्प” क़ायम हुए, वे इन्हीं जिंसों की पैदावार और निर्यात पर निर्भर मुल्क़ थे। इसीलिए बढ़ते दामों के दौर में वेनेज़ुएला, ब्राज़ील, इक्वेडोर, बोलीविया, अर्जेंटीना, पेरू आदि मुल्क़ों की इन निर्यातों से होने वाली कमाई में बड़ा इज़ाफ़ा हुआ। इसी अतिरिक्त कमाई का एक हिस्सा इन सरकारों ने अपने मुल्क़ों के लोगों पर ख़र्च करते हुए शिक्षा-स्वास्थ्य जैसी सुविधाओं को सुधारा और इनका फैलाव किया, सबसे ग़रीब आबादी के लिए सीधे नक़द अदायगी जैसी स्कीमें चलाई गईं, जिनका स्पष्ट तौर पर समाज के बड़े हिस्से को फ़ायदा हुआ। पर चूँकि यह सारा “परिवर्तन” पूँजीवादी व्यवस्था के दायरे के भीतर किया गया था, पूँजीपतियों की निजी जायदाद को छेड़ा तक नहीं गया था, इसलिए निर्यातों से बढ़ी कमाई ने निर्यातकों और पूँजीपतियों के मुनाफ़ों में भी दिन दोगुना-रात चौगुना इज़ाफ़ा किया और खनन उद्योग और कृषि क्षेत्र में बड़े पूँजीपतियों की पकड़ मज़बूत हुई। अर्जेंटीना, बोलीविया, ब्राज़ील, में खनन और कृषि-व्यापार की दैत्याकार कंपनियाँ अस्तित्व में आईं, जिन्हें बाकायदा सरकारी मदद भी मिलती रही। असल में यह तथाकथित “समाजवाद” टिका ही वर्गीय साझेदारी की बुनियाद पर था, जिसके तहत एक तरफ़ पूँजीपतियों के अधिकार भी सुरक्षित रखे गए और दूसरी ओर जिंसों के दामों की महँगाई के कारण हुई अतिरिक्त कमाई का एक हिस्सा लोगों की भलाई पर भी ख़र्चा गया। वेनेज़ुएला में शावेज़ हुकूमत द्वारा बजट का दो-तिहाई हिस्सा ऐसे कामों पर लगाया गया। 2007-08 में जब पश्चिमी पूँजीवादी दुनिया आर्थिक संकट का शिकार हुई, तो अगले कुछ सालों तक चीनी अर्थव्यवस्था में माँग क़ायम रहने ने इन मुल्क़ों की आमदनी बरक़रार रखी। इसी अरसे में ही चीन, अमेरिका और यूरोपीय यूनियन के बाद लैटिन अमेरिका का तीसरा सबसे बड़ा व्यापार साझेदार बना। पर जैसे ही 2011-12 के बाद चीनी अर्थव्यवस्था की आर्थिक विकास दर गिरने लगी, तो इसका सीधा असर जिंसों की गिरती क़ीमतों पर पड़ा और नतीजतन लैटिन अमेरिका के जिंस निर्यातों पर निर्भर ये अर्थव्यवस्थाएँ भी मुँह के बल गिरने लगीं। गिरती कमाई के कारण इन सरकारों के लिए जन-कल्याण प्रोजेक्ट को पैसा मुहैया कराना संभव नहीं था और दूसरी तरफ़ पूँजीपतियों ने भी अपने गिरते मुनाफ़ों के कारण इन सरकारों पर दबाव डालना शुरू किया कि वह समाज कल्याण की योजनाएँ बंद करे और सरकारी क्षेत्र उनके हवाले करे। इसलिए समाज कल्याण योजनाओं में कटौती की जाने लगी। जिसके कारण पिछले करीब एक दशक से इन मुल्क़ों में बेरोज़गारी, ग़रीबी में लगातार इज़ाफ़ा हो रहा है और बढ़ते जन आक्रोश का इज़हार एक ओर तो सड़कों पर दिख रहा है और दूसरी ओर दक्षिण-पंथी और प्रतिक्रियावादी ताक़तें फिर से उभर रही हैं। ग़ौरतलब नुक्ता यह है कि इस तथाकथित “समाजवाद” के पूरे 15-20 सालों के अरसे में किसी भी सरकार ने अमीरों पर टैक्स लगाकर या उनकी जायदादें ज़ब्त करके आम लोगों के भले के लिए इस्तेमाल करने की कोशिश नहीं की। 2015 में इक्वेडोर के सदर राफे़ल कोरिया ने अमीरों पर सिर्फ़ टैक्स की बात ही की थी, पर अमीरों और उच्च-मध्यवर्ग द्वारा विरोध करने पर तुरंत यह ऐलान वापिस ले लिया गया।
दूसरा, कच्चे माल और जिंसों के निर्यात पर निर्भर इस व्यवस्था का सीधा अर्थ था प्राकृतिक संसाधनों की बेरहम पूँजीवादी लूट, यानी प्राकृतिक खनिज पदार्थों वाले क्षेत्र में बस रही लाखों की आदिवासी आबादी के साथ सीधा टकराव। 2000 के दशक के आख़िर में बोलीविया में इवो मोरालेस, सदारत में तिपनिस और इक्वेडोर में कोरिया शासन में यासूनी जैसे संवेदनशील और जैविक तौर पर दुनिया में सबसे अलग क्षेत्र के लिए पारित की गईं सड़क और खनन परियोजनाओं के ख़िलाफ़ बड़ा जन आक्रोश देखने को मिला। ज़ाहिर था ऐसे फ़ैसलों के कारण जनता में इन सरकारों का समर्थन धीरे-धीरे कम होता चला गया और जब 14 सालों के शासन के बाद इवो मोरालेस को दक्षिण-पंथी ताक़तों ने सत्ता से हटा दिया तो मोरालेस के पक्ष में कोई बड़ी लामबंदी बोलीविया में देखने को नहीं मिली।
तीसरा, 1990 के दशक में लूट-अन्याय विरोधी आंदोलनों को इस ‘प्रगतिवादी’ आंदोलन ने हवा दी थी। 1990 के दशक में पूरे क्षेत्र में किसी बड़ी क्रांतिकारी पार्टी की मौजूदगी ना होने के कारण “सब लोगों” को साथ लेने की बात करने वाले ये तथाकथित “तीसरे विकल्प” सामने आए। चुनाव जीतने के बाद इन आंदोलनों के बहुत सारे नेता सरकार का हिस्सा बन गए जिसका सीधा असर ज़मीनी स्तर पर ट्रेड यूनियन और बड़े जनवादी आंदोलन के कमज़ोर होने में निकला और ज़्यादातर संगठन समाज में जनवादीकरण की प्रक्रिया को अमली जामा पहनाने की जगह सरकार के लिए सहमति जुटाने का औज़ार मात्र बनकर रह गए। इसीलिए शुरुआती 2000 के दशक से लेकर अगले 10-12 सालों तक हमने लैटिन अमेरिका के अलग-अलग मुल्क़ों में हड़तालों की गिनती में गिरावट देखी।
इस तरह, जन आंदोलनों की बदौलत खड़ा हुआ यह ‘प्रगतिवादी’ आंदोलन ऐसे समय में सत्ता में आया, जब दुनिया-भर में जिंसों की क़ीमतों में तेज़ी थी। इस तेज़ी ने इन नई सरकारों को लोगों के पक्ष में नीतियाँ बनाना संभव बनाया। पर चूँकि यह पूरा प्रोजेक्ट पूँजीवादी व्यवस्था की बुनियाद को चुनौती नहीं देता था, बल्कि इन संबंधों को नए ढंग से और ज़्यादा मज़बूत करता था, इसीलिए देर-सवेर पूँजीवादी व्यवस्था के तर्क ने अपना असर दिखाना ही था। बेशक पूरे लैटिन अमेरिका को एक ही पैमाने से नापा नहीं जा सकता; इसके पूरे ‘प्रगतिवादी’ मॉडल में जहाँ वेनेज़ुएला के शावेज़ और बोलीविया के मोरालेस जैसे अधिक रैडिकल नेता थे वहीं ब्राज़ील में लूला से लेकर अर्जेंटीना के किर्चनर तक ‘नरमपंथी’ नेता भी थे। अलग-अलग मुल्क़ों के अंदरूनी हालात के मुताबिक़ यहाँ लागू होने वाली जनपक्षधर नीतियों की संख्या भी अलग-अलग थी।
लैटिन अमेरिका में साम्राज्यवादी दख़ल
पूरी बीसवीं सदी में ही अमेरिकी साम्राज्य ने लैटिन अमेरिका में अपना दबदबा क़ायम रखने के लिए निरंतर दख़लंदाज़ी, आर्थिक-राजनीतिक बंदिशें और सीधी सैन्य तानाशाही स्थापित करने जैसे हथकंडे अपनाए हैं। 1970 के दशक में जहाँ जन आंदोलनों को दबाने के लिए सोवियत यूनियन के खतरे के नाम पर इन मुल्क़ों में दख़लंदाज़ी की, वहीं 1990 के दशक में “लोकतंत्र” को बढ़ावा देने के तहत ‘नागरिक समाज’ और अन्य ग़ैर-सरकारी संगठन बनाए गए, जो असल में अमेरिकी साम्राज्यवाद का एजेंडा ही लागू करती थे और इसके समर्थन में राय जुटाने की कोशिश करती थीं। इसी तरह सितंबर 2001 के हमलों के बाद आतंकवाद विरोधी जंग और नशे के ख़िलाफ़ जंग के नाम पर यहाँ दख़लंदाज़ी की, प्रतिगामी तानाशाही स्थापित की गई और मानवाधिकारों का बर्बर उल्लंघन करते हुए हज़ारों ही बेगुनाह लोगों, राजनीतिक कार्यकर्ताओं का क़त्ल किया गया। अपना एजेंडा लागू करने के लिए इस क्षेत्र में अमेरिका ने अपने मित्र मुल्क़ जैसे चीले, कोलंबिया, मेक्सिको, पेरू आदि के साथ मिलकर सर्व-अमेरिकी गठबंधन भी क़ायम किए। एक सदी से ज़्यादा समय की इसी अमेरिकी दख़लंदाज़ी के कारण ही लैटिन अमेरिका में अमेरिकी साम्राज्यवाद-विरोधी जज़्बा बहुत गहरा है। इस नफ़रत के कारण भी पूरे लैटिन अमेरिका में शावेज़, मोरालेस जैसे नेताओं की अमेरिकी साम्राज्यवाद विरोधी शख्सियत को बहुत पसंद किया गया।
अमेरिकी साम्राज्यवाद के बाद यूरोपीय यूनियन (इसके अलग-अलग मुल्क़ों को अलग रखते हुए) और कनाडा भी इस क्षेत्र में साम्राज्यवादी लूट में अहम भूमिका अदा करता रहा है। पर पिछले 10-15 सालों से चीन नया साम्राज्यवादी खिलाड़ी बनकर इस क्षेत्र में सामने आया है। मेक्सिको को छोड़कर बाकी सभी बड़े लैटिन अमेरिकी मुल्क़ों का सबसे बड़ा व्यापार साझेदार इस समय चीन है। चीनी साम्राज्यवाद का अमेरिकी साम्राज्यवाद से फ़िलहाल फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि इसने क्षेत्र में अपने सैन्य अड्डे नहीं बनाए। पर चीनी कंपनियाँ क्षेत्र के प्राकृतिक संसाधनों की बड़े स्तर पर लूट में इस समय सबसे आगे हैं।
सारांश
लैटिन अमेरिका “मॉडल” की चर्चा करते हुए कई इसके ख़त्म होने के लिए साम्राज्यवादियों को जि़म्मेदार मानते हैं, पर यह नज़रिया सही नहीं। इसमें कोई शक नहीं कि अमेरिका ने अपने एजेंडे से थोड़ा भी दूर होने की हिम्मत करने वाली लैटिन अमेरिकी सरकारों को सबक़ सिखाने की पूरी कोशिश की है, पर ‘प्रगतिवादी’ आंदोलन के गिरने का बुनियादी कारण इसके अपने अंदर ही है। यह आंदोलन पूँजीवादी व्यवस्था को ख़त्म किए बग़ैर पूँजीवाद की बुराइयों को ख़त्म करने का दावा लेकर चली थी। मुक़ाबलतन अनुकूल अंतरराष्ट्रीय हालतों में यह आंदोलन कामयाब हुए और सत्ता में आए। जिंसों की बढ़ती क़ीमतों ने शुरुआती सालों में एक हद तक जनपक्षधर नीतियाँ बनाने की अनुमति दी, पर जैसे ही 2010 में हालात बदले तो वर्गीय-साझेदारी की बुनियाद पर टिका यह “मॉडल” बिखरने लगा और अंत में चुनाव द्वारा ही दक्षिण-पंथी ताक़तें फिर से सत्ता में आ गईं। इस पूरे अनुभव का सार यह है कि निजी संपत्ति पर आधारित पूँजीवादी व्यवस्था को समाप्त किए बिना, वर्गीय-साझेदारी के बजाय मज़दूर वर्ग की स्पष्ट विचारधारा के नेतृत्व में समाजवादी क्रांति को अंजाम दिए बिना पूँजीवाद की बीमारियों को दूर नहीं किया जा सकता है। ‘प्रगतिशील आंदोलन’, ‘गुलाबी आंदोलन’, ’21वीं सदी का समाजवाद’ जैसे शीर्षकों के बावजूद ऐसे तमाम आंदोलन इसी पूँजीवादी चौखटे में ही गोल-गोल घूमते रहते हैं और अपनी सदिच्छाओं के बावजूद अंत में कट्टर दक्षिणपंथी सियासत को रास्ता देती हैं।
– मानव
मुक्ति संग्राम – बुलेटिन 26 ♦ जनवरी 2023 में प्रकाशित
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