Wednesday, 1 March 2023

बवासीर के मस्से काटने वाला धागा :------* हल्दी के चूर्ण में , थूहर के दूध की भावना देकर उसमें सूत को डुबों लें और उसी सूत से मस्से को कस कर बांध लें। इस प्रकार करने से मस्से और भगंदर नष्ट हो जाते है।* 20 ग्राम हल्दी को, अच्छी प्रकार पीस व छानकर

 ------: बवासीर के मस्से काटने वाला धागा :------
* हल्दी के चूर्ण में , थूहर के दूध की भावना देकर उसमें सूत को डुबों लें और उसी सूत से मस्से को कस कर बांध लें। इस प्रकार करने से मस्से और भगंदर नष्ट हो जाते है।
* 20 ग्राम हल्दी को, अच्छी प्रकार पीस व छानकर, थूहर के दूध में भिगो दें। पीछे सूत का बटा हुआ मजबूत धागा उसी में डाल दो। तीन दिन भीगने के बाद चौथे दिन, उसे छाया में सूखा लें। फिर उसी डोरे से बवासीर के मस्से को कस कर बांध दो। मस्से कट कर गिर पडे़गें और भगंदर की गांठ भी , इसके बांधने से नष्ट हो जाती है । यदि , रोगी को कष्ट होता है तो गरम शुद्ध घी चुपड़ दें या 100 बार फूल की थाली में घी को धोकर, घावों पर लगा दें। फौरन पीडा़ शांत हो जाती है । 
* थूहर का दूध, भिलावे, मालकंगनी, त्रिफला, दंती , कड़वी तोरई, चीता और सेंधा नमक । इन सभी को बराबर मात्रा में लेकर पीस लें और घी में मिलाकर, सूत पर लपेट दें। इस सूत को मस्से पर कसकर बांध दें। ऐसा करने से मस्से गल कर गिर जाते है ।

 *कैसे इस धरती की अमृत नोनी विभिन्न श्वसन विकारों में बहुत प्रभावी और सहायक है.?*
*वैसे तो नोनी किसी भी बीमारी के लिए दवाई नहीं है लेकिन ऐसी कोई भी बीमारी नहीं है जिसे ठीक होने में, ये मददगार साबित न होती हो सिवाय किडनी समस्याओं को छोड़कर....*
अधिकतम पुरानी श्वसन संबंधी विकार निरंतर ऑक्सीडेटिव तनाव के अधीन होते हैं, और एंटीऑक्सीडेंट की खुराक उनके लक्षणों के साथ कम हो जाती है।
नोनी में शक्तिशाली एंटीऑक्सीडेंट गुण होते हैं।
अध्ययनों से संकेत मिलता है कि अस्थमा से पीड़ित लोगों में कुछ पोषक तत्वों (उदाहरण के लिए, सेलेनियम और पोटेशियम) के निम्न स्तर होते हैं और हमारा दैनिक आहार (फास्ट फूड में उच्च और ताजे फल और सब्जियों में कम) अस्थमा की उच्च दर से जुड़ा हुआ है।

वास्तव में, तले हुए खाद्य पदार्थ और हमारे दैनिक अभ्यस्त खाद्य पदार्थ सभी पोषक तत्वों से परिपूर्ण नहीं होते हैं।  इसलिए हमें अपने शरीर को एक शक्तिशाली पोषण पूरक प्रदान करना चाहिए जिसमें उच्च एंटीऑक्सीडेंट गुण होने चाहिए और साथ ही सभी आवश्यक पोषक तत्वों से भरपूर होना चाहिए।

नोनी एक शक्तिशाली एंटी ऑक्सीडेंट है जिसमें पर्याप्त मात्रा में विटामिन सी, बी कॉम्प्लेक्स, बीटा कैरोटीन, फ्लेवोनोइड्स और सभी आवश्यक खनिज होते हैं जो इसे एक शक्तिशाली एंटीऑक्सिडेंट बनाते हैं।
इसके अलावा नोनी में 200+ से अधिक फाइटो पोषक तत्व होते हैं जिनमें उच्च एंटी ऑक्सीडेंट गुण होते हैं।

हमारी नेचर 2 वेलनेस की बनाई हुई नोनी जूस के 10ml में आपको मिलता है...
नोनी 2000mg
अश्वगंधा 300mg
गरसेनिया कम्बोजिया 100mg, जिसे आप किसी भी लैब में टेस्ट करवा सकते हैं।



: *पित्त की थैली की पथरी को कैसे निकाला जाये...*
●80% पित्त की थैली की पथरी कोलेस्ट्रॉल के जमने या सख्त होने के कारण होती है।
 
● इस कारण पेट में असहनीय दर्द होता है, उल्टी भी हो सकती है।
● पचने में दिक्कत, अपच और भारीपन रहता है, कहा जाता है कि बिना ऑपरेशन के इसे निकालना मुश्किल है।
● ऐसे में मरीज़ ने ऑपरेशन का विचार बनाया ही होगा।

*● कुछ घरेलू उपाय अपनाकर देखें, संभव है कि पथरी गल जाए।*
*● इससे पथरी तो गल ही जायेगी साथ में पाचन दुरूस्त और दर्द भी ठीक होगा..*

1. सेब का जूस और सेब का सिरका-
सेब में पित्त की पथरी को गलाने का गुण होता है, लेकिन इसके जूस को सेब के सिरके के साथ लेने पर ज्यादा असर होता है।
सेब में मौजूद मैलिक एसिड पथरी को गलाने में मदद करता है तथा सेब का सिरका लिवर में कोलेस्ट्रॉल नहीं बनने देता, जो पथरी बनने का कारण है।
यह घोल पथरी को गलाता है तथा दोबारा बनने से भी रोकता है और दर्द से भी राहत देता है।
उपचार-
एक गिलास सेब के जूस में एक चम्मच सेब का सिरका मिलाएं, दिन में दो बार पीएं।

2. नाशपाती का जूस-
इसमें मौजूद पैक्टिन कोलेस्ट्रॉल को बनने और जमने से रोकता है। नाशपाती गुणों की खान है।
उपचार-
1 गिलास गरम पानी में 1 गिलास नाशपाती का जूस को दो चम्मच शहद के साथ दिन में तीन बार पीयें।

3. चुकंदर, खीरा और गाजर का जूस-
जूस थेरेपी को पित्त की थैली के इलाज के लिए घरेलू उपचारों में सबसे ज्यादा इस्तेमाल किया जाता है।
चुकंदर न केवल शरीर का मजबूती देता है बल्कि गॉल ब्लेडर को साफ भी करता है साथ ही लिवर के कोलोन को भी साफ करता है।
खीरा में मौजूद ज्यादा पानी की मात्रा लिवर और गॉल ब्लेडर दोनों को डिटॉक्सीफाई करती है। गाजर में भी विटामिन सी और उच्च पोषक तत्व होने के कारण यही गुण होते हैं।
उपचार-
1 चुकंदर, 1 खीरा और 4 गाजर का जूस तैयार करें। दिन में दो बार।

4. पुदीना-
पुदीना को पाचन के लिए सबसे अच्छी घरेलू है जो पित्त वाहिका तथा पाचन से संबंधित अन्य रसों को बढ़ाता है। इसमें तारपीन होता है जो पथरी को गलाने में सहायक है।
उपचार-
पानी को गरम करें, इसमें ताजी या सूखी पुदीने के पत्तियों को उबालें। हल्का गुनगुना रहने पर पानी को छानकर इसमें शहद मिलाएं और पी लें। दिन में दो बार पियें।

5. खान-पान और दिनचर्या में बदलाव
रोजाना 8 से 10 गिलास (ढाई तीन लीटर) पानी जरूर पियें चाहे प्यास न भी लगी हो।

● वसायुक्त या तेज मसाले वाले खाने से बचें।

● कॉफी पियें।


 *आपका R.O. (रिवर्स ओसमोसिस) फिल्टर पानी, कितना उत्तम और कितना स्वास्थ्यवर्धक, कितना पानी को बर्बाद करने वाला, अंदाज़ा लगाएं.!*

*विकल्प:- अल्कलाइन यू.वी. प्यूरीफायर को भी समझें, न समझ मे आये तो मुझसे पूंछें।*
● अपने घरों में R.O. फिल्टर लगवाकर हम सब शेखियाँ बघारते हैं चाहे हम मौत को ही क्यों न गले लगा रहें हों।
● हम हेमा मालिनी और सचिन तेंदुलकर की ऐड देखते हैं और अपनी ऐसी तैसी करवा लेते हैं और जो पैसे वाले या धनी लोग हैं वो तो  विशेषकर।
जानिये सच.!

*आपके स्टेटस सिम्बल R.O. फिल्टर के पानी का लगातार सेवन बनेगा, बेमौत मौत का कारण*

● चिलचिलाती गर्मी में कुछ मिले ना मिले पर शरीर को पानी जरूर मिलना चाहिए और अगर पानी R.O. फिल्टर का हो तो क्या बात है..!
● परंतु क्या वास्तव में हम आर.ओ. को शुद्ध पानी मान सकते हैं,
● जवाब है बिल्कुल नहीं...!!
● और यह जवाब विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की तरफ से दिया गया है।
● विश्व स्वास्थ्य संगठन ने बताया कि इसके लगातार सेवन से हृदय संबंधी विकार, थकान, कमजोरी, मांसपेशियों में ऐंठन, सर दर्द आदि दुष्प्रभाव पाए गए हैं।
● यह कई शोधों के बाद पता चला है कि इसकी वजह से कैल्शियम, मैग्नीशियम पानी से पूरी तरह नष्ट हो जाते हैं जो कि शारीरिक विकास के लिए अत्यंत आवश्यक है।
● वैज्ञानिकों के अनुसार मानव शरीर 500 टी.डी.एस. तक सहन करने की छमता रखता है, परंतु R.O. में 18 से 25 टी.डी.एस. तक पानी की शुद्धता होती है जो कि नुकसानदायक है।
● इसके विकल्प में क्लोरीन को रखा जा सकता है जिसमें लागत भी कम होती है एवं आवश्यक तत्व भी सुरक्षित रहते हैं जिससे मानव शारीरिक विकास अवरूद्ध नहीं होता।
● जहां एक तरफ एशिया और यूरोप के कई देश R.O. पर प्रतिबंध लगा चुके हैं वहीं भारत में R.O. की मांग लगातार बढ़ती जा रही है और कई विदेशी कंपनियों ने यहां पर अपना बड़ा बाजार बना लिया है।

अब फैसला आपका क्योंकि जीवन तो आपका ही है न।

 *PROSTATE GLAND*
*पौरुष ग्रंथि (प्रोस्टेट ग्लैंड)*
*बढ़ती उम्र के साथ बढ़ती परेशानी...*
● पौरुष ग्रंथि यानी प्रोस्‍टेट ग्लैंड, पुरुषों के जननांगों का अहम हिस्‍सा होता है।
● यह अखरोट के आकार का होता है।
● यह ग्रंथि सीमेन निर्माण में मदद करती है, जिससे सेक्‍सुअल क्‍लाइमेक्‍स के दौरान वीर्य आगे जाता है।
● इस ग्रंथि में सामान्‍य बैक्‍टीरियल इंफेक्‍शन से लेकर कैंसर जैसे गंभीर रोग हो सकते हैं।

● प्रोस्टेट ग्लैंड ज्यादा बढ़ जाने पर
लगभग 30% पुरुषों 40 की उम्र में
और 50% से भी ज्यादा पुरुषों 60 की उम्र में प्रोस्टेट की समस्या से परेशान होते हैं।

● प्रोस्टेट ग्लैंड को पुरुषों का दूसरा दिल भी माना जाता है।
● पौरूष ग्रंथि शरीर में कुछ बेहद ही जरूरी क्रिया करती हैं।
● जैसे यूरीन के बहाव को कंट्रोल करना और प्रजनन के लिए सीमेन बनाना।
● जैसे-जैसे उम्र बढ़ती हैं, यह ग्रंथि बढ़ने लगती हैं।
● इस ग्रंथि का अपने आप में बढ़ना ही हानिकारक होता हैं और इसे बीपीएच (बिनाइन प्रोस्टेट हाइपरप्लेसिया) कहते हैं।
● प्रोस्टेट ग्रंथि के बिलकुल बढ़ जाने से मूत्र उत्सर्जन की परेशानी हो जाती है।
● प्रोस्टेट ग्रंथि के आकार में वृद्धि होने का कारण स्पष्ट नहीं है।
● लेकिन अधिकतर सेक्सुअली इनेक्टिव पुरुषों में ये समस्या आम पायी जाती है एवम् बढ़ती उम्र के साथ पुरुषों के शरीर में होने वाला हारमोन का परिवर्तन एक विशेष कारण हो सकता है।
● ग्रंथि के आकार में वृद्धि हो जाने पर मूत्र नलिका अवरुद्ध हो जाती है और यही पेशाब रुकने का कारण बनती है।

*प्रोस्टेट वृद्धि के लक्षण*
(1) पेशाब करने में कठिनाई मेहसूस होना।
(2) थोड़ी थोड़ी देर में पेशाब लगना। रात को कई बार पेशाब के लिये उठना।
(3) पेशाब की धार चालू होने में विलंब होना।
(4) मूत्राषय पूरी तरह खाली नहीं होता है। मूत्र की कुछ मात्रा मूत्राषय में शेष रह जाती है। इस शेष रहे मूत्र में रोगाणु पनपते हैं।
(5) मालूम तो ये होता है कि पेशाब जोरदार लग रही है लेकिन बाथरूम में जाने पर बूंद-बूंद या रुक-रुक कर पेशाब होता है।
(6) पेशाब में जलन मालूम पडती है।
(7) पेशाब कर चुकने के बाद भी मूत्र की बूंदे टपकती रहती हैं, यानी मूत्र पर नियंत्रण नहीं रहता।
(8) अंडकोषों में दर्द उठता रहता है।
(9) संभोग में दर्द के साथ वीर्य छूटता है।

ऐसी अवस्था मरीज के लिए कष्टदायक होती है। उसे समझ नहीं आता कि क्या किया जाना चाहिए।

*●●उपचार●●*
प्रकृति ने हमें बहुत बढिया उपाय दिए हैं।
1. सीताफल के बीज इस बीमारी में बेहद लाभदायक होते हैं।
सीताफल के कच्चे बीज को अगर हर दिन अपने खाने में इस्तेमाल किया जाए, तो काफी हद तक यह प्रोस्टेट की समस्या से छुटकारा मिल सकता है।

2. आँवला रस, एलोवेरा रस और लौकी रस है लाभदायक।

3. जैतून का तेल 2 चम्मच सुबह और 2 चम्मच शाम।

4. अलसी (तीसी) के बीज
2 चम्मच सुबह 2 चम्मच शाम।

5. जल चिकित्सा है राम बाण।
*नोट:-*
जल चिकित्सा नहीं समझ में आये तो पानी का ज्यादा से ज्यादा सेवन करें।

प्राणायाम और आसन
कपालभाति और अनुलोम बिलोम प्राणायाम है लाभदायक।

सर्वागासन, नौकासन और शीर्षाशन भी देंगे आराम।

पृक्रति में विश्वास रखें, क्योंकि प्राकृतिक चिकित्सा से सफल उपचार सम्भव है।

सलाह एवं उपचार के लिए कभी भी सम्पर्क कर सकते हैं।



 *गर्भ संस्कार का अद्भुत ज्ञान विज्ञान...*

*चिकित्सा विज्ञान के अनुसार गर्भ में शिशु किसी चैतन्य जीव की तरह व्यवहार करता है - वह सुनता और ग्रहण भी करता है।*
*माता के गर्भ में आने के बाद से गर्भस्थ शिशु को संस्कारित किया जा सकता है।*
*हमारे पूर्वज इन सब बातों से भली भॉंति परिचित थे इसलिए उन्होंने गर्भाधान संस्कार को हमारी भारतीय संस्कृति में कराए जाने वाले सोलह संस्कारों में से एक संस्कार मान कर उसे पूर्ण पवित्रता के साथ संपन्न करने की प्रथा प्रचलित की थी।*

*बालक के अवतरण और उसकी विकास यात्रा में योगदान देना माता-पिता की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है ।*
*पिता गर्भधारण में केवल सहयोग प्रदान करता है, किंतु बाद में उस गर्भ को पकाने का कार्य माता के माध्यम से ही संपन्न होता हैं इसलिए पिता की अपेक्षा माता का उत्तरदायित्व अधिक है।*
*बिना उचित ज्ञान एवं स्थिति की जानकारी लिए माता इस कर्तव्य का भली भॉति पालन कर सकेगी, यह असंभव जैसा है ।*

*गर्भ संस्कार क्या है?*

*माता का एक-एक क्षण व बच्चे का एक-एक कण एक-दूसरे से जुड़ा है।*
*माता का खाना-पीना, विचारधारा, मानसिक परिस्थिति इन सभी का बहुत गहरा परिणाम गर्भस्थ शिशु पर होता है।*
*गर्भस्थ शिशु को संस्कारित व शिक्षित करने का प्रमाण हमें धर्म ग्रंथों में मिलता ही है।*
*कई वैज्ञानिक भी इस बात से सहमत हैं व उन्होंने इसे सिद्ध किया है।*
*हमारे धर्म ग्रंथों में प्रचलित सभी मंत्रों में यही कंपन रहता है- ऊँ, श्रीं, क्लीं, ह्रीम इत्यादि।*
*गर्भस्थ शिशु को इन बीज मंत्रों को सिखाने की प्रथा हमारे धर्मग्रंथों में है।*

*स्वामी विवेकानंद का कथन...*

*संतान उत्पति के संदर्भ में स्वामी विवेकानंद का कथन है कि यदि माता-पिता बिना प्रार्थना किए संतानोत्पति करते हैं तो ऐसे संतान ‘अनार्य’ है और समाज पर भारस्वरूप है । ‘आर्य’ संतानें वे ही हैं, जो माता-पिता द्वारा भगवान से की गई निर्मल प्रार्थना के फलस्वरूप उत्पन्न होती हैं।*
*वे ही परिवार, समाज का हितसाधन कर सकती है।*

*स्वामी विवेकानन्द की माँ भुवनेश्वरी देवी ध्यान किया करती थीं और गर्भावस्था में भी उन्होंने ध्यान किया था, इसलिए स्वामी विवेकानंद बाल्यकाल से ध्यान योग विद्या जानते थे।*
*ध्यान साधना गर्भावस्था में सबसे उतम है, गर्भवती स्त्री को जिस देवता, संत अथवा वीरपुरुष के गुण अपने शिशु में लाने की इच्छा हो, उनकी मूर्ति, छायाचित्र सामने रखकर उनका ध्यान करें। ध्यान के पश्चात गर्भवती स्त्री कुछ आवश्यक स्वयं सूचनाएं भी अपने गर्भ को दे सकती है।*

*माँ की भूमिका..!*

*बच्चों का सुसंस्कारित बनाने का सबसे उपयुक्त समय उसका गर्भकाल है।*
*गर्भधारण काल में माता का चिंतन, चरित्र और व्यवहार तीनों ही उसके उदर में पह रहे बच्चे को प्रभावित करते हैं। इस अवस्था में वह जिस तरह के बच्चे की कल्पना करती है, जिस तरह का भोजन करती है जिस तरह का वातावरण उसे मिलता है, वह सब बच्चे के अंदर सूक्ष्म रूप से समाहित होता जाता है।*

माता की आदतें, इच्छाएं आदि भी संस्कार के रूप में उसकी संतान के अंदर प्रवेश कर जाते हैं, जो समयानुसार परिलक्षित होते हैं। इस अवस्था में माता का शारिरिक, मानसिक व भावनात्मक स्वास्थ्य बच्चे के स्वास्थ्य को विनिर्मित करता है। इस अवस्था में माता जो भी देखती है, सीखती हे, महसूस करती हे, इच्छा करती है, कल्पना करती है, उसके अनुरूप ही उसके बच्चे के व्यक्तित्व का निर्माण बीज रूप में हो जाता है, जो समयानुसार विकसित होता है।

*अभिमन्यु की कहानी....*

*इस संदर्भ में महाभारत की सुविख्यात घटना है कि महाभारत युद्ध के समय तक दिन द्रोणाचार्य ने पांडवों का वध करने के लिए चक्रव्यूह की रचना की।*
*उस दिन चक्रव्यूह का रहस्य जानने वाले एकमात्र अर्जुन को कौरव बहुत दूर तक भटका ले गए और इधर पांडवों के पास चक्रव्यूह भेदन का आमंत्रण भेज दिया।*
*यह जानकर सब सारी सभा सन्नाटे में थी, तब 23 वर्षीय राजकुमार अभिमन्यु खड़े हुए और बोले - ‘‘मैं चक्रव्यूह भेदन करना जानता हूं।’’*

*युधिष्ठिर ने साश्चर्य प्रश्न किया - ‘‘पुत्र! मैंने तो तुम्हें कभी भी चक्रव्यूह भेदन सीखते न देखा और न ही सुना।’’ तब अभिमन्यु ने कहा - ‘‘तात् जब मैं अपनी मां सुभद्रा के पेट में था और मां को प्रसव पीडा प्रारंभ हो गई थी, तब मेरे पिता अर्जुन पास ही थे।*
*मां का ध्यान दर्द की ओर से बंटाने के लिए उन्होंने चक्रव्यूह भेदन की क्रिया बतानी प्रारंभ की।"*

*ऐसे बनता है बच्चा खुशमिजाज...*

*विशेषज्ञों का कहना है गर्भधारण के 14वें दिन पहला न्यूरोन बनता है।*
*फिर हर मिनट ढाई लाख न्यूरोन बनते हैं, जो आपस में जालीनुमा रचना बनाकर मस्तिष्क व तंत्रिकाएं बनाते हैं।*
*इसके बाद शरीर व ज्ञानेंद्रियों का निर्माण होता है।*
*इस समय गर्भ में जो अनुभव होता है वह शिशु की मेमोरी में जा बैठता है।*

*यदि मां खुश है तो उसके मस्तिष्क से निकलने वाले न्यूरो हार्मोस प्लेसेंटा के जरिए बच्चे में पहुंचते हैं और केमिकल सिग्नलिंग के माध्यम से बच्चे की कोशिकाओं पर असर करते हैं। ये विशिष्ट न्यूरो हार्मोस झाइगोट की सेंसेटिव कोशिकाओं को बढ़ाने व खुलकर विकसित करने में सहायक होते हैं जिससे बच्चे का स्वभाव खुशमिजाज बनता है।*

*पॉजिटिव फीलिंग व थॉट्स की किताबें पढ़ें। सोच पॉजिटिव रखें और आसपास खुशनुमा माहौल रखें। गर्भस्थ शिशु से बात करें। मेडिटेशन करें। सूदिंग संगीत, राग, मंत्रोच्चार व श्लोक आदि सुने। किसी एक्सपर्ट के सुपरविजन में प्रीनेटल योग करें.!*

*गर्भ संस्कार की विधि...*

*गर्भधारण के पूर्व ही गर्भ संस्कार की शुरूआत हो जाती है।*
*गर्भिणी की दैनिक दिनचर्या, मासानुसार आहार, प्राणायाम, ध्यान, गर्भस्थ शिशु की देखभाल आदि का वर्णन गर्भ संस्कार में किया गया है।*
*गर्भिणी माता को प्रथम तीन महीने में बच्चे का शरीर सुडौल व निरोगी हो, इसके लिए प्रयत्न करना चाहिए।*
*तीसरे से छठे महीने में बच्चे की उत्कृष्ट मानसिकता के लिए प्रयत्न करना चाहिए।*
*छठे से नौंवे महीने में उत्कृष्ट बुद्धिमत्ता के लिए प्रयत्न करना चाहिए।*

*क्यों ज़रूरी है गर्भ संस्कार.?*

*वर्तमान समय में सबसे ज्यादा ध्यान देने की आवश्यकता बच्चों पर ही है।*
*बच्चे ही समाज एवं राष्ट्र का भविष्य हैं।*
*बच्चे ही इस देश की प्राण-ऊर्जा हैं । यदि इन्हें सॅंवारा जा सकें,*
*इन पर विशेष रूप से ध्यान दिया जा सके तो निश्चित रूप से क्रमश: परिवार, समाज, राष्ट्र एवं विश्व का कल्याण हो सकता है।*
*आज पैदा होने वाले बच्चे कल भविष्य में युवा बनकर देश की बागडोर एवं अन्य जिम्मेदारियां सॅंभालते हैं।*

*यदि उन्हें ठीक प्रकार से गढ़ा नहीं गया, उनमें सही समझ पैदा नहीं हुई,*
*तो उनका जीवन कुंठित एवं रूग्ण हो जाएगा। एक सुसंस्कारित बच्चा ही अपने माता-पिता के नाम को उज्जवल एवं प्रकाशित कर सकता है और अगर हर घर में सुसंस्कारित बच्चे पैदा होने लेगं, तो निश्चित रूप से धरती के हर घर-परिवार में स्वर्गीय वातावरण हो जाएगा।*

*हर माता-पिता अपने बच्चे के उज्जवल भविष्य के लिए धन संपदा को एकत्रित करते हैं, उसके विकास के लिए बहुत चिंता करते हैं।*
*लेकिन यदि माता-पिता अपने बच्चे को विरासत में अच्छे संस्कार दे सकें, तो फिर उन्हें कुछ और खास चीज देने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी, क्योंकि ऐसी संताने न केवल अपना भविष्य सुधार लेंगी, बल्कि औरों के लिए भी साधन सुविधायें जुटा लेंगी।*

*गर्भ संस्कार के श्लोक और मंत्र...*

*गायत्री मंत्र :-*
*ॐ भूर्भुव: स्वः,*
*तत्सवितुर्वरेण्यं*
*भर्गो॑ देवस्य धीमहि।*
*धियो यो न: प्रचोदयात्॥*

*हनुमान जी को नमन :-*
*मनोजवं मारुत तुल्यवेगां जितेन्द्रियां बुद्धिमताँ वरिस्टाम, वातात्मजम वानर यूतमुख्यं श्रीरामदूतम् शरणम प्रपद्ये*

*दुर्गा माता को नमन :*
*या देवी सर्वभूतेषु बुद्दिरुपेन संस्थिता नमस्तस्ये नमस्तस्ये नमस्तस्ये नमो नम ।।*
*या देवी सर्वभूतेषु निन्द्रारुपेन संस्थिता नमस्तस्ये नमस्तस्ये नमस्तस्ये नमो नम ।।*
*या देवी सर्वभूतेषु शुधारुपेन संस्थिता नमस्तस्ये नमस्तस्ये नमस्तस्ये नमो नम ।।*
*या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरुपेन संस्थिता नमस्तस्ये नमस्तस्ये नमस्तस्ये नमो नम ।।*

*या देवी सर्वभूतेषु शान्तिरुपेन संस्थिता नमस्तस्ये नमस्तस्ये नमस्तस्ये नमो नम या देवी सर्वभूतेषु बुद्दिरुपेन संस्थिता नमस्तस्ये नमस्तस्ये नमस्तस्ये नमो नम ।।*
*या देवी सर्वभूतेषु निन्द्रारुपेन संस्थिता नमस्तस्ये नमस्तस्ये नमस्तस्ये नमो नम ।।*
*या देवी सर्वभूतेषु शुधारुपेन संस्थिता नमस्तस्ये नमस्तस्ये नमस्तस्ये नमो नम ।।*


*या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरुपेन संस्थिता नमस्तस्ये नमस्तस्ये नमस्तस्ये नमो नम ।।*
*या देवी सर्वभूतेषु तृष्णारुपेन संस्थिता नमस्तस्ये नमस्तस्ये नमस्तस्ये नमो नम ।।*
*या देवी सर्वभूतेषु लज्जारुपेन संस्थिता नमस्तस्ये नमस्तस्ये नमस्तस्ये नमो नम ।।*
*या देवी सर्वभूतेषु श्रद्धारुपेन संस्थिता नमस्तस्ये नमस्तस्ये नमस्तस्ये नमो नम ।।*

*या देवी सर्वभूतेषु स्मृतिरुपेन संस्थिता नमस्तस्ये नमस्तस्ये नमस्तस्ये नमो नम ।।*
*या देवी सर्वभूतेषु दयारुपेन संस्थिता नमस्तस्ये नमस्तस्ये नमस्तस्ये नमो नम ।।*
*या देवी सर्वभूतेषु त्रुष्टिरुपेन संस्थिता नमस्तस्ये नमस्तस्ये नमस्तस्ये नमो नम ।।*
*या देवी सर्वभूतेषु मातारुपेन संस्थिता नमस्तस्ये नमस्तस्ये नमस्तस्ये नमो नम ।*

*सरस्वती माता का मंत्र :-*
*या कुंदेंदु तुषारहार धवला,*
*या शुभ्र वस्त्रावृता,*
*या वीणावर दण्डमंडितकरा, या श्वेतपद्मासना || या ब्रह्माच्युतशंकरप्रभ्रृतिभिर्देवै: सदा वन्दिता |*
*सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेष जाड्यापहा ||*
*शुक्लां ब्रह्मविचार सार परमां आद्यां जगद्व्यापिनीं वीणा पुस्तक धारिणीं अभयदां जाड्यान्धाकारापाहां |*
*हस्ते स्फाटिक मालीकां विदधतीं पद्मासने संस्थितां वन्दे तां परमेश्वरीं भगवतीं बुद्धि प्रदां शारदां||*

*विष्णु मंत्र :- शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्ण शुभाङ्गम् । लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यम् वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम् ॥*

*श्री कृष्णा को नमन :- करारविन्देन पदारविन्दं मुखारविन्दे विनिवेशयन्तम् । वटस्य पत्रस्य पुटे शयानं बालं मुकुन्दं मनसा स्मरामि ॥१॥*
*संहृत्य लोकान्वटपत्रमध्ये शयानमाद्यन्तविहीनरूपम् । सर्वेश्वरं सर्वहितावतारं बालं मुकुन्दं मनसा स्मरामि ॥२॥ इन्दीवरश्यामलकोमलांगं इन्द्रादिदेवार्चितपादपद्मम् । सन्तानकल्पद्रुममाश्रितानां बालं मुकुन्दं मनसा स्मरामि ॥३॥*
*लम्बालकं लम्बितहारयष्टिं शृंगारलीलांकितदन्तपङ्क्तिम् । बिंबाधरं चारुविशालनेत्रं बालं मुकुन्दं मनसा स्मरामि ॥४॥*
*शिक्ये निधायाद्यपयोदधीनि बहिर्गतायां व्रजनायिकायाम् । भुक्त्वा यथेष्टं कपटेन सुप्तं बालं मुकुन्दं मनसा स्मरामि ॥५॥* *कलिन्दजान्तस्थितकालियस्य फणाग्ररंगे नटनप्रियन्तम् । तत्पुच्छहस्तं शरदिन्दुवक्त्रं बालं मुकुन्दं मनसा स्मरामि ॥६॥*
*उलूखले बद्धमुदारशौर्यं उत्तुंगयुग्मार्जुन भंगलीलम् । उत्फुल्लपद्मायत चारुनेत्रं बालं मुकुन्दं मनसा स्मरामि ॥७॥*
*आलोक्य मातुर्मुखमादरेण स्तन्यं पिबन्तं सरसीरुहाक्षम् । सच्चिन्मयं देवमनन्तरूपं बालं मुकुन्दं मनसा स्मरामि ॥८॥*

*गर्भधान संस्कार   निरोग, स्वस्थ व तेजस्वी संतान-प्राप्ति, गौरवर्ण सुंदर तेजस्वी बालक के लिए शास्त्रीय व आयुर्वेदिक घरेलु उपाय...*

*क्या है गर्भधान संस्कार.?*
*हिंदू धर्म के सोलह संस्कारों में यह पहला संस्कार माना जाता है। इसी के जरिये सृष्टि में जीवन की प्रक्रिया आरंभ होती है।*
*धार्मिक रूप से गृहस्थ जीवन का प्रमुख उद्देश्य और प्रथम कर्तव्य ही संतानोत्पत्ति माना जाता है।*
*सृष्टि का भी यही नियम है कि मनुष्यों में ही नहीं बल्कि समस्त जीवों में नर व मादा के समागम से संतानोत्पत्ति होती है।*
*लेकिन श्रेष्ठ संतान की उत्पत्ति के लिये हमारे पूर्वज़ों ने अपने अनुभवों से कुछ नियम कायदे स्थापित किये हैं जिन्हें हिंदू धर्म ग्रंथों में देखा भी जा सकता है। इन्हीं नियमों का पालन करते हुए विधिनुसार संतानोत्पत्ति के लिये आवश्यक कर्म करना ही गर्भधान संस्कार कहलाता है। मान्यता है कि जैसे ही पुरुष व स्त्री का समागम होता है!*
*जीव की निष्पत्ति होती है व स्त्री के गर्भ में जीव अपना स्थान ग्रहण कर लेता है। गर्भाधान संस्कार के जरिये जीव में निहित उसे पूर्वजन्म के विकारों को दूर कर उसमें अच्छे गुणों की उन्नति की जाती है।*
*कुल मिलाकर गर्भाधान संस्कार बीज व गर्भ संबंधी मलिनता को दूर करने के लिये किया जाता है।*

*गर्भाधान संस्कार की विधि*
स्मृतिसंग्रह में गर्भाधान के बारे में बताते हुए लिखा गया है कि -
निषेकाद् बैजिकं चैनो गार्भिकं चापमृज्यते।
क्षेत्रसंस्कारसिद्धिश्च गर्भाधानफलं स्मृतम्।।
इसका अर्थ है कि विधि विधान से गर्भाधान करने से अच्छी सुयोग्य संतान जन्म लेती है। इससे बीज यानि शुक्राणुओं संबंधी पाप अर्थात दोष नष्ट हो जाते हैं व गर्भ सुरक्षित रहता है। यही गर्भाधान संस्कार का फल है।

हिंदूओं में उत्तम संतान की प्राप्ति के लिये गर्भधान संस्कार किया जाना अत्यावश्यक माना गया है।
इसके लिये सर्वप्रथम तो संतति इच्छा रखने वाले माता-पिता को गर्भाधान से पहले तन व मन से स्वच्छ होना चाहिये।
तन और मन की स्वच्छता उनके आहार, आचार, व्यवहार आदि पर निर्भर करती है। इसके लिये माता पिता को उचित समय पर ही समागम करना चाहिये।
दोनों मानसिक तौर पर इस कर्म के लिये तैयार होने चाहिये। यदि दोनों में से यदि एक इसके लिये तैयार न हो तो ऐसी स्थिति में गर्भाधान के लिये प्रयास नहीं करना चाहिये। शास्त्रों में लिखा भी है –
आहाराचारचेष्टाभिर्यादृशोभिः समन्वितौ ।
स्त्रीपुंसौ समुपेयातां तयोः पुतोडपि तादृशः ।।
यानि स्त्री व पुरुष का जैसा आहार और व्यवहार होता है, जैसी कामना रखते हुए वे समागम करते हैं वैसे गुण संतान के स्वभाव में भी शामिल होते हैं।

*गर्भाधान कब करें?*
संतान प्राप्ति के लिये ऋतुकाल में ही स्त्री व पुरुष का समागम होना चाहिये।
पुरुष पर-स्त्री का त्याग रखे। स्वभाविक रूप से स्त्रियों में ऋतुकाल रजो-दर्शन के 16 दिनों तक माना जाता है। इनमें शुरूआती चार-पांच दिनों तक तो पुरुष व स्त्री को बिल्कुल भी समागम नहीं करना चाहिये। इस अवस्था में समागम करने से गंभीर बिमारियां पैदा हो सकती हैं।
धार्मिक रूप से ग्यारहवें और तेरहवें दिन भी गर्भाधान नहीं करना चाहिये। अन्य दिनों में आप गर्भाधान संस्कार कर सकते हैं। 

*अष्टमी, चतुर्दशी, पूर्वमासी, अमावस्या आदि पर्व रात्रियों में स्त्री समागम से बचने की सलाह दी जाती है।*

रजो-दर्शन से पांचवी, छठी, सातवीं, आठवीं, नौंवी, दसवीं, बारहवीं, चौदहवीं, पंद्रहवीं और सोलहवीं रात्रि में गर्भाधान संस्कार किया जा सकता है। मान्यता है कि ऋतुस्नान के पश्चात स्त्री को अपने आदर्श रूप का दर्शन करना चाहिये अर्थात स्त्री जिस महापुरुष जैसी संतान चाहती है उसे ऋतुस्नान के पश्चात उस महापुरुष के चित्र आदि का दर्शन कर उनके बारे में चिंतन करना चाहिये। 

*गर्भाधान के लिये रात्रि का तीसरा पहर श्रेष्ठ माना जाता है।*

*गर्भाधान कब न करें?*
*मलिन अवस्था में, मासिक धर्म के समय, प्रात:काल, संध्या के समय, मन में यदि चिंता, भय, क्रोध आदि मनोविकार हों तो उस अवस्था में गर्भाधान संस्कार नहीं करना चाहिये।*

*दिन के समय गर्भाधान संस्कार वर्जित माना जाता है मान्यता है कि इससे दुराचारी संतान पैदा होती है।*
*श्राद्ध के दिनों में, धार्मिक पर्वों में व प्रदोष काल में भी गर्भाधान शास्त्रसम्मत नहीं माना जाता।*

 
*किसी भी देश का भविष्य बालकों पर निर्भर करता है जो दम्पति सुविचारी, सदाचारी एवं पवित्रात्मा हैं तथा शास्त्रोक्त नियमों के पालन में तत्पर हैं ऐसे दम्पति के घर में दिव्य आत्माएँ जन्म लेती हैं ऐसी संतानों में बचपन से ही सुसंस्कार, सदगुणों के प्रति आकर्षण एवं दिव्यता देखी जाती है वर्त्तमान में देश के सामने बालकों में संस्कारों की कमी यह एक प्रमुख समस्या है, जिससे उबरने ले हेतु संतानप्राप्ति के इच्छुक दम्पति को ब्रह्मज्ञानी संतों, महापुरुषों के दर्शन सत्संग का लाभ लेकर स्वयं सुविचारी, सदाचारी बनना चाहिए, साथ ही उत्तम संतान प्राप्ति के नियमों को भी जान लेना चाहिए.!*

*वास्तव में पत्थर, पानी, खनिज देश की सच्ची सम्पत्ति नहीं हैं अपितु ॠषि-परम्परा के पवित्र संस्कारों से सम्पन्न तेजस्वी बालक ही देश की सच्ची सम्पत्ति हैं लेकिन मनुष्य धन सम्पत्ति बढ़ाने में जितना ध्यान देता है उतना संतान पैदा करने में नहीं देता यदि शास्त्रोक्त रीति से शुभ मुहूर्त में गर्भाधान कर संतानप्राप्ति की जाय तो वह परिवार व देश का नाम रोशन करनेवाली सिद्ध होगी उत्त्म संतान प्राप्ति के लिए सर्वप्रथम पति-पत्नी का तन-मन स्वस्थ होना चाहिए वर्ष में केवल एक ही बार संतानोत्पत्ति हेतु समागम करना हितकारी है।*

*गर्भाधान के लिए समय:*
*ॠतुकाल की उत्तरोत्तर रात्रियों में गर्भाधान श्रेष्ठ है लेकिन 11वीं व 13वीं रात्रि वर्जित है*
*यदि पुत्र की इच्छा हो तो पत्नी को ॠतुकाल की 8, 10, 12, 14 व 16वीं रात्रि में से किसी एक रात्रि का शुभ मुहूर्त पसंद कर समागम करना चाहिए*
*यदि पुत्री की इच्छा हो तो ॠतुकाल की 5, 7, 9 या 15वीं रात्रि में से किसी एक रात्रि का शुभ मुहूर्त पसंद करना चाहिए.!*
*कृष्णपक्ष के दिनों में गर्भ रहे तो पुत्र व शुक्लपक्ष में गर्भ रहे तो पुत्री पैदा होती है..*
*रजोदर्शन दिन को हो तो वह प्रथम दिन गिनना चाहिए सूर्यास्त के बाद हो तो सूर्यास्त से सूर्योदय तक के समय के तीन समान भाग कर प्रथम दो भागों में हुआ हो तो उसी दिन को प्रथम दिन गिनना चाहिए रात्रि के तीसरे भाग में रजोदर्शन हुआ हो तो दूसरे दिन को प्रथम दिन गिनना चाहिए!*

*निषिद्ध रात्रियाँ:*
*पूर्णिमा, अमावस्या, प्रतिपदा, अष्टमी, एकादशी, चतुर्दशी, सूर्यग्रहण, चंद्रग्रहण, ऊत्तरायण, जन्माष्टमी, रामनवमी, होली, शिवरात्रि, नवरात्रि आदि पर्वों की रात्रि, श्राद्ध के दिन, चतुर्मास, प्रदोषकाल, क्षयतिथि (दो तिथियों का समन्वय काल) एवं मासिक धर्म के चार दिन समागम नहीं चाहिए शास्त्रवर्णित मर्यादाओं का उल्लंघन नहीं करना चाहिए*
*माता पिता की मृत्युतिथि, स्वयं की जन्मतिथि, नक्षत्रों की संधि (दो नक्षत्रों के बीच का समय) तथा अश्विनी, रेवती, भरणी, मघा, मूल इन नक्षत्रों में समागम वर्जित है...*
 *प्राचीन संस्कृत ग्रन्थ - सर्वोदय, सुश्रुत संहिता, चरक संहिता व दयानंद सरस्वती - संस्कार विधि इन सभी पुस्तकों में सु-पुत्री व सु-पुत्र की प्राप्ति का सम्पूर्ण ज्ञान दिया गया है।*

*सु-पुत्र व सु-पुत्री प्राप्ति के लिए ज्योतिष अनुसार गर्भाधान का तरीका...*
*ज्योतिषीय ग्रंथों एवं आयुर्वेद के मतानुसार पुत्र-पुत्री प्राप्ति हेतु दिन-रात, शुक्ल पक्ष-कृष्ण पक्ष तथा माहवारी के दिन से सोलहवें दिन तक का महत्व बताया गया है। धर्म ग्रंथों में भी इस बारे में जानकारी मिलती है।*

*यदि आप पुत्र प्राप्त करना चाहते हैं और वह भी गुणवान, तो हम आपकी सुविधा के लिए हम यहाँ माहवारी के बाद की विभिन्न रात्रियों की महत्वपूर्ण जानकारी दे रहे हैं, वैसे वर्तमान परिस्थितियों में लड़कियां लड़कों से बहुत आगे निकल चुकी हैं फिर भी कुछ लोग...*

👉 चौथी रात्रि के गर्भ से पैदा पुत्र अल्पायु और दरिद्र होता है।

👉 पाँचवीं रात्रि के गर्भ से जन्मी कन्या भविष्य में सिर्फ लड़की पैदा करेगी।

👉 छठवीं रात्रि के गर्भ से मध्यम आयु वाला पुत्र जन्म लेगा।

👉 सातवीं रात्रि के गर्भ से पैदा होने वाली कन्या बांझ होगी।

👉 आठवीं रात्रि के गर्भ से पैदा पुत्र ऐश्वर्यशाली होता है।

👉 नौवीं रात्रि के गर्भ से ऐश्वर्यशालिनी पुत्री पैदा होती है।

👉 दसवीं रात्रि के गर्भ से चतुर पुत्र का जन्म होता है।

👉 ग्यारहवीं रात्रि के गर्भ से चरित्रहीन पुत्री पैदा होती है।

👉 बारहवीं रात्रि के गर्भ से पुरुषोत्तम पुत्र जन्म लेता है।

👉 तेरहवीं रात्रि के गर्म से वर्णसंकर पुत्री जन्म लेती है।

👉 चौदहवीं रात्रि के गर्भ से उत्तम पुत्र का जन्म होता है।

👉 पंद्रहवीं रात्रि के गर्भ से सौभाग्यवती पुत्री पैदा होती है।

👉 सोलहवीं रात्रि के गर्भ से सर्वगुण संपन्न, पुत्र पैदा होता है।

*व्यास मुनि ने इन्हीं सूत्रों के आधार पर पर अम्बिका, अम्बालिका तथा दासी के नियोग (समागम) किया, जिससे धृतराष्ट्र, पाण्डु तथा विदुर का जन्म हुआ। महर्षि मनु तथा व्यास मुनि के उपरोक्त सूत्रों की पुष्टि स्वामी दयानंद सरस्वती ने अपनी पुस्तक ‘संस्कार विधि’ में स्पष्ट रूप से कर दी है।*

*प्राचीनकाल के महान चिकित्सक वाग्भट तथा भावमिश्र ने महर्षि मनु के उपरोक्त कथन की पुष्टि पूर्णरूप से की है।*

*दो हजार वर्ष पूर्व के प्रसिद्ध चिकित्सक एवं सर्जन सुश्रुत ने अपनी पुस्तक सुश्रुत संहिता में स्पष्ट लिखा है कि मासिक स्राव के बाद 4, 6, 8, 10, 12, 14 एवं 16वीं रात्रि के गर्भाधान से पुत्र तथा 5, 7, 9, 11, 13 एवं 15वीं रात्रि के गर्भाधान से कन्या जन्म लेती है।*

*2500 वर्ष पूर्व लिखित चरक संहिता में लिखा हुआ है कि भगवान अत्रिकुमार के कथनानुसार स्त्री में रज की सबलता से पुत्री तथा पुरुष में वीर्य की सबलता से पुत्र पैदा होता है।*

*प्राचीन संस्कृत पुस्तक ‘सर्वोदय’ में लिखा है कि गर्भाधान के समय स्त्री का दाहिना श्वास चले तो पुत्री तथा बायां श्वास चले तो पुत्र होगा।*

*यूनान के प्रसिद्ध चिकित्सक तथा महान दार्शनिक अरस्तु का कथन है कि पुरुष और स्त्री दोनों के दाहिने अंडकोष से लड़का तथा बाएं से लड़की का जन्म होता है।*

*चन्द्रावती ऋषि का कथन है कि लड़का लड़की का जन्म गर्भाधान के समय स्त्री-पुरुष के दायां बायां श्वास क्रिया, पिंगला तूड़ा नाड़ी, सूर्यस्वर तथा चन्द्रस्वर की स्थिति पर निर्भर करता है।*

*उपाय :*
(1). नारियल का पानी पीने से अथवा नौ महीने तक रोज बबूल के 5 से 10 ग्राम पत्ते खाने से गर्भवती स्त्री गौरवर्णीय बालक को जन्म देती है। फिर चाहे माता-पिता श्याम ही क्यों न हों।

(2). 1 ग्राम असली वंशलोचन चूर्ण को रोज रात में सोने से पहले लेना चाहिए! ऐसा नित्य पहले 3 से 4 महीने तक दूध के साथ नियम से लेने पर बच्चा सुन्दर, स्वस्थ और तेज दिमाग वाला पैदा होता है!

(3). गर्भवस्था के समय रोजाना भोजन करने के बाद सौंफ खाने पर बच्चा गौरवर्ण का उत्पन होता है!

(4). गर्भवती स्त्री 60 ग्राम ताजे अंगूरों का रस रोज दिन में 2 बार लेती है तो उसका शिशु बलिष्ठ, सुन्दर, और स्वस्थ उत्पन्न होता है! और बच्चे की माँ को होने वाली परेशानिया जैसे की सुजन, अफारा, कब्ज, मूर्छा, चक्कर आना, और दातों में दर्द होना जैसी तकलीफें नहीं होती है!

(5). अगर स्त्री नित्य नाश्ते में आंवले का मुरब्बा खाती है तो बच्चे का रंग साफ़ व गोरा होता है और स्त्री भी स्वस्थ रहती है!
 
*तेजस्वी संतान की प्राप्ति के उपाय :*

शक्तिशाली व गोरे पुत्र की प्राप्ति के लिएः गर्भिणी पलाश के एक ताजे कोमल पत्ते को पीसकर गाय के दूध के साथ रोज ले। इससे बालक शक्तिशाली और गोरा उत्पन्न होता है।
माता-पिता भले काले वर्ण के हों लेकिन बालक गोरा होता है।
इसके साथ सुवर्णप्राश की 2-2 गोलियाँ लेने से संतान तेजस्वी होगी।

*हृष्ट-पुष्ट व गोरी संतान पाने हेतुः*

गर्भिणी रोज प्रातःकाल थोड़ा नारियल और मिश्री चबा के खाये तो गर्भस्थ शिशु हृष्ट पुष्ट और गोरा होता है।
(अष्टमी को नारियल खाना वर्जित है।)

*सुंदर व तीव्रबुद्धि संतान प्राप्त करने हेतुः*

गर्भिणी गर्मियों में 100 मि.ली गाय के दूध में 100 मि.ली. पानी मिलाकर एक चम्मच गाय का घी मिला के पिये तो पेट में जो शिशु बढ़ रहा है वह कोमल त्वचा वाला, सुंदर, तेजस्वी व बड़ा बुद्धिमान होगा।
दूध पीने के 2 घंटे पहले और बाद में कुछ न खायें।

*त्वचा की कांति के लिएः*
.
10-10 ग्राम सौंफ सुबह शाम खूब चबा चबाकर नियमित रूप से खाने से त्वचा कांतिमय बनती है।
गर्भवती स्त्री यदि पूरे गर्भकाल में सौंफ का सेवन करे तो शिशु गोरे रंग का होता है। साथ ही जी मिचलाना, उल्टी, अरुचि जैसी शिकायतें नहीं होतीं और रक्त शुद्ध होता है।

*गौर-वर्ण संतान की प्राप्ति के लिए गर्भिणी प्रथम 3 मास तकः*

> जहाँ तक हो सके हरे नारियल का पानी पिये।

> देशी बबूल के 2 ग्राम कोमल पत्ते रोज खाये।

> आँवले का अथवा केसरयुक्त दूध का सेवन जहाँ तक हो सके करे।

*उपर्युक्त प्रयोगों के साथ यदि गर्भिणी स्त्री सत्संग की पुस्तकें पढ़ती है तो शिशु मेधावी व सुसंस्कारी होगा। ऐसे बालकों की विश्व को जरूरत है।*

*स्वदेशीमय भारत ही हमारा अंतिम लक्ष्य है :-*
*भाई राजीव दीक्षित जी के बताए आयुर्वेद के पानी के सूत्रों का कट्टर अनुयायी व क्षमता व परिस्थिति अनुसार आयुर्वेद के यम नियम का पालनकर्ता।*

*भाई राजीव दीक्षित के विचार ज्ञान  से ज्ञानित हो ज्ञान को निस्वार्थ भाव से ज्ञान का प्रचार प्रसार।*


*बवासीर के मस्सों का देसी इलाज....*

1. नीम तथा कनेर के पत्तों का लेप मस्सों को ख़त्म करता है।

2. कडवी तोरई तथा हल्दी का लेप सब तरह के मस्सों को ख़त्म करता है।

3. सेन्हुड़े के दूध में हल्दी का पाउडर मिलाकर एक बूँद मस्से पर लगा देने से मस्सा नष्ट होता है।

4. थूहर का दूध मस्सों पर लगाने से बवासीर के मस्से नष्ट हो जाते हैं।

5. सहजने के पत्तों को महीन पीसकर मस्सों पर लेप करने से मस्से नष्ट हो जाते हैं।

6. माजूफल को खूब पीसकर उसमे थोड़ी सी अफीम मिलाकर, पानी में पीसकर गाढ़ा सा लेप बना लें।
मस्सो पर इसका लेप करने से बवासीर में बड़ा लाभ होता है।

7. बरगद की पीले पत्तों को जलाकर उसकी 6 ग्राम राख को सरसों के तेल में लेप बनाकर मस्सों पर लगाने से मस्से नष्ट हो जाते हैं।

8. कडवी तुम्बी को सिरके में महीन पीसकर गुदा द्वार पर लेप लगाने से बवासीर शीघ्र ख़त्म होती है।

9. कुकरोंधे के पत्तों का रस बवासीर के मस्सों पर मलें तथा उसी के पत्ते मस्सों के ऊपर बाँध भी दें। तो कुछ दिनों तक यह प्रयोग करते रहने से मस्से नष्ट हो जाते हैं।

10. तम्बाकू के पत्तों को महीन पीसकर गुदा पर लेप करने से बवासीर के मस्से नष्ट हो जाते हैं।

*आसान उपाय*
4 महीने का प्राकृतिक Hands उपलब्ध है मेरे पास।



 *रिफाईन्ड तेल का काला सच...*
*विशेषकर सी.एस.डी. कैंटीनों की सुविधा उठाने वाले फौजी भाइयों के लिये,*
*खुद किराना दुकानदारों एवं मिडल क्लास परिवारों के लिये।*
*एक बार जरूर पढ़ें,*
*आपके रोंगटे खड़े हो जायेंगे, आंखे खुली की खुली रह जायेंगी क्योंकि ये आपके जीवन के लिये बहुत ही महत्वपूर्ण हो है.!*

*क्या आपने कभी विचार किया कि आखिर...*
- जिस रिफाइंड तेल से आप अपनी और अपने छोटे बच्चों की मालिश नहीं कर सकते, 
- जिस रिफाइंड को आप बालों मे नहीं लगा सकते,
उस हानिकारक रिफाइंड तेल को कैसे खा लेते हैं ??

आज से 50 साल पहले तो कोई रिफाइंड तेल के बारे में जानता ही नहीं था,
ये तो पिछले 20 -25 वर्षों से हमारे देश में आया है।

कुछ विदेशी कंपनियों और भारतीय कंपनियाँ इस धंधे में लगी हुई हैं।

तेल को साफ़ करने के लिए जितने केमिकल इस्तेमाल किये जाते हैं सब इनऑर्गेनिक हैं और इनऑर्गेनिक केमिकल ही दुनिया में जहर बनाते हैं।
और उनका कॉम्बिनेशन जहर या डायरेक्ट मौत की तरफ ही ले जाता है।

*इसलिए...*
रिफाइन्ड तेल, और विशेषकर डबल रिफाइन्ड तेल गलती से भी न खाएं।

*फिर आप कहेंगे कि-*
*"क्या खाएँ...?*

तो आप बेशक़ शुद्ध तेल खाइए, 
- सरसों का, 
- मूंगफली का, 
- तीसी अलसी का, या 
- नारियल का।

*अब आप कहेंगे कि शुद्ध तेल में बास बहुत आती है और दूसरे शुद्ध तेल बहुत चिपचिपा होते हैं।*

हम लोगों ने जब शुद्ध तेल पर काम किया (या एक तरह से कहें कि रिसर्च किया) तो पता चला कि तेल का चिपचिपापन उसका सबसे महत्वपूर्ण घटक है।

तेल में से जैसे ही चिपचिपापन निकाला जाता है तो पता चला कि ये तो तेल ही नहीं रहा.!

फिर हमने देखा कि तेल में जो बास आ रही है वो उसका प्रोटीन कंटेंट है.!
शुद्ध तेल में प्रोटीन बहुत है,
दालों में ईश्वर का दिया हुआ प्रोटीन सबसे ज्यादा है,
दालों के बाद जो सबसे ज्यादा प्रोटीन है वो तेलों में ही है, तो तेलों में जो बास आप पाते हैं वो उसका ऑर्गेनिक कंटेंट है प्रोटीन के लिए | 

4-5 तरह के प्रोटीन हैं सभी तेलों में, आप जैसे ही तेल की बास निकालेंगे उसका प्रोटीन वाला घटक गायब हो जाता है और चिपचिपापन निकाल दिया तो उसका फैटी एसिड गायब।

*अब ये दोनों ही चीजें निकल गयी तो वो तेल नहीं पानी है, जहर मिला हुआ पानी।*

*और...*
ऐसे रिफाइन्ड तेल के खाने से कई प्रकार की बीमारियाँ होती हैं...
- घुटने दुखना, 
- कमर दुखना, 
- हड्डियों में दर्द..!
ये तो छोटी बीमारियाँ हैं, सबसे खतरनाक बीमारी है, 
- हृदयघात (Heart Attack),
- पैरालिसिस, 
- ब्रेन का डैमेज हो जाना, आदि आदि।

जिन जिन घरों में पूरे मनोयोग से रिफाइंड तेल खाया जाता है उन्ही घरों में ये समस्या आप पाएंगे,
मैंने तो देखा है कि जिनके यहाँ रिफाइंड तेल इस्तेमाल हो रहा है उन्हीं के यहां हार्ट ब्लॉकेज और हार्ट अटैक की समस्याएं हो रही है।

जब हमने सफोला का तेल लेबोरेटरी में टेस्ट किया, सूरजमुखी का तेल,
अलग अलग ब्रांड का टेस्ट किया तो AIIMS के भी कई डाक्टरों की रूचि इसमें पैदा हुई तो उन्होंने भी इस पर काम किया और उन डाक्टरों ने जो कुछ भी बताया उसको मैं एक लाइन में बताता हूँ क्योंकि वो रिपोर्ट काफी मोटी है और सब का जिक्र करना मुश्किल है।
*निचोड़ में  उन्होंने कहा-*
*“तेल में से जैसे ही आप चिपचिपापन निकालेंगे, बास को निकालेंगे तो वो तेल ही नहीं रहता, तेल के सारे महत्वपूर्ण घटक निकल जाते हैं*

*और डबल रिफाइंड में कुछ भी नहीं रहता, वो छूँछ बच जाता है, और उसी को हम खा रहे हैं तो तेल के माध्यम से जो कुछ पौष्टिकता हमें मिलनी चाहिए वो मिल नहीं रहा है।”*

*आप बोलेंगे कि तेल के माध्यम से हमें क्या मिल रहा ?*
मैं बता दूँ कि हमको शुद्ध तेल से मिलता है HDL (High Density Lipoprotein), ये तेलों से ही आता है हमारे शरीर में, वैसे तो ये लीवर में बनता है लेकिन शुद्ध तेल खाएं तब.?

तो...
आप शुद्ध तेल खाएं तो आपका HDL अच्छा रहेगा और जीवन भर ह्रदय रोगों की सम्भावना से आप दूर रहेंगे!

*अभी भारत के बाजार में सबसे ज्यादा विदेशी तेल बिक रहा है। मलेशिया नामक एक छोटा सा देश है हमारे पड़ोस में, वहां का एक तेल है जिसे पामोलिन तेल कहा जाता है, हम उसे पाम तेल के नाम से जानते हैं, वो अभी भारत के बाजार में सबसे ज्यादा बिक रहा है, एक दो टन नहीं, लाखो करोड़ों टन भारत आ रहा है और अन्य तेलों में मिलावट कर के भारत के बाजार में बेचा जा रहा है।*

*7-8 वर्ष पहले भारत में ऐसा कानून था कि पाम तेल किसी दूसरे तेल में मिला के नहीं बेचा जा सकता था लेकिन GATT समझौता और WTO के दबाव में अब कानून ऐसा है कि पाम तेल किसी भी तेल में मिला के बेचा जा सकता है।*

भारत के बाजार से आप किसी भी नाम का डब्बा बंद तेल ले आइये, रिफाइन तेल और डबल रिफाइण्ड तेल के नाम से जो भी तेल बाजार में मिल रहा है वो पामोलिन तेल है।

और...
जो पाम तेल खायेगा, मैं स्टाम्प पेपर पर लिख कर देने को तैयार हूँ कि वो ह्रदय सम्बन्धी बिमारियों से मरेगा..

क्योंकि...
पाम तेल के बारे में सारी दुनिया के रिसर्च बताते हैं कि पाम तेल में सबसे ज्यादा ट्रांस-फैट है...
और...
ट्रांस-फैट वो फैट हैं जो शरीर में कभी घुलते मिलते नहीं हैं, किसी भी तापमान पर घुलते नहीं होते।

ट्रांस फैट जब शरीर में घुलता नहीं है तो वो बढ़ता जाता है और तभी हृदयघात होता है, ब्रेन हैमरेज होता है और आदमी पैरालिसिस का शिकार होता है, डाईबिटिज होता है, ब्लड प्रेशर की शिकायत होती है।


 *चौंकिये मत, ये भी जानिये*
*मानव शरीर से संबंधित संख्यात्मक तथ्य*
1. वस्यक व्यक्तियों में अस्थियों की संख्या : →206
2. खोपड़ी में अस्थियां : →28
3. कशेरुकाओ की संख्या: →33
4. पसलियों की संख्या: →24
5. गर्दन में कशेरुकाएं : →7
6. श्वसन गति : →16 बार प्रति मिनिट
7. हृदय गति : →72 बार प्रति मिनिट
8. दंत सूत्र : → 2:1:2:3
9. रक्तदाव : →120/80
10. शरीर का तापमान : →37 डीग्री 98.4 फ़ारेनहाइट
11. लाल रक्त कणिकाओं की आयु : →120 दिन
12. श्वेत रक्त कणिकाओ की आयु : →1 से 3 दिन
13. चेहरे की अस्थियां: →14
14. जत्रुक की संख्या :→2
15. हथेली की अस्थियां: →14
16 पंजे की अस्थियां: →5
17. ह्दय की दो धड़कनों के बीच का समय : → 0.8 से.
18. एक श्वास में खीची गई वायु : →500 मि.मी.
19. सुनने की क्षमता : →20 से १२० डेसीबल
20. कुल दांत : →32
21. दूध के दांतों की संख्या : →20
22. अक्ल दाढ निकलने की आयु : →17 से 25 वर्ष
23. शरीर में अमीनों अम्ल की संख्या : →22
24. शरीर में तत्वों की संखया : →24
25. शरीर में रक्त की मात्रा : →5 से 6 लीटर
(शरीर के भार का 7 प्रतिशत)
26. शरीर में पानी की मात्रा : →70 प्रतिशत
27. रक्त का PH मान : →7.4
28. ह्दय का भार : →300 ग्राम
29. महिलाओं के ह्‌दय का भार →250 ग्राम
30. रक्त संचारण में लगने वाला समय →22 से.
31. छोटी आंत की लंबाई →22 फीट
33. शरीर में पानी की मात्रा →22 लीटर
34. मष्तिष्क का भार →1380 ग्राम
35. महिलाओं के मष्तिष्क का भार →1250 ग्राम
36. गुणसूत्रों की संख्या →23 जोड़े
37. जीन्स की संख्या →97 अरब


 *कलयुग में देसी गाय का घी जीता जागता अमृत है बशर्ते कि आपको प्रकृति पर विश्वास हो.!*
*जानिये रोग के अनुसार देसी गाय के शुद्ध घी का 30 असाध्य बीमारियों में  उपयोग एवं उपचार :*
*(1).* गाय का घी नाक में डालने से पागलपन दूर होता है।
*(2).* गाय का घी नाक में डालने से एलर्जी खत्म हो जाती है।
*(3).* गाय का घी नाक में डालने से लकवा का रोग में भी उपचार होता है।
*(4).* 20-25 ग्राम गाय का घी व मिश्री खिलाने से शराब, भांग व गांजे का नशा कम हो जाता है।
*(5).* देसी गाय का घी नाक में डालने से कान का पर्दा बिना ओपरेशन के ही ठीक हो जाता है।
*(6).* नाक में घी डालने से नाक की खुश्की दूर होती है और दिमाग तरोताजा हो जाता है।
*(7).* गाय का घी नाक में डालने से कोमा से बाहर निकल कर चेतना वापस लोट आती है।
*(8).* गाय का घी नाक में डालने से बाल झडना समाप्त होकर नए बाल भी आने लगते है।
*(9).* गाय के घी को नाक में डालने से मानसिक शांति मिलती है, याददाश्त तेज होती है।
*(10).* हाथ पांव मे जलन होने पर गाय के घी को तलवो में मालिश करें जलन ठीक होता है।
*(11).* हिचकी के न रुकने पर खाली गाय का आधा चम्मच घी खाए, हिचकी स्वयं रुक जाएगी।
*(12).* गाय के घी का नियमित सेवन करने से एसिडिटी व कब्ज की शिकायत कम हो जाती है।
*(13).* गाय के घी से बल और वीर्य बढ़ता है और शारीरिक व मानसिक ताकत में भी इजाफा होता है।
*(14).* गाय के पुराने घी से बच्चों को छाती और पीठ पर मालिश करने से कफ की शिकायत दूर हो जाती है।
*(15).* अगर अधिक कमजोरी लगे, तो एक गिलास दूध में एक चम्मच गाय का घी और मिश्री डालकर पी लें।
*(16).* हथेली और पांव के तलवो में जलन होने पर गाय के घी की मालिश करने से जलन में आराम आयेगा।
*(17).* गाय का घी न सिर्फ कैंसर को पैदा होने से रोकता है और इस बीमारी के फैलने को भी आश्चर्यजनक ढंग से रोकता है।
*(18).* जिस व्यक्ति को हार्ट अटैक की तकलीफ है और चिकनाई खाने की मनाही है तो गाय का घी खाएं, इससे ह्रदय मज़बूत होता है।
*(19).* देसी गाय के घी में कैंसर से लड़ने की अचूक क्षमता होती है। इसके सेवन से स्तन तथा आंत के खतरनाक कैंसर से बचा जा सकता है।
*(20).* गाय का घी, छिलका सहित पिसा हुआ काला चना और पिसी शक्कर या बूरा या देसी खाण्ड, तीनों को समान मात्रा में मिलाकर लड्डू बाँध लें। प्रतिदिन प्रातः खाली पेट एक लड्डू खूब चबा-चबाकर खाते हुए एक गिलास मीठा गुनगुना दूध घूँट-घूँट करके पीने से स्त्रियों के प्रदर रोग में आराम होता है, पुरुषों का शरीर मोटा ताजा यानी सुडौल और बलवान बनता है।
*(21).* फफोलों पर गाय का देसी घी लगाने से आराम मिलता है।
*(22).* गाय के घी की छाती पर मालिश करने से बच्चो के बलगम को बहार निकालने मे सहायता मिलती है।
*(23).* सांप के काटने पर 100 -150 ग्राम गाय का घी पिलायें, उपर से जितना गुनगुना पानी पिला सके पिलायें, जिससे उलटी और दस्त तो लगेंगे ही लेकिन सांप का विष भी कम हो जायेगा।
*(24).* दो बूंद देसी गाय का घी नाक में सुबह शाम डालने से माइग्रेन दर्द ठीक होता है।
*(25).* सिर दर्द होने पर शरीर में गर्मी लगती हो, तो गाय के घी की पैरों के तलवे पर मालिश करे, इससे सिरदर्द दर्द ठीक हो जायेगा।
*(26).* यह स्मरण रहे कि गाय के घी के सेवन से कॉलेस्ट्रॉल नहीं बढ़ता है।
वजन भी नही बढ़ता, बल्कि यह वजन को संतुलित करता है।
यानी के कमजोर व्यक्ति का वजन बढ़ता है तथा मोटे व्यक्ति का मोटापा (वजन) कम होता है।
*(27).* एक चम्मच गाय के शुद्ध घी में एक चम्मच बूरा और 1/4 चम्मच पिसी काली मिर्च इन तीनों को मिलाकर सुबह खाली पेट और रात को सोते समय चाट कर ऊपर से गर्म मीठा दूध पीने से आँखों की ज्योति बढ़ती है।
*(28).* गाय के घी को ठन्डे जल में फेंट ले और फिर घी को पानी से अलग कर ले यह प्रक्रिया लगभग सौ बार करे और इसमें थोड़ा सा कपूर डालकर मिला दें।
इस विधि द्वारा प्राप्त घी एक असर कारक औषधि में परिवर्तित हो जाता है जिसे जिसे त्वचा सम्बन्धी हर चर्म रोगों में चमत्कारिक वस्तु की तरह से इस्तेमाल कर सकते हैं। यह सोराइसिस के लिए भी कारगर है।
*(29).* गाय का घी एक अच्छा (LDL) कोलेस्ट्रॉल है। उच्च कोलेस्ट्रॉल के रोगियों को गाय का घी ही खाना चाहिए। यह एक बहुत अच्छा टॉनिक भी है।
*(30).* अगर आप गाय के घी की कुछ बूँदें दिन में तीन बार, नाक में प्रयोग करेंगे तो यह त्रिदोष (वात पित्त और कफ) को सन्तुलित करता है।


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