अत्यंत कठिन जीवत्पुत्रिका का महाव्रत डॉ दिलीप कुमार सिंह मौसम विज्ञानी ज्योतिष शिरोमणि
यह व्रत क्या है और कौन रहती है
जीवित्पुत्रिका या जिउतिया का महा व्रत अत्यंत कठिन व्रत होता है इसे क्वार महीने की अष्टमी तिथि कृष्ण पक्ष को मनाया जाता है यह व्रत माताएं अपने पुत्र के दीर्घायु सुख शांति समृद्धि यश कीर्ति के लिए रखती है यह तीन दिनों का व्रत होता है जिसमें मुख्य व्रत दूसरे दिन शुरू होता है जो बिना अन्न जल ग्रहण किया किया जाता है आश्विन महीने के भीषण गर्मी में इस व्रत को रख पाना बहुत ही कठिन होता है इसी से एक नारी और मां की महिमा और महत्व को समझा जा सकता है इस वर्ष या व्रत रविवार के दिन पड़ रहा है और अंग्रेजी तिथि 14 सितंबर है यह 13 सितंबर को ही प्रारंभ हो जाएगा 14 सितंबर को मुख्य निर्जला व्रत है और 15 सितंबर को सुबह इसका पारण है।
व्रत करने का स्थान और विधि
जितिया या जीवित्पुत्रिका का महा व्रत तीन दिनों का होता है पहले दिन अर्थात 13 सितंबर को सात्विक भोजन बनाकर पीटा और पक्षियों को अर्पित किया जाता है और सादा भोजन ही किया जाता है दूसरे दिन अर्थात मुख्य व्रत 14 सितंबर को आश्विन कृष्ण पक्ष अष्टमी को रविवार के दिन है जब सूर्योदय से पहले ही स्नान करके निर्जल व्रत प्रारंभ किया जाता है किसी साफ सुथरा स्थान को गोबर और मिट्टी से लीप पोत कर उसके बीच में एक जल का कुंड बनाया जाता है उसमें पानी भरकर भगवान जीमूतवाहन की कुशकी निर्मित एक प्रतिमा बनाई जाती हैं जो जलकुंड के बीच में रखा जाता है उसके अगल-बगल चील और सियारिन की प्रतिमा रखी जाती है उसके बाद सभी बैठकर भगवान जीमूतवाहन की कथा सुनते हैं
जीवित्पुत्रिका व्रत की कथाएं
इस व्रत में तीन कथाएं कही जाती हैं जो लोक जीवन और पुराणों में वर्णित हैं पहले और मुख्य कथा यह है कि जीमूतवाहन जो गंधर्व राजकुमार थे उनका मनराज पाठ में नहीं रहता था और इधर-उधर ज्ञान की खोज में घूमते रहते थे एक दिन संजोग सेवा एक ऐसी जगह पहुंचे जहां पर रोना पीटना मचा हुआ था वहां पूछने पर उन्हें पता चला कि पक्षी राज गरुड़ प्रतिदिन आकर एक नाग को खा लेते हैं संजोग से उसे दिन जिस नाग की बारी थी वह अपने घर में अकेला पुत्र था इसलिए उसकी मां जोर-जोर से रो रही उसे आश्वस्त करते हुए जीमूतवाहन ने स्वयं को उसकी जगह भगवान गरुड़ को समर्पित कर दिया जब गरुड़ ने खाने के लिए सोच मेरी और उनका मांस निकला तब वह नाग की जगह एक पुरुष देखकर आश्चर्यचकित हो गया सारी कथा सुनकर गरुड़ देव प्रसन्न हो गए और वरदान मांगने को कहा इस पर जीमूतवाहन ने सभी नागों को अभय दान मांगा और मरे हुए नागों को जीवित करने की प्रार्थना की और गरुड़ देव ने प्रसन्न होकर वैसा ही किया ऐसा करके जीमूतवाहन अमर हो गए और उन्हें देवता माना जाने लगा माना जाने लगा।
दूसरी कथा चल और सियारिन की है जो एक दूसरे को बहुत मानते थे संजोग से एक बार सियारी लेने जीवित्पुत्रिका व्रत किया लेकिन भूख बर्दाश्त न होने पर चोरी से हड्डियां खाने लगी इसके प्रभाव से उसे अनेक दुख कष्ट उठाने पड़े बाद में उसने जीवित्पुत्रिका व्रत करके पुत्र लाभ प्राप्त किया और अगले जन्म में चल और शिविर दोनों राजकुमार और मंत्री की पत्नी बनी मंत्री की पत्नी चल को सुंदर स्वस्थ बच्चे होते थे यह देखकर सियारी ने बच्चों का गलत काट दिया और कागज में फेंक दिया लेकिन बच्चों का कुछ भी नहीं हुआ यह देखकर सियारिन ने जेल से क्षमा याचना की और कालांतर में उसके भी बच्चे पैदा हुए।
अगली कथा भगवान श्री कृष्ण से जुड़ी हुई है महाभारत युद्ध के बाद जब शैतान अश्वत्थामा ने उत्तर के गर्भ में ब्रह्मास्त्र चलकर परीक्षित को मार डाला तब भगवान श्री कृष्ण ने अपने तेज से बालक को जिंदा कर दिया और इस प्रकार उनके जीवित पैदा होने पर अत्यंत प्रसन्नता से जिउतिया पर्व मनाया गया।
वैज्ञानिक एवं व्यावहारिक पक्ष भारत के सभी धर्म दर्शन अध्यात्म एवं लोक व्यवहार के कामों में सर्वश्रेष्ठ वैज्ञानिक पक्ष अवश्य जुड़ा रहता है जीवित्पुत्रिका का व्रत अत्यंत कठिन समय में किया जाता है जो महिलाओं को आपातकाल में किसी भी परिस्थिति में सुरक्षित और जीवित रखने में सहायक सिद्ध होता है जीवन में आने का ऐसी स्थितियां आती है जब महिलाओं को अपने मान सम्मान और अपने सतीत्व की रक्षा के लिए बिना खाए पिए चुपचाप छुपकर एक जगह पड़े रहना पड़ता है आपातकाल युद्ध कल अपराध हत्या लूट बलात्कार और आतंकवादी हमले में महिलाएं सबसे पहले और सबसे आसान शिकार सिद्ध होती है इसलिए उनको अनेक व्रत त्यौहार में इस तरह धर्म अध्यात्म की रक्षा करते हुए अपनी भी रक्षा करने का प्रशिक्षण दिया जाता है सचमुच सनातन धर्म परम अद्भुत और सबसे महान है जिसमें हर व्यक्ति का परमाणु से लेकर ईश्वर का जड़ और चेतन का नदी समुद्र पहाड़ का पूरा-पूरा ध्यान रखते हुए सब की पूजा किया जाता है इसके अलावा ऐसे व्रत जैसे करवा चौथ गणेश चतुर्थी हरितालिका तीज से स्त्रियों का शरीर और उनकी प्रतिरोधक क्षमता दोनों चरम शिखर पर पहुंच जाते हैं और निर्जल व्रत रहने से अनेक शारीरिक क्रियाएं फिर से पूरी ऊर्जा प्राप्त करके आगे बढ़ने लगते हैं और डीएनए आरएनए और कोशिकाएं पुनर्जीवन भी प्राप्त कर लेती है
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