धर्म दर्शन विज्ञान और पितृविसर्जन का महापर्व -डॉ दिलीप कुमार सिंह मौसम विज्ञान ज्योतिष शिरोमणि
प्रस्तावना
अपने पूर्वजों पितरों के प्रति समर्पित इस बार का 16 दोनों का पितृपक्ष बहुत ही अद्भुत और अनूठा था हजारों वर्षों में एक दो बार ऐसा संजोग बनता है जब पितृपक्ष का आरंभ चंद्र ग्रहण से हो और पितृपक्ष का समापन सूर्य ग्रहण से हो और इस बार ऐसा ही हो रहा है चंद्र ग्रहण तो लग चुका है जिसके भयानक प्रभाव से सारी दुनिया जूझ रही है और 21 सितंबर को सूर्य ग्रहण लगेगा और उसी दिन पितृपक्ष का समापन अर्थात पितृ विसर्जन भी लग रहा है पितृ विसर्जन के दिन अलग से विशेष क्या करना होता है इसके बारे में पूर्ण प्रमाणिक जानकारी धाम दर्शन विज्ञान और व्यवहार के निचोड़ के रूप में दी जा रही है
पितृ विसर्जन के दिन क्या करें
पितृ विसर्जन के दिन भी सामान्य रूप से वही सब किया जाता है जो इसके पहले 15 दिन में किया जाता है लेकिन इसमें एक अंतर है की दर्पण और श्राद्ध दोपहर की बेला में किया जाता है पिंडदान और श्रद्धा सुबह शाम नहीं किया जाता है लेकिन आपातकाल में ऐसा कर भी सकते हैं पितृपक्ष के दिन प्रतिदिन की भांति सुबह उठ कर नित्य क्रिया से निवृत्त होकर शुद्ध और शांत चित्र से स्नान करें इसके बाद प्रतिदिन की तरफ दक्षिण मुंह करके अपने पितरों को पानी गंगाजल दूध मिलकर उसमें अक्षत काला तिल और सफेद हल्के पीले पुष्प तथा कुश के साथ जलांजलि दें तत्पश्चात पिंडदान करें भजन को पिंड बनाकर पूर्वजों को अर्पित करने की क्रिया ही पिंडदान कहलाती है
पंचबली और अन्य क्रियाएं
इसके पश्चात भोजन जो श्राद्ध के निमित्त बना है उसको पांच प्राणियों में खिला देते हैं जिसमें गाय कुत्ता कौवा चींटी मछली या देवताओं के नाम पर निकाला गया भोजन होता है और इसी पांच लोगों के नाम पर इसे पंच बली कहा जाता है यह क्रिया संपन्न हो जाने पर पितरों को खीर और पूरी का भोग लगाया जाता है जो उन्हें अत्यंत प्रिय होता है फिर विद्वान सदाचारी सुपात्र व्यक्ति को भोजन कर कर अपने समर्थ के अनुसार दान दक्षिणा दे सकते हैं यह काम सबके लिए अनिवार्य नहीं है इच्छा अनुसार किया जा सकता है लेकिन आप पात्र व्यक्ति को भोजन और दक्षिण का दान नहीं करना चाहिए।
इसके पश्चात पीपल की पूजा करके उसमें जल देना चाहिए और दक्षिण दिशा में दीपक जलाना चाहिए विशेष श्राद्ध पूजा करने वालों को 16 बत्तियों वाले दीपक को जलाना चाहिए जो सरसों के तेल का होना चाहिए और यह दीपक दक्षिण दिशा में रखना चाहिए लेकिन यह नियम सबके लिए नहीं है यदि कोई श्रद्धा पूर्वक रोज की तरह तर्पण करके केवल गाय कुत्ते कौवे चींटी मछली को ही भोजन दे देता है तो वही पर्याप्त है। हमारे देवी देवता वैदिक रीति रिवाज के अनुसार शुद्ध विचार और अंतःकरण से अपनी पूजा से ही संतुष्ट हो जाते हैं बहुत अधिक पाखंड बढ़ने से लाभ की जगह हानि होती है जैसे आजकल विवाह संस्कार में हो रहा है।
पितृ विसर्जन के दिन क्या-क्या वर्जित है
कुछ और बातों पर ध्यान पितृ विसर्जन के दिन रखना आवश्यक है इस दिन कोई भी नया कार्य शुरू न करें कोई भी शुभ और मांगलिक कार्य इस दिन करना मना है इसके साथ-साथ कम से काम पूरे दिन गलत आचरण या दूसरों की बुराई करना या किसी के साथ छल कपट करना भी पूरी तरह वर्जित है यह दिन पितरों को खुशी के साथ विदाई देने का है और विदाई के दिन कोई भी नया काम वैसे भी नहीं किया जाता है सारे सारांश का मूल्य यही है क्योंकि विदाई के बाद व्यक्ति बाहर भीतर से पूरी तरह दुखी होता है ऐसे में शुभ मांगलिक और खुशी का काम वैसे भी नहीं किया जाता है पिता भी हमारे लिए जीवित व्यक्ति के समान है इसीलिए कोई भी नया काम या खुशी का काम इस दिन वर्जित किया जाता है
पितृपक्ष के दिन सूर्य ग्रहणविशेष सावधानी
इसी पितृ विसर्जन के दिन सूर्य ग्रहण भी लग रहा है इसलिए यह विशेष फलदाई होगा और सूर्य ग्रहण का प्रभाव परिवार पर पितृ विसर्जन के प्रभाव से काम रहेगा वैसे तो यह सूर्य ग्रहण भारत में दृश्य मन नहीं है इसलिए उसका सूतक भारत में नहीं लगेगा फिर भी यह 11:00 बजे रात से लेकर 22 सितंबर को भर में 3:24 तक रहेगा आता पितृ विसर्जन के दिन इसका कोई विपरीत प्रभाव नहीं है इस सूर्य ग्रहण का भी देश दुनिया पर भीषण प्रभाव पड़ेगा लेकिन पितरों के प्रसन्न होने पर इसका कोई विपरीत असर हमारे परिवार पर नहीं होगा इस बात पर ध्यान देना आवश्यक है यह ग्रहण विशेष रूप से ऑस्ट्रेलिया-न्यूजीलैंड समूह और दक्षिणी प्रशांत महासागर में दिखाई पड़ेगा और वहीं पर इसका सबसे अधिक असर होगा आने वाले दिनों में ऑस्ट्रेलिया प्रशांत क्षेत्र न्यू नारकाफ दीप समूह क्यूबा और हवाई द्वीप समूह में इसका भयानक असर देखा जाएगा।
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