Monday, 22 September 2025

*अरे समाज यह,* *तेरा कैसा न्याय।।* *कचरा गाड़ी वाला आया ,* *अस्पताल से शव निकाल।*

*अरे समाज यह,* 
 *तेरा कैसा न्याय।।* 
*कचरा गाड़ी वाला आया ,* 
 *अस्पताल से शव निकाल।* 

कचरे की गाड़ी वाला आया – घर से कचरा निकाल – यह स्लोगन अब पुराना हो गया।
अब इसकी जगह यह होना चाहिए – कचरे की गाड़ी वाला आया, अस्पताल से शव निकाल।
दुनिया बनाने वाले, तूने भी क्या दुनिया बनाई।
किसी के नसीब में हीरे–मोती लिखे, तो किसी के नसीब में सूखी रोटी भी नहीं आई।
गरीब आदमी तिल–तिल मरता है,ज़िंदगी भर तिरस्कार की ज़िंदगी जीता है,पल–पल बेइज़्ज़ती सहता है।
अमीर लोग इन गरीबों को कचरा समझते हैं,
और वाक़ई, इन गरीब को कचरा ही मान लिए जाते हैं।
जीते जी तो ज़िल्लत झेलते हैं,
और मरने के बाद मरे हुए जानवरों की तरह कचरे की गाड़ी में डालकर ले जाए जाते हैं।
कचरे की गाड़ी में हम लोग बदबूदार, गंदा और बेकार सामान फेंकते हैं,
जिनकी हमें ज़रूरत नहीं होती।
क्या यह ग़रीब भी इस समाज का कचरा हैं,‌ जिनके शव को गंदी, बदबूदार कचरे की गाड़ी में डालकर ले जाया जाता है?
वहीं बड़े लोग या नेता या अभिनेता मरते हैं तो उन्हें बड़े सम्मान से,फूलों से सजी हुई गाड़ियों में रखा जाता है।
जहाँ से वह गाड़ी गुजरती है, लोग उस पर पुष्प–वर्षा करते हैं।
उस गाड़ी से ऐसी सुगंध आती है, मानो किसी ने स्वर्ग के दरवाज़े खोल दिए हों।
हाल की घटनाएँ
ऐसी घटनाएँ अक्सर मीडिया की नज़रों में आ जाती हैं।
दो दिन पूर्व देवेंद्र लोधी नामक व्यक्ति का निधन सरकारी अस्पताल में हो गया।
शव घंटों तक अस्पताल में पड़ा रहा।
परिवार वाले शव वाहन का इंतज़ार करते रहे, जब शव वाहन नहीं आया तो अस्पताल कर्मियों ने शव को कचरे की गाड़ी में रखकर परिवार को सौंप दिया कचरे की गाड़ी चली, शहर की गलियों से,पर आज उसमें कचरा नहीं, एक इंसान था,लाश के रूप में,जिसने जीते जी तिरस्कार सहा,रोटी को तरसा, अपमान सहा,मरने के बाद भी चैन न पाया,सम्मान का हक़दार न बन पाया। वहीं गरीब की लाश बदबू में लिपटी,
मक्खियों का निवाला बनती है।
अरे समाज! तूने ये कैसा न्याय किया,जीते जी तो कचरा समझा,मरने के बाद भी कचरे में डाल दिया।।
यह घटना अकेली नहीं है।
2017 में बिहार के मुज़फ्फरपुर स्थित श्री कृष्णा मेडिकल कॉलेज अस्पताल में
एक महिला की मृत्यु के बाद उसका शव पोस्टमार्टम के लिए कचरे की ट्रॉली में ले जाया गया।
2018 में तमिलनाडु के वेल्लोर ज़िले में एक बेसहारा वृद्ध व्यक्ति का शव कचरे वाले ठेले पर रखकर घर तक पहुँचाया गया।
हम क्यों बात करते हैं तरक्की की, विश्वगुरु बनने की,
जब मूलभूत सुविधाओं का अभाव आज भी सामने आता है।
सरकार गरीबों को राशन और महिलाओं को हर महीने ₹1500 देकर उन्हें नाकारा कर रही है।
वर्ष 2025–26 में लगभग ₹4.49 लाख करोड़ रुपए महिलाओं को बाँट दिए गए,
वहीं ₹2.36 लाख करोड़ रुपए का अनाज फ्री में बाँट दिया गया।
अगर इन्हीं पैसों से हर गाँव, हर ज़िले, हर तहसील, हर शहर में
कुटीर उद्योग लगाए जाएँ तो लोगों को रोज़गार मिलेगा।
गरीब भी अपने पैरों पर खड़े हो पाएँगे और देश सच में विश्वगुरु कहलाएगा।
अगर हम चीन की बात करें तो 50–60 वर्ष पहले वहाँ भी गरीबी चरम पर थी।
खाने–पीने की भारी कमी थी।
लोगों के पास अनाज नहीं होता था। वे भूख मिटाने के लिए कीड़े–मकोड़े, जंगली जड़ी–बूटियाँ और पत्ते तक खाते थे।
फिर अचानक चीन ने तरक्की कैसे की?
वहाँ की सरकार ने हर गाँव, हर ज़िले, हर तहसील और हर शहर में छोटे–छोटे कुटीर उद्योग स्थापित किए।
एक खिलौना बनाने का काम पूरे का पूरा एक जगह नहीं होता था,बल्कि उसे चार हिस्सों में बाँट दिया जाता था।
एक हिस्सा एक कुटीर उद्योग बनाता, दूसरा हिस्सा दूसरा उद्योग,इस तरह चार कुटीर उद्योगों को रोज़गार मिलता।
आज यही चीन दुनिया का सबसे ताक़तवर देश बन गया है।
 

जीते जी तिरस्कार सहा,
मरने पर कचरे की गाड़ी में रहा।

मोहम्मद जावेद खान 

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