कटते हैं जब जंगल,
रोती है धरती।
कटते पेड़ों की,
चीखें सुन क्यों नहीं पाते?
मां जैसे हैं ये पेड़,
फिर क्यों जुल्म इन पर ढाते?
हम इंसान कितने स्वार्थी हैं। अपने घरों को सजाने के लिए हमने जंगल काट डाले, पक्षियों के बसेरे उजाड़ दिए। लेकिन जब प्रकृति हमारे घर उजाड़ती है, तब हम रोते-गिड़गिड़ाते हैं।
हम भूल जाते हैं कि पेड़ और जंगल जीवन का आधार हैं। दिखावे के लिए कुछ पौधे लगाने से संतुलन नहीं लौटता, जबकि हकीकत यह है कि इंसान करोड़ों पेड़ों का कत्ल कर चुका है। इसी का परिणाम है—बादल फटना, भूकंप और 50 डिग्री तक पहुंचता तापमान।
पेड़ मां जैसे होते हैं। जिस तरह मां अपने बच्चे को छाती से लगाकर सुरक्षित रखती है, वैसे ही पेड़ अपनी जड़ों से धरती को थामे रहते हैं। लेकिन अफसोस, इन्हीं पेड़ों पर कुल्हाड़ियां चलती हैं। दुख की बात यह है कि जिस कुल्हाड़ी से वे काटे जाते हैं, उसका दस्ता भी कभी किसी पेड़ की ही शाखा था।
एक वृक्ष की व्यथा सुनिए—
“जब तुम चलना सीख रहे थे, मेरी लकड़ी से बनी गाड़ी ने तुम्हें सहारा दिया। स्कूल की बेंच मैंने दी। बुढ़ापे में छड़ी बनकर तुम्हारा साथ निभाया। और जब तुमने दुनिया छोड़ी, श्मशान में तुम्हारे साथ मैं भी जला। फिर भी मेरे एहसान भूलकर तुम मुझे ही काटते रहे।”
आज भागलपुर के पीरपैंती में 2400 मेगावाट की ताप विद्युत परियोजना के लिए 10 लाख पेड़ काटे जाएंगे। मेरा विरोध बिजली परियोजना से नहीं, बल्कि पेड़ों की अंधाधुंध कटाई से है। देश में हजारों एकड़ बंजर ज़मीन है, जहां ऐसी परियोजनाएं लग सकती हैं। इससे रोजगार भी मिलेगा और पर्यावरण भी सुरक्षित रहेगा।
पेड़ भी रोते हैं। फर्क बस इतना है कि हमारे आंसू सब देख लेते हैं, लेकिन पेड़ों का दर्द कोई नहीं देखता। उन्होंने हमें हमेशा दिया है—हवा, फल, छाया और पक्षियों का आश्रय। फिर भी हम उन पर रहम नहीं करते।
✍️ मोहम्मद जावेद खान
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