Sunday, 11 January 2026

सौर महापर्व मकर संक्रांति का संपूर्ण विवेचन** *डॉ दिलीप कुमार सिंह मौसम विज्ञानी ज्योतिष शिरोमणि

**सौर महापर्व मकर संक्रांति का संपूर्ण विवेचन**
 
*डॉ दिलीप कुमार सिंह मौसम विज्ञानी ज्योतिष शिरोमणि*

वर्ष 2026 में कब मकर संक्रांति का महापर्व है -
वर्ष 2026 में 14 जनवरी को सूर्य संक्रांति है स्नान और दान इस दिन होगा और 15 जनवरी को मकर संक्रांति का उत्सव संपूर्ण भारत में एक साथ मनाया जाएगा 

‌ सारी शंकाओं भ्रम और संदेह का निवारण करते हुए मैं बिल्कुल स्पष्ट रूप से सभी को बताना चाहता हूं कि इस बार पूस महीने की कृष्ण पक्ष के 11 वीं तिथि तदनुसार 14  जनवरी 2026 बुधवार को पड़ने वाले सूर्य के महापर्व को संपूर्ण भारत में  ‌ मकर संक्रांति के रूप में और 15 जनवरी 2026 बृहस्पतिवार के दिन द्वादशी तिथि को  संक्रांति  ‌ अर्थात खिचड़ी के उत्सव के रूप में मनाया जाएगा और अलग-अलग नामों से जाना जाता है   किसी धर्म विशेष का नहीं संपूर्ण सृष्टि और प्रकृति का सर्वोत्तम महापर्व है जिस दिन सूर्य भगवान धनु राशि मकर राशि में दक्षिणी गोलार्ध में आते हैं‌ और दक्षिणायन से उत्तरायण होते हैं अर्थात उत्तरी गोलार्ध में प्रकाश लगातार बढ़ता जाता है और अंधकार घटता चला जाता है और सारे सनातन पर्व असत्य पर सत्य अंधकार पर प्रकाश और पाप पर पुण्य की विजय को ही दिखते हैं*

मकर संक्रांति पर्व पर हमेशा क्यों भ्रम और संदेह की स्थिति रहती है -

मकर संक्रांति पर आपने देखा होगा कि हमेशा इसको मनाया जाने को लेकर ब्रह्म और संदेह की स्थिति बनी रहती हैं ऐसा इसलिए है कि यह महान पर्व पूरी तरह सूर्य के धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करने पर दक्षिणायन से उत्तरायण होने पर निर्भर है यदि सूर्य सूर्यास्त के बाद या देर रात में धनु से मकर राशि में प्रवेश करता है तब अगले दिन अर्थात 15 जनवरी को मकर संक्रांति होती है और मकर संक्रांति का पर्व मनाया जाता है लेकिन अगर यह सूर्यास्त से पहले ही संक्रांति कर लेता है तो 14 जनवरी को ही मकर संक्रांति का महापर्व मनाया जाता है‌ वास्तव में ऐसा होता है कि सूर्य 100 से 2 वर्षों तक एक ही तिथि को संक्रांति करता है अर्थात धनु से मकर राशि में जाता है इसलिए लंबे समय के कारण लोग ऐसा मान लेते हैं कि यह एक ही तिथि को मनाया जाता है जबकि ऐसा बिल्कुल नहीं है प्रत्येक 100 या 200 वर्ष के बाद इसकी तिथि में परिवर्तन हो जाता है इधर काफी दिनों से 14 जनवरी को ही मकर संक्रांति सूर्य संक्रांति के कारण पढ़ रही थी इसलिए लोगों ने यह मान लिया था की हमेशा 14 जनवरी को ही मकर संक्रांति कब पर्व मनाया जाएगा लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं है ‌ प्रमाण के रूप में स्वामी विवेकानंद जी का जन्म 12 जनवरी को हुआ था और उसे दिन मकर संक्रांतिथी। 

इस वर्ष संक्रांति और मकर संक्रांति की क्या स्थिति बन रही हैं। 

हमारे अलका शिप्रा वैष्णवी ज्योतिष मौसम पूर्वानुमान और विज्ञान अनुसंधान केंद्र के अनुसार अत्यंत सूक्ष्म गणनाओं के आधार पर इस वर्ष 14 जनवरी को 2026 ईस्वी में लगभग 3:00 बजे सूर्य की संक्रांति हो रही है इसलिए यह संदेह और भी अधिक बढ़ गया है यदि यही संक्रांति 2 घंटे बाद होती तो निश्चित रूप से यह महान पर्व 15 जनवरी को ही मनाया जाता दूसरी बात इस पर्व में उदय तिथि का भी कोई बहुत महत्वपूर्ण भाग नहीं होता है और इसलिए 14 जनवरी को भी 3:13 शाम से लेकर 5:45 शाम तक स्नान दान का परम पवित्र महापर्व है जबकि 15 जनवरी को सुबह 7:21 से शाम 5:55 तक इस संक्रांति का समय है एक प्रकार से संपूर्ण दिन भर इस संक्रांति का महापर्व रहेगा। 15 जनवरी को राहुकाल 8:37 सुबह से 9:55 सुबह तक है और ऐसे समय में स्नान दान या पुण्य कार्य पूरी तरह से वर्जित रहेगा ‌ सारांश रूप में मैं अपने गहन अध्ययन के अनुसार यह बताना चाहूंगा कि संक्रांति अर्थात दान और स्नान का पर्व तो इस वर्ष 14 जनवरी को मनाया जाएगा लेकिन संक्रांति उत्सव अर्थात खिचड़ी का महापर्व इस वर्ष 15 जनवरी को मनाया जाएगा इसमें कोई भी संदेह नहीं है क्योंकि बृहस्पतिवार का दिन होने से खिचड़ी को बनाया खाया और दान नहीं किया जा सकता है इसके अलावा बृहस्पतिवार के दिन कालिदास सरसों का तेल चावल पैसों और काले कपड़े कंबल और केला जैसे फल का भी दान नहीं किया जा सकता इसलिए भी स्नान दान करने का दिन निश्चित रूप से 14 जनवरी को ही है।

संपूर्ण सौरमंडल का स्वामी सूर्य हैं जिन्हें सनातन धर्म में ईश्वर भी कहा जाता है जो सच भी है क्योंकि सारी सृष्टि सूर्य के ऊर्जा और प्रकाश से ही चल रही है और सूर्य का प्रकाश सूर्य के चारों ओर 200 करोड़ किलोमीटर तक फैला हुआ है ‌ और सूर्य का प्रभाव दो प्रकाश वर्ष अर्थात 190 खरब किलोमीटर तक है वैसे तो ग्रहों के अधिपति सूर्य 14 जनवरी को दोपहर में ‌ लगभग 3:00 पर ही मकर राशि में ‌ धनु राशि से गोचर करेंगे लेकिन उदया तिथि 15 जनवरी को प्राप्त हो रही है इसलिए बिना किसी संदेह के वर्ष 2026 में विक्रम संवत 2083 ई में मकर संक्रांति ‌ मैं स्नान दान का पर्व बुधवार के दिन 14 जनवरी को  ‌ और मकर संक्रांति उत्सव अर्थात खिचड़ी का पर्व 15 जनवरी बृहस्पतिवार को संपूर्ण भारत में एक साथ मनाई जाएगी सभी विद्वानों से निवेदन है कि 2 दिन का चक्कर छोड़कर सनातन धर्म में एकरूपता लाने के लिए यह घोषित कर दें कि 15 जनवरी को ही मकर संक्रांति का महापर्व मनाया जाएगा।

*सनातन धर्म के सभी पर्व उत्सव त्यौहार और सामाजिक सांस्कृतिक कार्यक्रम पूरी तरह प्राकृतिक पर्यावरण और विज्ञान पर आधारित हैं -

मकर संक्रांति भी सृष्टि चक्र का एक महान पर्व है जो भगवान सूर्य देव को समर्पित है जिन की कृपा से न केवल पृथ्वी बल्कि सौर मंडल के सभी ग्रह उपग्रह अवांतर ग्रह धूमकेतु इत्यादि का जीवन चक्र चलता है पृथ्वी के अलावा सौरमंडल में बुध शुक्र है मंगल बृहस्पति शनि अरुण वरुण यम और सैकड़ों उपग्रह हैं और सौरमंडल का विस्तार लगभग 2 प्रकाश वर्ष में है मकर संक्रांति नाम क्यों पड़ा है मकर संक्रांति पृथ्वी के परिक्रमण अर्थात सूर्य के चारों ओर घूमने तथा परिभ्रमण अर्थात अपने अक्ष या दूरी पर चारों ओर घूमने से जुड़ा है जब सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण होते हुए धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करता है तो उसे संक्रांति कहते हैं और मकर में प्रवेश करने के कारण ही इसे मकर संक्रांति कहते हैं* ।

*मकर संक्रांति कश्मीर से केरल और तमिलनाडु तथा राजस्थान गुजरात से असम अरुणाचल प्रदेश सहित पूरे भारत में मनाया जाता है इसके अलग-अलग नाम है पंजाब में से लोहरी तो कश्मीर में इसे मर संक्रांति उत्तर प्रदेश बिहार में खिचड़ी बंगाल इत्यादि में पौष संक्रांति गुजरात इत्यादि में इसको उत्तरायण और दक्षिण भारत में इसे पोंगल असम और पूर्वोत्तर भारत में बिहू महाराष्ट्र तिलगुल में हरियाणा मे सकरात हिमाचल में माघी कहते हैं । इसके अलावा इस महापर्व को सुर पर्व फसल पर्व उत्तर संक्रांति मकर संक्रांति माघ औरमाघी भोगी पोंगल खिचड़ी माघे शेशुर संक्रांति ‌ दही चूड़ा के नाम से जानते हैं भारत के अलावा पूरे विश्व में यह किसी ने किसी रूप में मनाया जाता है विशेष करके दक्षिण पूर्वी एशिया में इसको आज भी मानते हैं और इसे थाईलैंड में सोंगक्रान‌ म्यांमार में थिग्याम ‌ कंबोडिया में मोहन सॉन्गक्रान‌ कहते हैं।

क्यों बदलता रहता है खिचड़ी महापर्व ‌ का समय 

 सूर्य का अपने परिवार के साथ अपनी आकाशगंगा की परिक्रमा करने में 22 करोड़ वर्ष लगते हैं।और इसलिए प्रत्येक 100 वर्ष के बाद मकर संक्रांति आगे बढ़ जाती है आज से 100 वर्ष पहले 11/12 जनवरी को मनाई जाती थी धीरे-धीरे 13 और 14 को मनाई जाने लगी और अब यह 14 या 15 जनवरी को मनाई जाती है और आने वाले 100 वर्षों के बाद यह 16 और 17 जनवरी को मनाई जाएगी इस प्रकार ‌ मकर संक्रांति का महापर्व स्थिर नहीं है इसका क्रम बदलता रहता है 12 जनवरी को जब स्वामी विवेकानंद का जन्म हुआ था तब उसी दिन मकर संक्रांति का महापर्व था इस वर्ष14/ 15 जनवरी को ‌ बुधवार और बृहस्पतिवार के दिन ‌ सत्याभिषा नक्षत्र वरीघा योग में‌ मकर संक्रांति मनाया जाएगा और ‌ अभिजीत मुहूर्त दोपहर में 12:10 से 12:51 तक रहेगा*

 *भारतीय विज्ञान और ज्योतिष शास्त्र आकाश को समस्त विश्व की कक्षा मानकर कुल 12 राशियां मानता है 

हर राशि में सूर्य 1 महीने तक रहता है 2 राशियों के बीच जब सूर्य रहता है तो उसे संक्रांति कहते हैं और इसका समय 24 घंटे से 30 घंटे तक होता है पिछले 22 वर्ष में 12 वर्ष मकर संक्रांति का पर्व 15 जनवरी को पड़ा है और 10 बार 14 जनवरी को पड़ा है वर्ष 2003 2004 2007 2008 20 11 2012 2014 2015 2018 2019 2020 में 15 जनवरी को ही मकर संक्रांति मनाया गया* ।इसी दिन से सूर्य उत्तरायण होता है और प्रकाश की मात्रा दिन का समय बढ़ने लगता है अंधकार की मात्रा और रात्रि का समय घटने लगता है जो अंधकार से प्रकाश की ओर और असत्य से सत्य की ओर ले जाने का प्रतीक है बहुत से विद्वान जैसे आचार्य लगध इससे नए युग का आरंभ मानते हैं इसी समय से देवताओं का दिन और दैत्यों की रात शुरू होती हैं आप सबको ज्ञात है कि किस तरह पितामह भीष्म ने अपार कष्ट शरसैया पर रहते हुए भी अपने प्राणों का त्याग सूर्य के उत्तरायण होने अर्थात मकर संक्रांति के दिन ही किया था इसी के साथ ही समस्त मांगलिक कार्य विवाह व्रत पूजन हवन दान भी शुरू हो जाता है*

‌ स्नान और दान का स्थान 

 *इस दिन नदी समुद्र झील झरने पोखर तालाबों में और कुछ ना मिलने पर घर ही गंगाजल मिलाकर स्नान को परम पवित्र माना गया है और गंगा यमुना अदृश्य सरस्वती के संगम पर स्नान सभी प्रकार के दैहिक दैविक भौतिक ताप को हरण करता है और महा पवित्र विश्व का सबसे बड़ा सम्मेलन महाकुंभ अभी मकर संक्रांति के दिन से ही शुरू होते हैं अयोध्या मथुरा काशी कांची अवंतिका पुरी द्वारका जैसे जगह स्नान करना परम पवित्र माना जाता है इस दिन काले तिल अक्षत और लाल फूल से सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है भोजन में जल में मिष्ठान में तेल में तिल का प्रयोग करते हुए दान में भी तिल को अवश्य ही शामिल करना चाहिए यह समय फसलों का भी होता है‌ कई चीजों का दान बृहस्पतिवार के दिन नहीं किया जाता है इसलिए भी दान करने का दिन 14 जनवरी बुधवार को ही होगा इसके साथ अक्षत का विधान बृहस्पतिवार को नहीं होता है काली सरसों और सरसों के तेल का दान और काला तथा काले वस्त्र और कंबल भी बृहस्पतिवार को दान नहीं दे सकते हैं और न पैसे ही दिए जाते हैं इसीलिए बृहस्पतिवार के दिन दान देना मना किया गया है* 

 प्रकृति का महापर्व

‌ मकर संक्रांति को प्रकृति का महापर्व भी कहा जाना उचित होगा इस दिन रात्रि में देवता लोग स्नान करते हैं और भोर में अर्थात आठवें पर हर में 4:00 बजे से लेकर 7:00 बजे तक स्नान मनुष्य लोगों का करना परम पवित्र माना जाता है मकर संक्रांति को मनाने का सबसे अच्छा विधि विधान यह है कि प्रातः काल सूर्योदय से पहले स्नान कर ले संभव हो तो पवित्र नदी के बहते जल में स्नान करें या गंगा जी में स्नान करें अन्यथा गंगा जल के साथ पानी में काला तिल भी मिला लेंमिलाकर स्नानघर भी कर सकते हैं उसने पवित्र मंत्र बोलते हुए स्नान करने के बाद साफ सुथरा कपड़ा पहनकर तांबे के लोटे में पानी भर लो उसमें काला तिल गुड़ का छोटा टुकड़ा गंगाजल लाल चंदन लाल पुष्प अक्षत लेकर सूर्य देव के मंत्र का जाप करते हुए सूर्यदेव को अर्घ्य दीजिए और शनिदेव को भी जल अर्पित करें इसके बाद गरीबों को तिल गुड़ खिचड़ी इत्यादि का दान दें अगर मंत्र ना याद हो तो ओम सूर्याय नमः का जाप करना काफी है* 

*नदियों में स्नान सबसे पवित्र माना गया है ऐसा इसलिए भी अनिवार्य बनाया गया था जिससे लोग नदी झील पोखर तालाब समुद्र को गंदा और प्रदूषित ना करें वरना स्नान कैसे करेंगे इसी के कारण आज से 50 वर्ष पहले तक पूरे भारत के नदी ताल पोखर झील झरने और गंगासागर द्वारिका के समुद्र तट परम पवित्र थे और निर्मल थे यह एक प्रकार से विज्ञान का महान पर्व भी है क्योंकि इससे ही निश्चित होता है की दिन बड़ा और रात छोटी होनी शुरू हो जाती है और कहीं भी तिथियों का व्यतिक्रम नहीं होता है*

14 जनवरी की नहीं है खिचड़ी मनाने का समय 

*क्योंकि काफी दिनों से मकर संक्रांति 14 जनवरी को ही मनाई जाती रही है इसीलिए लोगों को यह लगने लगा है कि 14 जनवरी को ही खिचड़ी का महापर्व होता है जबकि यह गलत है हर से 200 वर्षों में यह 1 दिन आगे बढ़ जाता है क्योंकि इस वर्ष सूर्य धनु राशि से मकर राशि में रात्रि को 8:21के आसपास प्रवेश करेंगे इसलिए 14 जनवरी को किसी हाल में मकर संक्रांति मनाया नहीं जा सकता रविवार को दोपहर तक खिचड़ी का पुण्य समय है इस दिन 3 ग्रह योग शश योग सुकर्मयोग वाशी योग बालव करण योग इत्यादि योग बन रहे हैं और शनिवार को ब्रह्मा योगाआदि योग महा और के योग रात्रि योग सूर्य शनि की युति का दुर्लभ योग भी बन रहे हैं इस वर्ष दोपहर तक पुण्य कॉल रहेगा डॉ दिलीप कुमार सिंह ज्योतिष शिरोमणि तथा निदेशक अलका शिप्रा वैष्णवी ज्योतिष मौसम विज्ञान अनुसंधान केंद्र

*मकर संक्रांति के दिन संभव है तो बहते हुए नदी में या गंगा नदी में या संगम में स्नान करें अन्यथा भगवान सूर्य का नाम लेकर गंगा जल मिलाकर घर में ही स्नान करें और तांबे के लोटे में अक्षत अर्थात बिना टूटा हुआ चावल लाल पुष्प काला तिल मिलाकर स्नान करें यह एक संपूर्ण प्रामाणिक वैज्ञानिक महापर्व है जो सूर्य पर आधारित है इसको मकर संक्रांति उत्तरायण खिचड़ी पोंगल बिहू मकर संक्रांति इत्यादि नामों से जाना जाता है इस काल में सूर्य धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करते हैं इसी दौरान जब तक ध्यान पूजा-पाठ और दान का अत्यधिक महत्व होता है इसी दिन से दिन बड़ा और रात छोटी होने लगते हैं अर्थात या प्रकाश का महापर्व है ज्ञान का और सत्य कभी महापर्व है*

*ऐसा माना जाता है कि भगवान सूर्य से दिन अपने पुत्र शनि देव से मिलने उनके घर जाते हैं शनि मकर राशि के देवता हैं इसलिए से मकर संक्रांति कहा जाता है इसी दिन महा प्रतापी परम शूरवीर गंगापुत्र भीष्म पितामह ने इच्छा मृत्यु के बाद स्वर्गारोहण किया था क्योंकि दक्षिणायन  सूर्य रहने पर मरने वाले को स्वर्ग नहीं मिलता इसलिए इसे भीष्मा स्त्री पर्व भी कहते हैं और यह भी माना जाता है कि इसी दिन मकर संक्रांति के दिन गंगा मां का स्वर्ग से अवतरण हुआ था‌ और कपिल मुनि के आश्रम में गंगासागर से गंगा जी का मिलन हुआ था इसलिए वहां बहुत बड़ा स्नान पर्व और मेला लगता है। और इसी दिन यशोदा ने भगवान श्री कृष्ण के लिए व्रत रखा था‌ और इसी दिन भगवान श्री हरि विष्णु ने राक्षसों का विनाश किया था*

*महापर्व में खिचड़ी गुड़ काला तिल इत्यादि का दान सच्चे मन से किया जाता है काला तिल शनि का प्रतीक तो है ही ऐसा माना जाता है कि इसकी उत्पत्ति भगवान विष्णु से हुई थी वैसे भी तेल शरीर को स्वस्थ निरोग रखता है और शरीर में गर्मी का संचार करता है यह संपूर्ण भारत वर्ष में मनाया जाता है डॉ दिलीप कुमार सिंह*

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