संपूर्ण सृष्टि में सबसे अद्भुतआदि देव भगवान शिव और महाशिवरात्रि -डॉ दिलीप कुमार सिंह मौसम विद ज्योतिष शिरोमणि एवं निदेशक
देवों के देव आदि देव भगवान शिव और उनकी शक्ति स्वरूपा देवी पार्वती शिवा सृष्टि का मूल है सृष्टि के प्रथम और अंतिम ईश्वरीय तत्व और ईश्वर हैं उनसे ही सारी सृष्टि का निर्माण हुआ है विश्व के हर धर्म सभ्यता और संस्कृति में एक समान रूप से वंदनीय हैं चाहे वह प्राचीन अमेरिका यूनान मिश्र भारत अरब की सभ्यता हो या आधुनिक काल की कोई भी सभ्यता हर जगह भूत भावन अघोरेईश्वर विश्व के कल्याणकारी जो स्वयं ही कल्याण के मूर्तिमान स्वरूप आशुतोष भगवान भोलेनाथ की जय जयकार हो रही है भगवान भोलेनाथ परम अद्भुत चिंतन और कल्पना से परे और देवी सती के साथ मिलकर अर्धनारीश्वर सृष्टि के अंतिम रहस्य हैं।
वैसे तो भगवान शिव और भगवती पार्वती को समझ पाना किसी भी जड़ चेतन या मानव के बस के कल्पना के परे की बात है फिर भी जो कुछ स्वरूप स्वयं भगवान शिव और माता पार्वती ने स्वयं बताया है या जो कुछ अन्य देवी देवताओं और महान शिव भक्तों के द्वारा वर्णित किया गया है उसके अनुसार भगवान शिव का मनमोहक स्वरूप इतना अदभुत है कि जिसको देखकर सृष्टि का जड़ चेतन ही नहीं देवी देवता ही नहीं स्वयं माता पार्वती भगवान गणेश और भगवान विष्णु भी सम्मोहित हो गए थे मोहिनी के रूप को धारण करते हुए भगवान श्री हरि विष्णु और बारात के समय असली स्वरूप में आने पर देवी पार्वती सहित समस्त उपस्थित लोग और परिजन विस्मय विमुग्ध हो गए थे इसीलिए भगवान भोलेनाथ शमशान में या कैलाश पर्वत पर अपने सबसे वीभत्स या अघोरी स्वरूप में रहते हैं सफेद कपूर जैसा गौर वर्ण शरीर पर मसान की भस्म लपेटे हुए अद्भुत लालिमा लिए हुए पैर शरीर पर बाघंबर हृदय में पार्वती मां सर पर गंगा देवी माथे पर जटा जूट और उसमें सुशोभित चंद्रमा गले में पूरे विश्व को भस्म कर देने वाला कालकूट हलाहल विष मस्तक पर सुशोभित तीन नेत्र एक हाथ में त्रिशूल और उसमें बंधा हुआ डमरू दूसरे हाथ में अभय दान की मुद्रा जिसमें समस्त अस्त्र-शस्त्र दिव्यास्त्र और संपूर्ण शास्त्र छिपे हुए होते हैं बगल में बैठे हुए नंदीश्वर और चारों ओर भूत प्रेत पिशाच डाकिनी शाकिनी महाकाली देवी और भैरव जी तथा बाल गणेश और स्वामी कार्तिक देव चारों तरफ हिममंडित पर्वत के उत्तम शिखर और कैलाश का वह शिखर जिस पर आज तक कोई भी चढ़ नहीं सका है और बगल में बिल्कुल स्वच्छ अमृत जैसी नीले हरे रंग की मानसरोवर झील और चारों ओर अद्भुत ओमकार का स्वर अद्भुत परम शांति और भगवान शिव के बगल में बैठी हुई सृष्टि का निर्माण करने वाले भगवती पार्वती मां सभी को आश्चर्यचकित कर एक परम पावन कैलाश लोक का निर्माण करता है।
यह तो भगवान शिव के धर्म और अध्यात्म का स्वरूप हुआ अब इसको थोड़ा विज्ञान की दृष्टि से देखा जाए भगवान शिव का पैर सदैव बर्फ से ढके हुए कैलाश शिखर पर आता है जो यह प्रदर्शित करता है कि वह बर्फ की तरह कोमल स्वच्छ और किसी भी प्रकार के प्रदूषण से मुक्त हैं शरीर पर बाघंबर इस बात का प्रतीक होता है कि हिंसक से हिंसक जीव जंतु भी उनके लिए वस्त्राभूषण के समान हैं और बाघ का वस्त्र पहन कर व्यक्ति आसानी से साधना में डूब जाता है हृदय में इलेक्ट्रॉन रूपी पार्वती मां सारी सृष्टि को अपने अंदर समाहित किए हुए हैं जो ऋणात्मक अर्थात स्त्री तत्व हैं और जब उसमें प्रोटॉन अर्थात भगवान शिव का मिलन होता है तब एक आदि कण परमाणु का निर्माण होता है और इसके बिना सृष्टि असंभव है गले में हलाहल विष समग्र विश्व की कल्याण कामना को दिखाता है और जिस हलाहल विष की गर्मी को तीनों लोक में कोई सहन नहीं कर सका उसको भगवान शिव ने खेल-खेल में पी लिया था और तीनों लोकों की रक्षा किया था अर्थात विश्व का सृष्टि का कल्याण भगवान शिव का सबसे बड़ा लक्ष्य है
भगवती गंगा देवी के रौद्र स्वरूप को जो धरती को चूर-चूर कर देता उसके अनंत वेग को रोककर भगवान शिव ने गंगा को भागीरथी बनाकर समग्र विश्व में पूजनीय बनाकर उसे देव नदी बना दिया और बताया कि महानता कल्याण में होती है विनाश में नहीं जटा जूट पर सुशोभित चंद्रमा जो अमृत तत्व का भंडार है वह हलाहल विष के तेज को शांत करता रहता है संसार के सभी अस्त्र-शस्त्र और दिव्यास्त्र को अपने अंदर समाहित करने वाला भगवान शिव का पिनाक त्रिशूल जहां एक और इलेक्ट्रॉन प्रोटॉन और न्यूट्रॉन तो दूसरी तरफ अल्फा बीटा गामा किरणों को दिखाता है।
और उसमें लेजर क्वाजार और एक्स किरणें इतनी भयंकर मात्रा में उपस्थित होती है कि एक दो आकाशगंगा नहीं अरबों विश्व समुदाय और अरबों कृष्ण नक्षत्र अर्थात ब्लैक होल को पल मात्र में भस्म किया जा सकता है डमडम निनाद का प्रतीक डमरू समस्त विद्या और ध्वनि ऊर्जा का प्रतीक है और ध्वनि से ही संपूर्ण विद्या ज्ञान विज्ञान कला साहित्य प्रकट होता है किसी डमरू को 14 बार बजा कर भगवान शिव ने महान पाणिनि को 14 सूत्रों का उपदेश दिया जिससे संपूर्ण संस्कृत भाषा का निर्माण हुआ और कालांतर में इसी संस्कृत भाषा से दुनिया की अनगिनत भाषाएं देश काल बोली और परिस्थितियों के अनुक्रम में उत्पन्न हुई।
भगवान शिव के बगल स्थित नंदीश्वर बैल स्वरूप में सारे विश्व और कृषि कार्यों के प्रतीक हैं जो उसे गाय के पुत्र स्वरूप उत्पन्न होते हैं जो मानव श्रेष्ठ की दूसरी मां कही जाती है और जिसका दूध अमृत माना जाता है और जो हर व्यक्ति के लिए कल्याणकारी है भूत प्रेत और उनके गण यह दिखाते हैं कि सृष्टि में कोई भी चीज भयंकर नहीं है भयंकर से भयंकर वस्तु भी सृष्टि और मानव के लिए कल्याणकारी है गले में लिपटा भयंकर नाग भी इस बात को दिखाता है की अपनी शक्ति प्रेम और ऊर्जा से विश्व के सबसे खतरनाक जीव नाग को भी वश में किया जा सकता है और परम भयंकर नग धारण करना भगवान शिव के बस की ही बात है चाहे मसान हो चाहे कैलाश पर्वत का क्षेत्र हो वहां पर अपूर्व शांति और असली जीवन का तत्व छिपा रहता है और यहीं पर आकर मनुष्य को अपूर्व शांति और सही जीवन का बोध होता है शरीर पर लपेटा हुआ भस्म यह दिखाता है कि अंत में मानव जीव जंतु जड़ चेतन ही नहीं संपूर्ण सृष्टि आकाशगंगा परम विश्व ब्लैक होल में और ब्लैक होल महाकाली में और महाकाली अंत में शिव में विलीन हो जाती हैं इस प्रकार भगवान शिव का स्वरूप परम कल्याणकारी चिंतन मनन कल्पना के परे हैं।
भगवान भोलेनाथ शिव को और उनकी परमप्रिया अर्धांगिनी देवी सती को समझ पाना मन बुद्धि कल्पना के परे हैं अपने भक्तों की रक्षा के लिए काल से नहीं साक्षात महाकाल से भी लड़कर मार्कंडेय ऋषि जैसे अबोध बालक को अमरत्व प्रदान करने वाले भस्मासुर जैसे लोगों को अपने ही विनाश का वरदान देने वाले जालंधर जैसे त्रिलोक विजेता का वध करने वाले रावण को सोने की लंका प्रदान करने वाले और कैलाश पर्वत उठाने का प्रयास करने पर उसे कुचल देने वाले अपने भक्तों की रक्षा के लिए भगवान श्री राम श्री कृष्ण और भगवान श्री राम और श्री हरिविष्णु से भी लड़ने वाले कठोरता की मूर्ति बनकर जहां 87000 वर्षों तक भगवती सती का त्याग कर दिया और कामदेव को भस्म कर दिया वहीं पर कोमलता की मूर्ति माता सती के अपने पिता के यज्ञ की अग्नि में सती हो जाने पर वीरभद्र और महाकाली को उत्पन्न कर सभी दुष्ट और दक्ष के विनाश का कारण बनने वाले हनुमान को अभय दान देने वाले सत्यम शिवम सुंदरम के साक्षात स्वरूप विश्व की प्रथम और अंतिम अंतरिक्ष नगरी तारकापुरी को नष्ट कर तारकासुर का संघार करने वाले अनंत वेग के स्वामी और समस्त ब्रह्मांड और ब्लैक होल सहित सब कुछ निगल जाने को तैयार माता महाकाली के पैर के नीचे आकर उनका क्रोध शांत करने वाले भगवान शिव की महिमा अनंत है ।
जिसका बखान वेदों से लेकर शिव पुराण और सभी धर्म और साहित्य काव्य जगत में आज भी गुंजित हो रहा है उनकी महिमा एक छोटे से लेख में सीमित नहीं जा सकती है भगवान शिव की कृपा और उनके आशीर्वाद से ही इस लेख का निर्माण हो सका है अभी तक जो कुछ भी विज्ञान और मनुष्य को टेक्नोलॉजी के सहारे ज्ञात है तो उसके अनुसार हमारी अपनी आकाशगंगा में पांच खरब सूर्य हैं ऐसी 1000 खरब आकाशगंगाए खोजी जा चुकी हैं और इन सभी आकाशगंगाओं का समूह परम विश्व अर्थात यूनिवर्स होता है और अभी तक 100 अरब यूनिवर्स खोजे जा चुके हैं और यह केवल देखे जा सकने वाले ब्रह्मांड का 10% भाग है और इन सभी को पलक झपकते ही भगवान शिव अपने डमरू के निनाद से और त्रिशूल से नष्ट कर देते हैं उनका रौद्र और भीषण रूप देखकर समस्त जड़ चेतन भयानक डर से कांप उठते है ग्रह नक्षत्र चूर-चूर हो जाते हैं आकाशगंगा बिखर जाती हैं परम विश्व और प्रति परम विश्व टूट कर महाकृष्ण विवर में और महा कृष्ण विवर महाकाली में समाहित हो जाता है द्रव्य प्रति द्रव्य ऊर्जा प्रति ऊर्जा श्वेत और श्याम ऊर्जा श्वेत और श्याम परम कृष्ण नक्षत्र सब कुछ भगवान शिव अपने एक अंगूठे में धारण कर लेते हैं ऐसे भगवान शिव भोलेनाथ को नमन है।
महाशिवरात्रि संपूर्ण पृथ्वी पर एक अत्यंत विशेष दिन होता है जो शिव भक्तों का सबसे प्रमुख दिन होता है इसी दिन भगवान शिव लेजर किरणों अनंत आकाशगंगाओं का तेज प्रकट करते हुए लिंग के रूप में पैदा हुए थे और ब्रह्मा जी और भगवान विष्णु ने उस लिंग की पूजा किया था इसी दिन भगवती पार्वती का भगवान भोलेनाथ से विवाह हुआ था इसीलिए प्रत्येक जगह शिव बारात का आयोजन किया जाता है महाशिवरात्रि की रात अत्यंत ही फलदाई होती है लेकिन उसके लिए आपको अलग से कुछ करने की आवश्यकता नहीं संपूर्ण श्रद्धा विश्वास के साथ भगवान शिव भगवती पार्वती की मन वचन कर्म से आराधना करें तो भी वही फल मिलता है जो निराहार व्रत रखने वाले को मिलता है भगवान शिव सत्य शिव सुंदर तत्व के प्रतीक हैं और निश्चल भक्त लोगों को बहुत आसानी से प्राप्त हो जाते हैं भगवान शिव बेल के पेड़ से जुड़े हुए हैं यही उनके निवास है इसलिए इनको बेलपत्र अत्यंत प्रिय है वैसे भी तीन या उससे अधिक पत्तों वाले पेड़ शिवजी को बहुत ज्यादा पसंद है जो कि विश्व की तीनों शक्तियों धन ऋण और उदासीन तत्व का प्रतीक है।
इस वर्ष महाशिवरात्रि 15 फरवरी के दिन पड़ रही है क्योंकि इसी दिन फाल्गुन मास की चतुर्दशी तिथि पड़ रही है और निशीथपूजा रात में 12 बज का 9 मिनट से 12:59 तक है और व्रत का पारण सूर्योदय के तत्काल बाद किया जाएगा भगवान शिव को शुद्ध और स्वच्छ चित्त से भविष्य में कोई पाप और गलत कामना न करने की प्रतिज्ञा करते हुए बेल का पत्र बेर का फल अबीर धतूरे का फल मदार का फूल श्वेत रंग की मिठाई श्वेत वस्त्र श्वेत पुष्प जैसी चीजों का अर्पण करना चाहिए इसके साथ-साथ माता पार्वती का पूजन आवश्यक है जिसके लिए आप हल्के गुलाबी या हल्के रंगों का वस्त्र फूल मिठाई इत्यादि का प्रयोग कर सकते हैं कुछ भक्त निराहार रहकर शिवजी की पूजा आराधना करते हैं तो अधिकांश लोग दूध फल सूखा मेवा खाते हुए भगवान शिव की अर्चना करते हैं लेकिन भगवान शिव को इन सब से कोई अंतर नहीं पड़ता है जो लोग निराहार नहीं रह सकते हैं या बालक वृद्ध हैं या रोगी हैं वह फलाहार दुग्धाहार कर सकते हैं सच्चे मन वचन कर्म से महाशिवरात्रि का व्रत करने वाले न केवल भगवान शिव भगवती पार्वती की कृपा आशीर्वाद प्राप्त करते हैं बल्कि जन्म मरण के चक्र से छोड़कर मोक्ष को प्राप्त करते हैं।
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