धरती पर पतिव्रता धर्म का प्रतिमान स्थापित करने वाली भगवती सीता मां का जन्मदिन (24 अप्रैल वैशाख शुक्ल पक्ष नवमी)-,
अपने पति का अनुसरण करने के लिए माता और पिता दोनों के राजपाट को छोड़कर जंगल जंगल भटकने वाली और हर कष्ट सहन करने वाली जीवन भर दुख सहन करने वाली भगवती सीता मां का वैशाख महीने की नवमी की तिथि को जयंती मनाई जाती है । त्रेता युग में जब महाराजा जनक के राज में चारों तरफ महान अकाल और सूखा पड़ा था तब विद्वान और ज्योतिषी लोगों की सलाह पर राजा जनक ने अपनी पत्नी के साथ सोने का हल खेत में चलाया था और वह हल एक घड़े से टकरा गया था।
जिसको निकालने पर घड़े से एक अद्भुत अलौकिक कन्या रत्न की प्राप्ति हुई और हल की फॉर से बने सीतों के कारण उनका नाम सीता रखा गया जो बाद में जनक नंदिनी मिथिलेश नंदिनी वैदेही जैसे अनगिनत नामों से विख्यात हुई उनके जन्म लेते ही अर्थात घड़े के मिलते ही आसमान में घनघोर घटाएं छा गई और मूसलाधार वर्षा से सारा अकाल और सूखा मिट गया था। और धरती पर हर दिशा में हरियाली छा गई थी सबसे अद्भुत बातें है कि सर्वप्रथम भगवान श्री राम चैत्र माह की नवमी को पैदा हुए उसके बाद हनुमान जी चैत्र माह की पूर्णिमा और फिर सीता मां भी नवमी तिथि को लेकिन वैशाख माह में पैदा हुई इस प्रकार वह जन्म में भी भगवान श्री राम से छोटी थी।
भगवती सीता के पिता महाराज जनक के भाई सीरध्वज के तीन और पुत्रियां थी । जिनके नाम मांडवी उर्मिला श्रुति कीर्ति थे बचपन में ही सीता जी ने भगवान शिव के उसे प्रचंड धनुष को बगीचे से उठाकर पूजा गृह में रख दिया था जिसको रावण जैसा तथा कथित तीनों लोकों का विजेता भी उठा नहीं पाया था। यह देखकर इस अद्भुत असाधारण करने के लिए जनक जी ने प्रतिज्ञा किया कि इसका विवाह उसी से होगा जो यह धनुष उठाकर उसकी प्रत्यंचा चढ़ा देगा
सीता जी के बाद होने पर उनका स्वयंवर आयोजित किया गया जिसमें देव दनुज किन्नर नर राक्षस सहित तीनों लोक के महान वीर योद्धा उपस्थित हुए रावण और बाणासुर भी इसमें सम्मिलित थे। लेकिन तीनों लोकों में कोई उसे धनुष को हिला भी नहीं पाया तब भगवान श्री राम जो साक्षात श्री हरि विष्णु के अवतार थे ने धनुष के प्रत्यंचा चढ़कर उसे तोड़ दिया परशुराम का गुरूर चूर-चूर किया और देवी सीता जी के साथ अयोध्या आए इसी क्रम में मांडवी का भरत से उर्मिला का लक्ष्मण से और श्रुति कीर्ति का शत्रुघ्न से विवाह हुआ।
विवाह के बाद कुछ वर्ष आनंद से बीतने के बाद जब भगवान श्री राम को वनवास हुआ तो भगवती सीता ने राजपाट ससुराल और मायका सब छोड़ और भगवान श्री राम और लक्ष्मण के साथ वन को निकल गई वहां पर निषाद राज केवट और चित्रकूट में महासती अनसूया और अत्रि ऋषि से मिलकर गहन दंडक वन से होते हुए पंचवटी में चली गई जहां पर हम तेजस्वी मारकंडे और अगस्त ऋषि से उन लोगों को दिशा निर्देश मिले।
कालांतर में खरदूषण भीम के वध और सूर्पनखा की नाक काटने पर भीषण संग्राम में खरदूषण उसकी सेवा मारी गई तब रावण मरीज की सहायता से साधुवेश धारण कर सीता जी का हरण कर लिया अपार कष्ट और परेशानी जय कर भी माता-पिता अशोक वाटिका में अपने अटल पतिव्रत धर्म पर अधिग रही और तीनों लोगों के विजेता रावण उनकी सेवा आती कार्य कुंभकरण मेघनाथ के मारे जाने पर लंका विजय के पश्चात अग्नि परीक्षा में अपनी छाया रूपी सीता को जलाकर असली सीता के रूप में श्री राम लक्ष्मण वानर सेवा के साथ निषाद राज से मिलते हुए अयोध्या लौटकर पटरानी बनी
कालांतर में एक जनता के परिवार के प्रवाद के कारण भगवान श्री राम की मर्यादा को समझते हुए उन्होंने इससे अच्छा से गर्भवती होने के बाद भी खुद को जंगल में छोड़ने को कहा और ब्रह्म ऋषि वाल्मीकि के आश्रम में रही जहां उनके लव और कुश नाम के दो परम अतिरथी पुत्र पैदा हुए जिन्हें भगवती सीता ने इतना वीर बनाया कि तीनों लोकों की विजेता सी और रावण को मारने वाली राम की सेवा भारत लक्ष्मण शास्त्रों में हनुमान अंगद सुग्रीव विभीषण सभी को इन्होंने परास्त कर दिया
कालांतर में भगवती सीता अयोध्या आई और भगवान श्री राम ने उनको सादर पत्नी रूप में स्वीकार किया लेकिन अपना बैकुंठ जाने का समय पूरा हुआ जानकर धरती से उत्पन्न सीता माता धरती में समा गई और बैकुंठ में अपना आसन लक्ष्मी के रूप में ग्रहण किया। इसके बाद भगवान श्री राम भी लव और पुष्प को सारा राज पाठ सौंप कर और अमेरिका यूरोप ऑस्ट्रेलिया अफ्रीका लक्ष्मण शत्रुघ्न के पुत्रों को बताकर सारी जनता के साथ सर्दियों में समाहित होकर बैकुंठ लोक चले गए
भगवती सीता का चरित्र इतना पवित्र और विराट है जिसको लिखने के लिए एक महाकाव्य भी काम हो जाएगा इसलिए वह अनुसूया नर्मदा सती लक्ष्मी और सरस्वती उर्मिला सुलोचना के समान महा सती मानी जाती हैं उनका चरित्र रखना केवल अनुकरणीय है बल्कि प्रातः स्मरणीय भी है उनके शराब से शापित होने के कारण अयोध्यावासी कभी विकास नहीं कर पाए और अभिशप्त अयोध्या भी फिर से वह गौरव नहीं प्राप्त कर पाई अयोध्या की रक्षा और उसे पूर्ण बीना से बचने के लिए अमर योद्धा हनुमान जी को नियुक्त करके सब अवतारी लोग अपने-अपने धाम चले गए
आज के लोग धारावाहिक और चलचित्र देखकर तथा विभिन्न प्रकार के सनातन द्रोही लोगों की रचनाओं को पढ़कर अपने धर्म और देवी देवताओं तथा अवतारी पुरुषों पर जो टिप्पणी करते हैं वह न केवल मोर खाता पूर्ण है बल्कि धर्म विरुद्ध है और विनाश करने वाली है जैसे कुछ लोग भगवान श्री कृष्ण को 1600 रानियां का होना बताते हैं लेकिन उनका मूल पुस्तक में पढ़ने से या भ्रम होता है जब नरकासुर के द्वारा त्याग दी गई रानियां को अपनाने का साहस किसी में नहीं हुआ तब उन्होंने अपने नगर में उन सभी को सम्मान पूर्वक रखा था पहले श्री कृष्ण की तरह एक अंगुली पर गोवर्धन पर्वत उठाकर फिर उसे पर टिकट टिप्पणी करना चाहिए
इसी तरह भगवान श्री राम पर टीका टिप्पणी करने वाले को पहले भगवान श्री राम बनकर दिखाना चाहिए जो एक बार से ही प्रशांत हिंद अटलांटिक उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव महासागर को सुखा सकते थे जिन्होंने जयंत को एक ही तीर मारा जिसको बचाने पूरे तीनों लोकों में कोई आगे नहीं आया कुंभकरण और रावण जैसे तीनों लोगों के विजेता को उन्होंने खेल-खेल में मार गिराया। इसीलिए लाखों करोड़ों वर्ष बीत जाने पर भी भगवती सीता और उन जैसे अमर और पवित्र चरित्र के लोग आज भी अनंत कोटि सूर्य की भांति तीनों लोकों में चमक रहे हैं।
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