Sunday, 18 December 2022

एक बार गणेश जी ने भगवान शिव जी से कहा,पिता जी ! आप यह चिता भस्म लगा कर मुण्डमाला धारण कर अच्छे नहीं लगते,मेरी माता गौरी अपूर्व सुन्दरी औऱ आप उनके साथ इस भयंकर रूप में !/पहले कृष्ण जी के बारे में जाने.. फिर किस रूप मे पूजना है भगवान् श्री कृष्ण जानिए* भगवान श्रीकृष्ण को अलग अलग स्थानों में अलग/विचार" उत्कृष्ट होना आवश्यक है*/जैसा बोओगे वैसा काटोगे !!

पौराणिक कथाओं में कभी कभी ऐसे प्रसंग सामने आते हैं 
जिसे पढ़ते हुए हृदय गदगद हो जाता है ।

एक बार गणेश जी ने भगवान शिव जी से कहा,
पिता जी ! आप यह चिता भस्म लगा कर मुण्डमाला धारण कर अच्छे नहीं लगते,
मेरी माता गौरी अपूर्व सुन्दरी औऱ आप उनके साथ इस भयंकर रूप में !

पिता जी ! आप एक बार कृपा कर के अपने सुन्दर रूप में माता के सम्मुख आयें, जिससे हम आपका असली स्वरूप देख सकें !

भगवान शिव जी मुस्कुराये औऱ गणेश की बात मान ली !

कुछ समय बाद जब शिव जी स्नान कर के लौटे तो उनके शरीर पर भस्म नहीं थी …
बिखरी जटाएँ सँवरी हुईं मुण्डमाला उतरी हुई थी !

सभी देवी-देवता, यक्ष, गन्धर्व, शिवगण उन्हें अपलक देखते रह गये, वो ऐसा रूप था कि मोहिनी अवतार रूप भी फीका पड़ जाए !

भगवान शिव ने अपना यह रूप कभी प्रकट नहीं किया था !

शिव जी का ऐसा अतुलनीय रूप कि करोड़ों कामदेव को भी मलिन कर रहा था !

गणेश अपने पिता की इस मनमोहक छवि को देख कर स्तब्ध रह गये मस्तक झुका कर बोले मुझे क्षमा करें पिता जी !
परन्तु अब आप अपने पूर्व रूप को धारण कर लीजिए !

भगवान शिव मुस्कुराये औऱ पूछा,
क्यों पुत्र अभी भी तुमने ही मुझे इस रूप में देखने की इच्छा प्रकट की थी…….

अब पुनः पूर्व स्वरूप में आने की बात क्यों ?

गणेश जी ने मस्तक झुकाये हुए ही कहा,
क्षमा करें पिता श्री !
मेरी माता से सुन्दर क़ोई औऱ दिखे मैं ऐसा कदापि नहीं चाहता ! शिव जी हँसे औऱ अपने पुराने स्वरूप में लौट आये !

पौराणिक ऋषि इस प्रसंग का सार स्पष्ट करते हुए कहते है 
आज भी ऐसा ही होता है पिता रुद्र रूप में रहता है क्योंकि
उसके ऊपर परिवार की ज़िम्मेदारियाँ अपने परिवार का रक्षण
उनके मान सम्मान का ख्याल रखना होता है तो थोड़ा कठोर रहता है...!

औऱ माँ सौम्य, प्यार, लाड़, स्नेह उनसे बातचीत कर के प्यार दे कर उस कठोरता का सन्तुलन बनाती हैं …
इसलिए सुन्दर होता है माँ का स्वरुप ।।

पिता के ऊपर से भी ज़िम्मेदारियों का बोझ हट जाए तो वो भी बहुत सुन्दर दिखता है ….

🙏ॐ नमः शिवाय 🙏


*पहले कृष्ण जी के बारे में जाने.. फिर किस रूप मे पूजना है भगवान् श्री कृष्ण जानिए* 
भगवान श्रीकृष्ण को अलग अलग स्थानों में अलग अलग नामो से जाना जाता है।
⭕उत्तर प्रदेश में कृष्ण या गोपाल गोविन्द इत्यादि नामो से जानते है।
⭕राजस्थान में श्रीनाथजी या ठाकुरजी के नाम से जानते है।
⭕महाराष्ट्र में बिट्ठल के नाम से भगवान् जाने जाते है।
⭕उड़ीसा में जगन्नाथ के नाम से जाने जाते है।
⭕बंगाल में गोपालजी के नाम से जाने जाते है।
⭕ दक्षिण भारत में वेंकटेश या गोविंदा के नाम से जाने जाते है।
⭕ गुजरात में द्वारिकाधीश के नाम से जाने जाते है।
⭕असम ,त्रिपुरा,नेपाल इत्यादि पूर्वोत्तर क्षेत्रो में कृष्ण नाम से ही पूजा होती है।
⭕मलेशिया,इंडोनेशिया, अमेरिका, इंग्लैंड,फ़्रांस इत्यादि देशो में कृष्ण नाम ही विख्यात है।
⭕गोविन्द या गोपाल में "गो" शब्द का अर्थ गाय एवं इन्द्रियों , दोनों से है। गो एक संस्कृत शब्द है और ऋग्वेद में गो का अर्थ होता है मनुष्य की इंद्रिया...जो इन्द्रियों का विजेता हो जिसके वश में इंद्रिया हो वही गोविंद है गोपाल है।
⭕श्री कृष्ण के पिता का नाम वसुदेव था इसलिए इन्हें आजीवन "वासुदेव" के नाम से जाना गया। श्री कृष्ण के दादा का नाम शूरसेन था..
⭕श्री कृष्ण का जन्म उत्तर प्रदेश के मथुरा जनपद के राजा कंस की जेल में हुआ था।
⭕श्री कृष्ण के भाई बलराम थे लेकिन उद्धव और अंगिरस उनके चचेरे भाई थे, अंगिरस ने बाद में तपस्या की थी और जैन धर्म के तीर्थंकर नेमिनाथ के नाम से विख्यात हुए थे।
⭕श्री कृष्ण ने 16000 राजकुमारियों को असम के राजा नरकासुर की कारागार से मुक्त कराया था और उन राजकुमारियों को आत्महत्या से रोकने के लिए मजबूरी में उनके सम्मान हेतु उनसे विवाह किया था। क्योंकि उस युग में हरण की हुयी स्त्री अछूत समझी जाती थी और समाज उन स्त्रियों को अपनाता नहीं था।।
⭕श्री कृष्ण की मूल पटरानी एक ही थी जिनका नाम रुक्मणी था जो महाराष्ट्र के विदर्भ राज्य के राजा रुक्मी की बहन थी।। रुक्मी शिशुपाल का मित्र था और श्री कृष्ण का शत्रु ।
⭕दुर्योधन श्री कृष्ण का समधी था और उसकी बेटी लक्ष्मणा का विवाह श्री कृष्ण के पुत्र साम्ब के साथ हुआ था।
⭕श्री कृष्ण के धनुष का नाम सारंग था। शंख का नाम पाञ्चजन्य था। चक्र का नाम सुदर्शन था। उनकी प्रेमिका का  नाम राधारानी था जो बरसाना के सरपंच वृषभानु की बेटी थी। श्री कृष्ण राधारानी से निष्काम और निश्वार्थ प्रेम करते थे। राधारानी श्री कृष्ण से उम्र में बहुत बड़ी थी। लगभग 6 साल से भी ज्यादा का अंतर था। श्री कृष्ण ने 14 वर्ष की उम्र में वृंदावन छोड़ दिया था।। और उसके बाद वो राधा से कभी नहीं मिले।
⭕श्री कृष्ण विद्या अर्जित करने हेतु मथुरा से उज्जैन मध्य प्रदेश आये थे। और यहाँ उन्होंने उच्च कोटि के ब्राह्मण महर्षि सान्दीपनि से अलौकिक विद्याओ का ज्ञान अर्जित किया था।।
⭕श्री कृष्ण की कुल 125 वर्ष धरती पर रहे । उनके शरीर का रंग गहरा काला था और उनके शरीर से 24 घंटे पवित्र अष्टगंध महकता था। उनके वस्त्र रेशम के पीले रंग के होते थे और मस्तक पर मोरमुकुट शोभा देता था। उनके सारथि का नाम दारुक था और उनके रथ में चार घोड़े जुते होते थे। उनकी दोनो आँखों में प्रचंड सम्मोहन था।
⭕श्री कृष्ण के कुलगुरु महर्षि शांडिल्य थे।
⭕श्री कृष्ण का नामकरण महर्षि गर्ग ने किया था।
⭕श्री कृष्ण के बड़े पोते का नाम अनिरुद्ध था जिसके लिए श्री कृष्ण ने बाणासुर और भगवान् शिव से युद्ध करके उन्हें पराजित किया था।
⭕श्री कृष्ण ने गुजरात के समुद्र के बीचो बीच द्वारिका नाम की राजधानी बसाई थी। ⭕द्वारिका पूरी सोने की थी और उसका निर्माण देवशिल्पी विश्वकर्मा ने किया था।
⭕श्री कृष्ण को ज़रा नाम के शिकारी का बाण उनके पैर के अंगूठे मे लगा वो शिकारी पूर्व जन्म का बाली था,बाण लगने के पश्चात भगवान स्वलोक धाम को गमन कर गए।
⭕श्री कृष्ण ने हरियाणा के कुरुक्षेत्र में अर्जुन को पवित्र गीता का ज्ञान रविवार शुक्ल पक्ष एकादशी के दिन मात्र 45 मिनट में दे दिया था।
⭕श्री कृष्ण ने सिर्फ एक बार बाल्यावस्था में नदी में नग्न स्नान कर रही स्त्रियों के वस्त्र चुराए थे और उन्हें अगली बार यु खुले में नग्न स्नान न करने की नसीहत दी थी।
⭕श्री कृष्ण के अनुसार गौ हत्या करने वाला असुर है और उसको जीने का कोई अधिकार नहीं।
⭕श्री कृष्ण अवतार नहीं थे बल्कि अवतारी थे....जिसका अर्थ होता है "पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्" न ही उनका जन्म साधारण मनुष्य की तरह हुआ था और न ही उनकी मृत्यु हुयी थी।




श्री कृष्ण गोविन्द हरे मुरारी,
हे नाथ नारायण वासुदेवा ॥
हे नाथ नारायण...॥
पितु मात स्वामी, सखा हमारे,
हे नाथ नारायण वासुदेवा ॥
हे नाथ नारायण...॥
॥ श्री कृष्ण गोविन्द हरे मुरारी...॥

बंदी गृह के, तुम अवतारी
कही जन्मे, कही पले मुरारी
किसी के जाये, किसी के कहाये
है अद्भुद, हर बात तिहारी ॥
है अद्भुद, हर बात तिहारी ॥
गोकुल में चमके, मथुरा के तारे
हे नाथ नारायण वासुदेवा ॥

श्री कृष्ण गोविन्द हरे मुरारी,
हे नाथ नारायण वासुदेवा ॥
पितु मात स्वामी, सखा हमारे,
हे नाथ नारायण वासुदेवा ॥

अधर पे बंशी, ह्रदय में राधे
बट गए दोनों में, आधे आधे
हे राधा नागर, हे भक्त वत्सल
सदैव भक्तों के, काम साधे ॥
सदैव भक्तों के, काम साधे ॥
वही गए वही, गए वही गए
जहाँ गए पुकारे
हे नाथ नारायण वासुदेवा॥

श्री कृष्ण गोविन्द हरे मुरारी,
हे नाथ नारायण वासुदेवा ॥
पितु मात स्वामी सखा हमारे,
हे नाथ नारायण वासुदेवा ॥

गीता में उपदेश सुनाया
धर्म युद्ध को धर्म बताया
कर्म तू कर मत रख फल की इच्छा
यह सन्देश तुम्ही से पाया
अमर है गीता के बोल सारे
हे नाथ नारायण वासुदेवा ॥

श्री कृष्णा गोविन्द हरे मुरारी,
हे नाथ नारायण वासुदेवा ॥
पितु मात स्वामी सखा हमारे,
हे नाथ नारायण वासुदेवा ॥

त्वमेव माता च पिता त्वमेव
त्वमेव बंधू सखा त्वमेव
त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव
त्वमेव सर्वं मम देव देवा
॥ श्री कृष्णा गोविन्द हरे मुरारी...॥

*राधे कृष्णा राधे कृष्णा*
*राधे राधे कृष्णा कृष्णा ॥*
*राधे कृष्णा राधे कृष्णा*
*राधे राधे कृष्णा कृष्णा ॥*

*हरी बोल, हरी बोल,*
*हरी बोल, हरी बोल ॥*

*राधे कृष्णा राधे कृष्णा*
*राधे राधे कृष्णा कृष्णा*
*राधे कृष्णा राधे कृष्णा*
*राधे राधे कृष्णा कृष्णा ॥*



*🌴१८ दिसम्बर २०२२ रविवार 🌴*
*🍁पौष कृष्णपक्ष दशमी २०७९🍁*
                  
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            *‼ऋषि चिंतन‼*
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*----सुखमय जीवन के लिए----*
*"विचार" उत्कृष्ट होना आवश्यक है*
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👉 *"विचारों" का असंयम मानव-जाति के लिए एक भयंकर अभिशाप एवं दुर्भाग्य बना हुआ है ।* हम मानवोचित उत्कृष्ट आदर्शवादी विचारधारा का परित्याग कर पशुओं और पिशाचों के ढंग से सोचते हैं। आकांक्षाओं का स्तर बहुत ही निकृष्ट रहता है । साहस के अभाव में चिंता, भय, निराशा, शोक, क्षोभ से चित्त निरंतर उद्विग्न बना रहता है । कलह और संघर्षों  का, द्वेष और दुर्भावनाओं का विस्तार, विचारधारा का स्तर अधोगामी होने के कारण ही होता है । *यदि लोग ऊँचे ढंग से सोचें, अपने मानवीय गौरव का स्मरण रखें और मनुष्यता की प्रतिष्ठा एवं मर्यादा के अनुरुप सोचें तो निकृष्ट गतिविधियाँ अपनाने का अवसर ही न आए ।* कुकर्मों की सृष्टि कुविचारों से ही होती है । दीनता, दरिद्रता और पतन के लिए निकृष्ट कोटि की विचारधारा ही उत्तरदायी है । *यदि विचार शक्ति का संयम और सदुपयोग कर हम ध्यान देने लगें तो नर को नारायण और जीव को ब्रह्म के रूप में परिणत होते हुए तनिक भी देर न लगे ।*
👉 आवेशों पर नियंत्रण न रहने से छोटे-छोटे कारणों को लेकर लोग आपे से बाहर हो जाते हैं और न करने लायक उद्धत कृत्य कर डालते हैं । छुरेबाजी, हत्याएँ, आत्म-हत्याएँ, मुकदमेबाजी, पार्टिबन्दी, षड्यंत्र आदि की दुर्घटनाओं के पीछे मनुष्य की गलत ढंग से सोचने की आदत ही प्रधान कारण रही होती है। *यदि लोग गंभीरतापूर्वक सोचने, दूसरों की परिस्थिति को समझने और उलझनों को शांतिपूर्ण ढंग से सुलझाने का प्रयत्न करें, सहिष्णुता, सहनशीलता एवं सद्भावना से काम ले तो पेचीदा दीखने वाली उलझनें भी सहज ही सुलझ जाया करें और भिन्नता के बीच एकता बनाए रहने का रास्ता निकल आया करे ।*
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*हम दुर्बल नहीं, शक्तिशाली बनें* पृष्ठ-२२
     *🍂पं.श्रीराम शर्मा आचार्,



*⚜️ आज का प्रेरक प्रसंग ⚜️*

         *!! जैसा बोओगे वैसा काटोगे !!*
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एक गांव में तीन चोर रहते थे। एक रात उन्होंने एक धनी आदमी के यहां चोरी की। उन्होंने सारा धन एक थैले में भरा और उसे लेकर जंगल की ओर भाग निकले। जंगल में पहुंचने पर उन्हें जोर की भूख लगी। वहां खाने को तो कुछ था नहीं, इसलिए उनमें से एक चोर पास के एक गांव से खाना लेने गया। बाकी के दोनों चोर जंगल में चोरी के माल की रखवाली कर रहे थे।
 
जो चोर खाना लेने गया था, उसकी नीयत खराब थी। पहले उसने होटल में खुद भोजन किया। फिर उसने अपने साथियों के लिए खाना खरीद कर उसमें तेज जहर मिला दिया। उसने सोचा कि जहरीला खाना खाकर उसके दोनों साथी मर जाएंगे तो सारा धन उसका हो जाएगा। 

जंगल में दोनों चोरों ने खाना लेने गए अपने साथी चोर की हत्या करने की योजना बना ली थी। वे उसे अपने रास्ते से हटाकर सारा धन आपस में बांट लेना चाहते थे। 

तीनों चोरों ने अपनी-अपनी योजनाओं के अनुसार कार्य किया। पहला चोर जैसे ही जहरीला भोजन लेकर जंगल में पहुंचा। उसके दोनों साथी उस पर टूट पड़े। उन्होंने उसका काम तमाम कर दिया फिर वे निश्चिंत होकर भोजन करने बैठ गए। मगर जहरीला भोजन खाते ही वे दोनों भी तड़प-तड़प कर मर गए। इस प्रकार तीनों का अंत भी बुरा ही हुआ। 

*शिक्षा:-*
बुराई का अंत बुरा ही होता है..!!

*सदैव प्रसन्न रहिये - जो प्राप्त है, पर्याप्त है।*
*जिसका मन मस्त है - उसके पास समस्त है।।*

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