Sunday, 18 December 2022

हृदय रुपी पात्र*

*हृदय रुपी पात्र*
*🕉️🌄🌅शुभ प्रभात🌅🌄🕉️*
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एक फकीर ने एक सम्राट के द्वार पर दस्तक दी l  सुबह का वक़्त था और सम्राट अपने बगीचे में घूमने निकला था। संयोग की बात थी उसे सामने ही फ़कीर मिल गया।

फकीर ने अपना पात्र उस के सामने कर दिया। सम्राट ने कहा क्या चाहते हो? फकीर ने कहा कुछ भी दे दो “शर्त यही हैं,” कि मेरा पात्र पूरा भर जाएं। मैं थक गया हूँ, यह पात्र कभी भरता ही नहीं। 

सम्राट हंसने लगा, और कहा तुम पागल मालुम होते हो। फकीर ने कहा पागल न होता तो, फकीर ही क्यों होता बादशाह। यह छोटा सा पात्र भरता ही नहीं? फिर सम्राट ने अपने वजीर से कहा लाओ इसे स्वर्ण-अशर्फियों से भर दो। और इस फकीर का मुंह सदा के लिए बंद कर दो। फ़क़ीर ने कहा मैं, आपको फिर याद दिला दूँ कि भरने की कोशिश अगर आप करते हैं, तो यह शर्त है, कि जब तक पात्र भरेगा नहीं पात्र मैं पीछे हटाउंगा नहीं। सम्राट ने कहा तू घबरा मत पागल! इसे हम सोने से भर देंगे, हीरे जवाहरातो से भर देंगे। लेकिन जल्द ही सम्राट को अपनी भूल समझ में आ गई। अशर्फियां डाली गई और खो गई, हीरे डाले गये पर वो भी खो गये। लेकिन सम्राट भी जिद्दी था, और फिर फ़क़ीर से हार माने। यह भी तो उसे जँचता नहीं था, इस लिए अपनी राजधानी में खबर पहुंचाई।खबर सुन कर हजारों लोग इकट्ठे हो गए, सम्राट अपना ख़जाना  उलीचता गया। उस ने कहा आज दांव पर लग जाना हैं, सब डूबा दूंगा, मगर उस का पात्र भर दूँगा। शाम हो गई सूरज ढलने लगा, सम्राट के कभी खाली ना होने वाले खजाने खाली हो गए। लेकिन पात्र नहीं भरा सो नहीं भरा, वह गिर पड़ा फकीर के चरणों में और कहा मुझे माफ़ कर दो। मेरी अकड़ मिटा दी आप ने, अच्छा किया। में तो सोचता था कि मेरे पास अक्षत खजाना है, लेकिन यह आप के छोटे से पात्र को भी न भर पाया। बस अब एक ही प्रार्थना है, में तो हार गया मुझे क्षमा कर दें।

 *मेने व्यर्थ ही आप को     आश्वासन दिया था आप का पात्र भरने का। मग़र जाने से पहले एक छोटी सी बात मुझे बताते जाओ। दिन भर यही प्रश्न मेरे मन में उठेगा, कि यह पात्र क्या है। किस जादू से बना है, फकीर हंसने लगा। उस ने कहा किसी जादू से नहीं ‘इसे आदमी के ह्रदय से बनाया गया है। ना आदमी का ह्रदय भरता है, और ना ही यह पात्र भरता है। इस जिंदगी में कोई और चीज तुम्हे छका नही सकेगी। तुम्हारा पात्र खाली का खाली रहेगा, कितना ही धन डालो इस में सब इस खो जाएगा। यह पात्र खाली का खाली ही रहेगा, भरे नहीं भरता, ना कभी भरेगा, यह तो केवल परमात्मा से ही भरेगा। क्योंकि अनंत है हमारी प्यास, अनन्त है हमारा परमात्मा। और अनंत को सिर्फ अनंत ही भर सकता है, और कोई नहीं*। 

 इस लिए हमें किसी भी किस्म का घमंड नहीं करना चाहिए। बस मालिक के आगे यही फरियाद करनी चाहिए। कि मालिक जो तूने दिया है, उस के लिए तेरा शुक्र है। और उस का उपयोग मालिक के उन दुखी दीन बंधुओं के लिए करना चाहिए। अपना दिल बड़ा रखते हुए सब की मदद करें। तभी हम उस परमात्मा की खुशी हासिल कर पाएंगे।

 *हर एक की सुनो, ओर हर एक से सीखो क्योंकि हर कोई, सब कुछ नही जानता। लेकिन हर एक कुछ ना कुछ ज़रुर जानता हैं! स्वभाव रखना है तो उस दीपक की तरह रखिये। जो बादशाह के महल में भी उतनी ही रोशनी देता है। जितनी की किसी गरीब की झोपड़ी में….।*

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