Wednesday, 11 January 2023

एक बार जब स्वामी विवेकानंद जी शिकागो की गलियों में सैर कर रहे थे तो उनका भगवा वस्त्र और पगड़ी देख कर कुछ अमरीकी युवाओं ने उनका खूब मज़ाक़ उड़ाना शुरू कर दिया। जब स्वामी विवेकानंद जी ने उनकी हंसी का कारण पूछा तो उन युवकों ने कहा - 'ये कैसे मज़ाक़िया कपड़े पहन रखे है? कैसी संस्कृति है

राष्ट्रीय युवा दिवस

एक बार जब स्वामी विवेकानंद जी शिकागो की गलियों में सैर कर रहे थे तो उनका भगवा वस्त्र और पगड़ी देख कर कुछ अमरीकी युवाओं ने उनका खूब मज़ाक़ उड़ाना शुरू कर दिया। जब स्वामी विवेकानंद जी ने उनकी हंसी का कारण पूछा तो उन युवकों ने कहा - 'ये कैसे मज़ाक़िया कपड़े पहन रखे है? कैसी संस्कृति है आपकी? तन पर केवल एक भगवा चादर लपेट रखी है...कोट–पतलून जैसा कुछ भी नहीं? कितने असभ्य दिखते हैं आप!' उनकी बात सुन स्वामी विवेकानंद जी मुस्कुराए और बोले – 'अरे बन्धु हमारी संस्कृति आपकी संस्कृति से भिन्न है; आपके यहाँ लोगों की पहचान कपड़ों से की जाती है, आपकी पहचान दर्ज़ी बनाता है, लेकिन हमारी संस्कृति में व्यक्ति की पहचान दर्ज़ी द्वारा बनाए कपड़ों से नहीं बल्कि उसके चरित्र से की जाती है। वस्त्रों की सुंदरता से अधिक हम चरित्र, आदर्श, विचार व व्यवहार की सुंदरता में विश्वास रखते हैं। इसलिए धोती कुर्ता पहन कर भी हम सभ्य व्यवहार कर रहे हैं और कोट पतलून पहन कर भी आप असभ्य।

इसी प्रकार एक दिन स्वामी विवेकानंद जी लंदन में ब्रिटिश दोस्तों के बीच बैठे हुए थे। उनमें से एक दोस्त ने प्रश्न किया: 'विवेकानंद आप अमरीका, इंग्लैंड व यूरोप में लगभग चार सालों से रह रहे है। इन देशों की शानो-शौकत, समृद्दि व सिस्टम को देखकर आपको अब अपने देश भारत जाने का मन तो नहीं करता होगा ना ? स्वामी विवेकानंद जी मीठा-मीठा हंसते हुए बोले- 'अरे नहीं बन्धु! मैं तो अपने देश भारत जाने को बहुत उत्सुक हूँ। वास्तविकता तो यह है कि जब मैं भारत से आया था तो मैं केवल उससे प्रेम करता था लेकिन यहां से वापिस जाने के बाद तो मैं अपने देश की पूजा करूँगा। इतने सालो से विश्व भर का भ्रमण कर अब मैं यकीन से कह सकता हूँ कि यदि विश्व में कोई ऐसा देश है जहाँ मानव सभ्यता के श्रेष्ठ मूल्यों को विक्सित व संरक्षित किया गया हो, श्रेष्ठ आदर्शों व संस्करों को जीवत रखा गया हो तो वह केवल भारत ही है। बाहरीय तौर पर विदेशी ग़ुलामी के अधीन होने के कारण चाहे उन मूल्यों व आदर्शों पर आज धूल जमी नज़र आ रही हो, भारत रूपी वट वृक्ष पर पतझड़ दिखाई दे रहा हो, लेकिन इस देश की जड़े आज भी बेहद गहरी और मज़बूत है। जल्दी ही भारत रूपी इस वट वृक्ष पर पुनः बसंत होगी, भारत फिर मानव जाति को संस्कार व शांति देगा, पुनः जगद्गुरु की पदवी को प्राप्त करेगा। इसलिए मैं तो ऐसी धरती को देखने व पुनः प्रणाम करने को, बेहद उत्सुक हूँ।'

स्वामी विवेकानंद जी राष्ट्र्प्रेम के साथ साथ एक श्रेष्ठ चरित्र के भी धनी थे। उनका मानना था कि जिस समाज में उच्च चरित्र के पुरुष होंगे वहाँ नारी शोषण स्वयं ही समाप्त हो जाएगा। एक बार एक अंग्रेज़ी महिला ने स्वामी विवेकानंद जी के रूप, यौवन व विद्वता से आकर्षित होकर शादी का प्रस्ताव रख दिया। प्रस्ताव सुनकर स्वामी जी थोड़ा अचंभित हुए और कहने लगे - 'मैं तो सन्यासी हूँ, शादी नहीं कर सकता; और वैसे भी आप तो बेहद रूपवती हैं, आप तो जिस पुरुष से चाहें विवाह कर सकती हैं, फिर आप मुझसे ही शादी क्यूँ करना चाहती हैं?' अंग्रेज महिला ने उत्तर देते हुए कहा: 'क्यूँकि मैं आपके जैसा पुत्र चाहती हूँ और वो मुझे आपसे ही मिल सकता है।'  इस पर स्वामी जी ने तपाक से उस महिला से कहा: 'तो ठीक है, आज से मैं आपका पुत्र और आप मेरी माँ।'

एक ऐसे व्यक्तित्व जो विदेशों में रहकर भी देश को नहीं भूले, जिन्होंने वस्त्रों में नहीं चरित्र में सुंदरता देखी, जिन्होंने नारी सम्मान के लिए पुरुष को सदचरित्र होने का आदर्श दिया, जिन्होंने केवल समाज से बदलाव की माँग नहीं की बल्कि स्वयं भी बदल कर दिखाया, ऐसे व्यक्तित्व को ही भारत का आदर्श युवा होना चाहिए था। इसलिए उनके ही जन्मदिवस '12 जनवरी‘ पर भारत में प्रत्येक वर्ष 'नैशनल यूथ डे' मनाया जाता है। आओ आज के दिवस पर संकल्प लें कि हम सब भी विवेकानंद जी के गुणों को धारण कर उनके भारत को जगद्गुरु बनाने के स्वपन में अपना योगदान देंगे।


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