Thursday, 12 January 2023

बचपन में मुझे लगता था कि अभी जाड़े के मौसम में जो हमलोग स्वेटर, जैकेट , इनर आदि पहनते हैं तो उससे गर्मी पैदा होती है ... इसीलिए, उसे पहनने के बाद हमें ठंड नहीं लगती है.शायद... मेरी

बचपन में मुझे लगता था कि अभी जाड़े के मौसम में जो हमलोग स्वेटर, जैकेट , इनर आदि पहनते हैं तो उससे गर्मी पैदा होती है ... 
इसीलिए, उसे पहनने के बाद हमें ठंड नहीं लगती है.

शायद... मेरी ऐसी सोच के पीछे कपड़ों के नाम का भी बड़ा प्रभाव था क्योंकि.... हमलोग इसे गर्म कपड़े कहा करते थे...!

लेकिन, जब समझदारी हुई तो मालूम पड़ा कि... 
अरे यार, ये स्वेटर, जैकेट, टोपी, मफलर आदि कोई गर्मी-फर्मी पैदा नहीं करते हैं...

बल्कि, ये तो हमारे ही शरीर की गर्मी को रोक कर रखते हैं जिससे कि हमें गर्मी का अनुभव होता है.

असल में होता ये है कि.... हमारा शरीर एक खास टेम्परेचर अर्थात 97° फॉरेनहाइट अथवा 37℃ के लिए सेट है.

अगर, वातावरण इससे ज्यादा गर्म हुआ तो हमें गर्मी लगती है और ठंड हुआ तो ठंड लगती है.

यहाँ वातावरण का मतलब हुआ कि जब हमारे शरीर से गर्म हवा टकराती है तो हमें गर्मी लगती है और ठंडी हवा टकराती है तो हमें ठंड लगती है.

तो, स्वेटर-जैकेट, मफलर आदि करता ये है कि वो हमारे शरीर और वातावरण के बीच एक मोटा लेयर बना देता है जिससे वो ठंडी हवा हमारे शरीर तक नहीं पहुंच पाती है.

और, इस हालत में हमारे शरीर की गर्मी हमें गर्मी का एहसास करवाती रहती है.

खैर.... ये तो हो गई मौसम की बात.

लेकिन, हमारे धर्मग्रन्थ और धर्मस्थान भी ठीक स्वेटर और जैकेट की ही तरह कोई ईश्वर पैदा नहीं कर देते हैं...

बल्कि, वे सिर्फ हमारी आस्था को बचाकर ईश्वर के अस्तित्व को बनाए रखते हैं.

तो..... जीर्ण शीर्ण मंदिर एवं भव्य मंदिर में अंतर सिर्फ इतना है कि जीर्ण शीर्ण मंदिर को देखकर दिल में एक टीस सी उठती है कि..... वेटिकन इतना अच्छा, मक्का इतना हाईटेक, येरुशलम इतना एडवांस लेकिन हमारे मंदिर इतने जीर्ण शीर्ण क्यों ???
वहीं भव्य मंदिर को देखकर एक गर्व की अनुभूति होती है कि दुनिया में हम सर्वश्रेष्ठ हैं.

ये बहुत कुछ वैसा है कि.... खाया तो रोटी सब्जी और चावल ही जाता है..
लेकिन, उसी खाने को सोने, चांदी की चमचमाती थाली में खाने का अनुभव कुछ अलग होगा एवं एल्युमिनियम के मुड़े तूड़े बर्तन में खाने का अनुभव कुछ और...

अब इसमें कोई लॉजिक दे कि....थाली थोड़े न खाना है..
खाना तो रोटी सब्जी है...!
तो, ये उनकी अपनी बुद्धि हो सकती है.

क्योंकि, मेरी नजर में मंदिर और धर्मस्थान सिर्फ आस्था का ही केंद्र नहीं होते हैं बल्कि वे हमारी सभ्यता संस्कृति और भव्यता के भी आईना होते हैं.

और, ये भी सच है कि.... मंदिर और धर्मस्थान पर्यटन और रोजगार को भी बढ़ावा देते हैं क्योंकि उस इलाके के हजारो लाखों लोग प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप से उससे जुड़े होते हैं.

आखिर, ये सुनकर अथवा पढ़कर किसे गर्व नहीं होगा कि.... हमारे अयोध्या के राम मंदिर .. दुनिया के सर्वश्रेष्ठ मंदिरों में से एक है.

अथवा , उज्जैन के महाकाल मंदिर के जैसा भव्य दुनिया में और कोई दूसरा मंदिर नहीं है.

इसीलिए, मंदिर और धर्मस्थान तो भव्य होना ही चाहिए...
और, मैं मंदिरों को भव्य से भव्यतम बनाये जाने का पक्षधर हूँ जिसे देखकर दुनिया के लोगों के मुँह से केवल एक ही चीज निकले... wow

ताकि, कल तक जो भारत सिर्फ ताजमहल और लालकिले से पहचाना जाता था...
वो, आगामी समय में... अयोध्या के राम मंदिर, महाकाल कॉरिडोर, काशी कॉरिडोर आदि के नाम से पहचाना जाए...!

क्योंकि, एक हिन्दू राष्ट्र की पहचान भी राष्ट्र में मौजूद भव्य और दिव्य हिन्दू मंदिर ही होने चाहिए न कि कोई मकबरा-फकबरा.

जय महाकाल...!!!

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🇮🇳वंदे मातरम🇮🇳
      

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