*भक्त और भगवान् (381)*
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*ब्रज के सिद्ध संत*
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*श्रीसखीचरणदास बाबाजी (भाग --01)*
(राधाकुण्ड) वृन्दावन
मणिपुर प्रान्त के लोगों का व्रज से विशेष सम्बन्ध रहा है। राधाकुण्ड में बहुत दिनों तक मणिपुरिया महात्माओं की ही प्रधानता रही है। आज भी यहाँ बहुत-से भजन-निष्ठ मणिपुरिया महात्मा भजन करते हैं।
इसका एक इतिहास है। श्रीनरोत्तम ठाकुर महाशय के समय से मणिपुर के राजा और प्रजा श्रीमन्महाप्रभु के सम्प्रदाय की नरोत्तम ठाकुर महाशय की शाखा के अनुगत रहे हैं। अंग्रेज जब भारत में अपने प्रभाव का विस्तार कर रहे थे, उस समय श्रीकुलचन्द्र महाराज मणिपुर के राजा थे। वे भी गौड़ीय भक्त थे। वे बड़े पराक्रमी थे। आक्रमणकारी अंग्रेज सेनाओं को उनके सामने कई बार मुँह की खानी पड़ी थी। अन्त में उन्हें पराजित करने के लिए उन्हें एक चाल चलनी पड़ी थी।
वे जानते थे कि राजा गो-भक्त हैं। किसी परिस्थिति में भी गो-हत्या करना उनके लिए सम्भव नहीं। इसलिए उन्होंने अन्तिम बार गाय-बछड़ों के समूह को आगे कर उनके ऊपर आक्रमण किया। उन्होंने गो-हत्या करने के बजाय पराजय स्वीकार की। अंग्रेज उन्हें और उनके कर्मचारियों को बन्दी बनाकर दिल्ली ले गये। राजा से अंग्रेजों ने पूछा-'आप कहाँ रहना पसन्द करेंगे ?' उन्होंने राधाकुण्ड में रहने की इच्छा प्रकट की। तभी अंग्रेजों ने राधाकुण्ड में गोपकुआँ के पास राजा के रहने के उपयुक्त एक मकान और मन्दिर का निर्माण कर दिया। राजा अपने कुछ कर्मचारियों के साथ वहाँ रहने लगे। तभी से राधाकुण्ड मणिपुरी भक्तों के लिए भजन का प्रमुख स्थान बन गया।
मणिपुरके बहुत से परिवारों में अब भी यह प्रथा है कि १०-१२ वर्ष की अवस्था में ही वे अपने बालकों को श्रीनरोत्तम ठाकुर महाशय के परिवार में दीक्षित करा देते हैं। श्रीसखीचरण बाबा के साथ भी ऐसा ही हुआ। वि० संवत् १९४२ फाल्गुनी कृष्णा त्रयोदशी को उनका जन्म हुआ। जब वे १०-१२ वर्ष के थे, उनके माता-पिता ने उन्हें श्रीनरोत्तम ठाकुर महाशय के परिवार के किसी व्यक्ति से दीक्षित करवा दिया। पर उनके साथ यह घटना एक लौकिक रीति के रूप में ही घटकर नहीं रह गयी। उन्होंने तभी घर-द्वार छोड़ वृन्दावन जाकर भजन करने का निश्चय कर लिया। तभी से उन्हें उसके लिए उपयुक्त समय की प्रतीक्षा में श्रीनरोत्तम ठाकुर का यह पद बार-बार गाते सुना जाने लगा--
आर की ए मन दशा हब, सब छाड़ि वृन्दावन जाब॥
आर कबे श्रीरासमण्डले। गड़ागड़ि दिब कुतूहले॥
आर कबे गोवर्धन गिरि। देखिब नयनयुग भरि॥
श्यामकुण्डे राधाकुण्डे स्नान करि कबे जुड़ाब परान॥
आर कबे जमुना जले। मज्जनै हइब निरमले॥
साधु संगे वृन्दावन बास। नरोत्तमदास करे आश॥
'हाय ! कब मेरी वह दशा होगी, जब मैं सब छोड़-छाड़ वृन्दावन जाऊँगा ? कब रासमण्डल में जाकर लोटा-पीटा करूँगा ? कब गिरि गोवर्धन नयन भर दर्शन करूँगा ? कब श्यामकुण्ड और राधाकुण्ड में स्नानकर प्राणों को शीतल करूँगा ? कब यमुना में स्नानकर निर्मल होऊँगा ? कब साधु-जनों के साथ श्रीवृन्दावन-वास की मेरी आशा पूर्ण होगी ?'
तभी से वे वृन्दावन में वैराग्याश्रम ग्रहणकर भजन करने के उद्देश्य से वैराग्य का अभ्यास भी करने लगे। अपना आहार दिन-पर-दिन कम करने लगे। ग्रन्थ-पाठ, सत्संग और कृष्ण-लीला-कीर्तनादि में अधिकांश समय व्यतीत करने लगे। लीला-कीर्तन-मण्डली के एक सुनिपुण नायक के रूप में चारो ओर लोग उनकी प्रशंसा करने लगे।
शकाब्द १८४२ में ३५ वर्ष की अवस्था में वे गृह त्यागकर व्रज चले गये। राधाकुण्ड में श्रीजीवगोस्वामी के घेरे में रहकर भजन करने लगे। विरक्त-वेश ग्रहण करने के लिए उपयुक्त गुरु की खोज भी उन्होंने तत्काल प्रारम्भ कर दी। पर किसको गुरु रूप में वरण करें, यह वे बहुत दिनों तक निर्णय न कर सके। अन्त में उन्होंने राधारानी की शरण ली। दिन-रात उनसे प्रार्थना करते हुए उनके निर्देश की प्रतीक्षा करने लगे। बहुत दिनों तक उनकी ओर से भी किसी प्रकार का संकेत न मिला। उनकी धारणा थी कि वेशाश्रय के बिना भजन में तीव्र गति से अग्रसर होना सम्भव नहीं। भजन में प्रगति बिना जीवन का कोई मूल्य नहीं। इसलिए जब राधारानी ने भी गुरु के सम्बन्ध में उन्हें कोई संकेत नहीं दिया, तब वे क्या करते ? उन्होंने अनशन द्वारा जीवन समाप्त करने का निश्चय किया। अन्न-जल सब त्याग दिया। सात दिन बिना अन्न-जल के व्यतीत हो गये। शरीर अत्यन्त दुर्बल हो गया। मानसिक स्थिति ऐसी हो गयी कि निद्रा और जागरण एक से प्रतीत होने लगे। उसी समय, कहना मुश्किल है कि स्वप्न में या जागरण में, राधारानी ने दर्शन देकर राधाकुण्ड में गोपीनाथजी के मन्दिर के सेवाध्यक्ष श्रीभगवानदास बाबाजी मे वेश ग्रहण करने का आदेश दिया।
सखीचरण ने भगवानदास बाबाजी के चरणों में आत्म-समर्पण किया। वेश ग्रहण करने के पश्चात उनसे अष्टकालीन भजन-शिक्षा देने के लिए आग्रह किया। उन्होंने कहा - 'मुझे मन्दिर के सेवा-कार्य तो अवकाश मिलता नहीं। तुम्हें भजन सिखाऊँ तो कैसे सिखाऊँ ? तुम ऐसा करो खदिरवन (खैरा) में थोलोकनाथ गोस्वामी की भजन-कुटीमें श्रीनरोत्तमदासजी महाराज और पिसाए की कदम्बखण्डी में श्रीराधिकादासजी महाराज रहते हैं। यह दोनों मणिपुर के उच्चकोटि के भजनशील व्यक्ति हैं। दोनों सिद्ध कृष्णदास बाबा की भजनशैली मे भजन करते हैं। दोनों जैसे एक प्राण, दो देह हैं। तुम इन दोनों से कृष्णदास बाबा की गुटिका के अनुसार भजन की पद्धति सीख लो।'
शेष भाग अगली कड़ी (382) में देखें
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