विश्वगुरु कब?
वैदिक उक्ति थी-कृण्वन्तो विश्वमार्यम् (ऋक्, ९/६३/५)। मनु स्मृति में भी है-
एतद्देशप्रसूतस्य सकाशादग्रजन्मनः।
स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेरन् पृथिव्यां सर्वमानवाः॥ (२/२०)
यहाँ अग्र जन्मनः का अर्थ है, सबसे पहले शिक्षित। शिक्षा को भी जन्म कहते हैं, इस द्वितीय जन्म के बाद मनुष्य द्विज होता है। शिक्षा तथा उसके अनुरूप आचरण से ही मनुष्य सभ्य होता है। इस अर्थ में भारत के लोग पहले सभ्य हुए। शक्ति पाने में असुर आगे थे जिनको पूर्वदेवाः कहा गया है। प्रथम शिक्षित होने के कारण इस देश के लोगों का कर्तव्य है कि अपने आचरण द्वारा पृथ्वी के सभी मानवों को शिक्षित करें।
अभी पिछले हजार वर्षों से भारत पतनशील है। ब्रिटिश शासन काल में भावना थी कि भारतीय प्रतिभा में किसी से कम नहीं हैं तथा श्री चन्द्रशेखर वेंकट रामन को १९३० में भारतीय रूप में नोबेल पुरस्कार मिला। रवीन्द्र नाथ ठाकुर (अंग्रेजीकृत टैगोर) को १९११ के दिल्ली दरबार में ब्रिटिश सम्राट पञ्चम जार्ज की स्तुति (वर्तमान राष्ट्रगीत) लिखने के लिए १९१३ में ब्रिटिश प्रजा रूप में साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला। १९१९ के गवर्नमेंट ऑफ इंडिया ऐक्ट पास होने के बाद श्री रामन को भारतीय रूप में पुरस्कार मिला।
स्वाधीनता के बाद पराधीनता तथा हीनता की भावना बढ़ती गयी। इसका आरम्भ था १९८५ में कांग्रेस की स्थापना, गान्धी-नेहरू द्वारा पूर्ण स्वाधीनता स्वीकार नहीं करना। १९१९ अधीन गवर्नमेंट ऑफ इंडिया ऐक्ट की स्वाधीनता टालने के लिए अरब में विद्रोह कराने वाले टी ई लारेंस के आदेश से तुर्की खलीफा के पक्ष में आन्दोलन किया, जिसमें मोपला द्वारा १०,००० से अधिक हिन्दुओं की हत्या हुई। इसके लिए केरल कांग्रेस अध्यक्ष गोविन्द मेनन को आजीवन कारावास दण्ड मिला। बाद में क्रिप्स आदि के प्रस्ताव इसलिए अस्वीकार करते रहे कि कामनवेल्थ में रहना पड़ेगा। किन्तु आजाद हिन्द फौज बनने, भारतीय नौसेना विद्रोह आदि के कारण अंग्रेजों ने भारत विभाजन कर अपने सेवकों को सत्ता सौंप दी। पर सेवक २ वर्ष तक अंग्रेज राजप्रमुख तथा सेनाध्यक्ष रखे रहे तथा अनन्त काल तक भारत को ब्रिटिश कामनवेल्थ के अधीन रखा। प्रत्यक्ष शासन नहीं होने पर भी मानसिक रूप से ब्रिटेन तथा अमेरिका की दासता बढ़ती गयी। भारत में वही शोध सही मानते हैं, जो ब्रिटेन या अमेरिका द्वारा स्वीकृत हो। कई बातों में नासा को उद्धृत करते हैं जिसका स्वयं नासा को पता नहीं होता। अतः स्वाधीनता के बाद केवल उन्ही भारतीयों को विज्ञान में नोबेल पुरस्कार मिला जिनको भारत छोड़कर अमेरिका भागना पड़ा-हरगोविंद खुराना, सुब्रह्मण्य चन्द्रशेखर। वैज्ञानिकों को भारत से भगाने में नेताओं को दुहरा लाभ था-तकनीकी वस्तुओं का ५ गुणा दाम पर आयात कर कमीशन को विदेशी बैंक में जमा करना, भारतीयों को अशिक्षित रख कर उनका वोट खरीदना।
श्री रामन ने ११ वर्ष की आयु में मैट्रिक परीक्षा में पूरे राज्य में प्रथम स्थान प्राप्त किया था। विश्व में सबसे कम उम्र के डाक्टर भी एक भारतीय हैं-बाल मुरली अम्बाती, जिन्होंने अमेरिका में ११ वर्ष की आयु में उच्च विद्यालय परीक्षा पास की तथा वहाँ के विख्यात नेत्र चिकित्सक हैं। भारत सरकार के वर्तमान नियमों के अनुसार ये दोनों भारत में पढ़ने के लिए योग्य नहीं हैं। ११ वर्ष की आयु में कक्षा ५ से आगे पढ़ने की अनुमति नहीं है।
योग्यता का आधार केवल जाति है। आरक्षण द्वारा शून्य अंक पाकर हजारों व्यक्ति शिक्षक बने हुए हैं। उनके छात्रों की योग्यता का अनुमान करना कठिन है। योग्यता में कमी के साथ परीक्षाफल में अंक बढ़ते जा रहे हैं। इसके लिए बिना विषय समझे उत्तर पर चिह्न देने की पद्धति बनी है, जिससे शिक्षकों का कोचिंग व्यवसाय बढ़ता रहे।
शिक्षा व्यवस्था नष्ट कर उसका दोष केवल ब्राह्मणों पर देना है। उनके अनुसार ब्राह्मण तो यूरेशिया में रहते थे, भारत आने पर भी कभी राजा नहीं बने। इन गरीब लोगों का आदेश राजा तथा सभी धनी वर्ग क्यों मानते रहे? अभी तक तो योजना यही है कि भारत में केवल डिग्री हो, योग्यता शून्य हो।
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