Wednesday, 15 February 2023

मौन भी एक तप है*

*मौन भी एक तप है*
मौन उस अवस्था को कहते हैं, जो वाक् और विचार से परे है। यह एक शून्य ध्यानावस्था है, जहाँ अनंतवाणी की ध्वनि सुनी जा सकती है।' अध्यात्म जगत् का साधक तो मौनसाधना के बिना एक कदम भी आगे नहीं बढ़ा सकता। आत्मा से और विश्वव्यापी सूक्ष्मशक्ति से मनुष्य तब तक संबंध स्थापित नहीं कर सकता, जब तक बाह्य कोलाहल में उलझा रहेगा, बहिर्मुखी बना रहेगा। अंतर्मुखी होने और अपनी संपूर्ण शक्तियों को एकाग तथा संगठित करने के लिए मौन का अवलंबन श्रेयार्थी के लिए अत्यंत आवश्यक है।व्यावहारिक जीवन में भी मौन अनथों को पैदा होने से रोकता है। मौन कभी भी दूसरों को हानि नहीं पहुँचा सकता। समाज में विग्रह, लड़ाई-झगड़े, कलह आदि की शुरुआत वाणी से ही होती है। एकदूसरे को भला-बुरा कहने पर ही लोग उत्तेजित होकर अनीति करते हैं। लेकिन जब मौन का अवलंबन लिया जाए तो बुरे शब्द मुख से नहीं निकलेंगे और न विग्रह की स्थिति ही पैदा होगी। इतना ही नहीं कोई व्यक्ति लड़ना चाहे, झगड़ने लगे; ऐसी स्थिति में दूसरा पक्ष में यदि मौन का अवलंबन ले ले तो झगड़ा कभी हो ही नहीं सकता।मौन की स्थिति में ही हम दूसरों की अधिक सुन सकते हैं और अपने ज्ञानकोश को बढ़ा सकते हैं। लोगों को समझने, उनका अध्ययन करने के लिए भी मौन की आवश्यकता होती है। एक कहावत के अनुसार-"मौन बुद्धिमानीरूपी वह सहयोगी है, जो मनुष्य को अच्छे मित्र देता है।" सचमुच जो वाचाल होते उनसे भले आदमी दूर रहने का ही प्रयत् करते हैं। मौन की स्थिति में इस अपने अज्ञान, मूर्खता, फूहड़पन को प्रकाशित होने से रोक सकते हैं।भर्तृहरि ने कहा है।विधाता ने मौन अर्थात चुप रहना, अज्ञानता का ढक्कन बनाया है। ज्ञानियों की सभा में अज्ञानियों के लिए मौन ही सर्वोत्तम आभूषण और रक्षा कवच है।" अज्ञानी आदमी यदि वाचाल होगा तो जल्दी ही अपनी मूर्खता प्रकट कर देगा, लेकिन मौन का अवलंबन लेकर वह अज्ञान-प्रदर्शन से अपने आप को रोक सकता है। जिस तरह गंदगी के दुष्प्रभाव न से भी स्वस्थ व तरोताजा रहता है।

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