Monday, 20 February 2023

बाल्मीकि एक व्याध या बहेलिया थे। वृक्षों पर बैठने वाले पक्षियों का शिकार करना - उसे पकाकर खाना, बेचना यह उनका स्वभाविक कर्म था। इसी से वे परिवार का पालन पोषण करते थे।*

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*🌿पाप का फल* 
*परिवार नहीं भोगेगा?🌿*
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*🏻 बाल्मीकि एक व्याध या बहेलिया थे। वृक्षों पर बैठने वाले पक्षियों का शिकार करना - उसे पकाकर खाना, बेचना यह उनका स्वभाविक कर्म था। इसी से वे परिवार का पालन पोषण करते थे।*

🏻 एक दिन वहां से गुजरते समय नारद ने देखा तो पूछा कि तुम जो यह काम करते हो - यह जीव हिंसा है और यह पाप है। यद्यपि उनकी समझ में बात कहां आनी थी ; लेकिन भगवान के 'मन' नारद जब किसी को समझाना चाहे, और समझ में ना आए - ऐसा तो नहीं हो सकता।

🙉अतः क्षण भर में यह समझ आ गया कि यह पाप है।

👪वाल्मीकि ने कहा कि यह पाप मैं केवल अपने पेट के लिए नहीं करता हूं , मेरे माता - पिता, पत्नी -पुत्र आदि है। वे - सभी थोड़ा-थोड़ा फल भोगेगे।

नारद ने कहा - जरा तुम पूछ लो - क्या वे तैयार है। वाल्मीकि ने जब पूछा तो सभी बोले - हम क्यों भोगेंगे, तुम पाप करते हो तो तुम भोगोगे।

*✔बाल्मीकि की आंखें खुल गई । प्रभु कृपा करें हमारी भी खुल जाए*

*✔भले ही परिवार -पालन के लिए सही, जो भी झूठ फरेब, छल, कपट, मक्कारी अन्याय हम करते हैं, उसका फल हमें ही भोगना है - दूसरा नहीं भोगेगा।*

*📌यह निश्चित है। अतः आज से ही सावधान होने की आवश्यकता है। और दूसरे के लिए पाप कमाने में तो समझदारी क्या है?*

वाल्मीकि के समझ आने पर पाप से मुक्ति के उपाय पूछने पर नारद ने कहा -'राम' 'राम' जपो।

वाल्मीकि ने कहा- मैंने तो जीवन भर 'मरा' 'मरा' सुना है। और मारा ही है। नारद बोले- ' मरा ' 'मरा' ही जपो। इनका नाम कुछ और था
इन्होंने अन्न जल त्याग कर हजारों वर्ष तक एक आसन पर इतना जप किया कि इनके शरीर के इर्द गिर्द मिट्टी की एक परत जम गयी और उस पर दीमक चीटियां लग गई।

 उस ऐसे ढेर को 'वाल्मीकि' कहते हैं।

इसी से इनका नाम बाल्मीकि हुआ। इन्होंने संस्कृत में रामायण की रचना की।

पुनः दूसरे जन्म में तुलसी बनकर रामचरित मानस की हिंदी में रचना की, 
*✔जो जग पूज्य है..!!*
   *🙏🏿🙏🏼🙏🏽जय जय श्री राम*🙏🙏🏻🙏🏾

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