होलाष्टक और शुभ तथा मांगलिक कार्य-डॉ दिलीप कुमार सिंह मौसम विज्ञानी ज्योतिष शिरोमणि
प्रस्तावना
होलाष्टक एक महत्वपूर्ण कालखंड है होली के 8 दिन पहले शुरू होता है और होलिका दहन के साथ समाप्त हो जाता है जब बसंत रितु चरम पर होती है और शीतल मंद सुगंधित पवन के झोंके जीवन को नई स्फूर्ति से भर देते हैं और नए जीवन का उत्साह हो जाता है इस कालखंड में होलाष्टक होली का महापर्व और बसंत रितु तथा नया सनातन भारतीय वर्ष परम पावन नवरात्रि और श्री रामनवमी पड़ते हैं जो भारत के लिए एक नवीन चेतना का संचार करते हैं।
किस लिए होलाष्टक का कालखंड पड़ा
होलाष्टक का कार्य कालखंड भक्त शिरोमणि प्रहलाद और हिरण्यकश्यप के साथ जुड़ा हुआ है प्रहलाद श्री हरि विष्णु के अनन्य भक्त थे और हिरण्यकश्यप स्वयं को ईश्वर मानता था इसलिए उसने स्वयं को ईश्वर घोषित कर दिया और सारी प्रजा को ईश्वर मानने को बाध्य किया। लेकिन प्रह्लाद ने अपने पिता को बहुत बार समझाया कि श्री हरि विष्णु ही ईश्वर है उन्हीं की पूजा करो क्रोधित होकर पहले तो हिरण्यकश्यप ने प्रहलाद को अपनी बहन को लेकर के साथ जलाने का प्रयास किया इसके बाद पहाड़ से नीचे धकेल दिया फिर हाथी से कुचलकर मारने का प्रयास किया और अनगिनत कष्ट दिए अंत में प्रहलाद को खंभे से बांधकर कहा अपने ईश्वर को बुलाओ अन्यथा तुम्हारा वध कर दूंगा तभी भगवान नरसिंह इस खंबे से निकल पड़े और हिरण्यकश्यप का अपनी जगह पर बैठ कर अपने नाखून से चीर डाला तभी से 8 दिन का होलाष्टक का पर्व ईश्वर भक्ति और प्रहलाद की भक्ति की शक्ति के रूप में मनाया जाता है।
होलाष्टक में क्या-क्या पूरी तरह से वर्जित है
होलिका दहन से 8 दिन पहले तक सभी प्रकार के शुभ मांगलिक कार्य पूरी तरह से वर्जित किए गए हैं इस कालखंड में गृह प्रवेश करना मना है कोई भी विवाह करना पूरी तरह वर्जित है वहां मकान सहित हर खरीदारी भी पूरी तरह वर्जित है इसके अलावा नया कार्य शुरू करने की भी पूरी तरह माना ही है इस कालखंड में ग्रह नक्षत्र और मौसम के प्रभाव से धूम धड़ाका हर्षोल्लास गाजा बाजा और संगीत पूरी तरह सेमाना है ऐसा न करने पर आने वाले समय में उसका भीषण परिणाम दिखाई देता है इस बार यह 24 फरवरी से लेकर 3 मार्च होलिका दहन के दिन तकहै।
होलाष्टक में क्या-क्या करना चाहिए
प्लास्टिक में भगवान श्री हरि विष्णु माता लक्ष्मी भगवान शिव मां पार्वती बजरंगबली की पूजा उपासना करना चाहिए अपने इष्ट देवी देवता का ध्यान पूजन भी कर सकते हैं इसके अलावा हनुमान जी का नाम लेकर हनुमान चालीसा और बजरंग बाण का पाठ भी करना चाहिए अपना ध्यान भक्ति आराधना में लगाने से इस कालखंड में सत्य की मानसिक अनुभूति होती है और मां को बहुत ही गहरी शांति प्राप्त होती है जीवन को नई दिशा भी मिलती है
उपसंहार
यदि सांस्कृतिक और वैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए तो यह कालखंड बहुत ही संक्रमण कालीन होता है इस समय हर्ष और उल्लास का कार्य करने से मन में विरोधी शक्तियां प्रकट हो जाती हैं और शुभ मांगलिक कार्य का अच्छा परिणाम नहीं निकलता है इस कालखंड में होने वाले विवाह वहां खरीददारी इत्यादि भी अंत में बुरा प्रभाव ही देता है यह जाड़े के अंत और गर्मी के प्रारंभ का बसंत ऋतु का मौसम है हमारे प्राचीन ऋषि मुनि और मनुष्यों ने बहुत ही गहन अध्ययन और अनुसंधान करके विभिन्न प्रकार के शुभ और मांगलिक कार्य तथा व्रत पर्व अनुष्ठान पूजा पाठ यज्ञ हवन का आविष्कार किया है जिसे आज पूरी दुनिया मान रही है लेकिन हम लोग भटक गए हैं यह देखकर बड़ा आश्चर्य हो रहा है कि तमाम लोग विवाह पूजा पाठ अखंड रामायण जैसे कार्य भी इस कालखंड में कर रहे हैं इसका निर्णय व स्वयं करेंगे कि इसका क्या परिणाम होता है।
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