Friday, 9 September 2022

राधाकृष्ण का संवाद" (तुम ही इस मन में रहती हो)

कविता -

 "राधाकृष्ण का संवाद" (तुम ही इस मन में रहती हो)
 
बरसों बाद मिले थे मुझको, फ़िर से वो खुशी के कुछ पल....
उन्हीं पलो में साथ बिताये मैंने, सारे बीते हुए कल....
सोच रही थी क्या-क्या उन पलो में संजोलू???
हाथ में उनके हाथ डालकर हँस दू.... या कंधे पर सिर रख रोलू।
समझ ना पाई बात कुछ भी.... बस एक टक उनको निहार रही थी.... क्या उनके लिए मैं इस वक़्त कर जाऊँ??? अंदर ही अंदर सोच विचार रही थी।
एकदम से फिर आ गया वो जुदाई का पल.... हँसकर उन्होंने मुझसे कहा....
फिर आऊंगा तुमसे मिलने.... रहा हूं मैं अब चल।
जैसे सांसे थम सी गई हो, उस पल.... और पैरो के नीचे से धरती भी गई हो निकल।
जाते-जाते उसने पूछा, फिर आऊं तो क्या लाऊं???
मैने कहा हो सके तो,
मेरे बहते आँसू.... तेरी यादों में बिताए वो कल....माथे की बिंदी....मांग का सिंदूर....तेरा वक़्त....हमेशा साथ देने का वादा और तेरी जिंदगी का हर एक पल।
ले आओगे ये सब जो तुम, हाँ मैं भी जी लुंगी....उम्र भर की मुलाकाते....वो मेरे दिल मैं छुपी है जो अनकही और अधूरी सी बातें।
सुनकर मेरी बात वो, थोड़ा सा मुस्कुराये....
चुमकर मेरे माथे को फिर, प्यार से दो शब्द सुनाये....
मैं जब-जब सांसे लेता हूं....तुम मुस्करा देती हो....
मैं जब भी पग बढ़ाता हूं....तुम संग परछाई बन चल देती हो....मैं तुम्हें याद नहीं करता हूं....क्योंकि तुम सदा ही दिल में रहती हो....मेरा दुख भी कम हों जाता है ....क्योंकि तुम मुझे याद कर रो देती हो....तुम मेरी वो सच्ची साथी हो....जो बिना स्वार्थ साथ देती हो....कल्पना से लेकर असलियत तक, बस तुम ही इस मन में रहती हों।।
लेखिका - रश्मि agrvalकविता - "राधाकृष्ण का संवाद" (तुम ही इस मन में रहती हो)
 
बरसों बाद मिले थे मुझको, फ़िर से वो खुशी के कुछ पल....
उन्हीं पलो में साथ बिताये मैंने, सारे बीते हुए कल....
सोच रही थी क्या-क्या उन पलो में संजोलू???
हाथ में उनके हाथ डालकर हँस दू.... या कंधे पर सिर रख रोलू।
समझ ना पाई बात कुछ भी.... बस एक टक उनको निहार रही थी.... क्या उनके लिए मैं इस वक़्त कर जाऊँ??? अंदर ही अंदर सोच विचार रही थी।
एकदम से फिर आ गया वो जुदाई का पल.... हँसकर उन्होंने मुझसे कहा....
फिर आऊंगा तुमसे मिलने.... रहा हूं मैं अब चल।
जैसे सांसे थम सी गई हो, उस पल.... और पैरो के नीचे से धरती भी गई हो निकल।
जाते-जाते उसने पूछा, फिर आऊं तो क्या लाऊं???
मैने कहा हो सके तो,
मेरे बहते आँसू.... तेरी यादों में बिताए वो कल....माथे की बिंदी....मांग का सिंदूर....तेरा वक़्त....हमेशा साथ देने का वादा और तेरी जिंदगी का हर एक पल।
ले आओगे ये सब जो तुम, हाँ मैं भी जी लुंगी....उम्र भर की मुलाकाते....वो मेरे दिल मैं छुपी है जो अनकही और अधूरी सी बातें।
सुनकर मेरी बात वो, थोड़ा सा मुस्कुराये....
चुमकर मेरे माथे को फिर, प्यार से दो शब्द सुनाये....
मैं जब-जब सांसे लेता हूं....तुम मुस्करा देती हो....
मैं जब भी पग बढ़ाता हूं....तुम संग परछाई बन चल देती हो....मैं तुम्हें याद नहीं करता हूं....क्योंकि तुम सदा ही दिल में रहती हो....मेरा दुख भी कम हों जाता है ....क्योंकि तुम मुझे याद कर रो देती हो....तुम मेरी वो सच्ची साथी हो....जो बिना स्वार्थ साथ देती हो....कल्पना से लेकर असलियत तक, बस तुम ही इस मन में रहती हों।।
लेखिका - रश्मि अग्रवाल



         संवाददाता मुकेश कुमार की रिपोर्ट

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