Thursday, 12 January 2023

अखेराज सोनगरा चौहान...वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप के नानोसा है जिन्होंने मेवाड़ के प्रति स्वामीभक्त का हर समय परिचय दिया।

अखेराज सोनगरा चौहान...

वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप के नानोसा है जिन्होंने मेवाड़ के प्रति स्वामीभक्त का हर समय परिचय दिया।

महाराज अखेराज सोनगरा भारत के इतिहास में प्रसिद्ध चौहान वंश की वीर परम्परा में पाली के शासक महाराज रणधीर सिंह चौहान के पुत्र थे। जो अपने समय के कुशल नितिज्ञ और प्रसिद्ध योद्धा थे। मारवाड़, मेवाड़ और बीकानेर राजघरानों से उनके वैवाहिक सम्बन्ध उस काल में उनके विशिष्ट स्थान व उनकी महत्ता की पुष्टि करते है।

अखेराज सोनगरा ने मारवाड़ के मेवाड़ के कई सैनिकों अभियानों में भाग लेकर अपनी वीरता का प्रदर्शन किया था।

महाराज अखेराज सोनगरा ने अपनी पुत्री का विवाह महाराणा उदयसिंह के साथ किया यह विवाह होते ही उदयसिंह को मेवाड़ के उमरावों के साथ चौहानों के साथ मारवाड़ का समर्थन स्वत: हासिल हो गया, क्योंकि अखेराज सोनगरा राव मालदेव के समय में महत्त्वपूर्ण पाली के शासक थे। अत: मारवाड़ के प्रसिद्ध वीर कूम्पा, जैता आदि मारवाड़ की सेना लेकर अखेराज सोनगरा के साथ बनवीर से लोहा लेने मेवाड़ पहुंचे।

माहोली के निकट घमासान युद्ध हुआ जिसमें दासी पुत्र बनवीर हार कर भाग गया।अनन्तर पाली, मेवाड़ व मारवाड़ की संयुक्त सेना ने चितौड़ पर अधिकार कर महाराणा उदयसिंह को राजगद्दी पर बैठा दिया। इस तरह मेवाड़ की स्वतंत्रता के लिए अखेराज सोनगरा के साथ रिश्तेदारी मेवाड़ के लिए महत्त्वपूर्ण साबित हुई।

जोधपुर के राव मालदेव व मेड़ता के वीरमदेव व बीकानेर के कल्याण के आपसी कलह के चलते शेरशाह सूरी की चढ़ाई की खबर राव कूंपा ने अखेराज सोनगरा के पास पाली भेजी। “अखेराज जी उस वक्त अपने साथियों संग सरोवर में स्नान कर रहे थे। उसने (सन्देश वाहक ने) सूचना दी तो अखेराज खुस हुए। अखेराज सोनगरा का मानना था कि क्षत्रिय के लिए युद्ध में प्राणोत्सर्ग करना गर्व की बात है और इस अवसर की सूचना उसे आज मिल ही गई।अखेराज सोनगरा ने खुश होकर अपने हाथों से स्वर्ण के कड़े उतार कर रेबारी को बधाई के रूप में प्रदान कर दिए।”

सूचना के बाद अखेराज सोनगरा अपने पुत्र भाण सोनीगरा के साथ अपना सैन्य दल ले शेरशाह सूरी से मुकाबले के लिए सुमेल गिरी राव कूंपा के पास जा पहुंचे। किसी षड्यंत्र की आशंका के चलते राव मालदेव युद्ध क्षेत्र से अनेक सरदारों के साथ जोधपुर किले में चले गए। तब अखेराज सोनगरा, जेता, कूंपा और खींवकरण आदि निर्भीक युद्धाओं ने शेरशाह से दो दो हाथ करने का निर्णय लिया और अपने से कई गुना बड़ी सेना के साथ भीड़ गए। अखेराज सोनगरा शेरशाह की सेना पर शेर की तरह दहाड़ते हुए हुंकार कर टूट पड़े। कहा जाता है कि अखेराज सोनगरा जब अफीम-पान करके हुंकार करते थे तो उनकी गर्जना कोसों दूर तक सुनाई देती थी। उनकी हुंकार जहाँ शत्रु खेमे में आतंक पैदा करती थी, वहीं उसके साथियों का मनोबल बढ़ता था। इसी युद्ध में अखेराज सोनगरा ने अपनी तलवार के जौहर दिखाते हुए अपने पुत्र भोजराज व 21 अन्य सोनगरा चौहानों के साथ अपने प्राणों का उत्सर्ग कर दिया। यह युद्ध पौष शुक्ला 11 वि.सं. 1600 में हुआ था।

इस युद्ध मारवाड़ के छोटे से सैन्य दस्ते द्वारा शेरशाह की सेना का भयानक नुकसान करने के बाद शेरशाह सूरी द्वारा कहा गया एक वक्तव्य इतिहास में प्रचलित है...

बोल्यो सूरी बैण यूँ, गिरी घाट घमसाण!
मूठी खातर बाजरी, खो देतो हिंदवाण!!

अर्थात् मैं मुट्ठी भर बाजरे के लिए हिंदुस्तान की सल्तनत खो देता।

बहुआयामी व्यक्तित्त्व के धनी अखेराज सोनगरा शकुन विद्या के भी अच्छे ज्ञाता थे। उन्होंने अपने सैनिक अभियानों व प्रशासनिक कार्यों के अनुभव पर “सुगनावली” नामक ग्रन्थ की रचना की थी। जिसमें शकुन देखने की विधि, दिशाओं का ज्ञान, रोजगार के जाने, राजा से मिलने, युद्ध अभियान के लिए प्रस्थान करने, कामदार आदि कर्मचारियों की नियुक्ति करने या हटाने, राजा का राजधानी से प्रस्थान करने, बारात प्रस्थान, अकाल-सुकाल, वस्तुओं के मूल्य घटने-बढ़ने, जलाशय तथा कुआ खुदवाने इत्यादि अनेक विषयों पर अच्छे-बुरे शकुनों की जानकारी सरल भाषा में लिपिबद्ध की।


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