Monday, 20 February 2023

मणिकर्ण को लेकर कहा जाता है कि यहां भगवान शिव ने अपनी तीसरी आंख खोली थी। हिमाचल प्रदेश के कुल्लू से 45 किमी दूर है मणिकर्ण...

: मणिकर्ण, हिमाचल प्रदेश

यहाँ खोली थी भगवान शिव ने अपनी तीसरी आंख, शेषनाग की हुंकार से आजतक उबलता है यहाँ का पानी
मणिकर्ण को लेकर कहा जाता है कि यहां भगवान शिव ने अपनी तीसरी आंख खोली थी। हिमाचल प्रदेश के कुल्लू से 45 किमी दूर है मणिकर्ण...

हिन्दू धर्म में भगवान शिव को त्रिदेवों में गिना जाता है। भगवान शिव को कोई रुद्र तो कोई भोलेनाथ के नाम से पुकारता है। माना जाता है कि भगवान शिव भक्त की भक्ति मात्र से प्रसन्न हो जाते हैं। भगवान शिव को कई और नामों से पुकारा जाता है जैसे- महादेव, भोलेनाथ, शंकर, महेश, रुद्र, नीलकंठ इत्याोदि. तंत्र साधना में भगवान शिव को भैरव के नाम से भी जाना जाता है। भगवान शिव से जुडी कई अलौकिक पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं. ऐसी ही एक कहानी हिमाचल प्रदेश के मणिकर्ण को लेकर भी मशहूर है।

मणिकर्ण को लेकर कहा जाता है कि यहां भगवान शिव ने अपनी तीसरी आंख खोली थी। हिमाचल प्रदेश के कुल्लू से 45 किमी दूर है मणिकर्ण। यहां हिन्दू और सिख धर्म के एतिहासिक धर्म स्थल हैं। मणिकर्ण से पार्वती नदी बहती है, जिसके एक ओर शिव मंदिर और दूसरी ओर गुरुनानक देव का एतिहासिक गुरुद्वारा है। यहाँ का खौलता पानी आज भी एक रहस्य बना हुआ है, जिसके बारे में अब तक विज्ञान भी कुछ नहीं बता सका है.

यहां प्रचलित कहानी के मुताबिक, कहा जाता है कि शेषनाग ने भगवान शिव के क्रोध से बचने के लिए यहां एक दुर्लभ मणि फेंकी थी। इस वजह से यह चमत्कार हुआ और यह आज भी जारी है। इसके बाद भगवान शिव ने क्रोधित होकर अपनी तीसरी आंख खोली थी। दरअसल, यहां की नदी में क्रीड़ा करते हुए एक बार माता पार्वती के कान के आभूषण की मणि पानी में गिर गई और पालात लोक में चली गई।ऐसा होने पर भगवान शिव ने अपने गणों को मणि ढूंढने को कहा। बहुत ढूंढने पर भी शिव-गणों को मणि नहीं मिली। इस बात से क्रोधित होकर भगवान शिव ने अपनी तीसरी आंख खोल दी।

तीसरा नेत्र खुलते ही उनके नेत्रों से नैना देवी प्रकट हुईं। इसलिए, यह जगह नैना देवी की जन्म भूमि मानी जाती है। नैना देवी ने पाताल में जाकर शेषनाग से मणि लौटाने को कहा तो शेषनाग ने भगवान शिव को वह मणि भेंट कर दी।

🌷 हर हर महादेव 🌷
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यह कूप कोई सामान्य कूआँ नहीं है।

यह कूप अपने में त्रेतायुग और मर्यादा पुरुषोत्तम श्री रामचन्द्र जी, माता वैदेही जानकी के स्मृति चिन्हों को समेटे हुए हैं।

यह अपने आप में आश्चर्यजनक विशिष्टता का संगम धारण किए हुए है।

समुद्र के अन्दर स्थित होने पर भी इस कूप में का जल मीठा है (sweet water)।
(समुद्र के लवणीय (खारे) पानी में मध्य मृदु जल मिलना असम्भव है।)

यह त्रयंबकेश्वर (द्वादश ज्योतिर्लिंग वाला नहीं) प्रभु शिव मन्दिर संस्थानम में स्थित है।

यह विल्लुण्डी तीर्थम कहलाता है।

Villoondi Theertham, Thangachimadam, Tamilnadu.

ऐसी मान्यता है कि रावण से सीता जी को मुक्त कराकर श्री राम जी यहीं इस देवाधिदेव महादेव के शिवलिङ्गम का पूजन किए थे।

पूजन समाप्ति पश्चात सीता जी को प्यास लगने पर श्री राम ने अपने तूणीर से वाण ले समुद्र छेदन कर मीठा जल निकाले थे।

वैसे विल्लुण्डी का अर्थ "तीर से छेदा हुआ" होता है।

यह है महान सनातन धरोहर..!!

जय सनातन धर्म🙏

: *शंख का महत्त्व*
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हिंदू मान्यता के अनुसार कोई भी पूजा, हवन, यज्ञ आदि शंख के उपयोग के बिना पूर्ण नहीं माना जाता है। धार्मिक शास्त्रों के अनुसार शंख बजाने से भूत-प्रेत, अज्ञान, रोग, दुराचार, पाप, दुषित विचार और गरीबी का नाश होता है। शंख बजाने की परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है। महाभारत काल में श्रीकृष्ण द्वारा कई बार अपना पंचजन्य शंख बजाया गया था।आधुनिक विज्ञान के अनुसार शंख बजाने से हमारे फेफड़ों का व्यायाम होता है, श्वास संबंधी रोगों से लडऩे की शक्ति मिलती है। पूजा के समय शंख में भरकर रखे गए जल को सभी पर छिड़का जाता है जिससे शंख के जल में कीटाणुओं को नष्ट करने की अद्भूत शक्ति होती है। साथ ही शंख में रखा पानी पीना स्वास्थ्य और हमारी हड्डियों, दांतों के लिए बहुत लाभदायक है। शंख में कैल्शियम, फास्फोरस और गंधक के गुण होते हैं जो उसमें रखे जल में आ जाते हैं।

और एक विशेष बात हमेशा यद् रखे भगवन शिव पर शंख जल नही चढ़ाते 
क्यों नहीं चढ़ाते शिव को शंख से जल?
शिव पुराण के अनुसार शंखचूड नाम का महापराक्रमी दैत्य हुआ। शंखचूड दैत्यराम दंभ का पुत्र था। दैत्यराज दंभ को जब बहुत समय तक कोई संतान उत्पन्न नहीं हुई तब उसने विष्णु के लिए घोर तप किया और तप से प्रसन्न होकर विष्णु प्रकट हुए। विष्णु ने वर मांगने के लिए कहा तब दंभ ने एक महापराक्रमी तीनों लोको के लिए अजेय पुत्र का वर मांगा और विष्णु तथास्तु बोलकर अंतध्र्यान हो गए। तब दंभ के यहां शंखचूड का जन्म हुआ और उसने पुष्कर में ब्रह्मा की घोर तपस्या कर उन्हें प्रसन्न कर लिया। ब्रह्मा ने वर मांगने के लिए कहा और शंखचूड ने वर मांगा कि वो देवताओं के लिए अजेय हो जाए। ब्रह्मा ने तथास्तु बोला और उसे श्रीकृष्णकवच दिया फिर वे अंतध्र्यान हो गए। जाते-जाते ब्रह्मा ने शंखचूड को धर्मध्वज की कन्या तुलसी से विवाह करने की आज्ञा दी। ब्रह्मा की आज्ञा पाकर तुलसी और शंखचूड का विवाह हो गया। ब्रह्मा और विष्णु के वर के मद में चूर दैत्यराज शंखचूड ने तीनों लोकों पर स्वामित्व स्थापित कर लिया। देवताओं ने त्रस्त होकर विष्णु से मदद मांगी परंतु उन्होंने खुद दंभ को ऐसे पुत्र का वरदान दिया था अत: उन्होंने शिव से प्रार्थना की। तब शिव ने देवताओं के दुख दूर करने का निश्चय किया और वे चल दिए। परंतु श्रीकृष्ण कवच और तुलसी के पातिव्रत धर्म की वजह से शिवजी भी उसका वध करने में सफल नहीं हो पा रहे थे तब विष्णु से ब्राह्मण रूप बनाकर दैत्यराज से उसका श्रीकृष्ण कवच दान में ले लिया और शंखचूड का रूप धारण कर तुलसी के शील का अपहरण कर लिया। अब शिव ने शंखचूड को अपने त्रिशुल से भस्म कर दिया और उसकी हड्डियों से शंख का जन्म हुआ। चूंकि शंखचूड विष्णु भक्त था अत: लक्ष्मी-विष्णु को शंख का जल अति प्रिय है और सभी देवताओं को शंख से जल चढ़ाने का विधान है। परंतु शिव ने चूंकि उसका वध किया था अत: शंख का जल शिव को निषेध बताया गया है। इसी वजह से शिवजी को शंख से जल नहीं चढ़ाया जाता है।

जय श्री हरि🙏🙏🌷
 जय गजानन 🙏
गणेश जी की सबसे ऊंची मूर्ति भारत में नहीं बल्कि थाईलैंड के ख्लाँग ख्वेन शहर के इंटरनेशनल पार्क में स्थित है, इस शहर को चचोएंगसाओ और #सिटी_आफ_गणेश के नाम से भी जाना जाता है।। कांस्य धातु से बनी 39 मीटर ऊंची मूर्ति को थाईलैंड की राजकुमारी द्वारा स्थापित किया गया है।।

जय श्री गणेश🙏🙏

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