Monday, 20 February 2023

वृन्दावन के भक्त - 92”!! पण्डित बाबा - श्रीरामकृष्ण दास जी !!

 आज  के  विचार

आज  के  विचार

( "श्रीकृष्णचरितामृतम्" - भाग 72 )

!! "श्रीदामा" - कन्हैया का नया सखा  !! 

7, 6, 2021

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श्रीदामा  का मिलन हुआ कन्हैया से  ........दोनों के आनन्द का कोई ठिकाना नही था ........ये नया सखा  मिला था ....वैसे  श्रीदामा कोई नया नही है .......ये पुराना है ......अनादि सखा है ........गोलोक में  निज परिकर है कन्हैया का  ये.........श्रीदामा  ।

पर -

 अवतार काल में पृथ्वी में ये पहली बार मिल रहा था अपनें कन्हैया से ।

कल सन्ध्या को आये थे   बृषभान जी नन्दगाँव.........अकेले नही आये .......आज अपनें पुत्र को भी ले आये थे .......गौर वर्ण का  वह बालक ........पीली छोटी पाग सिर में  बाँधे हुए था.......मुस्कुराता मुखमण्डल .....अद्भुत तेजयुक्त   था वो   ।

कन्हैया  तो  खिसकते हुए  पहुँच गए   बृषभान जी के पास में .....फिर  बगल में शान्त बैठे श्रीदामा के  पास ।

तुम्हे खेलना है ?    जाओ !      थोड़ी देर खेल लो .......बृषभान  जी बोले थे  अपनें पुत्र  श्रीदामा से  ।

कन्हैया  चंचल बहुत है .......तुरन्त ही श्रीदामा का हाथ पकड़ कर बोला ........चलो !  तुम्हारे बाबा नें आज्ञा दे दी है ......अब चलो  ।

श्रीदामा संकोची है..........पर कन्हैया इसके संकोच को निकाल फेंकेगा ........देखते जाना   ।

कन्हैया  श्रीदामा का हाथ पकड़ कर ले गए और अपनी सखा मण्डली  में ले आये थे  ...........

नाम क्या है  तुम्हारा ?   कन्हैया नें पूछा था  ।

संकोची है  श्रीदामा....दो चार बार पूछनें पर ही बताया था  अपना नाम  - श्रीदामा ।   

तुम कहाँ रहते हो ?     बरसाना !......पास में ही है   ।

बड़े सुन्दर हो  तुम तो ?    श्रीदामा के कपोल को छूते हुए कन्हैया बोले ।

मुझ से भी ज्यादा सुन्दर तो  मेरी बहन है .........बालक.श्रीदामा नें कहा......

" बहन और मुझे   साथ में कोई देख ले ......तो कोई ये बता नही सकता  कि  कौन भाई है  और  कौन मेरी बहन है   ।

कन्हैया नें  पीठ में हाथ मारी श्रीदामा के ...........यहाँ लेकर आओ  अपनी बहन को ........मैं तो बता दूँगा  कि  कौन तुम हो ..और कौन  तुम्हारी बहन है   ।    कन्हैया  ही बोले थे ।

रुके कन्हैया.....कुछ सोचकर बोले.......तुम्हारी बहन का नाम क्या है  ?   

"श्रीराधा".............श्रीदामा नें उत्तर दिया  ।

कुछ देर के लिये आँखें बन्द हो गयीं थीं कन्हैया की ............ये नाम ऐसा  अद्भुत है  कि  श्री कृष्ण को भी अंतर्मुखी बना देता है   ये नाम  ।

हमारे साथ मित्रता करोगे ?   हँसते हुए  कन्हैया नें अपना हाथ बढ़ाया  ।

श्रीदामा नें  तुरन्त  सिर  हाँ में ही हिलाया था.........और  फिर हाथ मिले  और गले भी मिले   ।

तुम नित्य आओगे  हमारे पास  ?         कन्हैया नें श्रीदामा को पूछा ।

हाँ .....मेरा  ग्राम बरसाना,  पास में ही है .........वो देखो !     उस ऊँची पहाड़ी में  महल दिखाई दे रहा है ना....वही है.....श्रीदामा नें दिखाया  ।

तभी उस  दिशा से हवा चली ........और उस हवा के झोंके नें कन्हैया को छूआ ........बस उसी समय    कन्हैया रोमांचित हो उठे  थे  ।

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( साधकों !  प्राचीन वृन्दावन में - नन्दगाँव  बरसाना गोवर्धन यमुना जी ये सब आते थे....वर्तमान का वृन्दावन  पंचकोशी है .....ये  "सरस वृन्दावन" है....जहाँ मात्र  श्रीराधा रानी से  श्री कृष्ण का प्रेमालाप होता था  )  

बृषभान जी और बृजराज दोनों होकर   अपनें बालकों को ढूंढनें निकल गए थे ......क्यों की   रात्रि हो रही थी   ।

नन्दजी को देखते ही कन्हैया  दौड़ पड़े.....बृषभान जी के पास श्रीदामा ।

ये है  मेरा बालक........बृषभान जी नें  दिखाया  बृजराज को  ।

श्रीदामा.......आपनें जब  देखा था  बृजराज !    तब ये बहुत छोटा था .......आप को स्मरण है  क्या  ?   बृषभान जी नें पूछा  ।

हाँ ........मुझे स्मरण है  ।

और ये है  मेरा पुत्र  कृष्ण ............नन्दबाबा नें   परिचय दिया  ।

लाला !   आओ  ...इधर आओ   .............बृषभान जी नें बुलाया कन्हैया को .....तो कन्हैया  चले गए  ।

और ये सब  मेरे पुत्र के सखा हैं .............नन्द बाबा के कहनें पर .....सब नें  बृषभान जी के  चरण छूए ............पर  -

तू भी  छू  ...........कन्हैया हँसते हुये मनसुख से बोले  ।

मैं तो ब्राह्मण हूँ ..........मैं कैसे छू सकता हूँ..............मनसुख नें बृषभान जी की ओर  देखते हुए ही कहा था   ।

ओह !   ब्राह्मण हो आप ......फिर  तो  आपके  चरण हमारे  धाम में भी रखिये....पवित्र हो जायेगें....बृषभान जी नें  हाथ जोड़कर मनसुख से कहा ।

पता नही ऐसा क्यों कहा .......गौ के  खुर से स्थान पवित्र होता है .......पर मनसुख कोई गौ तो नही .....फिर इसके पाँव पड़नें से  कोई भी स्थान पवित्र कैसे हो सकता है.......मेरे तो कुछ समझ में ही नही आया ।

कन्हैया सोच रहे थे .............कि तभी  मनसुख नें ऐसी बात कह दी .....कन्हैया  तो शरमा गया  और मैया की गोद में जाकर छुप गया था ।

आपकी बेटी है  ?   सुना है बड़ी सुन्दर है.....हमारे कन्हैया से उसकी सगाई करा दो ....फिर आऊँगा  आपके यहाँ  और खूब दावत उड़ाऊँगा ।

कुछ भी बोल देता है मनसुख.......अरे !   कुछ तो  शरम  करो ...........पर  मनसुख को कौन समझाये  ।    

लग रहा था  कन्हैया को  कि    बृषभान जी क्रोधित हो उठेंगे  ऐसी बातें सुनकर ........पर  बृषभान जी तो बहुत अच्छे हैं ..............कन्हैया नें अब सोचा ......कितनें अच्छे हैं !   

मनसुख के सामनें  हाथ जोड़कर बोले ........आप ही  करवा दो  मेरी बेटी और नन्दनन्दन के साथ सगाई ...............

कैसी है आपकी बेटी  ?     बोर कर रहा था अब मनसुख  ।

फिर उत्तर की प्रतीक्षा बिना किये बोला .......आपके पुत्र .श्रीदामा जैसी ही लगती हैं क्या  ?     मनसुख पूछ रहा है  ।

हाँ बृजराज !  मेरी राधा बेटी  बिल्कुल श्रीदामा की तरह ही लगती है ।

कोई पहचान ही नही पाता दोनों को ......कभी श्रीदामा को  राधा कह देते हैं .....कोई राधा को श्रीदामा......ये कहते हुए हँस रहे थे बृषभान जी ।

पर श्रीदामा  से शर्त लगाई है अपनें कन्हैया नें......कि  कल राधा को ले आना.....अपना कन्हैया तो  पहचान लेगा  - श्रीदामा है  कि  राधा हैं  ? 

मनसुख की बातों का कोई बुरा नही मानता ..........ये परम तपश्विनी पौर्णमासी का पुत्र है .........बृजराज नें  बृषभान जी को कहा  ।

नही ..........बड़ा अद्भुत बालक है ये ...........दिव्य  प्रेम मयी ऊर्जा से ओतप्रोत ........बृषभान जी नें मनसुख के लिये कहा था  ।

पर सुन्दर तो आपका पुत्र है.........कन्हैया काला है ....पर आपका पुत्र गौर वर्ण का है..........श्रीदामा के लिये कहा मनसुख नें ......और   श्रीदामा के गोरे कपोलों को छूकर भागा ।

मनसुख की  हर छोटी बड़ी हरकतों पर कन्हैया खूब हँसता है .........आज भी खूब हँसा..............बृषभान जी  मन्त्रमुग्ध होकर नन्दनन्दन को देखते ही रहे थे    ।

श्रीदामा अब  कन्हैया के  सखाओं में  प्रमुख बन गया था .............नित्य बरसानें से  नन्दगाँव आना......कभी कभी  तो नन्दगाँव में ही सो जाना ।

एक दिन -

शेष चरित्र कल -



वृन्दावन के भक्त - 92”

!! पण्डित बाबा - श्रीरामकृष्ण दास जी !!

29, 9, 2022

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गतांक से आगे - 

श्रीमद्भागवत का अध्ययन मैंने  पाँच वर्ष तक लगातार किया ।    मैंने सुना अपने गुरुदेव से कि श्रीधाम वृन्दावन के कोतवाल  श्रीगोपेश्वर महादेव हैं  तो नियम बना लिया ....नित्य ब्रह्ममुहूर्त में जाकर महादेव को श्रीमद्भागवत जी का पाठ सुनाता था ...साप्ताहिक पाठ ।  पाँच वर्ष तक मैंने गोपेश्वर महादेव को पाठ सुनाया ....एक दिन  महादेव प्रकट हो गये ....मेरे सामने प्रत्यक्ष ।  

पण्डित बाबा  सुना रहे हैं और चारों ओर लोग  बड़े ध्यान से उन्हें सुन रहे हैं .....अभी  तक जयपुर से  महाराजा के मंत्री पहुँचे नही हैं ....”उनकी गाड़ी खराब हो गयी”  पण्डित बाबा इतना कहकर हंसे ...बोले ...ठाकुर जी की अभी इच्छा नही है कि मैं उनके पास जाऊँ ।

आज द्वादशी है ....पूरी रात भजन कीर्तन करते हुए बीती है ....ऐसी अवस्था में भी  उठकर स्नान किया  पण्डित बाबा ने और चरणामृत का पान किया ।  पर  इनकी कुटिया का नियम है ...द्वादशी के दिन कोई मधुकरी के लिए भी नही जाता ....कुटिया में सब कीर्तन करते हैं और कोई  मन्दिर से प्रसाद आजाए तभी सब लोग मिलकर पाते हैं ।  इस दिन कोई मधुकरी के लिए नही जाता ।

“मेरा ये सिद्धांत ही रहा ....पण्डित बाबा बता रहे हैं .....जब मैं  विरक्त बना तो मेरे गुरुदेव ने मुझ से कहा मधुकरी लेकर आओ ......मैं पहले दिन गया तो मुझे मधुकरी खूब मिल गयी ...पर दूसरे दिन गया तो  कहीं नही मिली ..जिस जिस घर में जाता  मुझे मना ही कर देते ...मैं लौट आया ...पण्डित बाबा बोले ...मेरे गुरुदेव ने मेरे कन्धे में हाथ रखते हुए कहा ....कुछ पैसे हैं क्या ? 
मेरे पास दो रुपए थे ....मैंने गुरुदेव को दिये ...गुरुदेव ने उस दो रुपए को हाथ में लेकर पूछा ये कल भी थे क्या ?  नही ...कल मेरे पास कुछ नही था .....हंसते हुये उन दो रुपयों को  गुरुदेव ने यमुना जी में फेंक दिया और कहा ...इसी धनाश्रय के कारण तुम्हें बृजवासियों से मधुकरी नही मिली ....ये धाम के वासी हैं ...धाम के वासी धामी ही होते हैं ....ये सब श्रीकृष्ण स्वरूप हैं ...जाओ और जाकर अब मधुकरी लेकर आओ ...और जिन्होंने मना किया था उन्हीं के घरों में जाना ....पण्डित बाबा कहते हैं ...मैंने कहा - गाली मिलेगी ...तो मेरे गुरुदेव बोले ...गाली तो अमृत है ....जाओ !    और उन्हीं घरों से मुझे मधुकरी मिली उन्हीं बृजवासियों ने मुझे प्रेम से मधुकरी दी ....तभी से मैंने सोच लिया  अब किसी का आश्रय नही लेना है ....एक रुपये का भी आश्रय नही ....पण्डित  बाबा बोले ....फिर कुछ वर्षो  बाद  मैंने नियम बना लिया कि द्वादशी के दिन कोई मधुकरी माँगने नही जाएगा ....यहीं  जो आएगा उसी को सब कुटिया वाले पायेंगे ..और नही आएगा तो  नही पायेंगे .. ठाकुर जी के मन्दिर से जो आयेगा या कोई बृजवासी दे जाएगा उसी को पाया जायेगा ।        

पण्डित बाबा अब मौन हैं .......सब लोग संकीर्तन कर रहे हैं ।   

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पण्डित बाबा ने श्रीमद्भागवत पाठ गोपेश्वर महादेव को सुनाई थी ... पाँच वर्ष तक  साप्ताहिक क्रम से ....महादेव प्रकट हो गये थे ....क्या चाहिए तुम्हें ?     “युगल सरकार के दर्शन”....पण्डित बाबा ने हाथ जोड़कर महादेव से माँगा था । 

“ठीक है”.....कहकर महादेव ने पण्डित बाबा के सिर में हाथ रखा और अन्तर्ध्यान  हो गये ।

बरसाने में जाकर  रहने की आज्ञा मिली गुरुदेव से पण्डित बाबा को ....ये बरसाना गये ....वहाँ  इन्होंने  कीर्तन सीखा ...मृदंग सीखा ....फिर इनको कीर्तन में आवेश आने लगा ...भजन  में अब इनको आनन्द नही आता था ....ये कीर्तन करते हुए उन्मत्त हो जाते ....तब इनके गुरुदेव ने इनको आदेश दिया कि  भजन में मन लगाओ ....पर अब इनका मन लग नही रहा था भजन में ....इन्होंने अपनी परेशानी गुरुदेव को बताई ...सिद्ध थे गुरुदेव उन्होंने इनको कहा कि तुम नन्दगाँव जाओ और वहाँ जाकर उद्धव क्वांरी में बैठकर गोपालमन्त्र का एक पुरश्चरण करो ...इन्होंने छ मास में एक    पुरश्चरण  पूरा किया  । उसी दिन इनको  साक्षात् श्रीयुगल सरकार के दर्शन हुये ....ये अपलक नेत्रों से उनको निहारते रहे  और देह भान खो बैठे ।   नन्दगाँव में इनकी ये स्थिति  दो माह तक बनी रही .....इनको  सिद्ध श्रीकृष्णदास जी मिले  ये गिरिराज जी में रहते थे  पण्डित बाबा भी इनके साथ अब गिरिराज जी में आगये .....सामान्य चर्या अब इनकी हो गयी थी ।  

रामप्रताप !    

पीछे से किसी महिला ने इनको आवाज दी ....ये समझ गये  कि  ये आवाज इनकी वात्सल्यमयी ताई जी की है ...वो श्वेत वस्त्रों में थीं ....पर ये सब देखते हुये भी इन्होंने उन से न कोई बात की न उनसे मिले ....बेचारी वो ताई  वहाँ से वापस चली गयीं  जयपुर ....ताऊ जी का शरीर शान्त हो गया था ...क्यों की ताई ने सुहाग के कोई चिन्ह धारण नही किए थे ।

इसका परिणाम ये हुआ कि ..अब पण्डित बाबा के मन में उचाट होने लगा ...भजन में मन नही लगता ...एकान्त में बैठते हैं तो घबराहट होती है ....ऐसा  क्यों हो रहा है मेरे साथ ?  ये प्रश्न जब सिद्ध बाबा कृष्ण दास जी से पूछा तो उनका उत्तर था ....तुमने एक माता का अपमान किया है ....वो बेचारी  तुमसे मिलने आयी थी ....तुम्हें पता है !   तुम तो जयपुर से यहाँ आगये और सबको भूल गये  पर वो नही भूल पाई....सिद्ध कृष्णदास जी  सारी बातें ऐसे बता रहे थे जैसे वो देखें हों ...और सत्य बता रहे थे ...ये परम सिद्ध थे ....पण्डित बाबा सुनते रहे ....उन्होंने कहा ...तुम्हारे ताऊ जी जब स्वर्गवासी हुये तब भी इस माता की इच्छा थी कि तुम उनके अंतिम संस्कार में पहुँचो ...पर तुम्हें पता नही था और होता भी तो तुम जाते नही  कोई बात नही ....ये तो उचित भी है  विरक्त के लिये ....किन्तु वो यहाँ आयीं थीं ....तुम प्रेम से बोल तो लेते ....उनकी कुछ बातें तो सुन लेते ......पण्डित बाबा को लगा कि हाँ मुझ से सच में अपराध हुआ है ....अब मैं क्या करूँ ?  वापस वैसी स्थिति कैसे पाऊँ ?  

“ये तो तुम ही सोचो” ....सिद्ध कृष्ण दास बाबा ने इतना ही कहा ।

ये सोचते रहे फिर इन्होंने एक तार भेजा  जयपुर  और उसमें लिखा - मेरी ममता मयी ताई जी ! मैं आपकी सेवा करना चाहता हूँ अगर आप चाहें तो बृजवास के लिए आसकती हैं ....वो परमभक्तिमति थीं उनको श्रीहनुमान जी ने ही आज्ञा दी थी  कि तुम बृजवास करो इसलिये तो वो आयीं थीं .....अब जब तार प्राप्त हुआ तो प्रसन्नता से भरी ये फिर आयीं ....गिरिराज जी के गोस्वामी परिवार के एक मकान में  अपनी ताई जी को पण्डित बाबा ने रखवा दिया ....और  सुबह शाम आकर ये इनकी देख भाल करते थे ...सेवा करते थे ...इससे इनको बड़ा लाभ हुआ ...इनका भजन पूर्व की भाँति बढ़ने लगा ....और सिर्फ दो वर्ष की ही सेवा लेकर ताई ने भी अपना शरीर छोड़ दिया था ।

शेष कल - 


[: कृष्ण प्रेमगीता
( भाग ४६ )
१६/४/२२

भगवान खुद ही अपने भक्तो की महिमा गाते हुए आनंदित होते है.... द्वारिका में तो भक्तो की शिरोमणि हुई गोपियों की और उनकी गुरु बनी उनकी स्वामिनी की प्रेम महिमा सुनाई जा रही है..... जिसे भगवान खुद प्रेमगीता कहते हुए सम्मानित कर रहे है.... प्रेम का ज्ञान संसार को कैसे हो वो स्पष्ट कर रहे है.... द्वारिका की पवित्र भूमि में सुनाई जा रही प्रेमगीता को आगे बढ़ाते हुए कृष्ण कहते है.... हृदय से सुनो रानियों .... ये जो गोपियां है ना ये किस कुल में जन्मी है वो महत्व पूर्ण नही है.... उन्होंने उस कुल में जन्म लेकर उन कुलोंका उद्धार कर दिया है ये समझो.... नारी होकर , अपनी धर्म और मर्यादाओं का पालन कर , अपने संसार में रहकर प्रेम की उच्चतम अवस्था प्राप्त कर,  ऐसे स्थान पर पहुंची है की वहा तक पहुंचने में करोड़ों जन्मों की तपस्या करे तो भी ऋषि मुनि देव देवता दानव वहा तक नही पहुंच सकते.... ये है प्रेम की शक्ति.... प्रेम ही तो सारे ज्ञान का मूल है.... प्रेम से ब्रह्म है प्रेम से सृष्टि है प्रेम से ही जीव जगत है.... जैसे मैने कहा ज्ञान का अर्थ है ब्रह्म को जानना.... उसके लिए संग, अन्न, स्पर्श , और साथ ही योग, ध्यान, धारणा, समधी ये साधना भी अति आवश्यक है.... ये सारी मैं ज्ञान की बाते बता रहा हूं जो इस संसार की है समझो..... ये अहिर की कन्याएं जन्मी कहा है प्रेम की परम भूमि में व्रज में.... जहा कण कण चैतन्य है प्रेम देवता की परम कृपा से.... तो प्रेम स्पंदन तो व्रज की भूमि में है... जल में है... वायु में है... जो जो दृश्य है अदृश्य है सब मे है.... इन सब का संग मिला है इन गोपियों को... उस पर परम करुणामई जो है प्रेम का प्रत्यक्ष स्वरूप वो इनकी सखी है,गुरु है, स्वामिनी है .... सब कुछ बस श्री राधा को ही मानती है.... नित ही उनकी सेवा करती है तो उनके चरणों का स्पर्श पाती है जिसे पाने के लिए ब्रह्म तक तरसता है... वो सेवा सुख इनको सहज प्राप्त है.... अब आप सब खुद समझ सकती हो की प्रेम का संग, स्पर्श मिलते ही इनके हृदय में प्रेम ज्योति का प्रकाश उजागर होगा ही जिससे माया का अंधकार तो छा ही नही सकता... जब अंधकार ही नही है तो ज्ञान प्रत्यक्ष हो जाता है.... केवल कृष्ण ही इनका जगत है... दृष्टिसे जो भी दिखता है वो कृष्ण है... कर्ण जो श्रवण करते है वो  शब्द भी कृष्ण ही है...उनका तन कृष्ण है मन कृष्ण है उनका रोम रोम कृष्ण है फिर कहती है हम भी कृष्ण ही है.... यही तो ब्रह्म ज्ञान है... कठिन तप,योग साधना करने के बाद अहम ब्रह्मस्मि का ज्ञान प्राप्त करते है... ये अहिर को कन्याएं प्रेम से सहज ही इस स्थिति को प्राप्त कर गई.... अब उससे उच्चतम अवस्था....इनका अन्न जो गो माता की सेवा से मिलने वाला दूध दही माखन का सेवन अधिकतर करती थी... अब गो माता भी कैसी जो मेरे साथ वन में होती थी... मेरा वेणुनाद सुनती तो उसके हृदय में भी मेरे प्रति अनन्य प्रेम वो गो माता और अधिक दूध देती... ये भी प्रेम का बड़ा सुंदर उदाहरण है गौ तो मूलतः ही शांत ,प्रेम , वात्सल्य से भरी होती है... नित मुझे देखती तो अपना प्रेम और वात्सल्य के भाव प्रकट करती... अब ऐसे गौओंका दूध उससे बने पकवान ये गोपियां बनाती.... जब भोजन बनाती तो विचार कैसे कृष्ण के प्रेम के विचार... वही प्रेम अन्न में मिलता... भोजन भी कृष्ण के लिए ...हृदय से कृष्ण को  अर्पण करती... अन्न हो गया ना कृष्ण का प्रसाद... तो उनका अन्न भी पूर्ण ब्रह्म बन जाता... ये है ब्रह्मज्ञान...  अब इनकी साधना सुनो... ये किसी भी स्थिति में एक जगह बैठ जाती और मेरे विचारो में खो जाती तो कितना समय ये उसी स्थिति में होती उनको भी अनुभव नहीं होता... ये उनका योग आसन हुआ... मेरे विचारों से इनके हृदय में प्रेम उमड़ता और फिर मुझसे मिलने की व्याकुलता बढ़ती... विरह अग्नि इनके हृदय को जलता तो इनकी सांस बढ़ जाती विरह यातना से अश्रु बहते वो हिलकियो से रोती ये होगया इनका प्राणायाम... जब शांत होती तो आंखे बंद कर हृदय में मेरे रूप को निहारती ये होगया इनका ध्यान... उसके बाद ये हृदय से मुझे प्रेम करती आलिंगन देती अत्यधिक आनंदित होती... मेरे रूप में खो जाती और भूल जाती खुदको .... आपने आप को कृष्ण समझती... उनकी आत्मा का मुझ परमात्मा से मिलन होता ये उनकी समाधि होती थी.... प्रेम कितना सरल मार्ग है आत्मज्ञान का.... जिस ज्ञानको अपनाकर ये अहिर कन्याओं ने ब्रह्म को अपना बना लिया... और उनकी वो स्वामिनी वो तो शिखर है प्रेम का समर्पण का उन्होंने तो अपने प्रेम का गुलाम बना लिया है त्रिलोक के नाथ को... अपने प्रेम का ऋणी बना लिया है इसीलिए तो उनकी चरण रज के लिए भी मचल जाता है ये ब्रह्म.... केवल अपने निष्काम निस्वार्थ प्रेम से ज्ञान को प्राप्त कर लिया है इन गोपियों ने.... रानी भद्रा आप संतुष्ट है ना ये जानकर की कैसे अहिर की कन्याओं ने ज्ञान प्राप्त किया.... रानी भद्रा प्रसन्न मुद्रा से कहती है .... अद्भुत है नाथ आप की ये गोपियां और उनका प्रेम ... धन्य है ये गोपियां जिन्हे श्रीराधा का वरद हस्त मिला है...  धन्य है.... कहते हुए अपने हाथ जोड़ कर प्रणाम किया था रानी भद्रा में गोपियों को उनकी स्वामिनी को......

( शेष भाग कल )
कृष्ण की दीवानी कृष्णदासी

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