कृष्ण प्रेमगीता
( भाग ४४ )
१४/४/२२
द्वारिकामे प्रेमगीता सुनाते हुए श्रीकृष्णचन्द्र अपनी रानियों को परम ज्ञान की महिमा भी सुना रहे है.... परम ज्ञान प्राप्त कैसे होता है उसको उजागर कर रहे है.... संगत, मित्रता, अन्न इनके साथ साथ अब स्पर्श से ज्ञान कैसे प्राप्त होता है ये बताते हुए अपने गुरुदेव की कथा सुना रहे है......आगे कहते है जैसे ही मेरे गुरुदेव सांदीपनी के गुरुदेव का अनुष्ठान पूर्ण हुआ वो पूर्णतः जागरूक हुए.... पूर्ण सजग वो कूटी से बाहर आए उस समय सांदीपनी कुटी को गोबर से लेप रहे थे .... प्रातः की बेला थी ब्रह्म मुहुर्त की साधना कर, स्नान करके कुटी को स्वच्छ करने का कार्य कर रहे थे.... उनके गुरुदेव बाहर आ कर देखते है तो सांदीपनी कुटी लेप रहे है उनके तन पर कितने ही मार के निशान है कुछ जख्म भी है... पूर्ण शरीर उनका भरा हुआ था वो देख कर गुरुदेव को ज्ञात हुआ कि कितनी पीड़ा सही है.... और इतनी वेदनाओ के सह कर भी कितनी श्रद्धा और निष्ठा से सेवा की है ... गुरुदेव का हृदय करुणा से भर गया अपने शिष्य की सेवा पर अति प्रसन्न हुए थे उनकी आंखों से अश्रु धाराएं बह चली थी..... सांदीपनी का ध्यान उनकी ओर गया तो वो इतने प्रसन्न हुए गुरुदेव गुरुदेव कहते उनके चरणों में गिर गए.... अपने अश्रुओं से गुरुदेव के चरणों का अभिषेख किया उनके गुरुदेव के भी अश्रु बह चले वो उनके प्रिय शिष्य के माथे पर गिर रहे थे.... अद्भुत दृश्य होगा वो गुरुशिष्य के प्रेम का .....सांदीपनी को अपने हाथों से जैसे ही स्पर्श किया था उनके गुरुदेव ने उनमें ज्ञान का प्राकट्य हो गया.... उठाकर अपने हृदय से लगाया था गुरुदेव ने तब माया के सारे बंध टूट गए.... अहम ब्रह्मस्मी का ज्ञान स्मरण हो गया .... फिर भी उनके गुरुदेव को संतोष नही मिल रहा था की अपने इस प्रिय निष्टावान निस्वार्थ सेवा करनेवाले शिष्य को सब कुछ मिलना चाहिए.... तो उन्होंने सारा ज्ञान , सारी कलाए , सारी सिद्धियां उनको प्रदान की अपना हस्त अपने शिष्य के माथे पर रखकर.... और उनको वरदान दिया जो इस विश्व को ज्ञान दिलाएगा .... योग सिखाएगा.... जगतगुरु कहलाएगा तुम उसके गुरु बनोगे शिष्य.... तुम ब्रह्म के गुरु कहलाओगे.... युगों युगों तक तुम्हारा नाम सम्मान से लिया जाएगा.... जिसकी पूजा ये सारा संसार करेगा वो तेरे चरणों की सेवा करेगा.... मुस्कुराते है कृष्ण.... परम शिष्य बननेके लिए भी पूर्ण समर्पण की आवश्यकता है... शिष्य को किस योग्य बनाना है ये गुरु जानते है... मेरे गुरुदेव सांदीपनी ने ही मुझे ये कथा सुनाई थी.... गुरु के स्पर्श से ज्ञान मिला था और मेरे गुरुदेव बनने का सौभाग्य भी..... स्पर्श वासना का ही प्रतीक नही है.... स्पर्श तो ममता का प्रतीक है.... स्पर्श वो ज्ञान प्रदान करता है जो सिदा हृदय में उजागर होता है.... जैसे माता पिता का स्पर्श संतान को प्रेम ममता वात्सल्य का ज्ञान देता है.... उस स्पर्श में हमे निर्भयता का अनुभव होता है.... मेरी मैया तो मेरे सिर पर जब प्रेम से हाथ फेरती थी तो मुझे उसके ममता से परम आनंद की अनुभूति होती.... और जब मैं नंदबाबा के पास होता तो उनके बहु में मुझे परम सुरक्षितता महसूस होती.... कितना निर्भय होता मैं.... ये ममता का स्पर्श.... ऐसा ही भाई भाई का स्पर्श भाई बहन का स्पर्श.... जब दाऊ साथ में हो तो मुझे तो कोई चिंता ही नही होती कही भी भीड़ जाते थे हम.... दाऊ का हाथ स्कंध पर हो तो जीत पक्की होती.... हसने लगते है कृष्ण .... दाऊ को ही लडाते थे हम... जब मैया से मार मिलनी होती थी तब भी दाऊ ही बचाते थे.... सुख में दुख में दाऊ के गले लगकर संतोष मिलता था... उनका स्पर्श जैसे लगता की मैं कभी भी अकेला नहीं हूं.... वो नित मेरे साथ ही है.... ऐसा ही बहन जब भाई के गले लगती है तब उसे भी अनुभव होता है की ये बाहू उसकी रक्षा के लिए सैदव तत्पर होंगे.... ये भाई का आलिंगन नही उसका सुरक्षा कवच है.... ये भाई हर परिस्थिति में उसके साथ खड़ा रहकर उसका रक्षण करेंगा..... ये भाई बहन का स्पर्श अपनेपन का ज्ञान दिलाता है..... एक स्पर्श है निस्वार्थ प्रेम का स्पर्श जो हमें अनुभव करता है परम प्रेम का.... ये कहते ही कृष्ण फिर अपनी स्मृतियों में खो गए थे........ रानी भद्रा बोली क्या हुआ नाथ क्या विचार कर रहे है...?? राधा के बारे मे.... ?? हमे भी बताए....... कृष्ण मुस्कुराते है.......
( शेष भाग कल )
कृष्ण की दिवानी कृष्णदासी
: आज के विचार
“वृन्दावन के भक्त - 90”
!! पण्डित बाबा - श्रीरामकृष्णदास जी !!
27, 9, 2022
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गतांक से आगे -
वृन्दावन के कौन सन्त महात्मा वहाँ उपस्थित नही थे ...इतना ही नही बृजवासी भी उपस्थित थे ...और बृजवासी केवल श्रीधाम वृन्दावन के ही नहीं ....नन्दगाँव बरसाना गोवर्धन पूरे ब्रजमण्डल के बाबा के प्रिय बृजवासी लोग वहाँ आगये थे ...सबके प्रिय जो थे पण्डित बाबा । शोकाकुल हो उठा था बृजमण्डल उन्हें लग रहा था पण्डित बाबा अपना देह छोड़ देंगे तब हमारा क्या होगा ? इसलिये सब आये थे ...पण्डित बाबा जी का नियम ही था कोई भी इनकी कुटिया में पधारता था ये उन्हें मिश्री और कुछ सत्संग का प्रसाद अवश्य देते ।
आज कुछ प्रसाद नही मिलेगा ? उड़िया बाबा जी भी आगये थे पण्डित बाबा के अन्तिम दर्शन करने ....ऐसे महापुरुष कहाँ मिलेंगे फिर ?
हाँ , उड़िया बाबा जी की आवाज सुनकर पण्डित बाबा ने अपने नेत्रों को खोला और उठने की कोशिश करने लगे तो - अरे ! आप ऐसे करेंगे तो मैं अपने आपको अपराधी समझ लूँगा ...कि मेरे यहाँ आने के कारण पण्डित बाबा को कष्ट हुआ ....उड़िया बाबा जी ने उन्हें लेटने के लिए ही कहा ....एकादशी का दिन फिर पण्डित बाबा का नियम हर एकादशी निर्जला ही ये करते थे .....इसलिये शरीर भी अब साथ नही दे रहा था । हाँ , मैं ज्ञानी हूँ ना इसलिये भक्तों के मर्म को ज़्यादा नही समझता ...आप कुछ कह रहे थे ...वही प्रसाद दे दें .....उड़िया बाबा जी श्रीधाम में किसी से प्रभावित थे तो पण्डित बाबा से ही ।
“हाँ , मेरे शरीर की आयु उन दिनों होगी यही छ वर्ष की .....पण्डित बाबा जो प्रसंग सुना रहे थे वो आगे सुनाने लगे थे .....मुझे पतंग उड़ाने का बड़ा शौक था ...गोविन्द देव जी के मन्दिर में चला जाता फिर छत में चढ़कर खूब पतंग उड़ाता ...एक दिन .....मैं पतंग उड़ा रहा था किसी ने मेरी पतंग काट दी ....मैं रोने लगा ....मैं अकेले ही रोने लगा ....क्यों की ताऊ जी ने जैसे तैसे एक रुपए दिये थे उसमें से मैंने दस पैसे का पतंग लिया था और बाकी से धागा ,चरखा सब ख़रीद लिया था .....पतंग उड़ा रहा था पतंग तो कट ही गयी बचाने के चक्कर में मैं गिरते गिरते बचा इसलिए धागा और चरखा दोनों चले गये थे ।
पण्डित बाबा की ये बातें सब सुन रहे थे और गदगद हो रहे थे ।
मैं रोने लगा ...अकेले खूब रो रहा था कि तभी छत पर गोविन्द देव जी आगये ....क्यों रो रहा है भाई ! मुस्कुराते हुए पूछने लगे ...मेरी पतंग कट गयी ..और धागा और चरखा भी गया ...अब मैं क्या करूँ ? पगले ! क्या हुआ तो जाने दे पतंग को .....गोविन्द देव जी बोले ....जाने दे ! ऐसे कैसे जाने दे ? तुझे खेलना है नही ...बोर होता रहता है पर बोलता नही ....मुकुट लगाकर बाँसुरी लेकर ....मैंने अपने आँसु और नाक पौंछि ...फिर कहा - तेरे हाथ नही दूखते बाँसुरी लेकर हर समय खड़ा रहता है ......पण्डित बाबा कहते हैं ....मेरी बात सुनकर वो सिर्फ हंसे ....फिर मुझ से बोले ...रो मत ....तो तुम दिला दो गोविन्द ! पतंग ....मैंने कहा ....गोविन्द देव जी ने पता नही कहाँ से ...दस पतंग और दो चरखा , धागे से चरखा भरा हुआ ....लाकर दिया ....मैं बहुत खुश हुआ ....और पतंग लेकर जैसे ही घर में आया ....पण्डित बाबा खूब हंस रहे हैं ये बात बताते हुये .....मुझे मेरी ताई ने थप्पड़ मारा और कहा ...सच बता कहाँ से चोरी की .....मैंने कहा - मैं क्यों करूँ चोरी ? फिर ये सब कैसे ख़रीदा ? मुझे मेरे मित्र गोविन्द ने दिया ....पर मेरी ताई समझी नहीं .....वो तो जाकर हनुमान जी के मन्दिर में बैठ गयीं .....वो हनुमान जी की परम भक्ता थीं ...आवेश हनुमान जी का उनपर आता था .....दो घण्टे वो बैठी रहीं अब हनुमान जी ने उनके हृदयाकाश में आकाशवाणी कर दी कि आप चिन्ता मत करो .....ये भगवान श्रीगोविन्द देव जी का सखा है ...और गोलोक का निज परिकर है ....ये बात संकोच के साथ बहुत धीरे बोल रहे थे पण्डित बाबा ...पर सबने सुन ही ली ।
हरिबाबा जी भी वहाँ आगये थे ....वो उड़िया बाबा जी से शिकायत के स्वर में कह रहे थे मुझे क्यों नही बताया कि आप पण्डित बाबा जी के पास आरहे हैं ......हरिबाबा जी ! अभी मैं जीवित हूँ ...पण्डित बाबा जी के इस बात पर सब हंसे थे ।
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हर समय खेलना , खेलने में ही रुचि थी रामप्रताप की ....और रुचि क्यों न हो साक्षात् गोविन्द देव जी जिसके साथ आकर खेल रहे हैं ...दोनों में झगड़ा हो रहा है .....आहा !
एक दिन दोनों झगड़ पड़े ...राम प्रताप और गोविन्द देव जी .....गोविन्द देव जी ने राम प्रताप का कुर्ता फाड़ दिया ....राम प्रताप को क्रोध आया उसने गोविन्द देव जी की पोशाक फाड़ दी ।
ये पोशाक किसने फाड़ी ? पुजारियों में चर्चा का विषय बन गया था ....तो किसी ने कह दिया वो बालक रामप्रताप उद्दण्ड हो गया है .....कहीं भी आता जाता है ......तभी जयपुर के महाराजा दर्शन को पधारे उन्होंने भी पूछा .....आज पोशाक कैसे फटी है ठाकुर जी की ....तो पुजारियों ने कहा ....हम आपके कारण कुछ कह नही पाते पर इस रामप्रताप बालक ने मन्दिर में हंगामा कर रखा है ...यहीं गेंद खेलता रहता है ...यहीं पतंग उड़ाता रहता है ......देखिये महाराज ! देखिये !
उसी समय रामप्रताप क्रोध में भरकर फटे कुर्ते में रोता हुआ ....और सामने आकर चिल्ला रहा था ...गोविन्द देव जी को तर्जनी दिखाकर गालियाँ दे रहा था ......राजा साहब ने देखा ....उनके नेत्रों से अश्रु गिरने लगे .....इसके दादा इसके पिता सिद्ध थे ....पर लगता है ये माता पिता के परमधाम जाने से विक्षिप्त सा हो गया है ....दयालु राजा ने उसी समय विचार किया ब्राह्मण बालक है इसको मैं शिक्षा दिलाऊँगा ...विचार करके वो अपने महल में चले गए ।
बालक राम प्रसाद के ताऊ जी को महल में बुलाया जयपुर के महाराज ने ...राम प्रसाद के लिये शिक्षा की व्यवस्था नही की ? ताऊ जी ने कहा ...महाराज ! शिक्षा की व्यवस्था तो है पर पहले यज्ञोंपवीत संस्कार तो हो जाये .....कर दो ....ताऊ जी सिर झुकाकर खड़े रहे .....महाराजा ने कुछ द्रव्य दिये और कहा इस बालक का यज्ञोपवीत कराओ और जितना व्यय होगा मुझे बता देना ।
रामप्रताप की आयु आठ वर्ष की हो गयी थी ...इसलिये उपनयन करना आवश्यक हो गया था ।
गोविन्द ! मेरा कल उपनयन है फिर मैं गुरुकुल जाकर पढ़ूँगा तेरी मुझे बहुत याद आएगी ....राम प्रताप ये कहते हुए रो गया था ......दोनों कंचे खेल रहे थे तब कहा था रामप्रताप ने ।
अच्छा है ना , जा, पढ़ेगा तो पण्डित बनेगा .....फिर मेरे मन्दिर में आकर मुझे सामवेद सुनाना ...गोविन्द देव जी ने कहा था । अपने आंसुओं को पोंछ कर रामप्रताप तुरन्त बोला ...सामवेद ! तुम्हें अच्छा लगता है सामवेद ? हाँ सुनने में मुझे बहुत अच्छा लगता है ।
इसके बाद रामप्रताप का उपनयन संस्कार हुआ ....पण्डित “छोटे लाल राजपुरोहित” से राम प्रताप ने गायत्री मन्त्र प्राप्त किया । पर पण्डित छोटे लाल ने एक वचन ले लिया और कहा ...तुम गायत्री मन्त्र का पुरश्चरण करोगे .....बालक ने चरणों में प्रणाम करते हुये कहा ..आपने मुझे गायत्री मन्त्र दिया है तो गायत्री माता के मैं दर्शन करके ही मानूँगा ....फिर गोविन्द के सखा को गायत्री दर्शन न दें , ऐसा सम्भव है क्या ? पुरश्चरण इधर पूरा हुआ और माता गायत्री बालक रामप्रताप के सामने प्रकट हो गयीं । क्या चाहिए तुम्हें ! गोविन्द सखा को पहले उन्होंने ही प्रणाम किया फिर कहा था - क्या चाहिए तुम्हें ! “गोविन्द के चरणों में मेरी रति मति कभी हटे नही”। माता गायत्री ने कहा ....ये तो है ही ....क्यों की स्वयं गोविन्द ने तुम्हें पकड़ा हुआ है .....कुछ और माँगो ! रामप्रताप ने कहा इसके सिवा मुझे और कुछ नही चाहिए ......गायत्री माता ने कहा ...मैं अपनी तरफ से तुम्हें समस्त विद्याओं का ज्ञान हो ये आशीष देती हूँ ....माता गायत्री ने इतना कहा और अन्तर्ध्यान हो गयीं ।
अब मन नही लग रहा पढ़ाई में .....कहाँ रहना है ? जयपुर ? फिर मन में आता , नही ....श्रीधाम वृन्दावन , वो भागे रात्रि में ही गुरुकुल से ......पर गुरुकुल की व्यवस्था राजकुल से संचालित है ...पकड़ लिए गये ....उस दिन बहुत झेंपा रामप्रताप क्यों की उसे लग रहा है .....गोविन्द आज खूब हंस रहा होगा ...वो कह रहा होगा ...भाग रहा था पकड़ा गया ।
पर स्वप्न में आकर गोविन्द देव जी ने कहा.....क्या मुझे सामवेद नही सुनाओगे ? सुनाऊँगा ना ! फिर पढ़ाई क्यों नही कर रहे ...पढ़ो । आज्ञा गोविन्द की अब तो जी जान लगा दिया ....पण्डित नरसिंह प्रसाद ये जयपुर के उद्भट विद्वान थे ....व्याकरण का इनको जितना ज्ञान था उतना पूरे राजस्थान में किसी को नही था ....ये षट्दर्शन के आचार्य थे ...काशी तक में इनका नाम था ......रामप्रताप ने इन्हीं से पढ़ना शुरू किया ....लघुसिद्धान्तकौमुदी से लेकर सिद्धांत कौमुदी ....अमरकोश आदि सब रट किये .....फिर आगे चारों वेद वेदान्त सब पढ़ डाला रामप्रताप ने .....चकित थे पण्डित नरसिंह प्रसाद जी भी ..षट्दर्शन का भी इन्होंने अल्प समय में ही ज्ञान प्राप्त कर लिया था । एक दिन रामप्रताप की अद्भुत मेधा देखकर इन्हें सन्देह हुआ इन्हें लगा की किसी की सिद्धि तो नही प्राप्त की इस बालक ने ....ब्रह्म पिशाच आदि कोई सहायता तो नही कर रहा इसकी .......पर एक रात्रि में इन्हें स्वप्न आया ....कि भगवान गोविन्ददेव जी के सामने समस्त देवि देवता स्तुति कर रहे हैं ...गायत्री सावित्री सब हाथ जोड़कर खड़ी हैं ....शिवब्रह्मादि शान्त भाव से गोविन्द भगवान का दर्शन कर रहे हैं तभी एक बालक को देखा जो गोविन्द भगवान का हाथ पकड़ कर खींच रहा है और कह रहा है खेलने चल ....खेलने चल ....स्वप्न में उस बालक को ध्यान से देखा नरसिंह प्रसाद जी ने .....तो उनकी नींद ही खुल गयी ...क्यों की वो बालक यही रामप्रताप था । वो उठे और जब गए रामप्रताप के पास गये तो वो सो रहा था .....गहरी नींद थी .....पर उस गहरी नींद में भी वो कह रहा था ...गोविन्द ! मेरा मन नही लगता यहाँ ....तेरे बिना मेरा मन नही लगता । मुझे श्रीवृन्दावन भेज दे ना ।
पण्डित नरसिंह प्रसाद जी को रोमांच होने लगा ....ये तो भगवान गोविन्द का निज परिकर है ..इसकी क्या तुलना ? मात्र इस घटना ने पण्डित नरसिंह प्रसाद जी को पूरा बदल दिया ...हाथ जोड़कर प्रणाम कर रामप्रताप को ...वो रात में ही श्रीधाम वृन्दावन चले गये । वहाँ जाकर श्री नित्यानंद बाबा जी से इन्होंने वैष्णवी दीक्षा प्राप्त की .....श्रीनरसिंह दास इनका नाम हुआ । यही बड़े गुरु भाई भी हुए राम प्रताप के ।
शेष कल -
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