अनंत ब्रह्मांड में हमारी धरती के एक कण से भी छोटी है -डॉ दिलीप कुमार सिंह मौसम विज्ञानी ज्योतिष शिरोमणि
क्या कभी आपने इस अनंत ब्रह्मांड के बारे में सोचा है कि यह कितने दूर तक फैला हुआ और कितना बड़ा है हमारी धरती के 99% लोग तो सारा जीवन निहित सोचते हुए अनंत ब्रह्मांड में विलीन हो जाते हैं कि हमारी धरती बहुत ही विराट है उनका सोचना गलत भी नहीं है क्योंकि जीवन भर यात्रा करने वाला व्यक्ति यदि 100 वर्ष जीवित रहे तो भी धरती के एक प्रतिशत भाग से अधिक को नहीं देख और घूम पता है और धर्म दर्शन विज्ञान अध्यात्म एवं सारी प्रगति के बावजूद भी आज सागर महासागर का 95 प्रतिशत और धरती का 50% भाग पूरी तरह अज्ञात अनजान है लेकिन ब्रह्मांड के आगे यह धरती कुछ भी नहीं है तो एक छोटे से उदाहरण से आपको समझते हैं कि अभी तक का ज्ञात ब्राह्मण कितना विराट है।
आप सब की सुविधा के लिए हम अनंत ब्रह्मांड और पृथ्वी को मटर के एक दाने के बराबर मानकर शुरू करते हैं यदि पृथ्वी को मटर का एक दाना माना जाए तो हमारा विराट सूर्य ऐसे 13 लाख मटर के दाने के बराबर है और सौरमंडल जो दो प्रकाश वर्ष में फैला है ऐसे मटर के दाने 13 लाख महा शंख में 21 शून्य बढ़ाने के बाद जो संख्या आती है उतना बड़ा तो केवल अपना सौरमंडल है। अब आपको लग रहा है कि हमारा सौरमंडल तो बहुत अधिक व्यापक और विराट है लेकिन अनंत ब्रह्मांड के आगे कुछ भी नहीं है क्योंकि वास्तव में सौरमंडल का और अनंत अंतरिक्ष का 99% भाग पूरी तरह से खाली और शून्य है और यह अभी तक सारी सभ्यता के ज्ञात ब्रह्मांड का वर्णन हो रहा है
दो प्रकाश वर्ष में फैला हुआ हमारा सूर्य और सौरमंडल हमारी अपनी आकाशगंगा के आगे कुछ नहीं है जिसको एक लाख प्रकाश वर्ष में फैला हुआ माना जाता है अर्थात हमारे सूर्य जैसे 50000 से 1 लाख सौरमंडल हमारी अपनी ही आकाशगंगा में है और ऐसा माना जाता है कि इसमें दो खरब सूर्य से भी अधिक तर विद्यमान है हमारा यह सौरमंडल इस आकाश गंगा के आगे मटर के दाने से भी छोटा पड़ जाता है फिर धरती का इसमें कौन सा अस्तित्व बचेगा यदि सूर्य को मटर का एक दान मान लें तो धरती इस आकाश गंगा में मटर के दाने से 13 लाख गुना छोटी होगी अब एक मटर का 13 लाख टुकड़ा करके आप खुद समझ लीजिए कि इस आकाशगंगा में आपकी धरती कहां है और फिर हमारा आपका उसमें क्या अस्तित्व है जो धरती के आगे रेत के एक कड़क से भी छोटी हैं।
हमारी सभ्यता की सारी कल्पना गणित के अंकों का खेल और कल्पना अपनी आकाशगंगा के आगे समाप्त हो जाती हैं क्योंकि यदि हम एक सेकंड में 3 लाख किलोमीटर लगातार चलते रहें तो हम 1 लाख वर्ष में अपनी आकाशगंगा में पहुंच पाएंगे और अभी मनुष्य के द्वारा सबसे तेज चलने वाला बनाया गया अंतरिक्ष या न केवल 100 किलोमीटर प्रति सेकंड के वेग से चल सकता है ऐसे में किसी मनुष्य के द्वारा निर्मित यह से आकाशगंगा पार करने में हमको 3 लाख करोड़ वर्ष लग जाएंगे
अब आपको यह समझ में आ रहा होगा कि अपनी आकाशगंगा जिससे मंदाकिनी कहा जाता है जिसका वर्णन हमारे वेद पुराण में है यह बहुत विराट और कल्पना से परे हैं लेकिन अभी तो आपने कुछ भी नहीं देखा है कि यह हमारा ब्रह्मांड कितना अनंत असीम अदभुत आश्चर्यजनक और अतल हैं इसकी लंबाई चौड़ाई गहराई ऊंचाई में सारा मानव का पैमाना डूब जाता है। क्योंकि अपनी आकाशगंगा जैसी 500 अब आकाशगंगाए अपने दृश्य मन ब्रह्मांड में 14 अब प्रकाश वर्ष में खोजी जा चुकी है
जहां सूर्य के मुकाबले हमारी धरती एक मटर के दाने के बराबर है और सूर्य आकाश गंगा में एक मटर के दाने के बराबर है तो अपनी विराट 2 खरब सौरमंडल से युक्त अपनी आकाशगंगा इस अनंत ब्रह्मांड में स्वयं अन्य आकाशगंगाओं के मुकाबले मटर के एक दाने के बराबर है
इसीलिए हमारे वैदिक ऋषि मुनियों से लेकर महाकाव्य लिखने वाले वाल्मीकि वेदव्यास संत महंत ब्रह्म ऋषि दार्शनिक और विद्वान तथा वैज्ञानिक इस ब्रह्मांड को अनंत और नेति नेति कहते हैं जिसका कोई भी अंत या आदि नहीं है और ऐसे 500 खराब आकाशगंगाएं ईश्वर के एक रूम में निवास करती हैं गोस्वामी तुलसीदास जी ने वेदव्यास जी ने और वाल्मीकि ने ईश्वर के विराट रूप का वर्णन करते हुए लिखा है रोम रोम प्रति राजत कोटि-कोटि ब्रह्मांड अर्थात भगवान श्री हरि विष्णु के एक रूम में करोड़ों ब्रह्मांड का निवास है और अब ईश्वर तथा ब्रह्मांड के भारतीय ऋषि मुनियों के द्वारा प्रतिपादित इस सिद्धांत को आधुनिक क्वांटम विज्ञान मान चुका है।
अब जाकर वैज्ञानिकों ने भारत के प्राचीन ज्ञान विज्ञान पर मोहर लगा दिया है और कहा है कि हम संपूर्ण ब्रह्मांड का केवल पांच प्रतिशत भाग देख सकते हैं क्योंकि बाकी 95% भाग श्वेत ऊर्जा और श्वेत ब्रह्मांड श्वेत पदार्थ के अलावा श्याम ऊर्जा और श्याम पदार्थ का बना है अंग्रेजी भाषा में इसको हम डार्क एनर्जी डार्क मैटर कहते हैं और यह संपूर्ण ब्रह्मांड का 95% भाग है अब आप कल्पना कर सकते हैं कि संपूर्ण ज्ञात ब्रह्मांड जिनकी संख्या 500 खरब मानी जाती है इस डार्क एनर्जी और डार्क मैटर में खुद मटर के एक दाने के बराबर है और यह समग्र अनंत ब्रह्मांड जो अभी तक हमें ज्ञात है ईश्वर के एक रोम के एक करोड़ भाग के बराबर है।
और बात इतनी पर ही नहीं रख रही है हमारा अपना ब्रह्मांड और सारे ब्रह्मांड लगातार फैल रहे हैं हमारे पुराण वेद और उपनिषद में लिखा है कि प्रारंभ में ईश्वर एक था उसने मन में इच्छा प्रकट किया कि मैं बहुत सा हो जाऊं** एकोअहं बहुस्याम**और उसके बाद एक प्रचंड महा विस्फोट कल्पना और सोच से परे हुआ और अनंत को ब्रह्मांडों का निर्माण हुआ जो आधुनिकतम विज्ञान की बिग बैंग थ्योरी अर्थात महा विस्फोट सिद्धांत के समान है और मेरा तो यह मानना है कि पश्चिम के वैज्ञानिकों ने यह सब वेद पुराण गीता रामायण महाभारत और भागवत पढ़कर ही निकला है जैसे आइंस्टीन का सापेक्षता का सिद्धांत डॉ सत्येंद्र नाथ बोस और गीता की सहायता से लिखा गया और हमारे ब्रह्मास्त्र के द्वारा और अन्य दिव्य अस्त्र शस्त्रों के द्वारा छोटे पैमाने वाले परमाणु हाइड्रोजन और न्यूट्रॉन बमों का आविष्कार किया गया वैसा ही सब कुछ पश्चिमी ज्ञान विज्ञान वाले हमारे ग्रंथो का अध्ययन करके कर रहे हैं।
पृथ्वी सूर्य आकाश गंगा और आकाशगंगाओं के करोड़ों समूह को देखकर अब आप सो चुके कि यह तो मन वचन कल्पना से परे है और फिर आपने अनंत कोटि ब्रह्मांड और श्वेत श्याम ऊर्जा और श्वेत श्याम पदार्थ के बारे में पढ़ा तो घनघोर आश्चर्य में डूब गए लेकिन यह अनंत ब्रह्मांड स्वयं में अनंत और कल्पना से परे आश्चर्य का स्वयं केंद्र है इस अनंत ब्रह्मांड में वह सब कुछ है जो देखा सोचा जा सकता है और जिसकी कल्पना हो सकती है यहां पर पदार्थ और प्रति पदार्थ हैं ऊर्जा और प्रति ऊर्जा है श्वेत विवर और श्याम विवाह हैं ग्रह नक्षत्र तारे आकाशगंगा हैं अनंत धूल और ऊर्जा के बदले हैं अनंत गति से चल रहे तारे और बहने वाली प्रचंड हवा है कहानी सोने चांदी के ग्रह नक्षत्र तारे हैं तो कहीं हीरे मोतियों के तो कहीं पर धरती से अर्बन गुना अधिक जल वाले ग्रह नक्षत्र विद्यमान है इतना ही नहीं हमारे सूर्य से अर्बन गुना बड़े और चमकदार तथा अब गुना छोटे सूर्य विद्यमान है अपनी एक लाख प्रकाश वर्ष में फैली हुई आकाशगंगा से भी करोडो गुना बढ़िया आकाशगंगाए और इससे भी करोडो गुना छोटी आकाशगंगाए हैं यदि अधिक अधिक सोचना चाहिए तो हमारे मस्तिष्क में स्वयं ही विस्फोट हो जाएगा जो इस माह विस्फोट का अंग हो जाएगा।
और अभी तो आपने कुछ भी नहीं जाना है यदि आप सोचते हैं कि प्रकाश सब जगह एक जैसा चलता है तो यह भी आपकी भूल है जहां भयंकर द्रव्यमान होता है वहां प्रकाश धीमा हो जाता है और जहां कम द्रव्यमान होता है वहां यह तीव्र हो जाता है और निर्वात में अपने अधिकतम गति प्राप्त कर लेता है और कृष्ण नक्षत्र अर्थात ब्लैक होल में इसकी गति शून्य हो जाती है और सभी ऊर्जा पदार्थ की तरह यह भी ब्लैक होल में समा जाता है इसी तरह दिन मिनट घंटे भी हर ग्रह नक्षत्र पर एक समान नहीं होते हैं यदि हम मंगल ग्रह पर चले जाएं तो वहां का 2 वर्ष धरती के एक वर्ष के बराबर होगा इसी तरह यदि हम यम ग्रह पर जो नर्क है और यमलोक है जहां करने के बाद हमारी आत्मा जाती है वहां पर चले जाएं तो हमारा 1 वर्ष 500 वर्ष के बराबर हो जाएगा इसका अतिरिक्त ऐसे ऐसे ग्रह नक्षत्र तारे और आकाशगंगा हैं जहां पर एक वर्ष धरती के लाखों करोड़ों वर्ष के बराबर होता है और एक दिन एक वर्ष से भी बड़ा होता है
जो कुछ भी हमारे वेद पुराण उपनिषद रामायण महाभारत और सिख जैन बौद्ध सनातन पंथ में लिखा है सब सही है तीव्र वेग से चलने वाली जो आत्माएं अपने सत्कर्म और प्रकाश की गति के कारण वाइजर और पायनियर यह की तरह सूर्य की सीमा पार कर लेती हैं वे स्वर्ग लोक और उसके आगे ब्रह्म लोक शिवलोक और महा विष्णु लोक पर जाती हैं जहां पर यह समस्त ब्रह्मांड प्रति ब्रह्मांड श्वेत विवर श्याम विवाह ऊर्जा और प्रति ऊर्जा समाप्त हो जाता है उसके शीर्ष पर महाशिवरात्रि द्वीप है जिसमें भगवान श्री हरि विष्णु योग माया दूसरों के साथ निवास करते हैं और जहां पर भूख प्यास नहीं लगती और सभी आत्माएं सूर्य के समान चमकती हुई निवास करती हैं यह सब बातें कल्पना नहीं सच्चाई है और ऐसा हमने सभी भारतीय धर्म ग्रंथो का गहन और सूक्ष्म अध्ययन करके लिखा है यदि आप पढ़ाना चाहे तो उससे अधिक आनंददायक और ज्ञानदायक कोई भी वस्तु धरती पर नहीं मिलेगी
देशकाल और समय और ब्रह्मांड के अनंत होने का प्रमाण भी हमारे धर्म ग्रंथो में कई बार मिलता है जब राजा रहे रंवतक अपनी पुत्री रेवती के साथ ब्रह्म लोक में उसके योग्य वरदान प्राप्त करने के लिए गए तब ब्रह्मा के केवल कुछ घड़ी बीते और तब तक धरती पर लाखों वर्ष बीत गए थे सतयुक्त रहता बीत चुका था द्वापर चल रहा था तब ब्रह्मा जी ने उन्हें सब कुछ समझते हुए वापस आकर बलराम से रेवती के विवाह करने को कहा इसी तरह जब हनुमान जी श्री राम की अंगूठी लेने पाताल लोक में गए तब वहां पर श्री राम की अंगूठी का पहाड़ बना हुआ था देशकाल और युग कितने बीत गए कुछ पता नहीं था ऐसे ही जब ब्रह्मा जी भगवान श्री कृष्ण से मिलने आए और कहा कि मैं ब्रह्मा हूं तो भगवान श्री कृष्ण ने उनसे कहा कि आप किस लोक के ब्रह्म हैं तबब्रह्मा को आभास हुआ की अनगिनत समानांतर ब्रह्मांड में अनगिनत ब्रह्मलोक हैं
ऐसा दृश्य श्री कृष्ण भगवान ने अनंत विराट रूप में माता यशोदा माता कौशल्या महाभारत युद्ध में अर्जुन और दुर्योधन की सभा में भी दिखाया था जिसमें कल्पना से परे अनगिनत ब्रह्मांड एक ही समय में गतिमान दिखाई दिए और ऐसा ही दृश्य काग भूसुंडी को भगवान श्री राम ने दिखाया था जब रोटी चीन के लिए बालक समझकर का भूसुंडी भगवान श्री राम के विराट मुंह में प्रवेश कर गए थे इस तरह देशकाल समय की 64 विमाएं भारत ने खोज लिया था जबकि आधुनिक विज्ञान केवल 11 विमाएं ही खोज सका है। इसी तरह सनातन धर्म और संस्कृति की सभ्यता ने 84 लाख योनियों की धरती पर खोज किया है जबकि विज्ञान अभी मुश्किल से 20 लाख योनियों की खोज कर सकता है हमारे दिव्यास्त्र जिसमें ब्रह्मास्त्र नारायण अस्त्र पाशुपत अस्त्र एवं अस्त्र भार्गव और पर्जन्य तथा वायव्य सम्मोहन और प्रदीप जैसे महान दिव्या तारा थे जिसे धरती को और पूरी आकाश गंगा को नष्ट किया जा सकता था अभी वैज्ञानिक प्रगति उससे बहुत पीछे है इसीलिए विज्ञान में कभी एक सिद्धांत आता है तो फिर दूसरा और फिर तीसरा आ जाता है क्योंकि सत्य तक वह पहुंच ही नहीं पाते परमाणु सिद्धांत को ही ले लीजिए डाल्टन से लेकर बोर बरी समर फील्ड हाइजेनबर्ग और अब क्वांटम सिद्धांत आया हुआ है और कोई भी ठीक नहीं पाया जबकि भारत के कनाडा का परमाणु सिद्धांत आज भी अटूट है जिसमें उन्होंने झरोखे से आई हुई सूर्य की रोशनी में दिखने वाले सूक्ष्म कणों को 60 बार तोड़ने के बाद मिलने वाले कार्ड को परमाणु कहा था।
इसीलिए कहा गया है हरि अनंत हरि कथा अनंता और जो नहीं देखा नहीं सुना जो मनहू न समाय वाली बात सही है सूर्य के साथ रथ के घोड़ा का रहस्य आज सबको मालूम हो गया है कि सूर्य से निकलने वाली साथ किरणें ही उनके साथ रथ हैं और सूर्य से ओम की अनंत ध्वनि निकलती है और यह ध्वनि संपूर्ण ब्रह्मांड में व्याप्त है हमारे सौरमंडल से आगे बढ़ने पर विज्ञान का सारा सिद्धांत विफल हो जाता है हमारे ऋषि मुनि वैज्ञानिक ऐसे विमान अंतरिक्षण बन चुके थे जो अनंत गति को प्राप्त करके अपनी आकाशगंगा को पार कर कुछ ही घंटे में ब्रह्मांड के शीर्ष पर स्थित महाश्वेत द्वीप पर पहुंच जाता था। प्राचीन भारत में विमान अंतरिक्ष यान और ब्रह्मांड यान विद्यमान थे पुष्पक सौभ और अन्य विमान को तो सब लोग जानते हैं। श्वेत श्याम विवर को लोग जानते थे कृष्ण नक्षत्र अर्थात ब्लैक होल के अंदर से जाते हुए भगवान श्री कृष्णा और अर्जुन का परम वेगशाली रथ अर्थात अंतरिक्ष यान ऐसे घनघोर अंधेरे में डूब गया कि करोड़ सूर्य के सामान प्रकाशित चक्र भी उसमें जलते हुए दिए के समान दिखाई दे रहा था ऐसा महाभारत में बिल्कुल स्पष्ट लिखा गया है और यह कल्पना नहीं है।
अरणोअरणीयान महतोमहीयान का महान आश्चर्यजनक और सबसे बड़ा सिद्धांत भारत की ही देन है अर्थात छोटे से छोटा और बड़े से बड़ा जो कुछ संभव है दिखाया गया है सबसे छोटे में परमाणु के अंतिम रूप की और सबसे बड़े में अनंत ईश्वर की कल्पना की गई है अब आप सोच लीजिए कि यह अनंत ब्रह्मांड जो ईश्वर के एक रोम में स्थित है वह ईश्वर स्वयं में कितना विराट होगा और इतना बड़ा अनंत और विराट ढांचा अपने आप बन जाना किसी भी भौतिक रासायनिक नियम में संभव नहीं है
इसलिए अपने धर्म दर्शन और अध्यात्म ग्रंथ को पढ़ो उसमें छिपी वैज्ञानिक तथ्य को आप लोग समझो ऐसा कुछ नहीं है जो हमारे संस्कृति सभ्यता और ग में नहीं है लेकिन गूगल या हो इंटरनेट पढ़कर और मोबाइल में व्यस्त समय विताकर हमें कुछ भी प्राप्त होने वाला नहीं है केवल शरीर रोग और बीमारियों से ग्रस्त हो जाएगा और बुद्धि भ्रष्ट हो जाएगी अपनी मौलिक कल्पना ज्ञान को देंगे और छोटे-छोटे काम गुड़ा गणित जोड़ भाग के लिए भी हम मोबाइल पर निर्भर हो जाएंगे 24 घंटे में 2 घंटे से अधिक समय मोबाइल पर देना मूर्खता है इसीलिए महा ब्रह्म ऋषि वेद व्यास जी ने महाभारत को लिखकर व्याख्या करते हुए लिख दिया था जो कुछ इस महाभारत में नहीं है वह ब्रह्मांड में कहीं नहीं है और यही अंतिम सच है हमारे देश में तो लक्ष्मण श्री राम मांधाता मुझको कुंड रघु अर्जुन भीष्म परशुराम मेघनाथ जैसे परम आधार रति योद्धा थे जिनके पास ब्रह्मांड की समस्त शक्तियां थी और जो चाहते तो समग्र ब्रह्मांड को मिटा सकते थे लेकिन ऐसा किसी ने नहीं किया क्योंकि हमारा देश सृजन का देश है विनाश का देश नहीं और बाकी धर्म और देश विनाश के अग्रदूत हैं जो सारी दुनिया का और अंत में अपना खुद का विनाश कर लेंगे।
No comments:
Post a Comment