चपरासी शब्द सुना है आपने? जो पुराने लोग होंगे उन्होंने जरूर सुना होगा। #चपरासी का क्या मतलब होता है । आप सोच रहे होंगे कि आज अचानक मैंने ये बिंदु क्यों उठाया। तो दिल थाम के बैठिए कि ये चपरासी की कहानी क्या गुल खिलाने वाली है।
तो पहले बता दूँ कि चपरासी शब्द बना चपरास से बना है जिसकी उत्पत्ति तुर्की मूल की है और जिसके मायने होते हैं धातु का बिल्ला।
चपरास' असल में धातु (पीतल या तांबा) की एक तख्ती या बिल्ला होता था। पुराने समय में राजाओं, नवाबों और फिर ब्रिटिश काल के दौरान सरकारी अधिकारियों के संदेशवाहकों या अर्दली के पास यह बिल्ला होता था।
यह चपरास आमतौर पर एक चमड़े के पट्टे पर लगा होता था, जिसे कंधे से कमर तक तिरछा पहना जाता था। इस धातु की पट्टी पर उस विभाग या अधिकारी का नाम या पद गुदा होता था, जिसका वह व्यक्ति प्रतिनिधित्व करता था।
स्वतंत्रता के बाद में भी सरकारी कार्यालयों में चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी को चपरासी ही कहा जाता था। लेकिन समय के साथ ऐसा महसूस किया जाने लगा कि ये शब्द #गुलामी का प्रतीक है और इसलिए इसे हटा कर ‘कार्यालय सहायक’ कहा जाने लगा।
इसी तरह बहुत से ऐसे शब्दों को जो व्यक्ति की गरिमा को कम करते थे उन्हें हटाया गया। जैसे घरों में काम करने वाले लोगों को ‘हाउस हेल्प’ कहा जाने लगा। इसी प्रकार विकलांग को ‘ दिव्यांग’, पागल को ‘ मानसिक अस्वस्थ’, भंगी को ‘ सफ़ाई मित्र ‘, मेहतर को ‘ पर्यावरण सहायक ‘, नौकर को ‘ डोमेस्टिक हेल्प ‘ कहा जाने लगा है। यहाँ तक कि वेश्या के लिए ‘ सेक्स वर्कर ‘ शब्द का प्रयोग किया जाने लगा है।
शब्दों का यह बदलाव केवल 'नाम बदलना' नहीं है, बल्कि यह इस बात का संकेत है कि समाज अब काम के आधार पर व्यक्ति की गरिमा को नहीं आंकना चाहता। भाषा का यह परिमार्जन हमें अधिक सभ्य और संवेदनशील बनाता है।
एक ओर हम व्यक्ति की गरिमा के सम्मान के लिए इतने बदलाव कर रहे हैं दूसरी ओर राजनीति में ठीक इसके उलट हो रहा है। अभी कल मैं संसद में नेता विपक्ष का आसाम की किसी चुनावी सभा का वीडियो देख रहा था। उस वीडियो में वो असम के मुख्यमंत्री के लिए जिस तरह की भाषा का प्रयोग कर रहे थे किसी सड़क झाप टपोरी से भी बदतर थी।
अभी आप में से बहुत लोग ये कहेंगे कि भाजपा मे भी लोग ऐसी भाषा का प्रयोग करते हैं आपको केवल राहुल जी ही क्यों दिखते हैं। मोदी नहीं दिखते? दिखते हैं, लेकिन मोदी कभी इस तरह नहीं बोलते कि राहुल ऐसा करता है या वैसा करता है। राहुल जी उम्र में लगभग बीस साल छोटे हैं फिर भी मोदी जी ऐसे नहीं बोलते। दूसरी बात राहुल जी कांग्रेस के सबसे बड़े नेता हैं, #संसद में #नेताविपक्ष हैं और उनसे ये उम्मीद की जाएगी कि वो भाषा में संयम रखें और किसी भी व्यक्ति की गरिमा को नीचा न दिखायें।
जब वो एक राज्य के चुने हुए #मुख्यमंत्री के प्रति ऐसे शब्दों का प्रयोग करते हैं तो वो अपनी पार्टी के नेताओं के साथ कैसे पेश आते होंगे ये सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है।
No comments:
Post a Comment