*श्रीमद् भागवत गीता का वास्तविक संदेश*
इतनी व्याख्या श्रीमद् भागवत गीता की कथा कथित विद्वानों ने किया है देश-विदेश के झुंडन सम्मिलित हैं लेकिन गीता का असली संदेश कोई भी जान नहीं पाया।
गीता का सबसे बड़ा संदेश यही था कि किसी भी धर्म समाज और परिवार के लिए वर्णसंकरता अर्थात दोगलापन सबसे बड़ा अभिशाप है और यही संसार का सबसे बड़ा सच है जब तक यह शुद्ध रहता है तब तक धर्म समाज घर भी शुद्ध रहता है।
मुझे आश्चर्य है कि आखिर आज तक इतने बड़े-बड़े विद्वान इस संदेश को खुद नहीं समझ पाए और लंबी चौड़ी व्याख्या दुनिया की सभी भाषाओं में कर दिया किसी भी प्रश्न का उत्तर उसी पुस्तक में होता है जो पुस्तक लिखी जाती है अपने मन का उत्तर ठीक नहीं है।
गीता का सबसे बड़ा संदेश प्रश्न और समस्या एक ही थी जो अर्जुन ने भगवान श्री कृष्ण से पूछा था और भगवान श्री कृष्ण भी उसका उत्तर नहीं दे पाए थे क्योंकि उनको धरती पर कलयुग को ले आना था।
अर्जुन ने भगवान श्री कृष्ण से कहा है प्रभु महाभारत के इस धरती आकाश पाताल व्यापी ब्रह्मांड युद्ध में बड़ी संख्या में पुरुष मारे जाएंगे इससे स्त्रियां अकेली रह जाएंगे और उनके अंदर व्यवहार होगा और समाज में दोगले वर्ण शंकर लोग पैदा होंगे और धर्म सदाचार नियम व्यवस्था सब कुछ नष्ट भ्रष्ट हो जाएगी जिसका उत्तर भगवान श्री कृष्ण के पास भी नहीं था।
अर्जुन ने भगवान श्री कृष्ण का सम्मान करने के लिए महा भयानक युद्ध लड़ तो लिया लेकिन उन्हें का कहना सही हुआ 65 करोड़ पुरुष मारे गए और पूरे भूमंडल में स्त्रियां पुरुषों के अभाव में स्वच्छंद और दुराचारी हो गईं नतीजा हुआ ऐसे वर्णशंकर दोगली पीढ़ी पैदा हुई जिससे महाभारत काल के बाद दुनिया तहस-नस हो गई और दुनिया में राक्षसी शैतानी सभ्यताओं का जन्म हुआ महाभारत के युद्ध के पहले कोई सनातन धर्म के अलावा अन्य धर्म नहीं था।
इस महा भयानक ब्रह्मांड व्यापी युद्ध के बाद 65 करोड़ पुरुष मारे गए और क्रिश्चियन इस्लामिक यहूदी और पारसी तथा चीन के ताओ शिंतोधर्म का उदय हुआ और दुनिया भर में शक मलिक्छ हूणकिरात तुर्क मुसलमान किरात कबीला के लोग छा गए नकली धर्म गुरु लोगों ने नकली धर्म की स्थापना की है और आज इन्हीं नकली लोगों का बोलबाला है दुष्ट आधार में शैतान स्त्री पुरुष धन-धन संपत्ति आभूषण पद प्रतिष्ठा से भरे पड़े हैं और सच्चे सदाचारी स्त्री पुरुष किसी तरह अपने मान सम्मान को बचाकर जी रहे हैं।
एक बात और आपको बता दें कि वर्णशंकर और तो गाली संतान चाहे पेड़ पौधों की हो या गाय भैंस जानवरों किया मनुष्यों की वह बहुत तेज होते हैं लेकिन बहुत ही विनाशकारी धर्म मर्यादा सभ्यता से बिल्कुल रहित होते हैं क्योंकि उनका जन्म ही आचरण के विरुद्ध होता है इनका रहन-सहन खान पान इतना ऊंचा होता है कि सब कुछ नष्ट भ्रष्ट कर देते हैं उदाहरण के लिए जर्सी गाय या वर्णशंकर कुत्तों को ले लीजिए देश के 99% लोगों की औकात ही नहीं कि इनका खान पान वहन कर सके और कुछ समय बाद एक दो पीढ़ी के अंतर से बर्बाद हो जाते हैं यही बात देसी आम और कलमी आम के लिए भी सच है देसी आम सैकड़ो साल तक रहता है और पीढ़ी दर पीढ़ी वैसा ही रहता है जबकि कलमी आम का बीज आप लगा दे तो वह कलमी नहीं रह जाता है। इन्हीं सब कारण से आज पुरुष स्त्रियों को संतुष्ट करने योग्य और बच्चा पैदा करने लायक नहीं रहे और दूसरों के वीर्य से आईवीएफ से पैदा हुए बच्चे क्या करेंगे आप सभी जानते हैं ।
इसी तरह दोगली प्रजाति की मछलियां बाकी मछलियों को खा जाती है और आज स्वादिष्ट और पौष्टिक मछलियां कहीं पाई ही नहीं जाती हैं देसी गाय का घी अमृत होता है जबकि जर्सी गाय का घी बस नाम को भी होता है और उसके बछड़े किसी काम के नहीं होते यही गीता का सार है की अपना धर्म सर्वश्रेष्ठ होता है और दूसरे का धर्म भयानक होता है और वर्णसंकर्ता अर्थात दोगलापन दुनिया का सबसे बड़ा अभिशाप होता है जिसको आज तक लोग समझ नहीं पाए हैं इसीलिए आज नौकरी से प्रशासन और राजनीति व्यापार से लेकर खेल हर जगह वर्णशंकर दोगले लोगों का राज है बाकी आप स्वयं जांच करके देख सकते हैं जब तक डंकल का बीज नहीं आया था तब तक भारत में सब कुछ ठीक था और आज क्या स्थिति है लोग केवल पेट भरने के लिए खा रहे हैं और किसी भी अन्य में दूध में फल फूल वनस्पतियों में कोई स्वाद नहीं है।
इसी बात को सनातन धर्म के रक्षक विश्व के महानतम कवियों में से एक तुलसीदास जी ने भी लिखा है
मारग सो सो जाकहं जो भावा।
पंडित सोइ जो गाल बजावा।
जो बहू झूठ मसखरी जाना ।
कलयुग सो गुणवंत बखाना।
सौभागिनी विभूषण हीना।
विधवन के श्रृंगार नवीना।
जाकर नख सिख जटा विशाला।
सो प्रसिद्ध तापस कालिकाला।
नारि मरी घर संपत्ति नाशी।
मूड़ मुडाइ भये सन्यासी।
जो नहीं देखा नहीं सुना जो मनहूं न समाय।
सो सब देखिए कल युगहिं कुछ भी कहा न जाए।
इस प्रकार अंत में श्रीमद् भागवत के दो सबसे प्रमुख संदेश निकलकर सामने आते हैं पहले वर्ण सनकर्ता किसी भी देश समाज धर्म परिवार का सबसे बड़ा अभिशाप है और दूसरा स्वधर्म पर मर मिटना सबसे महान कार्य हैं और दूसरे का धर्म अपना लेना सबसे भयानक अभिशाप है बाकी संदेश सनातन धर्म की हर पुस्तकों में है लेकिन ऐसा संदेश कहीं नहीं है - डॉ दिलीप कुमार सिंह मौसम विज्ञानी ज्योतिष शिरोमणि एवं निदेशक