Friday, 16 December 2022

_क्रोध पाप का मूल है,क्रोध मिटावत मान।_* *_क्रोध कभी ना कीजिए, या में नरक निधान।।_*

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*_क्रोध पाप का मूल है,क्रोध मिटावत मान।_*
  *_क्रोध कभी ना कीजिए, या में नरक निधान।।_*
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_प्राचीन काल की बात है। किसी गांव में चंद्रभूषण नाम का एक विद्वान पंडित रहता था।_
     _उसकी वाणी में गजब का आकर्षण था। वह भागवत कथा सुनाने में निपुण था।_
      _उसकी वाणी से कथा का सार- सुनकर लोग मुग्ध हो जाते थे।_
     _इसीलिए उसके यहां पर रोज कथा सुनने वालों की भीड़ लगी रहती थी। दूर दूर से लोग चंद्रभूषण से भागवत कथा सुनने आते थे।_
   _उसी गांव में एक दूसरे पंडित जी भी रहते थे,नाम था-नंबियार। पढ़े लिखे तो बहुत थे,पर थे बहुत घमंडी और क्रोधी,स्वयं को बहुत बड़ा विद्वान समझा करते थे।_
 _सोचते थे,कहाँ  ये *कल का छोकरा- चंद्रभूषण!* जो अटक अटक कर कथा पढ़ता है,और *कहां मैं,शास्त्रों का मर्म जानने वाला विद्वान पंडित।*_ 
_किंतु जब भी नंबियार चंद्रभूषणश के घर के सामने से गुजरते- उसके श्रोताओं की भीड़ देखकर उनका मन ईर्ष्या से भर उठता।_
     _मन ही मन सोचते यह चंद्रभूषण क्या जादू करता है- कि इसके यहां दिनों दिन श्रोताओं की भीड़ बढ़ती जा रही है।_
   _ऐसे तो मेरी नाक नीची हो जाएगी। मुझे कुछ करना चाहिए।_
        _एक दिन की बात है-नंबियार थके हारे घर लौटे। भूख भी जोरों की लगी थी। लेकिन घर आकर देखा तो उसकी पत्नी दिखाई न दी।_
    _एक दो बार आवाज भी लगाई,मगर चुप्पी छाई रही। अचानक नंबियार का मन *आशंका से भर उठा* कहीं मेरी पत्नी चंद्रभूषण के यहां कथा सुनने तो नहीं चली गई?_
_*ईर्ष्या और क्रोध से नंबियार के नथुने फड़कने लगे।* एक-एक पल उन्हें हजार घण्टे के बराबर लगा।_
 _जब रहा ही नहीं गया,तो वह चंद्रभूषण के घर की आरे चल दिए।_
_*चंद्रभूषण के दरवाजे पर पहुंचकर नंबियार ठिठक गए।* वहां श्रोताओं की अपार भीड़ थी। *सब मंत्रमुग्ध* होकर कथा सुन रहे थे। नंबियार ने देखा *श्रोताओं के बीच उसकी पत्नी* भी बैठी है। बस, फिर क्या था। उनका क्रोध भड़क उठा।_
            _वह दनदनाते हुए चंद्रभूषण के आसन के पास पहुंच गए- और *चिल्लाकर बोले.. ”चंद्रभूषण!* तुम दुनिया के सबसे *बड़े मूर्ख हो-* और तुमसे *बड़े मूर्ख* ये सारे लोग हैं- जो यहां इकट्ठा होकर *तुम्हारी बकवास* सुन रहे हैं।“_
       _नंबियार की बात को सुनकर *चंद्रभूषण आश्चर्य* में पड़ गया।_
        _कथा बीच में ही छूट गई। सारे *श्रोता नंबियार को भला-बुरा कहते* हुए अपने अपने घर लौट गए।*घर पहुंचकर बाकी बचा गुस्सा नंबियार ने अपनी पत्नी* पर निकाला,और बोला *”क्या जरूरत थी, तुम्हें वहां जाने की?*_ 
_क्या मुझसे बड़ा विद्धवान है वो चंद्रभूषण....? मेरे पास शास्त्रों का भण्डार है। मगर तुम्हें कौन बताए- लगता है- तुम्हारी *खोपड़ी में तो बुद्धि ही नहीं है।“”*_
    _आज अपने पति के व्यवहार के कारण- पत्नी पहले से ही दु:खी थी- *तो पलटकर बोली- क्यों अपने मुंह मियां मिट्ठू बनते हो?* तुम ऐसे ही बड़े हो- तो *चंद्रभूषण की तरह इतने लोगों को इकट्ठा* करके दिखाओ। मैं तुम्हारे *ज्ञान* को मान लूंगी।_
_*मैं तो तुम्हारी जली कटी रोज सुनती हूँ।* पर अब तुम *दूसरों को भी अपमानित* करने लगे हो- तुम्हें कोई और काम नहीं *सिवा ईर्ष्या के।“* इतना कहकर तिलमिलाती हुई नंबियार की पत्नी भीतर चली गई।_
         _उस रात दोनों में से किसी ने भोजन नहीं किया। पत्नी तो थोड़ी देर में सो गई। पर *नंबियार की आंखों में नींद* नहीं थी। शाम की सारी घटना जैसे उनकी आंखों में तैर रही थी। रह-रह कर उसी घटना के बारे में सोचते रहे- *आखिर मैंने चंद्रभूषण का अपमान* क्यों किया?_
_वह जितना सोचते,उनकी बेचैनी उतनी ही बढ़ती जाती। बाहर काफी सर्दी थी,मगर गला सूखने के कारण वह बार-बार पानी पी रहे थे।_
          _यही बात सोचते सोचते- *नंबियार का सारा गुस्सा पश्चाताप में बदल गया।*_
     _ओह!! यह मैंने क्या किया? *मेरे मन में भगवान की भक्ति के नाम पर इतना द्वेष,इतना क्रोध-* और *चंद्रभूषण के स्वभाव में इतनी विनम्रता।* इतना अपमान सहने के बाद भी वह एक शब्द न बोला।_
      _जैसे ही भोर का तारा दिखा,नंबियार ने पश्चाताप प्रकट करने हेतु चंद्रभूषण के घर जाने के लिए दरवाजा खोला-_
     _उन्होंने देखा,चौखट के पास कोई आदमी कंबल ओढ़े बैठा है। वह जाड़े से सिकुड़ रहा था।_
        _जैसे ही *नंबियार ने कदम आगे बढ़ाया,वह उनके पैर छूने* के लिए आगे बढ़ा।”_ 
    _*यह क्या करते हो? कौन हो तुम?“*_
    _कहते हुए नंबियार पीछे हट गए। उस व्यक्ति को ध्यान से देखा।_ 
    _*सामने हाथ जोड़े खड़ा व्यक्ति-और कोई नहीं था- कथावाचक- "चंद्रभूषण " ही था।*_
    _जब तक नंबियार कुछ कहते,*चंद्रभूषण बोल उठा, ”आपने अच्छा ही किया, जो मेरा दोष* मुझे बता दिया।_
    _लेकिन लगता है,आप मुझसे अभी तक नाराज हैं। *मैं रात भर यहां बैठकर आपका इंतजार* करता रहा। शायद आप बाहर आएं- *और मैं आपसे क्षमा मांगूं।“*_
   _नंबियार तो पहले से ही लज्जित थे-_

         _उन्होंने *लपककर चंद्रभूषण को अपने गले से लगा लिया।* बोले, ”भाई!, दोष मेरा है तुम्हारा नहीं। *मैं घमंड में अंधा* हो गया था। तुमने *अपनी विनम्रता से मेरा घमंड चूर चूर कर दिया।* सच कहता हूँ-तुमने मेरी आंखें खोल दीं।_ 
_*वास्तव में यदि विनम्रता न हो तो ज्ञान भी नष्ट हो जाता है।“*_

*_🌸🌷 जय श्री राधे 🌷🌸_*


*_🪷🥀।।सीताराम।। 🥀🪷_*

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