Saturday, 20 June 2026

योग विज्ञान और योग दिवस-डॉ दिलीप कुमार सिंह

योग विज्ञान और योग दिवस-डॉ दिलीप कुमार सिंह 
योग भारत की विश्व को एक एक अद्भुत और अनुपम देन है जो आज संपूर्ण विश्व में फैल गया है इसका सर्वप्रथम उल्लेख विश्व के सबसे प्राचीनतम पवित्र ग्रंथ ऋग्वेद में किया गया है ‌ प्रत्येक भारती ग्रंथ और महाकाव्य और साहित्य में योग व्यायाम का वर्णन आवश्यक है रामायण महाभारत जैन और बौद्ध ग्रंथ उपनिषद ब्राह्मण आदरणीय और पुराण में इसका वर्णन है विश्व काव्य कामायनी में भी इसका भावपूर्ण वर्णन है। स्वामी विवेकानंद स्वामी रामतीर्थ महेश योगी धीरेंद्र ब्रह्मचारी आचार्य रजनीश ओशो रामदेव जैसे लोगों ने इसके प्रचार प्रसार में पूरे विश्व में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है इसका मुख्य और वैज्ञानिक स्रोत और ग्रंथ पतंजलि द्वारा किया गया है। 

योग का शाब्दिक अर्थ जोड़ना है यह हमको स्वास्थ्य से आत्मा को परमात्मा से जोड़कर गहरी ज्ञान की अंतिम अवस्था में एक बिंदु पर केंद्रित करें ईश्वर का दर्शन करता है एवं नियम आसन प्राणायाम प्रत्याहार धारणा ध्यान और समाधि इसकी आठ सदस्य आए हैं जिनको अष्टांग योग कहा जाता है आजकल इसके आसान अधिक प्रचलित हैं जबकि इसका अंतिम लक्ष्य ध्यान करके स्वयं को जानकारी ईश्वर का दर्शन प्राप्त करके मोक्ष को पाना है इसकी उपयोगिता और विश्व में प्रसार को देखते हुए 14 दिसंबर 2014 को संयुक्त राष्ट्र संघ के द्वारा इसको मान्यता दी गई और 21 जून को योग दिवस घोषित किया गया ध्यान रहे की 21 जून को उत्तरी गोलार्ध में सबसे बड़ा दिन और सबसे छोटी रात होती है। 


योग धीरे-धीरे प्राप्त किया जाता है इसमें वह वस्तुओं से धीरे-धीरे ध्यान हटाकर पीएम के बाद नियम अर्थात अनुशासन इत्यादि को ग्रहण करते हुए प्राणायाम अर्थात सांस को अंदर बाहर ले जाने पर नियंत्रण करना होता है और प्रत्याहार में इस पर पूर्ण नियंत्रण करके गहरी ज्ञान की अवस्था में सभी बाहरी चीजों से मन को हटाते हुए अपने चरित्र को एक निश्चित धरना बिंदु पर केंद्रित करके गहन समाधि की अवस्था प्राप्त करके कुंडलिनी शक्ति जागृत करते हुए सहस्त्रार चक्र से झरने वाले अमृत की बूंद का पान करते हुए दिव्य निनाद अर्थात  रसपान किया जाता है।

योग बहुत ही व्यापक है यह आत्मा को परमात्मा से मिलना है व्यक्ति को विभिन्न आसनों के द्वारा शक्तिशाली और स्वस्थ बनाकर उसके जीवन के लक्ष्य की ओर ले जाता है और**जीवेत ‌ शरदं शतं **की सार्थकता स्वीकार करताहै।

‌**योग कर्मसु कौशलम्** ‌ अर्थात कार्य की सर्वोच्च कुशलता को ही योग कहा जाता है यह मानवता को विकसित करके प्रकृति की शक्तियों से साक्षात्कार करते हुए मानव को शक्तिशाली बन कर उसको सृजनात्मक बनता है जबकि पाश्चात्य और अब देश शक्ति और हिंसा को सर्वोच्च मन कर विनाश लीला प्रस्तुत करते हैं और दुनिया को विनाश के कगार पर ले जाते हैं अब यूरोप अमेरिका के अलावा अरब के अधिकांश मुस्लिम देशों ने भी योग को न केवल मान्यता दिया है अपितु इसको अपना लिया है। 

योग का प्रचार प्रसार और विज्ञापन करके अरबों रुपए फूंकने से अच्छा है ‌ कि इस पर धरातल से काम करते हुए लोगों को इसका महत्व समझाते हुए व्यक्ति को कर्म योगी बनाया जाए योग केवल आसान व्यायाम ही नहीं है इसमें कर्म योग भक्ति योग ज्ञान योग सहित सभी योग आ जाते हैं और योग स्वयं भगवान शिव के द्वारा पैदा हुआ है इसलिए वह भी उनका एक रूप है इसलिए विश्व योग दिवस पर विश्व के सभी लोगों को यह संकल्प लेना चाहिए कि वह कोई भी एक योग्य की प्रक्रिया अपना कर स्वस्थ बनाकर स्वयं को जानते हुए ईश्वरी सत्ता की तरफ बढ़ते हुए मोक्ष अर्थात मुक्ति को प्राप्त करेंगे।

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