Friday, 16 December 2022

चीन पर चर्चा*👉(1) *हिरासत में मौत*

👇👇👇👇👇👇👇👇  मौत*
👉(2) *चीन पर चर्चा*

👉(1) *हिरासत में मौत*
👉 *पुलिस को समझना होगा कि वह मानवधिकारों की रक्षा के लिए है,, न की उल्लंघन के लिए*!!
👉 *सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक फैसले में कहा था कि हिरासत में मौत या पुलिस की बर्बरता कानून शासित राज्यों में सबसे बड़ा अपराध है!! कानपुर में पुलिस हिरासत में पिटाई से व्यापारी बलवंत सिंह की मौत ने भी पुलिस  के बर्बर चेहरे को उजागर किया है!! सिर्फ संदेह के आधार पर किसी को थाने लाकर रखना और पूछताछ के दौरान इतनी प्रताड़ना देना कि मौत हो जाए, पुलिस की निरंकुशता का परिचायक है!! सिर्फ इतना ही नहीं पुलिस ने इसके बाद मामले को दबाने की कोशिश की और मौत का कारण हृदयाघात साबित करने का कुचक्र रचा!! लेकिन पोस्टमार्टम रिपोर्ट में 22 चोटों से सच सामने आ ही गया!! बाद में स्पेक्टर समेत 11 पुलिसकर्मियों को निलंबित कर मुकदमा जरूर दर्ज किया गया,, लेकिन यह घटना बताती है कि कुछ थानों में कार्यशैली में जरा भी बदलाव नहीं आया है!! पुलिस को मानवधिकारों की कोई चिंता नहीं है और वह अपनी मनमानी करने में तनिक भी नहीं हिचकती!! आमतौर पर इस तरह के मामलों को पुलिस अपने ढंग से तोड़- मरोड़ कर पेश करने में सफल भी हो जाती है क्योंकि घटना का स्थल थाने के भीतर होता है?! और दूसरे पुलिसकर्मी भी आरोपीतो का सहयोग करते हैं*!!
👉 *पुलिस स्टेशनों में मानवधिकारों का उल्लंघन गंभीर बात है और इस पर कड़े कदम उठाए जाने चाहिए!! उत्तर प्रदेश की पुलिस पर एक बड़ा कलंक यह भी है कि हिरासत में मौत की सबसे अधिक घटनाएं यहां होती है!! मानवधिकार आयोग की रिपोर्ट के अनुसार उत्तर प्रदेश में 2021-22 में हिरासत में कुल 501 मौतों के मामले दर्ज हुए थे!! कानपुर से सटे फतेहपुर में ही 2 माह पहले पुलिस हिरासत में सत्येंद्र नामक युवक की मौत हो चुकी है!! लोगों को संविधान का  कवच  मिलने के बाद भी थानों में शोषण, उत्पीड़न, और मौत की घटनाएं चिंताजनक है!! हिरासत में लिए गए व्यक्ति के भी कुछ अधिकार होते हैं,, लेकिन शायद ही किसी थाने में उनका पालन होता हो!! यहां तक कि परिवार को जानकारी देना तक उचित नहीं समझते!! पुलिस को समझना होगा कि वह मानवधिकारों की रक्षा के लिए है,, न कि उल्लंघन के लिए*!!

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👉 (2) *चीन पर चर्चा*
👉 *चीन को उसकी औकात दिखाने का समय*
👉 *हमें बार-बार रक्षात्मक रवैया छोड़, अब आक्रमक रवैया अपनाना चाहिए*
👉 *तवांग में चीनी सेना के साथ झड़प के बाद जब देश दुनिया की निगाहें भारत की ओर हैं!! तब चीन से निपटने को लेकर संसद में हंगामा होना अच्छी बात नहीं!! यह विचित्र है कि जब देश के राजनीतिक नेतृत्व को एकजुटता का प्रदर्शन करते हुए दिखना चाहिए,, तब वह बिखरा हुआ दिख रहा है!! स्पष्ट है कि चीन और अन्य भारत विरोधी शक्तियां इसका लाभ उठाने की कोशिश कर सकती हैं!! निसंदेह  तवांग में चीनी सैनिकों के साथ हुई मुठभेड़ को लेकर विपक्ष के कुछ सवाल हो सकते हैं और वह यह भी कह सकता है कि रक्षा मंत्री के वक्तव्य से उसकी जिज्ञासा का समाधान नहीं हुआ,, लेकिन अपने सवालों का जवाब जानने के लिए संसद में सरकार को कटघरे में खड़ा करने और उसकी कोशिश से दुनिया और विशेष रूप से चीन को कोई सही संदेश नहीं जाएगा!! सत्तापक्ष के साथ विपक्ष को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि घरेलू राजनीति के चलते विश्व समुदाय को ऐसा कोई संदेश  न जाए कि भारत चीन से निपटने को लेकर एकमत नहीं अथवा वह उसके खिलाफ डटकर नहीं खड़ा है!! उचित यह होगा कि इस मामले में तू- तू मैं - मैं की राजनीति से बचा जाए!! जहां विपक्ष को यह समझना होगा कि यह ऐसा विषय नहीं,, जिसमें सरकार को कटघरे में खड़ा करने की कोशिश की जाए,, वही सत्ता पक्ष को भी यह देखना होगा कि वह विपक्षी दलों को कैसे संतुष्ट करें*!!
👉 *यदि रक्षा - सुरक्षा मामलों में गोपनीयता के चलते चीन को लेकर संसद में खुली चर्चा नहीं हो सकती तो फिर अलग से सर्वदलीय बैठक तो की ही जा सकती है!! इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि गलवन में चीनी सेना से खूनी मुठभेड़ के बाद सर्वदलीय बैठक हुई थी!! सर्वदलीय बैठक के जरिए देश की जनता को भी सही सूचना देने में मदद मिलेगी!! यह समझा जाना चाहिए कि आज के इस युग में जब सूचनाओं पर विशेष महत्व है,, तब सरकार को हर स्तर पर सूचना युद्ध से निपटने के लिए तैयार रहना चाहिए!! यह ध्यान रहे कि चीन सूचना युद्ध में माहिर है!! डॉकलाम में गतिरोध और गलवन में मुठभेड़ के बाद उसने इस युद्ध का सहारा भी लिया था!! वास्तव में जितना जरूरी सीमा पर चीनी सेना की हरकतों का मुंहतोड़ जवाब देना है!! उतना ही उसे सूचना युद्ध में मात देना फिर यह तब संभव हो पाएगा,, जब पक्ष- विपक्ष एकजुट दिखेंगे!! इससे खराब बात और कोई नहीं हो सकती कि चीन से लगती सीमा की स्थिति जानने के नाम पर विपक्षी दल अपनी अलग खिचड़ी पकाते नजर आए!! कांग्रेस अध्यक्ष मलिकार्जुन खरगे ने चीन के मसले पर सरकार को घेरने के लिए जिस तरह 17 राजनीतिक दलों की अलग से बैठक बुलाई,, वह राष्ट्रीय हित से अधिक दलगत हितों को महत्व देने वाली राजनीति है*!!

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