Collegium: Law of the Land? कब पास किया संसद ने? सरकार पर “सुप्रीम” हमला। उपराष्ट्रपति को भी कह दिया, “जुबान सम्हाल कर बोलो”
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कल हिमाचल प्रदेश और गुजरात चुनाव के नतीजे आने के बाद पार्टी कार्यकर्ताओं को बड़ी सौम्यता से सलाह दी, “बढ़ानी होगी सहनशीलता, अब बढ़ेंगे हमारे ऊपर हमले” लोग समझ रहे हैं वो केवल राजनीतिक हमलों की बात कर रहे थे, लेकिन वो हर क्षेत्र से हमलों की बात कर रहे थे जिसमें न्यायपालिका भी शामिल है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता को पचाना विपक्ष के लिए ही नहीं सुप्रीम कोर्ट के जजों के लिए भी कठिन हो रहा है, जिस दिन गुजरात में मोदी ने चुनाव में सभी रिकॉर्ड तोड़ दिए, उसी दिन सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस संजय किशन कौल, एएस ओका और विक्रमनाथ ने सरकार पर जबरदस्त हमला करते हुए कहा कि Collegium: Law of the Land है और इसका अनुपालन होना ही चाहिए।
एक दिन पहले उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ जी का राज्यसभा में सुप्रीम कोर्ट पर NJAC को ख़ारिज करने के फैसले पर कही गई बातें जजों को हजम नहीं हुई और उसके पहले कानून मंत्री किरेन रिजिजू भी कॉलेजियम को Alien कानून बता चुके हैं। SCBA के अध्यक्ष विकास सिंह ने इन टिप्पणियों पर बोलते हुए कहा कि “जो लोग संवैधानिक पदों पर बैठे हैं वो कह रहे हैं कि सुप्रीम कोर्ट को Judicial Review का अधिकार नहीं है ये तो संविधान का Basic stucture है। इस पर जस्टिस कौल ने कहा कि कल को लोग कहेंगे Basic Structure भी संविधान का हिस्सा नहीं है।
जजों का क्रोध देखिये कि जस्टिस विक्रम नाथ ने विकास सिंह की बातें सुनकर AG से कहा, “You have to advise them to control their... (Mr Singh is referring to the speeches... which is not very good for... Making Comments on Supreme Court Collegium is not very well taken” इन शब्दों का मतलब साफ़ था कि “वो जुबान सम्हाल कर बोलें” (उपराष्ट्रपति के लिए ऐसे शब्द कहेंगे मीलार्ड)
जस्टिस कौल एक बात का जवाब तो आपको देना कि Collegium: Law of the Land कैसे हो गया। यह केवल सुप्रीम कोर्ट का बनाया हुआ असंवैधानिक System है जिसका उल्लेख संविधान में कहीं नहीं है और सुप्रीम कोर्ट के बनाए हुए ऐसे नियम को Law of the Land नहीं कहा जा सकता। कानून बनाने का अधिकार केवल संसद को है और संसद ने कॉलेजियम नहीं बनाया जिसे आप Collegium: Law of the Land कह रहे हैं। यह ध्यान रखना चाहिए सामने बैठा व्यक्ति कानून मंत्री है और उपराष्ट्रपति है जो आम जनता में नहीं आते। जजों में स्वयं भी कुछ सहनशीलता होनी चाहिए, ऐसा कह हो सकता है कि आप किसी के लिए कुछ भी कह देंगे, उपराष्ट्रपति को भी आप कह देंगे। जुबान सम्हाल कर बोलिए मगर आपको कोई कुछ न बोले।
जस्टिस कौल ने यहाँ तक कहा कल कोई भी व्यक्ति कह सकता है कि वो ये कानून नहीं मानेगा और वो कानून मानेगा, इस तरह तो Breakdown हो जायेगा। मगर मीलार्ड ये प्रथा तो आपकी अदालत ने ही शुरू की है। कृषि कानूनों को आपने रोक दिया, कमिटी बना दी और रिपोर्ट दबा कर बैठ गए। मगर किसान को सड़कों पर बैठने दिया और लालकिले पर हमला करने दिया। शाहीन बाग में CAA के खिलाफ आपने किसी को नहीं रोका चाहे कोरोना फैलता रहा। लखनऊ में दंगाइयों को technical ground पर अदालत ने छोड़ दिया।
इतना ही नहीं संसद द्वारा पास किया गया CAA का कानून केरल और राजस्थान सरकार ने लागू करने से मना कर दिया और आपने उस याचिका पर फैसला नहीं किया। ऐसे ही कई राज्यों ने लागू करने से मना किया है।
कॉलेजियम में बदलाव समय की मांग है। केंद्र सरकार को चाहिए वो अब भी आपके 2015 के फैसले को संसद में पलट दे जिससे NJAC लागू हो अन्यथा एक नया कानून बने जिसमें जजों की नियुक्ति के लिए सारी पवार केंद्र सरकार के पास हो। आज जितना बेलगाम बोल रहे हैं सुप्रीम कोर्ट के जज, उतना बोलने की हिम्मत कभी इंदिरा गांधी के समय में की थी क्या?
Credit--: सुभाष चन्द्र यह लेखक के निजी विचार हैं इनसे ब्लॉक के संपादक का कोई लेना देना नहीं है, सहमत होना आवश्यक नहीं है।
MANISH KHATRI
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