Sunday, 21 June 2026

मंदिर में दान की चोरी की खबर आई तो कुछ लोग हैरान हो गए। मानो चोर ने सीधे भगवान के घर में हाथ डाल दिया हो। लेकिन सच पूछिए तो हैरानी चोरी पर नहीं, हैरानी इस बात पर होनी चाहिए कि अब भी लोग हैरान हो रहे हैं।

मंदिर में दान की चोरी की खबर आई तो कुछ लोग हैरान हो गए। मानो चोर ने सीधे भगवान के घर में हाथ डाल दिया हो। लेकिन सच पूछिए तो हैरानी चोरी पर नहीं, हैरानी इस बात पर होनी चाहिए कि अब भी लोग हैरान हो रहे हैं।
हम बड़ा दिलचस्प समाज हैं। भगवान को सर्वशक्तिमान भी मानते हैं और उनके घर पर सीसीटीवी, ताले, गार्ड और ऑडिट भी लगाते हैं। यानी श्रद्धा भी पूरी और अविश्वास भी पूरा।
कहते हैं लोग भगवान से डरते हैं। अगर ऐसा होता तो दानपात्र पर ताला नहीं, फूल-माला लगी होती। सच तो यह है कि इंसान भगवान से कम, थाना-पुलिस और कोर्ट-कचहरी से ज्यादा डरता है। जहां एफआईआर का खतरा हो, वहां चरित्र जाग जाता है। जहां सिर्फ भगवान देख रहे हों, वहां आदमी अपने असली रूप में आ जाता है।
मजेदार बात यह है कि चोरी करने वाला भी शायद पूजा-पाठ करता होगा। सुबह आरती, शाम भजन, और बीच में अवसर मिले तो भगवान की गुल्लक पर भी हाथ साफ। हमारे यहां पाप करने और क्षमा मांगने के बीच का अंतराल कई बार चाय के एक कप से भी कम होता है।
धर्म के बाजार में सबसे ज्यादा बिकने वाली चीज़ "भय" है। बचपन से बताया जाता है कि भगवान सब देख रहा है। लेकिन जैसे ही नोटों से भरा दानपात्र सामने आता है, आदमी को भरोसा हो जाता है कि आज शायद भगवान कहीं और देखने में व्यस्त हैं।
असल में भगवान से लोग डरते नहीं, भगवान का नाम लेकर दूसरों को डराते हैं। खुद पर बात आए तो पूरा दर्शन बदल जाता है। यही कारण है कि मंदिरों में दान बढ़ता जाता है और ताले भी मोटे होते जाते हैं। श्रद्धा और सुरक्षा, दोनों साथ-साथ बढ़ रही हैं और शायद यही इस घटनाओं का सबसे बड़ा व्यंग्य है। जिस भगवान के भरोसे लोग अपनी जिंदगी छोड़ देते हैं, उसी भगवान के पैसे की सुरक्षा के लिए उन्हें इंसानों पर भरोसा नहीं होता।

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