Wednesday, 14 December 2022

दशम पिता श्री गुरु गोबिंद सिंह साहब जी के 52 हुक्मनामें ( उपदेश )*

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*🚩🔷 भाग - 1🚩🔷*

*🚩🔷दशम पिता श्री गुरु गोबिंद सिंह साहब जी के 52 हुक्मनामें ( उपदेश )*

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*🚩🔷सन् 1699 में श्री गुरु गोबिंद सिंह साहब जी  ने खालासा पंथ की स्थापना की, उन्होने मुगलो के खिलाफ अनेकों युद्ध लड़े और अपने परिवार को इन युद्धों मे बलिदान कर दिया और स्वयं भी मुगल शासकों के अन्याय के खिलाफ लड़ते हुए शहीद हो गए।* 

*🚩🔷गुरु गोबिंद सिंह जी  एक लेखक और कवि भी थे। उन्होने कई ग्रंथों की रचना भी की उन्हे कई भाषाओं का ज्ञान था, यही नहीं उन्‍होंने गुरु ग्रंथ साहिब जी को पूर्ण भी किया था। उन्होंने ही पवित्र श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी को सिख धर्म का स्थायी गुरु घोषित किया था।*

*🚩🔷आज  हम आपको बता रहे हैं श्री गुरु गोबिंद सिंह जी के उपदेशों के बारे में, जिन्हें हुकुमनामा कहते है। हुकुमनामा में गुरु गोबिंद सिंह जी के 52 हुकुम  लिखे गए है। हुकुम मतलब उपदेश, जिन्हे हर मनुष्य को अपने जीवन में अपनाने चाहिए।*  

*1) 🚩🔷धर्म दी किरत करनी – ईमानदारी से काम करना।* 

*2) 🚩🔷दसवंद देना – अपनी कमाई का दसवाँ हिस्सा दान मे देना।*

*3) 🚩🔷गुरबाणी कंठ करनी – गुरबाणी (गुरु की बाणी) याद करनी।*

*4) 🚩🔷अमृत वेले उठना – सुबह सूरज निलने से पहले उठना।*

*5) 🚩🔷सिख सेवक दी सेवा रूचि नाल करनी – पूरी श्रद्धा से गुरूसिक्खों की सेवा करनी।*

*6) 🚩🔷गुरुबाणी दे अर्थ सिख विद्वाना तो पढ़ाने – गुरसिखों से गुरबाणी के अर्थ समझने।*

*7) 🚩🔷पंज ककार दी रेहत दिरीह कर रखनी – पाँच ककार (कड़ा,कच्छा,कृपाण,केस,कघां) की मर्यादा मेँ रहना और सख्ती से पालन करना।*

*8)🚩🔷 शबद दा अभिहास करना – जीवन में शबद (गुरबानी) का अभ्यास करना।*

*9) 🚩🔷सत स्वरुप सतगुर दा ध्यान धरना – सच्चे गुरु (भगवान) का ध्यान करना।*

*10) 🚩🔷गुरु ग्रंथ साहिब जी नू गुरु मानना – श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी को गुरु मानना।*

*11) 🚩🔷कारजां दे आरम्भ विच अरदास करनी – सभी कार्य की शुरुआत में अरदास करनी।*

*12) 🚩🔷जन्म, मरण, जा उस विआह मोके जपजी दा पाठ कर, तिहावाल (कड़ा प्रसाद) कर, आनंद साहिब दे पंज पौरिआं, अरदास, प्रथम पंज प्यारे ते हजूरी ग्रंथी नू वरत के संगत नू वार्ताओना – जन्म, मृत्यु, या विवाह समारोहों (आनंद कारज) में, जपजी साहिब का पाठ करें, कड़ा प्रसाद बनाएं, आनंद साहिब के पांच श्लोक करें, अरदास करें, और फिर पंज प्यारे, हजूर ग्रंथी और फिर संगत को कराह प्रसाद वितरित करें।*

*13) 🚩🔷जब तक कड़ा प्रसाद वरतदा रहे साद संगत अडोल बैठे रहे – जब तक कड़ा प्रसाद बाँटते रहें सारी साद संगत बिना हिले डुले बैठ रहे।*

*14)🚩🔷 आनंद विआह बिना ग्रहस्त नहीं करना – विवाह (आनंद कारज) के बिना वैवाहिक जीवन की शुरुआत नहीं करनी।*

*15) 🚩🔷पर स्त्री, माँ, बहन, धी, कर जानी। पर स्त्री द संग नहीं करना। – अपनी पत्नी के अलावा सभी औरतों को माँ, बहन, बेटी के रूप में देखना है। पराई स्त्री के साथ वै वाहिक सम्बन्ध नहीं रखना।*

*16) 🚩🔷स्त्री दा मुँह नहीं फटकारना – स्त्री का सम्मान करना, उसे दुत्कारे नहीं।*

*17)🚩🔷 जगत जूठ तम्बाकू बिखिआ दा तिआग करना – संसार के झूठ, तम्बाकू, जहर का सेवन नहीं करना। इन सबका त्याग करना।*

*18)🚩🔷 रेहतवान आते नाम जुपन वाले गुरसिखा दी संगत करनी – रेहत का पालन करने वाले और वाहेगुरु का नाम ध्यान करने वाले सिक्खो की संगत करनी।*

*19)🚩🔷 कम करन विच दरीदार नहीं करना – काम करने में आलस नहीं दिखानी।*

*20)🚩🔷 गुरबाणी दी कथा ते कीर्तन रोज सुनने ते करने – प्रतिदिन कीर्तन और गुरबाणी (गुरु की बाणी) प्रवचन सुनें और करें।*

*21) 🚩🔷किसे दी निंदा, चुगली, अते इरखा नहीं करनी – किसी भी व्यक्ति की निंदा, चुगली या ईर्ष्या नही करनी।*

*22) 🚩🔷धन, जवानी ते कुल जात दा अभिमान नहीं करना – धन दौलत जात पात व यौवन का घमंड नहीं करना। सब लोगों में आपसी भाईचारा होने चाहिए।*

*23) 🚩🔷मत ऊंची ते सुचि रखनी – अपने विचार तथा अपनी सोच हमेशा ऊंची व साफ़ रखना।*

*24) 🚩🔷शुभ कर्मन तो कदे ना कतराना – हमेशा शुभ कार्य करते रहे, नेक कार्य करने से परहेज न करें।*
 
 *25)🚩🔷 बुद्ध बल दा दाता वाहेगुरु नू जानना – भगवान (वाहेगुरु) को बुद्धि और शक्ति के दाता (मालिक) के रूप में जानना।*

*26) 🚩🔷सोगन्ध (कसम साहू) दे कर इतबार जनाओँ वाले ते यकीन नहीं करना – उस व्यक्ति पर विश्वास न करें जो कसम खाता है। जो मनुष्य किसी को ‘कसम या सौगंध’ के साथ मनाने की कोशिश करता है ऐसे व्यक्ति पर विश्वास नहीं करना।*

*🚩🔷वाहेगुरु जी दी खालसा*
*🚩🔷वाहेगुरु जी दी फतह*

*🚩🔷कल भी जारी रहेगा -------*

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