देव शयनी एकादशी -डॉक्टर दिलीप कुमार सिंह
देव शयनी एकादशी -डॉ दिलीप कुमार सिंह मौसम विज्ञानी ज्योतिष शिरोमणि
सनातन धर्म दुनिया का सबसे प्राचीन सबसे वैज्ञानिक और सबसे प्रगतिशील धर्म है यहां पर प्रकृति पर्यावरण और जीव जगत का एक दूसरे से अभिन्न संबंध है हर महीने बहुत से व्रत पर्व त्यौहार ग्रह नक्षत्र के अनुसार पड़ते ही रहते हैं जिनका वैज्ञानिक महत्व है इसी क्रम में आषाढ़ माह की शुक्ल पक्ष एकादशी को पड़ने वाला देवशयनी महापर्व की एक बहुत प्रसिद्ध पर्व है इसको हरि शयनी महापर्व भी कहा जाता है यह महापर्व सृष्टि के पालनकर्ता भगवान श्री हरि विष्णु को समर्पित है जो आषाढ़ शुक्ल पक्ष 11से लेकर अगहन मास शुक्ल पक्ष दशमी तक 4 महीने तक योग निद्रा में सोते रहते हैं और फिर कार्तिक शुक्ल पक्ष एकादशी के दिन जागते हैं इसलिए उसी दिन को देव उठनी या हरि उठनी एकादशी का व्रत रहते हैं कहीं-कहीं इसको जुठवन भी कहा जाता है।
ग्रह नक्षत्र पंचांग के अनुसार जब सूर्य मिथुन राशि में आते हैं तब यह महापर्व प्रारंभ हो जाता है और जब सूर्य तुला राशि में कार्तिक माह में आते हैं तब 4 महीने की योग निद्रा भगवान श्री हरि विष्णु की समाप्त हो जाती है इसी दिन महान आतताई असुर शंखासुर मारा गया था और उसका विनाश करके श्री हरि विष्णु चार महीने की लंबी योग निद्रा में लीन हुए थे तभी से यह व्रत चला आ रहा है।
इस बारे में एक और कथा है सतयुग में संपूर्ण पृथ्वी जीतने वाले महान सम्राट मांधाता के राज्य में एक बार तीन वर्ष का महान अकाल और सूखा पड़ गया जब मांधाता ने इसका कारण जानना चाहा तो महर्षि अंगिरा ने कहा कि राज्य में धर्म विरुद्ध ढंग से एक शूद्र तपस्या कर रहा है उसको मार दिया जाए तो यह अकाल और सूखा खत्म हो सकता है लेकिन सम्राट मांधाता ने इसको स्वीकार नहीं किया और दूसरा उपाय पूछा तब ब्रह्म ऋषि अंगिरा ने उन्हें एकादशी व्रत करने को कहा जिसके फलस्वरुप चारों ओर घनघोर वर्षा हुई और जन जीवन सुखी हो गया तब से लेकर आज तक यह व्रत लगातार चल आ रहा है।
सनातन धर्म बहुत ही सरल प्राकृतिक और मानवता का धर्म है जिसको हर कोई अपना सकता है इसमें व्रत पूजा पाठ यज्ञ हवन अनुष्ठान सरल से सरल है और कठिन से कठिन भी है कठिन उनके लिए है जो ऋषि मुनि तपस्वी या धर्म के आचार्य हैं और गृहस्थ जीवन के लिए बहुत सरल है इस दिन सुबह स्नान ध्यान करके भगवान श्री हरि विष्णु की सोने चांदी तांबे किसी एक प्रतिमा को स्नान कर कर सफेद तकिया और चादर बिछाकर फूल माला धूप दीप के साथ सोने के लिए रख दिया जाता है जो 4 महीने तक लगातार सोते हैं इन चार महीनों में सृष्टि की देखभाल भगवान शिव और माता पार्वती करती हैं यदि देवउठनी एकादशी को करने वाला व्यक्ति अपनी बुराई पाप छोड़कर सदाचार अपना ले और तामसी भोजन से दूर रहे जन कल्याण और मानवता के कार्य में लगा रहे तो उसकी न केवल मनोकामना पूरी होती है बल्कि भगवान श्री हरि विष्णु और माता महालक्ष्मी के दर्शन भी हो जाते हैं।
लेकिन धर्म और आध्यात्मिक के अलावा इस व्रत का सबसे बड़ा वैज्ञानिक और दार्शनिक पक्ष भी हैं जो प्रकृति और पर्यावरण के अनुकूल है इन चार महीनों में किसी भी प्रकार के मांगलिक और शुभ कार्य करने के लिए वर्जित किया गया है ।यद्यपि आजकल खरीदे गए धर्माचार्य और ज्योतिषी इस कालखंड में अनेक कार्यों को करने की अनुमति देते हैं लेकिन यह पूरी तरह से धर्म विज्ञान और दर्शन के विरुद्ध हैं ऐसा नहीं करना चाहिए अन्यथा उसका फल विनाशकारी होता है ।
इस कालखंड में होने वाले विवाह मांगलिक कार्य किसी भी प्रकार की खरीद फरोक्त कभी सफल नहीं होती है जिस तरह से धन्वंतरि की जयंती को बर्तन और सोना चांदी वाहन की खरीद से जबरदस्ती जोड़ दिया गया है और अक्षय तृतीया को भी इसी प्रकार से गलत ढंग से जोड़ा गया है जो पूरी तरह गलत है इसलिए किसी भी प्रकार से शुभ मांगलिक कार्य करने से बचें जो करना चाहता है उसे करने दें।
4 महीने श्री हरि विष्णु के योग माया में सोने और सभी शुभ मांगलिक कार्य को वर्जित करने का वैज्ञानिक और लोक हित में सबसे बड़ा कारण है कि इन चार महीनों में घनघोर बरसात होती है चारों तरफ पानी ही पानी रहता है रास्ते डूब जाते हैं चारों ओर खतरनाक और विषैला जीव जंतु सांप बिच्छू फैल जाते हैं जिनके काटने का डर होता है वातावरण में नकारात्मक ऊर्जा फैल जाती है सूर्य का प्रकाश और गर्मी बहुत कमजोर हो जाता है और व्यक्ति की पाचन शक्ति भी बहुत क्षीण हो जाती है सूर्य भी दक्षिणायन हो जाता है और विवाह के मंगल कारक शुक्र और बृहस्पति ग्रह भी अस्त रहते हैं या प्रभाव नहीं देते हैं व्यावहारिक रूप से भी इस समय शुभ विवाह और शुभ मांगलिक कार्य करना प्रकृति और विधि के विरुद्ध है इस समय अग्नि जलाने में बहुत कठिनाई होती है और सूखी लकड़ी सूखे उपले मिलना भी बड़ा मुश्किल होता हैऔर खुले में यज्ञ हवन होता है जो बरसात में संभव नहीं हो सकता इसलिए बड़ी ही कुशलता से धर्म और लोक व्यवहार तथा विज्ञान सम्मत ढंग से इस समय समस्त शुभ और मांगलिक कार्यों को वर्जित किया गया है जो बिल्कुल सही है ।
आज इतनी सुविधा होने के बाद भी इन चार महीनों में शुभ कार्य और मांगलिक कार्य करना संभव नहीं है वह प्रकृति के द्वारा बाधित हो जाता है वातावरण में भी चारों ओर जीवाणु कीटाणु विषाणु रोगाणु फैले रहते हैं और भोजन फल फूल बहुत जल्दी खराब होता है इस समय पूजा सामग्री हवन सामग्री विभिन्न प्रकार की जड़ी बूटियां और पुष्प तथा अन्य चीज मिल पाना बहुत कठिन होता है इसलिए इस समय पूरे सावन महीने भर भगवान शिव की पूजा अर्चना होती है जिससे वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा फैलती है जिससे सांप बिच्छू और विषैले जीव जंतु ग्रामीण स्थान और मानव निवास स्थान से दूर हो जाते हैं और इस समय उपलब्ध बेल के पत्र से मुख्य पूजा की जाती है बेल के पत्र दूध शहद घी गन्ने के रस घी का मिट्टी से बने शिवलिंग पर अभिषेक करने से उसका पानी जल को शुद्ध करता है और उसकी सुगंध हानिकारक जीवाणु को मार कर खतरनाक विषैली चीजों को बाहर भगा देती है इन सभी वैज्ञानिक कर्म से ही चार महीने जब तक भगवान श्री हरि विष्णु योग निद्रा से जाग नहीं जाते हैं तब तक शुभ और मांगलिक कार्य संपन्न होना निषेध किया गया है ।
इस प्रकार हरिशयनी एकादशी या पद्मा एकादशी बहुत ही शुभ फल देने वाला महापर्व है और इस व्रत को विधि विधान से करने वालों की वे सभी इच्छाएं पूरी होती हैं जिनके वह पात्र होते हैं इतना अवश्य है कि उन्हें पवित्र होकर सदाचार पूर्वक पाप और बुराई छोड़ते हुए इस अनुष्ठान को करना चाहिए। बुराई और पाप पूर्ण ढंग से किया गया कोई भी व्रत पूजा पाठ यज्ञ हवन अनुष्ठान कभी भी सफल नहीं हो सकता है।
सनातन धर्म दुनिया का सबसे प्राचीन सबसे वैज्ञानिक और सबसे प्रगतिशील धर्म है यहां पर प्रकृति पर्यावरण और जीव जगत का एक दूसरे से अभिन्न संबंध है हर महीने बहुत से व्रत पर्व त्यौहार ग्रह नक्षत्र के अनुसार पड़ते ही रहते हैं जिनका वैज्ञानिक महत्व है इसी क्रम में असर माह की शुक्ल पक्ष एकादशी को पड़ने वाला देवशयनी महापर्व की एक बहुत प्रसिद्ध पर्व है इसको हरि शयनी महापर्व भी कहा जाता है यह महापर्व सृष्टि के पालनकर्ता भगवान श्री हरि विष्णु को समर्पित है जो स्थिति से लेकर 4 महीने तक योग निद्रा में सोते रहते हैं और फिर कार्तिक शुक्ल पक्ष एकादशी के दिन जागते हैं इसलिए उसी दिन को देव उठनी या हरि उठनी एकादशी का व्रत रहते हैं कहीं-कहीं इसको जुठवन भी कहा जाता है
ग्रह नक्षत्र पंचांग के अनुसार जब सूर्य मिथुन राशि में आते हैं तब यह महापर्व प्रारंभ हो जाता है और जब सूर्य तुला राशि में कार्तिक माह में आते हैं तब 4 महीने की योग निद्रा भगवान श्री हरि विष्णु की समाप्त हो जाती है इसी दिन महान आतताई असुर शंखासुर मारा गया था और उसका विनाश करके श्री हरि विष्णु चार महीने की लंबी योग निद्रा में लीन हुए थे तभी से यह व्रत चला आ रहा है। इस बारे में एक और कथा है सतयुग में संपूर्ण पृथ्वी जीतने वाले महान सम्राट मांधाता के राज्य में एक बार तीन वर्ष का महान काल और सूखा पड़ गया जब मांधाता ने इसका कारण जानना चाहा तो महर्षि अंगिरा ने कहा कि राज्य में धर्म विरुद्ध ढंग से एक शूद्र तपस्या कर रहा है उसको मार दिया जाए तो यह अकाल और सूखा खत्म हो सकता है लेकिन सम्राट मांधाता ने इसको स्वीकार नहीं किया और दूसरा उपाय पूछा तब ब्रह्म ऋषि अंगिरा ने उन्हें एकादशी व्रत करने को कहा जिसके फलस्वरुप चारों ओर घनघोर वर्षा हुई और जन जीवन सुखी हो गया तब से लेकर आज तक यह व्रत लगातार चल आ रहा है।
सनातन धर्म बहुत ही सरल प्राकृतिक और मानवता का धर्म है जिसको हर कोई अपना सकता है इसमें व्रत पूजा पाठ यज्ञ हवन अनुष्ठान सरल से सरल है और कठिन से कठिन भी है कठिन उनके लिए है जो ऋषि मुनि तपस्वी या धर्म के आचार्य हैं और गृहस्थ जीवन के लिए बहुत सरल है इस दिन सुबह स्नान ध्यान करके भगवान श्री हरि विष्णु की सोने चांदी तांबे किसी एक प्रतिमा को स्नान कर कर सफेद तकिया और चादर बिछाकर फूल माला धूप दीप के साथ सोने के लिए रख दिया जाता है जो 4 महीने तक लगातार सोते हैं इन चार महीना में सृष्टि का देखभाल भगवान शिव और माता पार्वती करती हैं यदि देवउठनी एकादशी को करने वाला व्यक्ति अपनी बुराई पाप छोड़कर सदाचार अपना ले और तामसी भोजन से दूर रहे जन कल्याण और मानवता के कार्य में लगा रहे तो उसकी न केवल मनोकामना पूरी होती है बल्कि भगवान श्री हरि विष्णु और माता महालक्ष्मी के दर्शन भी हो जाते हैं
लेकिन धर्म और आध्यात्मिक के अलावा इस व्रत का सबसे बड़ा वैज्ञानिक और दार्शनिक पक्ष भी हैं जो प्रकृति और पर्यावरण के अनुकूल है इन चार महीना में किसी भी प्रकार के मांगलिक और शुभ कार्य करने के लिए वर्जित किया गया है ।यद्यपि आजकल खरीदे गए धर्माचार्य और ज्योतिषी इस कालखंड में अनेक कार्यों को करने की अनुमति देते हैं लेकिन यह पूरी तरह से धर्म विज्ञान और दर्शन के विरुद्ध हैं ऐसा नहीं करना चाहिए अन्यथा उसका फल विनाशकारी होता है इस कालखंड में होने वाले विवाह मांगलिक कार्य किसी भी प्रकार की खरीद फरोक्त कभी सफल नहीं होती है जिस तरह से धन्वंतरि की जयंती को बर्तन और सोना चांदी वहां की खरीद से जबरदस्ती जोड़ दिया गया है और अक्षय तृतीया को भी इसी प्रकार से गलत ढंग से जोड़ा गया है जो पूरी तरह गलत है इसलिए किसी भी प्रकार से शुभ मांगलिक कार्य करने से बचें जो करना चाहता है उसे करने दें।
4 महीने श्री हरि विष्णु के योग माया में सोने और सभी शुभ मांगलिक कार्य को वर्जित करने का वैज्ञानिक और लोक हित में सबसे बड़ा कारण है कि इन चार महीनों में घनघोर बरसात होती है चारों तरफ पानी ही पानी रहता है रास्ते डूब जाते हैं चारों ओर खतरनाक और विषैला जीव जंतु सांप बिच्छू फैल जाते हैं जिनके काटने का डर होता है वातावरण में नकारात्मक ऊर्जा फैल जाती है सूर्य का प्रकाश और गर्मी बहुत कमजोर हो जाता है और व्यक्ति की पाचन शक्ति भी बहुत क्षीण हो जाती है सूर्य भी दक्षिणायन हो जाता है और विवाह के मंगल कारक शुक्र और बृहस्पति ग्रह भी अस्त रहते हैं या प्रभाव नहीं देते हैं व्यावहारिक रूप से भी इस समय शुभ विवाह और शुभ मांगलिक कार्य करना प्रकृति और विधि के विरुद्ध है इस समय अग्नि जलाने में बहुत कठिनाई होती है और सूखी लकड़ी सूखे उपले मिलना भी बड़ा मुश्किल होता हैऔर खुले में यज्ञ हवन होता है जो बरसात में संभव नहीं हो सकता इसलिए बड़ी ही कुशलता से धर्म और लोक व्यवहार तथा विज्ञान सम्मत ढंग से इस समय समस्त शुभ और मांगलिक कार्यों को वर्जित किया गया है जो बिल्कुल सही है ।
आज इतनी सुविधा होने के बाद भी इन चार महीना में शुभ कार्य और मांगलिक कार्य करना संभव नहीं है वह प्रकृति के द्वारा बाधित हो जाता है वातावरण में भी चारों ओर जीवाणु कीटाणु विषाणु रोगाणु फैले रहते हैं और भोजन फल फूल बहुत जल्दी खराब होता है इस समय पूजा सामग्री हवन सामग्री विभिन्न प्रकार की जड़ी बूटियां और पुष्प तथा अन्य चीज मिल पाना बहुत कठिन होता है इसलिए इस समय पूरे सावन महीने भर भगवान शिव की पूजा अर्चना होती है जिससे वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा फैलती है जिससे सांप बिच्छू और विषैले जीव जंतु ग्रामीण स्थान और मानव निवास स्थान से दूर हो जाते हैं और इस समय उपलब्ध बेल के पत्र से मुख्य पूजा की जाती है बेल के पत्र दूध शहद घी गन्ने के रस घी का मिट्टी से बने शिवलिंग पर अभिषेक करने से उसका पानी जल को शुद्ध करता है और उसकी सुगंध हानिकारक जीवाणु को मार कर खतरनाक विषैली चीजों को बाहर भगा देती है इन सभी वैज्ञानिक कर्म से ही चार महीने जब तक भगवान श्री हरि विष्णु योग निद्रा से जाग नहीं जाते हैं तब तक शुभ और मांगलिक कार्य संपन्न होना निषेध किया गया है
इस प्रकार हरिशयनी एकादशी या पद्मा एकादशी बहुत ही शुभ फल देने वाला महापर्व है और इस व्रत को विधि विधान से करने वालों की वे सभी इच्छाएं पूरी होती हैं जिनके वह पात्र होते हैं इतना अवश्य है कि उन्हें पवित्र होकर सदाचार पूर्वक पाप और बुराई छोड़ते हुए इस अनुष्ठान को करना चाहिए। बुराई और पाप पूर्ण ढंग से किया गया कोई भी व्रत पूजा पाठ यज्ञ हवन अनुष्ठान कभी भी सफल नहीं हो सकता है।
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