आषाढ़ मास की पूर्णिमा की रात बहुत ही घनघोर अंधेरे वाली होता है क्योंकि इस समय आसमान में घने काले बादल छाए रहते हैं इस पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा भी कहा जाता है इस समय चारों ओर वर्षा का वातावरण रहता है और चारों तरफ पानी भरा होने के कारण आना जाना सम नहीं रह जाता है इसलिए प्राचीन काल में आषाढ़ मास की एकादशी से लेकर कार्तिक मास की एकादशी तक चार महीने सभी शुभ और मंगल कार्य बंद रहते थे और लोग गहन अध्यात्म चिंतन और धर्म कर्म के प्रतिपादन में अपना समय घर में सुरक्षित गुफाओं में या जंगल के अंदर आश्रम में बिताया करते थे प्राचीन भारत में गुरु की महत्ता भगवान से भी बढ़कर बताई गई थी वेदों के संकलन और 18 पुराणों की रचना करने वाले महागुरु वेदव्यास का जन्म भी इसी दिन हुआ था इसी दिन ज्ञान प्राप्त के बाद भगवान गौतम बुद्ध ने सारनाथ में अपने शिष्यों को प्रथम उपदेश दिया था और इसी दिन महावीर स्वामी ने भी अपने शिष्य इंद्रभूति को प्रथम उपदेश दिया था इसलिए इस दिल को अद्भुत अनुपम माना जाता है।
गुरु का अर्थ केवल शिक्षक ही नहीं होता है जो एक संपूर्ण मानव का विकास करने वाली विद्या अपने शिष्यों में से और जो अपने शिष्यों के अंदर से अज्ञान अंधकार सत्य को दूर करते हुए उन्हें सत्य ज्ञान और प्रकाश से भर दें वही गुरु कहा जाता है और प्राचीन भारत में सचमुच ऐसा ही था गुरु और गुरु माता अपने शिष्यों को इतना योग्य बना देते थे कि वह अकेले ही नए युग का निर्माण कर सकते थे ब्रह्म ऋषि विश्वामित्र और वशिष्ठ महागुरु सांदीपनि गुरु तुकाराम और एकनाथ और राघवेंद्र प्रताप जैसे लोगों ने देश को रामकृष्ण शिवाजी महाराणा प्रताप और कबीर जैसी अनंत काल तक चलने वाली लंबी गुरु और शिष्य परंपरा दिया है जो आज भी चल रही है।
इस बारे में एक और तथ्य भी बहुत महत्वपूर्ण है कि इन चार महीना में भगवान विष्णु योग माया में ली हो जाते हैं और देवी लक्ष्मी उनकी सेवा करती हैं इन चार महीना में संपूर्ण ब्रह्मांड की देखभाल भगवान शिव माता पार्वती और गणेश जी करते हैं इसलिए इन चार महीना में इन तीनों की पूजा पाठ करने से व्यक्ति की मनोकामनाएं पूरी होती हैं और वह दीर्घायु स्वस्थ साहसी राष्ट्रभक्त और सनातन भक्त बनता है सावन महीना तो भगवान शिव जी का महीना है ही जिसमें उनकी पूजा अर्चना पूरे महीने भर होती है।
आषाढ़ मास में भी पूजा पाठ की वही विधि है जो विधि अन्य पर्व त्योहार की है सुबह उठकर नित्य क्रिया करें इसके बाद शुद्ध चित्र से स्नान करें यदि गंगाजल मिल जाए तो थोड़ा सा हल्दी और गंगाजल मिलाकर स्नान करें इसके बाद अपने गुरु और गुरुओं के आदि गुरु भगवान शिव और भगवती माता पार्वती का ध्यान करते हुए मानसिक पूजा करें अथवा पुष्प और माला से भी धूप दीप और गंध के साथ गुरुजनों की पूजा करें ईश्वर की पूजा के साथ गुरुजनों की पूजा करें ईश्वर की पूजा करें गुरुजनों को जाकर अपनी शक्ति के अनुसार उपहार सम्मान देते हुए उनका आशीर्वाद प्राप्त करें वेदव्यास कबीर दास तुलसीदास सहित संपूर्ण साहित्य में गुण की महिमा भरी पड़ी है और गुण का सम्मान आशीर्वाद प्राप्त करके अपने घर शांत चित्त से चिंतन करें देश और धर्म के लिए अपना सब कुछ न्योछावर करने और दीन दुखी की सेवा करें कन्याओं और महिलाओं की सुरक्षा का भर लें ऐसा करने से गुरु पूर्णिमा पर निश्चित रूप से समस्त मनोकामनाएं पूरी होती हैं
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