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Friday, 2 October 2026

अत्यंत कठिन जीवत्पुत्रिका का महाव्रत डॉ दिलीप कुमार सिंह मौसम विज्ञानी ज्योतिष शिरोमणि

अत्यंत कठिन जीवत्पुत्रिका का महाव्रत डॉ दिलीप कुमार सिंह मौसम विज्ञानी ज्योतिष शिरोमणि

यह व्रत क्या है और कौन रहती है 

जीवित्पुत्रिका या जिउतिया का महा व्रत अत्यंत कठिन व्रत होता है इसे क्वार महीने की अष्टमी तिथि कृष्ण पक्ष को मनाया जाता है यह व्रत माताएं अपने पुत्र के दीर्घायु सुख शांति समृद्धि यश कीर्ति के लिए रखती है यह तीन दिनों का व्रत होता है जिसमें मुख्य व्रत दूसरे दिन शुरू होता है जो बिना अन्न जल ग्रहण किया किया जाता है आश्विन महीने के भीषण गर्मी में इस व्रत को रख पाना बहुत ही कठिन होता है इसी से एक नारी और मां की महिमा और महत्व को समझा जा सकता है इस वर्ष या व्रत शनिवार  के दिन पड़ रहा है और अंग्रेजी तिथि 3अक्टूबर है यह 2 अक्टूबर  को ही प्रारंभ हो जाएगा 3अक्टूबर को मुख्य निर्जला व्रत है और 4अक्टूबर को सुबह 7ः15 के बाद इसका पारण है।

व्रत करने का स्थान और विधि 

जिउतिया या जीवित्पुत्रिका का महा व्रत तीन दिनों का होता है पहले दिन अर्थात 13 सितंबर को सात्विक भोजन बनाकर पितरों और पक्षियों को अर्पित किया जाता है और सादा भोजन ही किया जाता है दूसरे दिन अर्थात मुख्य व्रत 3 अक्टूबर को आश्विन कृष्ण पक्ष अष्टमी को रविवार के दिन है जब सूर्योदय से पहले ही स्नान करके निर्जला व्रत प्रारंभ किया जाता है किसी साफ सुथरा स्थान को गोबर और मिट्टी से लीप पोत कर उसके बीच में एक जल का कुंड बनाया जाता है उसमें पानी भरकर भगवान जीमूतवाहन की कुशकी निर्मित एक प्रतिमा बनाई जाती हैं जो जलकुंड के बीच में रखा जाता है उसके अगल-बगल चील और सियारिन की प्रतिमा रखी जाती है उसके बाद सभी बैठकर भगवान  जीमूतवाहन की कथा सुनते हैं। 

जीवित्पुत्रिका व्रत की कथाएं 

इस व्रत में तीन कथाएं कही जाती हैं जो लोक जीवन और पुराणों में वर्णित हैं पहले और मुख्य कथा यह है कि जीमूतवाहन जो गंधर्व राजकुमार थे उनका मन राज पाठ में नहीं रहता था और इधर-उधर ज्ञान की खोज में घूमते रहते थे एक दिन संजोग से वह एक ऐसी जगह पहुंचे जहां पर रोना पीटना मचा हुआ था वहां पूछने पर उन्हें पता चला कि पक्षी राज गरुड़ प्रतिदिन आकर एक नाग को खा लेते हैं संजोग से उस दिन जिस नाग की बारी थी वह अपने घर में अकेला पुत्र था इसलिए उसकी मां जोर-जोर से रो रही उसे आश्वस्त करते हुए जीमूतवाहन ने स्वयं को उसकी जगह भगवान गरुड़ को समर्पित कर दिया जब गरुड़ ने खाने के लिए चोंच मारी और मानव का मांस निकला तब वह नाग की जगह एक पुरुष देखकर आश्चर्यचकित हो गया सारी कथा सुनकर गरुड़ देव प्रसन्न हो गए और वरदान मांगने को कहा इस पर जीमूतवाहन ने सभी नागों को अभय दान मांगा और मरे हुए नागों को जीवित करने की प्रार्थना की और गरुड़ देव ने प्रसन्न होकर वैसा ही किया ऐसा करके जीमूतवाहन अमर हो गए और उन्हें देवता माना जाने लगा माना जाने लगा।

दूसरी कथा चील और सियारिन की है जो एक दूसरे को बहुत मानते थे संजोग से एक बार सियारी लेने जीवित्पुत्रिका व्रत किया लेकिन भूख बर्दाश्त न होने पर चोरी से हड्डियां खाने लगी इसके प्रभाव से उसे अनेक दुख कष्ट उठाने पड़े बाद में उसने जीवित्पुत्रिका व्रत करके पुत्र लाभ प्राप्त किया और अगले जन्म में चील और सियारिन दोनों राजकुमार और मंत्री की पत्नी बनी मंत्री की पत्नी चील को सुंदर स्वस्थ बच्चे होते थे यह देखकर सियारिन ने बच्चों का गला काट दिया और कागज में फेंक दिया लेकिन बच्चों का कुछ भी नहीं हुआ यह देखकर सियारिन ने जेल से क्षमा याचना की और कालांतर में उसके भी बच्चे पैदा हुए।

अगली कथा भगवान श्री कृष्ण से जुड़ी हुई है महाभारत युद्ध के बाद जब शैतान अश्वत्थामा ने उत्तर के गर्भ में ब्रह्मास्त्र चलाकर परीक्षित को मार डाला तब भगवान श्री कृष्ण ने अपने तेज से बालक को जिंदा कर दिया और इस प्रकार उनके जीवित पैदा होने पर अत्यंत प्रसन्नता से जिउतिया पर्व मनाया गया।

वैज्ञानिक एवं व्यावहारिक पक्ष भारत के सभी धर्म दर्शन अध्यात्म एवं लोक व्यवहार के कामों में सर्वश्रेष्ठ वैज्ञानिक पक्ष अवश्य जुड़ा रहता है जीवित्पुत्रिका का व्रत अत्यंत कठिन समय में किया जाता है जो महिलाओं को आपातकाल में किसी भी परिस्थिति में सुरक्षित और जीवित रखने में सहायक सिद्ध होता है जीवन में आने का ऐसी स्थितियां आती है जब महिलाओं को अपने मान सम्मान और अपने सतीत्व की रक्षा के लिए बिना खाए पिए चुपचाप छुपकर एक जगह पड़े रहना पड़ता है आपातकाल युद्ध कल अपराध हत्या लूट बलात्कार और आतंकवादी हमले में महिलाएं सबसे पहले और सबसे आसान शिकार सिद्ध होती है इसलिए उनको अनेक व्रत त्यौहार में इस तरह धर्म अध्यात्म की रक्षा करते हुए अपनी भी रक्षा करने का प्रशिक्षण दिया जाता है सचमुच सनातन धर्म परम अद्भुत और सबसे महान है जिसमें हर व्यक्ति का परमाणु से लेकर ईश्वर का जड़ और चेतन का नदी समुद्र पहाड़ का पूरा-पूरा ध्यान रखते हुए सब की पूजा किया जाता है इसके अलावा ऐसे व्रत जैसे करवा चौथ गणेश चतुर्थी हरितालिका तीज से स्त्रियों का शरीर और उनकी प्रतिरोधक क्षमता दोनों चरम शिखर पर पहुंच जाते हैं और निर्जल व्रत रहने से अनेक शारीरिक क्रियाएं फिर से पूरी ऊर्जा प्राप्त करके आगे बढ़ने लगते हैं और डीएनए आरएनए और कोशिकाएं पुनर्जीवन भी प्राप्त कर लेती है