Saturday, 3 October 2026

: एक और बात बहुत ही गहन विचार करने की है कि भारत ने जितने भी रजत पदक जीते हुए सभी स्वर्ण पदक में बदल सकते थे

: एक और बात बहुत ही गहन विचार करने की है कि भारत ने जितने भी रजत पदक जीते हुए सभी स्वर्ण पदक में बदल सकते थे

 यदि इस पर गहन प्रशिक्षण दिया गया होता और खिलाड़ियों को उचित खान-पान और सुविधा दी गई होती कुछ खेलों में तो यह अंतर इतना कम था जिसे आज भी बहुत अफसोस होता है जैसे निशानेबाजी में इलावेनेल केवल 0.6 अंक से स्वर्ण पदक गंवा दिया वहीं ईशा सिंह चीन के खिलाड़ी के बराबर 38-38 अंक पर थी लेकिन उन्हें रजत पदक मिला एंसी सोजन केवल 2 सेंटीमीटर से चीन से स्वर्ण पदक चूक गई गोला फेंक में तेजेंद्र पाल तूर केवल 17 सेमी से स्वर्ण पदक गंवा बैठे तो मैराथन में सावन बरणबाल 2 घंटे 11 मिनट 37 सेकंड का सर्वश्रेष्ठ समय निकालने के बाद भी समापन रेखा पर जापान से केवल कुछ सेकंड से पीछे रह गए वहीं पर ऊंची कूद में कुशारे 2.25 मी के साथ चैंपियन खिलाड़ी के बराबर थे लेकिन उनका भी स्वर्ण पदक नहीं मिला लगभग सभी 21 रजत पदक स्वर्ण में बदल सकते थे और हाहाकार मच सकता था लेकिन खेल मंत्रालय और खेल अधिकारियों की कमी के चलते ऐसा नहीं हो सका इसी तरह जिसने सारे एशियाई खेल ध्यान से मेरी तरह देखा है वह अच्छी तरह जानता है कि लगभग हर एक तीसरा स्थान दूसरे स्थान में और चौथा स्थान तीसरे स्थान में बदल सकता था क्योंकि बैडमिंटन तलवारबाजी टेनिस टेबल शाहिद अनेक खेलों में भारत बिल्कुल अंत में हार गया इसमें बहुत बड़ा कारण था जापान पहुंचने पर खिलाड़ियों को भोजन पानी और कमरे के लिए ठहरना पड़ा जिन जिनसे उनकी ले बिगड़ गई और यदि आप ध्यान से देखें तो प्रारंभ के 5 और 6 दिनों तक खिलाड़ियों ने सबसे खराब प्रदर्शन किया बाद में जब उनको सारी सुविधाएं मिली तब उन्होंने जी तोड़ प्रदर्शन किया और अनेक कीर्तिमान बनाया

 कब बदलेगी भारतीय खेलों की दिशा और कब बनेगा भारत चीन की तरह खेलों की विश्व शक्ति

यह बहुत ही गहन और विचारणीय प्रश्न है जो 149 करोड़ भारतीयों को हमेशा बहुत ही व्यथित करता रहता है कि आखिर छोटे-छोटे देश एशियाई राष्ट्रमंडल और विश्व तथा ओलंपिक खेलों और अन्य खेलों में हमसे बहुत आगे हैं  इसका कारण है कि हमारे यहां हवा हवाई नारेबाजी बहुत होती है मुंगेरीलाल के हसीन सपने भी खूब दिखाए जाते हैं खिलाड़ियों पर दिखाने के लिए पैसे और धन तो बहुत खर्च किया जाता है लेकिन उसका आधा भाग भी वास्तव में खर्च नहीं हो पता अधिकांश खिलाड़ी और खेल मंत्रालय कभी खेलों के रुचि में रहता ही नहीं ना कभी खिलाड़ियों से उनका बहुत अधिक संबंध रहता है और उसमें अधिकांश तो न खिलाड़ी होते हैं ना खेलों का क ख ग घ जानते हैं  वर्ष भर आराम से सोते हैं और जब एशियाई खेल राष्ट्रमंडल खेल विश्व खेल ओलंपिक खेल और विश्व कप जैसे खेल खेल नजदीक आते हैं तब सोते-सोते जाग जाते हैं और आधी अधूरी तैयारी के साथ खिलाड़ियों को खेलने के लिए भेज दिया जाता है इसका परिणाम सामने आ जाता है वैसे अधिकांश एशियाई खेलों का स्तर ओलंपिक खेलों से बहुत अधिक नीचे हैं इसलिए और ओलंपिक खेलों में भारत को एक स्वर्ण मिलना भी बहुत भारी पड़ता है और भारत हमेशा सर्वश्रेष्ठ 30 देश से भी नीचे रहता है

यही कारण है कि आज से तीन-चार वर्ष पहले हांगझोऊ चीन में जहां से चले थे वहीं पर फिर से आ गए स्थान तो चौथा हमने बरकरार रखा हमने लेकिन कुल स्वर्ण पदकों की संख्या में 7 स्वर्ण पदक की कमी हो गई और संपूर्ण पदक संख्या भी 107 से घटकर 85 पर आ गई जो 32 काम है जो बहुत ही लज्जा जनक दुखद और चिंताजनक है विशेष कर तब जब 4 साल तक खेलो इंडिया का हवा हवाई नारा मुंगेरीलाल के हसीन सपनों की तरह सारे भारत के प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में सब के सिर पर चढ़कर बोल रहा था और सभी लोग कम से कम दूसरा स्थान पाने की खयाली पुलाव मन में पकाए हुए बैठे थे वह तो भला हो की अंतिम समय में उज्बेकिस्तान स्वर्ण पदक का मुकाबला हार गया वरना भारत पांचवें स्थान पर होता क्योंकि उज्बेकिस्तान ने भी भारत के बराबर ही 21 स्वर्ण पदक प्राप्त किए थे और उसका रजत पदक भारत से केवल दो कम था  इस प्रकार भारत का मान सम्मान थोड़ा बहुत बच गया लेकिन 149 करोड़ देश वाले भारत के लिए यह बहुत ही लज्जा जनक और अफसोस जनक है ।

यदि हमें वास्तव में खेलों में आगे बढ़ाना है और एशियाई खेलों में दूसरे या तीसरे स्थान विश्व और ओलंपिक खेलों में दूसरे या तीसरे स्थान विश्व और ओलंपिक खेलों में सर्वश्रेष्ठ 10 स्थान में आना है तो हमें दुनिया भर के हवा हवाई नारे और विज्ञापन से हटकर यथार्थ की दुनिया में आना होगा और चीन जापान अमेरिका की तरह बहुत छोटी आयु से ही खिलाड़ियों को संपूर्ण प्रशिक्षण संपूर्ण सुविधाओं के साथ देना होगा और उनके पैसे और भोजन में लूटपाट बंद करनी होगी जैसे कि देश की आजादी से आज तक होता चला आ रहा है इस बात का प्रमाण है वह खिड़की जो की अपना खेत बेचकर आभूषण बेचकर या गिरवी रखकर उधार लेकर खेलने गए और एशियाई खेलों से पदक लेकर लौटे जबकि भारी भरकम सरकारी सुविधा पाने वाले खिलाड़ी बुरी तरह हार गए इस पर भी गहराई से ध्यान देना होगा नहीं तो इसी तरह हवा हवाई नारे टेलीविजन और समाचार पत्रों में नेताओं के भाषण में जारी रहेगा सबसे बड़ी बात हमें देशभक्ति का विकास करना होगा और अंग्रेजी तथा अंग्रेजी संस्कृति सभ्यता की छाया से निकलकर खेलो इंडिया की जगह खेलो भारत जैसी सभ्यता का विकास करना होगा

अंत में गहराई से निष्पक्ष विवेचना करते हुए यह कहा जा सकता है कि अंतिम दो दिनों में 6 और 5 स्वर्ण पदक प्राप्त करके भारतीय खिलाड़ियों ने किसी तरह भारत को अपमानित होने से बचा लिया और गोल्फ जैसे खेलों में स्वर्ण पदक जीत करतहल्का मचा दिया  एक बात ध्यान रखना होगा कि जिन खेलों में सबसे अधिक स्वर्ण पदक मिलते हैं उसमें हम कहीं नहीं हैं जिसमें एथलेटिक्स जिमनास्टिक तरह की साइकलिंग तलवारबाजी जैसी प्रतियोगिताएं हैं इस पर हमको बहुत गहराई से ध्यान देना होगा यदि सरकार खेल मंत्रालय और भारत के बुद्धिजीवी जरा भी गंभीर हैं तो अब लगाया जापान को आज से भूलकर आने वाली विश्व का ओलंपिक खेल और अगले एशियाई खेलों पर ध्यान देते हुए तत्काल ही इस पर गहराई से काम करना होगा वरना फिर एक के बाद एक हम फेल होते चले जाएंगे और फिर से खेलो इंडिया का नारा हवा हवाई सिद्ध होगा हमें चीन की तरह पूरी तैयारी के साथ उतर कर पूरी दुनिया को आश्चर्यचकित करते हुए विश्व और ओलंपिक खेलों में शीर्ष पांच स्थानों में आना ही होगा
[10/3, 10:31 PM] Dr  Dileep Kumar singh: भारत के खेलों का ढांचा इतना पक्ष पर पूर्ण और गलत आधार पर है कि जिनको इसके बारे में गहराई से नहीं मालूम पर विश्वास नहीं कर सकते हैं सबसे बड़ी बात यहां पर खिलाड़ियों का शोषण और यौन शोषण जमकर होता है और आवाज उठाने वालों का हाल इतना बड़ा होता है कि पुलिस प्रशासन तो दूर न्यायपालिका से भी उनको न्याय नहीं मिल पाता है इसलिए वह सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन नहीं कर पाए चाहे पुरुष हो या महिला हो दूसरी बात पक्षपात और भाई भतीजावाद है जो स्कूल कॉलेज से विश्वविद्यालय तक चलता रहता है और प्रशिक्षक लोगों को काफी पैसा या फिर शरीर की आवश्यकता होती है और काफी सिफारिश भी चाहिए होती है अन्यथा अच्छे से अच्छा खिलाड़ी भी क्लब स्तर तक सीमित रह जाता है इसके अतिरिक्त मुंबई दिल्ली और महानगरों के जो खिलाड़ी होते हैं उनको राष्ट्रीय स्तर पर जाने की संभावना अधिक होती है छोटे स्तर वाले अपने नगर क्षेत्र तक ही गायब हो जाते हैं क्योंकि उनको उठाने वाला कोई नहीं होता है नगर क्षेत्र तक ही गायब हो जाते हैं क्योंकि उनको उठाने वाला कोई नहीं होता है । खेलों में तानाशाही चरम पर होती है चाटुकार और चापलूस लोग आगे बढ़ते जाते हैं और स्वाभिमानी लोग दबा दिए जाते हैं और यह लोग विश्व और एशिया स्तर पर जाकर देश के ऊपर कलंक लगा देते हैं सबसे बड़ी बात देश के अधिकांश प्रतिभाएं गांव और सुदूर क्षेत्रों से निकलते हैं जिन्हें धन का और सुविधाओं का घोर अभाव होता है इस बारे में एशियाई खेलों में गए खिलाड़ियों के बारे में पढ़कर आप जान सकते हैं जौनपुर के रोहित यादव का उदाहरण भी ले सकते हैं किस तरह लोग उधार लेकर खेत बेचकर आभूषण रखकर अनेक कठिनाई सहन करके या अपने शरीर का सौदा करके संबंधित खेल अधिकारी राजनेता के आगे उनकी सही गलत मांगों को मान लिए तब जाकर खेलने जा पाए यहां प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया भी बहुत ही पक्षपाती है और 20 से लेकर 24 पृष्ठ के समाचार पत्र में केवल एक पृष्ठ खेलों से संबंधित होता है और उसमें भी कभी-कभी आधा पेज विज्ञापन दे दिया जाता है इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का हाल तो और भी खराब है खेल पर लेख लिखने वाले तो बहुत गिने चुने दिखाई पड़ते हैं और अच्छा लिखने वाले लोगों का छापा भी नहीं जाता है सामान्य जनता और बुद्धिजीवी लोगों की रुचि भी खेलों में बहुत कम है इन सब चीजों को दूर करके ही भारत खेलों की विश्व शक्ति बन सकता है।

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